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श्री वाराही ध्यान श्लोकाः

Sri Varahi Dhyana Slokah — द्वादश वाराही के 12 गोपनीय ध्यान श्लोक

श्री वाराही ध्यान श्लोकाः
॥ श्री वाराही ध्यान श्लोकाः ॥ १) वार्ताली (Vartali) रक्ताम्भोरुहकर्णिकोपरिगते शावासने संस्थितां मुण्डस्रक्परिराजमानहृदयां नीलाश्मसद्रोचिषम् । हस्ताब्जैर्मुसलं हलाऽभयवरान् सम्बिभ्रतीं सत्कुचां वार्तालीमरुणाम्बरां त्रिनयनां वन्दे वराहाननाम् ॥ वार्ताली वाराही देव्यै नमः । २) अश्वारूढा (Ashvarudha) रक्तामश्वाधिरूढां शशिधरशकलाबद्धमौलिं त्रिनेत्रां पाशेनाबध्य साध्यां स्मरशरविवशां दक्षिणेनानयन्तीम् । हस्तेनान्येन वेत्रं वरकनकमयं धारयन्तीं मनोज्ञां देवीं ध्यायेदजस्रं कुचभरनमितां दिव्यहाराभिरामाम् ॥ अश्वारूढा वाराही देव्यै नमः । ३) धूम्र वाराही (Dhumra Varahi) वाराही धूम्रवर्णा च भक्षयन्ती रिपून् सदा । पशुरूपान् मुनिसुरैर्वन्दितां धूम्ररूपिणीम् ॥ धूम्र वाराही देव्यै नमः । ४) अस्त्र वाराही (Astra Varahi) नमस्ते अस्त्रवाराहि वैरिप्राणापहारिणि । गोकण्ठमिव शार्दूलो गजकण्ठं यथा हरिः ॥ शत्रुरूपपशून् हत्वा आशु मांसं च भक्षय । वाराहि त्वां सदा वन्दे वन्द्ये चास्त्रस्वरूपिणी ॥ अस्त्र वाराही देव्यै नमः । ५) सुमुखी वाराही (Sumukhi Varahi) गुञ्जानिर्मितहारभूषितकुचां सद्यौवनोल्लासिनीं हस्ताभ्यां नृकपालखड्गलतिके रम्ये मुदा बिभ्रतीम् । रक्तालङ्कृतिवस्त्रलेपनलसद्देहप्रभां ध्यायतां नॄणां श्रीसुमुखीं शवासनगतां स्युः सर्वदा सम्पदः ॥ सुमुखी वाराही देव्यै नमः । ६) निग्रह वाराही (Nigraha Varahi) विद्युद्रोचिर्हस्तपद्मैर्दधाना पाशं शक्तिं मुद्गरं चाङ्कुशं च । नेत्रोद्भूतैर्वीतिहोत्रैस्त्रिनेत्रा वाराही नः शत्रुवर्गं क्षिणोतु ॥ निग्रह वाराही देव्यै नमः । ७) स्वप्न वाराही (Swapna Varahi) मेघश्यामरुचिं मनोहरकुचां नेत्रत्रयोद्भासितां कोलास्यां शशिशेखरामचलया दंष्ट्रातले शोभिनीम् । बिभ्राणां स्वकराम्बुजैरसिलतां चर्मासि पाशं सृणिं वाराहीमनुचिन्तयेद्धयवरारूढां शुभालङ्कृतिम् ॥ स्वप्न वाराही देव्यै नमः । ८) वश्य वाराही (Vashya Varahi) तारे तारिणि देवि विश्वजननी प्रौढप्रतापान्विते तारे दिक्षु विपक्षपक्षदलिनि वाचाचला वारुणी । लक्ष्मीकारिणी कीर्तिधारिणि महासौभाग्यसन्धायिनि रूपं देहि यशश्च सततं वश्यं जगत्यावृतम् ॥ वश्य वाराही देव्यै नमः । ९) किरात वाराही (Kirata Varahi) घोणी घर्घर निस्वनाञ्चितमुखां कौटिल्य चिन्तां परां उग्रां कालिमकालमेघपटलच्छन्नोरु तेजस्विनीम् । क्रूरां दीर्घविनील रोमपटलामश्रूयतामीश्वरीं ध्यायेत्क्रोडमुखीं त्रिलोकजननीमुग्रासि दण्डान्विता ॥ किरात वाराही देव्यै नमः । १०) लघु वाराही (Laghu Varahi) महार्णवे निपतितां उद्धरन्तीं वसुन्धराम् । महादंष्ट्रां महाकायां नमाम्युन्मत्तभैरवीम् ॥ मुसलासिलसद्घण्टाहलोद्यत्कर पङ्कजाम् । गदावरदसम्युक्तां वाराहीं नीरदप्रभाम् ॥ लघु वाराही देवतायै नमः । ११) बृहद्वाराही (Brihat Varahi) रक्ताम्बुजे प्रेतवरासनस्थामर्थोरुकामार्भटिकासनस्थाम् । दंष्ट्रोल्लसत्पोत्रिमुखारविन्दां कोटीरसञ्च्छिन्न हिमांशुरेखाम् । हलं कपालं दधतीं कराभ्यां वामेतराभ्यां मुसलेष्टदौ च । रक्ताम्बरां रक्तपटोत्तरीयां प्रवालकर्णाभरणां त्रिनेत्राम् । श्यामां समस्ताभरणं सृगाढ्यां वाराहि सञ्ज्ञां प्रणमामि नित्यम् ॥ बृहद्वाराही देवतायै नमः । १२) महावाराही (Maha Varahi) प्रत्यग्रारुणसङ्काशपद्मान्तर्गर्भसंस्थिताम् । इन्द्रनीलमहातेजः प्रकाशां विश्वमातरम् ॥ कदम्बमुण्डमालाढ्यां नवरत्नविभूषिताम् । अनर्घ्यरत्नघटितमुकुटश्रीविराजिताम् ॥ कौशेयार्धोरुकां चारुप्रवालमणिभूषणाम् । दण्डेन मुसलेनापि वरदेनाऽभयेन च ॥ विराजितचतुर्बाहुं कपिलाक्षीं सुमध्यमाम् । नितम्बिनीमुत्पलाभां कठोरघनसत्कुचाम् ॥ महावाराही देवतायै नमः ।

द्वादश वाराही ध्यान श्लोक — विस्तृत परिचय

श्री वाराही ध्यान श्लोकाः (Sri Varahi Dhyana Slokah) हिन्दू शाक्त-तांत्रिक परम्परा में एक अत्यंत गोपनीय और दुर्लभ रचना है। जहाँ अधिकांश स्तोत्रों में देवी के एक ही स्वरूप का वर्णन होता है, वहीं यह अद्वितीय संकलन माँ वाराही के 12 विभिन्न और विशिष्ट स्वरूपों (द्वादश वाराही) के ध्यान श्लोकों को एक स्थान पर प्रस्तुत करता है। प्रत्येक स्वरूप का अपना विशिष्ट रूप-वर्णन, आयुध (Weapons), वाहन, वर्ण (Colour) और विशिष्ट सिद्धि-क्षेत्र है — यही इस संकलन को वाराही उपासना में अमूल्य बनाता है।

तंत्र शास्त्र का मूल सिद्धान्त यह है कि देवी का ध्यान उनके विशिष्ट स्वरूप में करने से उस स्वरूप की विशिष्ट शक्ति साधक को प्राप्त होती है। जैसे — वार्ताली (Vartali) का ध्यान करने से वाणी सिद्ध होती है और वाक्‌‌शक्ति प्राप्त होती है; स्वप्न वाराही (Swapna Varahi) रात्रि में स्वप्न के माध्यम से भविष्य का ज्ञान और समस्याओं के उत्तर देती हैं; अश्वारूढा (Ashvarudha) अश्व पर सवार हैं — ये गति, विजय और तीव्र प्रगति की देवी हैं; निग्रह वाराही (Nigraha Varahi) नेत्रों से अग्नि प्रकट करती हैं — ये शत्रुओं का तत्काल विनाश करती हैं; और किरात वाराही (Kirata Varahi) वनवासी व्याध स्वरूप में भूमि, संपत्ति और प्राकृतिक बाधाओं से रक्षा करती हैं।

इन 12 स्वरूपों की संरचना भी अत्यंत विचारपूर्ण है। पहले 5 स्वरूप (वार्ताली, अश्वारूढा, धूम्र, अस्त्र, सुमुखी) मुख्यतः बाहरी शत्रुओं और बाधाओं से सम्बंधित हैं। स्वरूप 6-9 (निग्रह, स्वप्न, वश्य, किरात) आन्तरिक शक्तियों — ज्ञान, वशीकरण, दिव्य दृष्टि — से सम्बंधित हैं। और अंतिम 3 स्वरूप (लघु, बृहत्, महावाराही) देवी के सम्पूर्ण विश्व-व्यापी स्वरूप का ध्यान हैं — जहाँ वे महार्णव (महासागर) से पृथ्वी को उठाने वाली (लघु), प्रेतासन पर विराजमान रक्ताम्बरा (बृहत्), और इन्द्रनीलतेज से प्रकाशित विश्वमाता (महा) हैं।

वार्ताली का श्लोक सबसे विस्तृत है — इसमें देवी को लाल कमल की कर्णिका पर शवासन में विराजमान, मुण्डमाला धारण करने वाली, नीलमणि के समान कान्तिवाली, मुसल, हल, अभय और वर मुद्रा धारण करने वाली, अरुण वस्त्र पहनी, त्रिनेत्र और वराह-मुखी बताया गया है। यह वर्णन साधक को ध्यान के समय देवी का सम्पूर्ण मानसिक चित्रण (Visualization) करने में सहायता करता है — और यही ध्यान की वास्तविक शक्ति है।

महावाराही — 12वाँ और अंतिम स्वरूप — सर्वोच्च है। इसमें देवी प्रत्यग्रारुणसंकाश पद्म (ताजे लाल कमल) के गर्भ में विराजमान हैं, इन्द्रनीलमहातेज (नीलम के समान तेज) से प्रकाशित हैं, कदम्बमुण्डमाला और नवरत्न से विभूषित हैं, अनर्घ्यरत्न मुकुट से शोभित हैं, और दण्ड, मुसल, वरद और अभय मुद्रा — चार भुजाओं से सुशोभित हैं। यह स्वरूप सम्पूर्ण 11 स्वरूपों की शक्तियों का समष्टि-रूप है।

विशेष: ये 12 ध्यान श्लोक वाराही उपासना के सम्पूर्ण स्पेक्ट्रम को कवर करते हैं — शत्रु नाश (निग्रह, अस्त्र, धूम्र), वशीकरण (वश्य), भविष्य ज्ञान (स्वप्न), समृद्धि (सुमुखी), विजय (अश्वारूढा), भूमि रक्षा (किरात), और सर्वशक्ति (महावाराही)। साधक को अपनी विशिष्ट आवश्यकता के अनुसार सम्बंधित स्वरूप का ध्यान करना चाहिए।

प्रमुख स्वरूपों का महत्व (Significance of Forms)

स्वप्न वाराही (Swapna Varahi): यदि आप किसी प्रश्न का उत्तर स्वप्न में पाना चाहते हैं, तो रात्रि में सोने से पहले इस स्वरूप का ध्यान करें। मेघश्याम कान्ति, तीन नेत्र, कोल (वराह) मुख, चन्द्रशेखरा — ये इनका रूप है। 11-21 दिनों के अभ्यास से स्वप्न में सांकेतिक उत्तर मिलता है।

अश्वारूढा (Ashvarudha): लाल अश्व पर सवार, त्रिनेत्र, चन्द्रमौलि — ये पाश से शत्रु को बाँधकर लाती हैं। सेना, पुलिस, खेल (Sports) में विजय, करियर में गति (Speed/Progress) और प्रतियोगिताओं में सफलता के लिए ध्यान करें।

निग्रह और धूम्र वाराही: ये अत्यंत उग्र रूप हैं। निग्रह वाराही विद्युत-कान्ति हस्तों से पाश, शक्ति, मुद्गर और अंकुश धारण करती हैं — नेत्रों से अग्नि प्रकट होती है। धूम्र वाराही धूम्रवर्ण (धुएँ के रंग) की हैं जो शत्रुओं को पशु रूप में भक्षण करती हैं। केवल तीव्र संकट — शत्रु बाधा, तांत्रिक आक्रमण — में ही इनका ध्यान करें।

किरात वाराही (Kirata Varahi): वनवासी व्याध (Hunter) स्वरूप — उग्र, कालमेघ-कान्ति, क्रोडमुखी (वराह-मुख), उग्र असि-दण्ड धारिणी। भूमि विवाद, संपत्ति रक्षा, कोर्ट-कचहरी, जंगली/प्राकृतिक बाधाओं के निवारण के लिए ध्यान करें।

वश्य वाराही (Vashya Varahi): "रूपं देहि यशश्च सततं वश्यं जगत्यावृतम्" — रूप, यश और सम्पूर्ण जगत का वशीकरण। नेतृत्व, व्यापार, सम्बन्ध और सामाजिक प्रभाव-वृद्धि के लिए इनका ध्यान सर्वोत्तम है।

ध्यान विधि (Meditation Method)

संकल्प: सबसे पहले हाथ में जल लेकर संकल्प लें कि आप किस स्वरूप का और किस उद्देश्य से ध्यान कर रहे हैं। संकल्प से मन की दिशा निश्चित होती है और ध्यान की शक्ति बढ़ती है।

आसन: लाल आसन पर उत्तर मुख (धन/शांति के लिए) या दक्षिण मुख (शत्रु नाश के लिए) बैठें। देवी का चित्र या यंत्र सामने रखें।

प्रक्रिया: (1) नेत्र बंद करें और भ्रूमध्य (दोनों आँखों के बीच) में ध्यान लगाएं। (2) श्लोक में वर्णित देवी के रंग, वस्त्र, और आयुधों (Weapons) का मानसिक चित्रण (Visualization) करें। (3) श्लोक का 11 या 21 बार उच्चारण करें। (4) अंत में मानस पूजा (Mental Offering) कर देवी से आशीर्वाद मांगें।

समय: ब्रह्म मुहूर्त या रात्रि काल सर्वोत्तम। स्वप्न वाराही के लिए सोने से ठीक पहले। निग्रह/अस्त्र के लिए रात्रि। सुमुखी/वार्ताली के लिए प्रातःकाल। अष्टमी और अमावस्या विशेष फलदायी।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. द्वादश वाराही ध्यान श्लोक क्या हैं?

माँ वाराही के 12 प्रमुख स्वरूपों — वार्ताली, अश्वारूढा, धूम्र, अस्त्र, सुमुखी, निग्रह, स्वप्न, वश्य, किरात, लघु, बृहत् और महावाराही — के ध्यान श्लोक। प्रत्येक स्वरूप विशिष्ट सिद्धि और कामना-पूर्ति देता है।

2. क्या सभी 12 स्वरूपों का ध्यान एक साथ कर सकते हैं?

हाँ, नित्य पूजा में सभी 12 श्लोकों का क्रमशः पाठ कर सकते हैं — इसे 'द्वादश वाराही स्तोत्र' कहा जाता है। यह सम्पूर्ण सुरक्षा, समृद्धि और सर्वांगीण आत्मबल प्रदान करता है।

3. स्वप्न वाराही का ध्यान कैसे करें?

रात्रि में सोने से ठीक पहले स्वप्न वाराही श्लोक का 11 या 21 बार पाठ करें। मन में प्रश्न रखकर सोएं। लगातार 11-21 दिनों के अभ्यास से उत्तर स्वप्न में सांकेतिक रूप में प्रकट होता है।

4. किरात वाराही किस कार्य के लिए है?

किरात वाराही वनवासी व्याध स्वरूप हैं। भूमि विवाद, संपत्ति रक्षा, जंगली/प्राकृतिक बाधाओं का निवारण, कोर्ट-कचहरी के मामलों में विजय और प्रतिद्वंद्वी को पराजित करने के लिए इनका ध्यान किया जाता है।

5. निग्रह और धूम्र वाराही कब ध्यायें?

ये अत्यंत उग्र स्वरूप हैं। केवल शत्रु बाधा, तांत्रिक प्रयोग या जीवन पर तीव्र संकट होने पर ही ध्यान करें। ये तुरंत रक्षा कवच प्रदान करती हैं और शत्रुओं का नाश करती हैं। सामान्य स्थिति में सौम्य स्वरूपों का ध्यान करें।

6. क्या गुरु के बिना ध्यान कर सकते हैं?

सौम्य स्वरूपों (वार्ताली, स्वप्न, लघु, सुमुखी, वश्य) का ध्यान सामान्य साधक श्रद्धा से कर सकते हैं। लेकिन निग्रह, धूम्र और अस्त्र वाराही जैसे उग्र स्वरूपों का तीव्र ध्यान गुरु के मार्गदर्शन में ही करना उचित है।

7. अश्वारूढा वाराही किसके लिए है?

अश्वारूढा (अश्व पर सवार) देवी गति, विजय और तीव्र प्रगति की देवी हैं। सेना, पुलिस, खेल (Sports), प्रतियोगी परीक्षा, करियर में तेज उन्नति और किसी भी क्षेत्र में शीघ्र सफलता के लिए इनका ध्यान किया जाता है।

8. ध्यान का सही समय क्या है?

ब्रह्म मुहूर्त या रात्रि काल सर्वोत्तम। स्वप्न वाराही के लिए सोने से ठीक पहले। निग्रह/अस्त्र के लिए रात्रि। सुमुखी/वार्ताली के लिए प्रातःकाल। अष्टमी, अमावस्या और शुक्रवार विशेष फलदायी हैं।

9. महावाराही और बृहत्वाराही में अंतर क्या है?

बृहत्वाराही विस्तृत ध्यान — प्रेतासन, रक्ताम्बर, हल-कपाल-मुसल। महावाराही सर्वोच्च स्वरूप — पद्मासन, इन्द्रनीलतेज, कदम्बमाला, नवरत्न मुकुट, चतुर्भुजा। महावाराही सम्पूर्ण 11 स्वरूपों की शक्तियों की समष्टि है।

10. वश्य वाराही का ध्यान किसलिए?

वश्य वाराही वशीकरण, आकर्षण और प्रभाव-वृद्धि की देवी हैं। श्लोक में कहा — "वश्यं जगत्यावृतम्" — सम्पूर्ण जगत वश में हो। नेतृत्व, व्यापार, सम्बन्ध सुधार और सामाजिक प्रभाव बढ़ाने के लिए इनका ध्यान सर्वोत्तम है।