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मुक्तामयपञ्चदशप्राकारस्थितदण्डिनीवाराहीध्यानम्

Muktamaya Panchadasha Prakara Sthita Dandini Varahi Dhyanam

मुक्तामयपञ्चदशप्राकारस्थितदण्डिनीवाराहीध्यानम्
॥ अथ मुक्तामयपञ्चदशप्राकारस्थितदण्डिनीवाराहीध्यानम् ॥ अथ मुक्ताख्यसालस्यान्तरे मारुतयोजने । सालोन्मरकताभिख्यश्चतुर्योजनमुच्छ्रतः ॥ १ ॥ पूर्ववद्गोपुरादीनां संस्थानैश्च सुशोभितः । सर्वाः स्थालीर्मरकतश्रेणिभिः खचिताः शुभाः ॥ २ ॥ हेमतालवनाढ्या च सर्ववस्तुसमाकुला । तत्र श्रीदण्डनाथाया दहनादिविदिग्गताः ॥ ३ ॥ चत्त्वारो निलयाः प्रोक्ताः मन्त्रिणीगृहविस्तृताः । किरिचक्ररथेन्द्रस्य याः पर्वाणि समाश्रिताः ॥ ४ ॥ भण्डासुरमहायुद्धे ता देव्यस्तत्र जाग्रति । जम्भिन्याद्याः चक्रदेव्यो हेतुकांश्चैव भैरवाः ॥ ५ ॥ सप्त निग्रहदेव्याश्च नृत्यन्ति मदविह्वलाः । चतुर्विदिक्षु दण्डिन्या यत्र यत्र महद्गृहम् ॥ ६ ॥ तत्रपूर्वादिदिग्भागे देवीसदृशवर्चसः । उन्मत्तभैरवी चैव स्वप्नेशी च तिरस्कृतिः ॥ ७ ॥ तथा किरीटिनी देवी सेवन्ते दण्डनायिकाम् । एषकक्ष्या मरकतप्रकृतिः सर्वतो दिशः ॥ ८ ॥ निवासो दण्डनाथायाः केवलं त्वाभिमानिकः । दण्डनाथा तत्र देवि शतस्तम्भाढ्यमण्डपे ॥ ९ ॥ कार्तस्वरमयाम्भोजकर्णिकामध्यसंस्थितम् । बिन्दुत्रिकोणवृत्ताढ्यं षड्दलवृत्तयुग्मकम् ॥ १० ॥ चक्रं विराजिते तत्र तप्तकाञ्चनसन्निभा । सन्ध्यारुणलसच्चेला सर्वाभरणमण्डिता ॥ ११ ॥ शङ्खचक्राभयवरान् हलं च मुसलं तथा । पाशाङ्कुशौ च दधती चन्द्ररेखावतंसिनी । वाराहवक्त्रसंयुक्ता दण्डिनी तत्र वर्तते ॥ १२ ॥ अस्य मुक्तामयदुर्गस्य पुरःस्थामरकतमयदुर्गस्य च अन्तरालभूतपञ्चदश्याः कक्ष्यायाः सुवर्णमयतालवणे किरिचक्रासने रथस्थदेवताभिः किरिचक्रासने दण्डिनीर्भूता वाराहीदेवी परिवारेण च समं निजायुधानि धृत्वा रक्षिका भूत्वास्ते ॥ १३ ॥ ॥ इति मुक्तामयपञ्चदशप्राकारस्थितदण्डिनीवाराहीध्यानं सम्पूर्णम् ॥

दण्डिनी वाराही ध्यान — श्रीपुर के गोपनीय रहस्य

श्रीविद्या उपासना पद्धति में भगवती ललिता महात्रिपुरसुन्दरी का दिव्य निवास "श्रीपुर" (श्रीनगर) कहा जाता है। यह नगर 25 प्राकारों (दुर्गों/किलेबंदी) से सुरक्षित है, जिनमें प्रत्येक दीवार लोहा, ताम्र, सीसा, पीतल, पञ्चलोह, रजत, स्वर्ण, पुष्पराग, पद्मराग, गोमेदक, वज्र, वैदूर्य, इन्द्रनील, मुक्ता, मरकत, विद्रुम, मणिमय, माणिक्य, नीलम आदि दिव्य रत्नों और धातुओं से बने हैं।
इस ध्यान में 15वें प्राकार (मुक्तामय — मोतियों का दुर्ग) और उसके अंदर स्थित मरकत (पन्ने का) प्राकार के बीच की कक्ष्या (गलियारे) का अत्यंत विस्तृत और रहस्यमय वर्णन दिया गया है। इन दोनों दुर्गों के बीच एक योजन (लगभग 12 किलोमीटर) का विशाल अंतराल है, जो सुवर्णमय ताल-वनों (सोने के तालवृक्षों के जंगलों) से भरपूर है।
इस कक्ष्या में दण्डनाथा वाराही का शतस्तम्भाढ्यमण्डप (100 खम्भों वाला भव्य मण्डप) है, जिसमें कार्तस्वर (तपे हुए सोने) से निर्मित कमल की कर्णिका (बीजकोष) के मध्य में एक विशेष चक्र विराजमान है। इस चक्र की संरचना — बिन्दु, त्रिकोण, वृत्त, षड्दल और दो वृत्त — ठीक उसी प्रकार है जैसा वाराही यंत्र का स्वरूप होता है।
देवी का स्वरूप "तप्तकाञ्चनसन्निभा" (तपे हुए सोने के समान तेजस्वी) है। वे सन्ध्यारुण (सन्ध्या की लालिमा के समान रक्तिम) वस्त्र धारण किए हुई हैं और सर्वालङ्कार भूषिता हैं। उनके आठ हाथों में शंख, चक्र, अभय, वरद, हल, मुसल, पाश और अंकुश हैं। चन्द्ररेखा उनके मस्तक पर अवतंस (सिरे की शोभा) के रूप में सुशोभित है और उनका मुख वराह (वराह का मुख) स्वरूप है।

किरिचक्र रथ और परिवार देवियाँ

किरिचक्र रथ: किरिचक्र दण्डनाथा वाराही का प्रसिद्ध युद्ध-रथ है। श्लोक 4-5 में बताया गया है कि इस रथ के विभिन्न पर्वों (भागों) पर जो देवियाँ आश्रित हैं, वे भण्डासुर के महायुद्ध में सदैव जाग्रत रहती हैं। जम्भिन्यादि चक्रदेवियां और हेतुक भैरव इस रथ की शक्तियां हैं।
सप्त निग्रहदेवियाँ: सात विशेष देवियाँ हैं जो मद-विह्वल (शक्ति के नशे में चूर) होकर नृत्य करती हैं (श्लोक 6)। यह शत्रुओं के सम्पूर्ण दमन और निग्रह का प्रतीक है — ये शक्तियाँ बृहद् वाराही स्तोत्र में भी वर्णित हैं।
चार प्रमुख सेविका देवियाँ: चारों दिशाओं में दण्डनाथा वाराही की सेवा करने वाली देवियाँ हैं: 1. उन्मत्तभैरवी — उन्माद और भय उत्पन्न करने वाली शक्ति 2. स्वप्नेशी — स्वप्न और चेतना को नियंत्रित करने वाली 3. तिरस्कृति (तिरस्करिणी) — अदृश्यता और छुपने की शक्ति देने वाली 4. किरीटिनी — मुकुटधारिणी राज-शक्ति
ये चारों देवियाँ "देवीसदृशवर्चसः" — अर्थात् स्वयं देवी (वाराही) के समान तेज वाली हैं। इसका तात्पर्य है कि ये सामान्य परिचारिकाएं नहीं, बल्कि स्वतंत्र शक्ति-स्रोत हैं जो दण्डनाथा की आज्ञा में कार्य करती हैं।

ध्यान विधि और अनुष्ठान

ध्यान का उद्देश्य: यह ध्यान श्रीचक्र पूजा या नवावरण पूजा के दौरान किया जाता है। जब साधक श्रीचक्र के विभिन्न आवरणों की पूजा करते हुए वाराही के स्थान पर पहुंचता है, तब इस ध्यान से देवी के सम्पूर्ण स्वरूप का मानसिक दर्शन किया जाता है।
पाठ का समय: रात्रि काल (निशीथ), वाराही गायत्री के जप के बाद या अष्टोत्तरशतदिव्यनाम स्तोत्र पाठ के प्रारंभ में।
ध्यान प्रक्रिया: आँखें बंद करके पहले मुक्तामय (मोतियों की) दीवार की कल्पना करें → फिर मरकत (पन्ने की) दीवार → बीच में सुवर्ण ताल-वन → 100 खम्भों वाला मण्डप → स्वर्ण-कमल → उस पर चक्र → और अंत में तप्तकाञ्चनवर्णा, अष्टबाहु, वराहमुखी दण्डिनी देवी का साक्षात् दर्शन करें।
विशेष: श्लोक 13 (अन्तिम गद्य भाग) एक फलश्रुति सारांश है — इसमें स्पष्ट कहा गया है कि वाराही देवी इस स्थान पर "रक्षिका भूत्वास्ते" (रक्षिका बनकर विराजमान हैं)। अतः इस ध्यान से साधक को सम्पूर्ण सुरक्षा कवच प्राप्त होता है।

इस ध्यान के प्रमुख लाभ

1. अभेद्य सुरक्षा कवच: मुक्ता (मोती) और मरकत (पन्ने) के दो प्राकारों के बीच देवी स्वयं रक्षिका बनकर बैठी हैं — इस ध्यान से साधक के चारों ओर अदृश्य सुरक्षा-घेरा बन जाता है।
2. तांत्रिक बाधाओं से मुक्ति: किरिचक्र रथ की देवियां और सप्त निग्रहदेवियां शत्रुओं के तंत्र-प्रयोगों को ध्वस्त कर देती हैं।
3. श्रीविद्या साधना में प्रगति: यह ध्यान श्रीचक्र पूजन का अंग है। इसके नियमित अभ्यास से नवावरण पूजा की गहराई बढ़ती है।
4. अदृश्यता और गोपनीयता: तिरस्कृति (तिरस्करिणी) देवी का आशीर्वाद साधक को शत्रुओं की दृष्टि से ओझल रखता है (तिरस्करिणी ध्यान)।
5. स्वप्न-सिद्धि: स्वप्नेशी देवी की कृपा से साधक को स्वप्न में दिव्य दर्शन और भविष्य-ज्ञान की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. मुक्तामय पञ्चदश प्राकार दण्डिनी वाराही ध्यान क्या है?

यह श्रीपुर के 15वें प्राकार (मुक्ता/मोती के दुर्ग) में विराजमान दण्डनाथा वाराही देवी का ध्यान श्लोक है, जो श्रीविद्या परंपरा में अत्यंत गोपनीय और पवित्र माना जाता है।

2. श्रीपुर क्या है?

श्रीपुर ललिता महात्रिपुरसुन्दरी देवी का दिव्य नगर है, जो 25 प्राकारों (दुर्गों/किलेबंदी की दीवारों) से घिरा हुआ है। प्रत्येक प्राकार विभिन्न रत्नों और धातुओं से बना है।

3. दण्डनाथा कौन हैं?

दण्डनाथा, वाराही देवी का दूसरा नाम है। वे ललिता देवी की सेनापति (दण्ड = सेना) हैं और किरिचक्र रथ पर आसीन होकर भण्डासुर से युद्ध करती हैं।

4. किरिचक्र रथ क्या है?

किरिचक्र वाराही देवी का दिव्य युद्ध-रथ है। इसमें विभिन्न देवियां (जम्भिनी आदि) विराजमान रहती हैं और भण्डासुर के साथ महायुद्ध में इसी रथ का उपयोग किया गया।

5. इस ध्यान में कौन-कौन से प्राकारों का वर्णन है?

मुख्य रूप से मुक्तामय (मोती का) 15वां प्राकार और उसके अंदर का मरकत (पन्ना) प्राकार — दोनों का विस्तृत वर्णन है।

6. उन्मत्तभैरवी, स्वप्नेशी, तिरस्कृति, किरीटिनी कौन हैं?

ये चार देवियां दण्डनाथा वाराही की प्रमुख सेविकाएं हैं जो चारों दिशाओं में उनकी सेवा करती हैं। प्रत्येक का अपना विशिष्ट तांत्रिक कार्य है।

7. इस ध्यान का पाठ कब करना चाहिए?

श्रीविद्या उपासना के दौरान, विशेषकर वाराही दीक्षा के बाद। रात्रि काल, पंचमी या अमावस्या इसके लिए शुभ है।

8. वाराही देवी के अस्त्र कौन-कौन से हैं?

इस ध्यान में देवी के आठ हाथों में शंख, चक्र, अभय, वरद, हल, मुसल, पाश और अंकुश — ये अष्ट आयुध बताए गए हैं।

9. जम्भिनी और निग्रहदेवियां कौन हैं?

जम्भिनी (जड़ करने वाली) किरिचक्र रथ की प्रमुख देवी हैं। सात निग्रहदेवियां शत्रुओं का दमन करती हैं और मद-विह्वल होकर नृत्य करती हैं।

10. क्या बिना दीक्षा के यह ध्यान पढ़ सकते हैं?

ध्यान श्लोक के रूप में इसे पढ़ने और सुनने में कोई बाधा नहीं है। किंतु इसका पूर्ण तांत्रिक अनुष्ठान दीक्षित साधकों के लिए ही विहित है।