महावाराही अष्टोत्तरशतनामावलिः
Mahavarahi Ashtottarashatanamavali — देवी वाराही के 108 नाम

॥ अथ श्रीमहावाराह्यष्टोत्तरशतनामावलिः ॥
ॐ नमो वराहवदनायै नमः ।
ॐ नमो वाराह्यै नमः ।
ॐ वररूपिण्यै नमः ।
ॐ क्रोडाननायै नमः ।
ॐ कोलमुख्यै नमः ।
ॐ जगदम्बायै नमः ।
ॐ तरुण्यै नमः ।
ॐ विश्वेश्वर्यै नमः ।
ॐ शङ्खिन्यै नमः ।
ॐ चक्रिण्यै नमः ॥ १०॥
ॐ खड्गशूलगदाहस्तायै नमः ।
ॐ मुसलधारिण्यै नमः ।
ॐ हलसकादि समायुक्तायै नमः ।
ॐ भक्तानामभयप्रदायै नमः ।
ॐ इष्टार्थदायिन्यै नमः ।
ॐ घोरायै नमः ।
ॐ महाघोरायै नमः ।
ॐ महामायायै नमः ।
ॐ वार्ताल्यै नमः ।
ॐ जगदीश्वर्यै नमः ॥ २०॥
ॐ अन्धे अन्धिन्यै नमः ।
ॐ रुन्धे रुन्धिन्यै नमः ।
ॐ जम्भे जम्भिन्यै नमः ।
ॐ मोहे मोहिन्यै नमः ।
ॐ स्तम्भे स्तम्भिन्यै नमः ।
ॐ देवेश्यै नमः ।
ॐ शत्रुनाशिन्यै नमः ।
ॐ अष्टभुजायै नमः ।
ॐ चतुर्हस्तायै नमः ।
ॐ उन्मत्तभैरवाङ्गस्थायै नमः ॥ ३०॥
ॐ कपिलालोचनायै नमः ।
ॐ पञ्चम्यै नमः ।
ॐ लोकेश्यै नमः ।
ॐ नीलमणिप्रभायै नमः ।
ॐ अञ्जनाद्रिप्रतीकाशायै नमः ।
ॐ सिंहारूढायै नमः ।
ॐ त्रिलोचनायै नमः ।
ॐ श्यामलायै नमः ।
ॐ परमायै नमः ।
ॐ ईशान्यै नमः ॥ ४०॥
ॐ नील्यै नमः ।
ॐ इन्दीवरसन्निभायै नमः ।
ॐ कणस्थानसमोपेतायै नमः ।
ॐ कपिलायै नमः ।
ॐ कलात्मिकायै नमः ।
ॐ अम्बिकायै नमः ।
ॐ जगद्धारिण्यै नमः ।
ॐ भक्तोपद्रवनाशिन्यै नमः ।
ॐ सगुणायै नमः ।
ॐ निष्कलायै नमः ॥ ५०॥
ॐ विद्यायै नमः ।
ॐ नित्यायै नमः ।
ॐ विश्ववशङ्कर्यै नमः ।
ॐ महारूपायै नमः ।
ॐ महेश्वर्यै नमः ।
ॐ महेन्द्रितायै नमः ।
ॐ विश्वव्यापिन्यै नमः ।
ॐ देव्यै नमः ।
ॐ पशूनामभयकारिण्यै नमः ।
ॐ कालिकायै नमः ॥ ६०॥
ॐ भयदायै नमः ।
ॐ बलिमांसमहाप्रियायै नमः ।
ॐ जयभैरव्यै नमः ।
ॐ कृष्णाङ्गायै नमः ।
ॐ परमेश्वरवल्लभायै नमः ।
ॐ नुदायै नमः ।
ॐ स्तुत्यै नमः ।
ॐ सुरेशान्यै नमः ।
ॐ ब्रह्मादिवरदायै नमः ।
ॐ स्वरूपिण्यै नमः ॥ ७०॥
ॐ सुरानामभयप्रदायै नमः ।
ॐ वराहदेहसम्भूतायै नमः ।
ॐ श्रोणिवारालसे नमः ।
ॐ क्रोधिन्यै नमः ।
ॐ नीलास्यायै नमः ।
ॐ शुभदायै नमः ।
ॐ शुभवारिण्यै नमः ।
ॐ शत्रूणां वाक्स्तम्भनकारिण्यै नमः ।
ॐ कटिस्तम्भनकारिण्यै नमः ।
ॐ मतिस्तम्भनकारिण्यै नमः ॥ ८०॥
ॐ साक्षीस्तम्भनकारिण्यै नमः ।
ॐ मूकस्तम्भिन्यै नमः ।
ॐ जिह्वास्तम्भिन्यै नमः ।
ॐ दुष्टानां निग्रहकारिण्यै नमः ।
ॐ शिष्टानुग्रहकारिण्यै नमः ।
ॐ सर्वशत्रुक्षयकरायै नमः ।
ॐ शत्रुसादनकारिण्यै नमः ।
ॐ शत्रुविद्वेषणकारिण्यै नमः ।
ॐ भैरवीप्रियायै नमः ।
ॐ महामायाविनोदिन्यै नमः ॥ ९०॥
ॐ यन्त्ररूपायै नमः ।
ॐ तन्त्ररूपिण्यै नमः ।
ॐ पीठात्मिकायै नमः ।
ॐ देवदेव्यै नमः ।
ॐ श्रेयस्कारिण्यै नमः ।
ॐ चिन्तितार्थप्रदायिन्यै नमः ।
ॐ भक्तालक्ष्मीविनाशिन्यै नमः ।
ॐ सम्पत्प्रदायै नमः ।
ॐ सौख्यकारिण्यै नमः ।
ॐ महज्ज्वलन्त्यै नमः ॥ १००॥
ॐ स्वप्नवाराह्यै नमः ।
ॐ भगवत्यै नमो नमः ।
ॐ ईश्वर्यै नमः ।
ॐ सर्वाराध्यायै नमः ।
ॐ सर्वमयायै नमः ।
ॐ सर्वलोकात्मिकायै नमः ।
ॐ महिषनाशिन्यै नमः ।
ॐ बृहद्वाराह्यै नमः ॥ १०८॥
॥ इति वाराह्यष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णा ॥
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महावाराही अष्टोत्तरशतनामावलिः (Mahavarahi Ashtottarashatanamavali) देवी वाराही के 108 शक्तिशाली नामों का संग्रह है। 'अष्टोत्तरशत' का अर्थ है 108 (अष्ट = 8, उत्तर = अधिक, शत = 100)। प्रत्येक नाम स्वयं में एक पूर्ण मन्त्र है — 'ॐ' से प्रारम्भ और 'नमः' (मैं नमन करता/करती हूँ) से समाप्त। हिन्दू तांत्रिक परंपरा में 108 की संख्या अत्यंत पवित्र मानी जाती है — 108 उपनिषद, 108 मनके की माला, 108 मर्म स्थान — इसलिए 108 नामों का पाठ सम्पूर्ण फल प्रदान करता है।
वाराही देवी (Goddess Varahi) सप्तमातृकाओं (Seven Mother Goddesses) में से एक हैं — ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इन्द्राणी और चामुण्डा। भगवान विष्णु के वराह अवतार की शक्ति होने से इनका मुख वराह (सूअर) का है। श्रीविद्या परंपरा में वे ललिता त्रिपुरसुन्दरी की प्रधान सेनापति (दंडनाथा/Commander-in-Chief) मानी जाती हैं। जहाँ श्यामला (राजमन्त्रिणी) ललिता की मंत्री हैं, वहीं वाराही (दंडनाथा) उनकी सेना की प्रमुख हैं।
इन 108 नामों में देवी की समस्त शक्तियों का क्रमबद्ध वर्णन है। पहले 10 नामों में देवी का स्वरूप (वराहवदना, क्रोडानना, कोलमुखी) और आयुध (शङ्खिनी, चक्रिणी) वर्णित है। नाम 11-20 में खड्ग, शूल, गदा, मुसल, हल जैसे अस्त्र-शस्त्र और वार्ताली, जगदीश्वरी जैसी उपाधियाँ। नाम 21-30 में पाँच देवी नाम-जोड़े — अन्धे-अन्धिनी, रुन्धे-रुन्धिनी, जम्भे-जम्भिनी, मोहे-मोहिनी, स्तम्भे-स्तम्भिनी — ये पाँचों शत्रु की एक-एक शक्ति को नष्ट करते हैं। यही पाँच नाम वाराही मूल मन्त्र (114 अक्षरी) में भी प्रयुक्त हैं।
नाम 31-60 में देवी के दिव्य गुण — कपिलालोचना (गहरी भूरी आँखें), सिंहारूढा (सिंह पर सवार), त्रिलोचना (तीन नेत्र), श्यामला (गहरे रंग वाली), नीलमणिप्रभा (नीलमणि जैसी कांति), जगद्धारिणी (जगत को धारण करने वाली), विश्वव्यापिनी (सर्वव्यापी)। ये नाम देवी की सार्वभौमिक शक्ति को प्रकट करते हैं।
नाम 61-77 में उग्र स्वरूप — भयदा (भय देने वाली), बलिमांसमहाप्रिया (बलि और मांस प्रिय), जयभैरवी, कृष्णांगा (काले शरीर वाली), क्रोधिनी। और नाम 78-90 में इस नामावली की सबसे विशिष्ट शक्ति — सात प्रकार के स्तम्भन: (1) वाक्स्तम्भन — शत्रु की वाणी रोकना, (2) कटिस्तम्भन — शत्रु की गति रोकना, (3) मतिस्तम्भन — बुद्धि रोकना, (4) साक्षीस्तम्भन — गवाही रोकना (कोर्ट केस हेतु), (5) मूकस्तम्भन — मुँह बंद करना, (6) जिह्वास्तम्भन — जीभ रोकना, (7) निग्रह — सम्पूर्ण दमन।
अंतिम नाम 91-108 में तांत्रिक स्वरूप — यन्त्ररूपा (यन्त्र स्वरूपा), तन्त्ररूपिणी (तन्त्र स्वरूपा), पीठात्मिका (शक्ति पीठ), सम्पत्प्रदा (धन देने वाली), सौख्यकारिणी (सुख देने वाली), स्वप्नवाराही (स्वप्न में रक्षा), और अंत में बृहद्वाराही (महान वाराही) — 108वाँ नाम सबसे व्यापक।
विशेष ध्यान दें: नाम 84 — "दुष्टानां निग्रहकारिणी" (दुष्टों का दमन) और ठीक अगला नाम 85 — "शिष्टानुग्रहकारिणी" (सज्जनों पर कृपा)। इन दो नामों को लगातार रखने का गहरा अर्थ है — देवी वाराही एक ही समय में दुर्जनों का निग्रह और सज्जनों का अनुग्रह करती हैं। यही उनकी 'दंडनाथा' (न्यायकर्ता) प्रकृति है।
108 नामों के 6 प्रमुख लाभ — विशिष्ट नाम सहित
1. शत्रुनाश और विजय: "ॐ शत्रुनाशिन्यै नमः" (नाम 27), "ॐ सर्वशत्रुक्षयकरायै नमः" (नाम 86), "ॐ शत्रुसादनकारिण्यै नमः" (नाम 87), "ॐ शत्रुविद्वेषणकारिण्यै नमः" (नाम 88) — चार नाम केवल शत्रुनाश हेतु। कोर्ट केस, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, राजनीतिक विरोध — हर प्रकार के शत्रु पर निश्चित विजय।
2. सात प्रकार का स्तम्भन: इस नामावली की सबसे अद्वितीय शक्ति। नाम 78-83 में वाक्, कटि, मति, साक्षी, मूक, जिह्वा — छह प्रकार का स्तम्भन। कोर्ट में विरोधी पक्ष की गवाही (साक्षीस्तम्भन), वकील की दलील (वाक्स्तम्भन), और जज के सामने उनकी बुद्धि (मतिस्तम्भन) — सब अवरुद्ध। इसीलिए वाराही नामावली को 'कोर्ट केस का मन्त्र' भी कहा जाता है।
3. काले जादू और तंत्र से रक्षा: वाराही देवी तांत्रिक शक्तियों की अधिष्ठात्री हैं। "ॐ यन्त्ररूपायै नमः" (91), "ॐ तन्त्ररूपिण्यै नमः" (92) — स्वयं यन्त्र-तन्त्र स्वरूपा हैं। नियमित पाठ अभिचार (काला जादू), मारण, उच्चाटन, विद्वेषण प्रयोगों को तुरंत काटता है। बुरी नज़र और भूत-प्रेत बाधा का भी शीघ्र निवारण।
4. भूमि-संपत्ति लाभ: भगवान विष्णु ने वराह अवतार में पृथ्वी (भूदेवी) को हिरण्याक्ष राक्षस से बचाया था। वाराही उसी शक्ति का स्त्री रूप हैं — इसलिए भूमि विवाद, जमीन-जायदाद के मुकदमे, संपत्ति प्राप्ति और अचल सम्पत्ति (Real Estate) हेतु वाराही नामावली अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। "ॐ वराहदेहसम्भूतायै नमः" (72) — वराह शरीर से उत्पन्न।
5. सम्पत्ति, सुख और लक्ष्मी: "ॐ सम्पत्प्रदायै नमः" (98) — सम्पत्ति देने वाली। "ॐ सौख्यकारिण्यै नमः" (99) — सुख देने वाली। "ॐ भक्तालक्ष्मीविनाशिन्यै नमः" (97) — भक्तों की दरिद्रता (अलक्ष्मी) का नाश। गरीबी दूर, धन-सम्पत्ति प्राप्ति।
6. स्वप्न रक्षा और भय निवारण: "ॐ स्वप्नवाराह्यै नमः" (101) — स्वप्न में भी रक्षा करने वाली। बुरे सपने, रात्रि भय, अज्ञात आशंकाओं से मुक्ति। "ॐ भक्तानामभयप्रदायै नमः" (14) — भक्तों को अभय (निर्भयता) प्रदान।
क्रमबद्ध पाठ विधि — 108 नामार्चन कैसे करें?
चरण 1 — आसन और दिशा: लाल आसन पर उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें। सामने वाराही देवी का चित्र या यन्त्र स्थापित करें। दीपक (घी या सरसों तेल) और अगरबत्ती प्रज्वलित करें।
चरण 2 — सामग्री: 108 लाल पुष्प (गुड़हल सर्वोत्तम) या कुमकुम। लाल चंदन का तिलक। माला — रुद्राक्ष या लाल चंदन। भोग हेतु — अनार, उरद दाल, गुड़ या खीर। जल पात्र।
चरण 3 — संकल्प: जल हाथ में लेकर अपना नाम, गोत्र और इच्छित फल (शत्रुनाश/कोर्ट विजय/रक्षा आदि) बोलकर संकल्प करें। फिर जल पात्र में छोड़ें।
चरण 4 — अर्चन: प्रत्येक नाम "ॐ ... नमः" बोलकर एक लाल फूल या चुटकी कुमकुम देवी के चित्र/यन्त्र पर चढ़ाएं। यही 'नामार्चन' (नाम + अर्चन) कहलाता है। 108 नाम = 108 पुष्प।
चरण 5 — भोग और आरती: 108 नाम पूर्ण होने पर भोग (अनार/उरद/गुड़) अर्पित करें। दीपक से आरती करें। प्रार्थना करें और प्रसाद ग्रहण करें।
शुभ समय: रात्रि सर्वश्रेष्ठ — मध्यरात्रि (12 बजे) अत्यंत फलदायी। शुभ तिथि: पंचमी, अष्टमी, अमावस्या, नवरात्रि। शुभ वार: मंगलवार, शनिवार। बिना दीक्षा: हाँ, नामावली बिना गुरु दीक्षा के भी पढ़ सकते हैं — यह वाराही मूल मन्त्र (गुरु दीक्षा अनिवार्य) से सरल है।
FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. यह नामावली क्या है?
देवी वाराही के 108 शक्तिशाली नामों का संग्रह। प्रत्येक नाम 'ॐ' से प्रारम्भ और 'नमः' से समाप्त — प्रत्येक नाम एक मन्त्र।
2. पाठ कब करें?
रात्रि (मध्यरात्रि विशेष)। पंचमी, अष्टमी, अमावस्या और नवरात्रि शुभ।
3. क्या बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?
हाँ! नामावली बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं। मूल मन्त्र (114 अक्षर) के विपरीत, नामावली सर्वसुलभ है।
4. स्तम्भन शक्ति क्या है?
7 प्रकार के स्तम्भन (नाम 78-88): वाक् (वाणी), कटि (कमर), मति (बुद्धि), साक्षी (गवाही), मूक (मुँह), जिह्वा (जीभ) — शत्रुओं की सब शक्तियाँ रोक देना।
5. कोर्ट केस में लाभ?
शत्रुनाशिनी (नाम 27) + वाक्स्तम्भनकारिणी (78) + साक्षीस्तम्भनकारिणी (81) — विरोधी की गवाही, वाणी, बुद्धि स्तम्भित।
6. भूमि-संपत्ति लाभ कैसे?
वराह अवतार = पृथ्वी रक्षक। वाराही = पृथ्वी की शक्ति। भूमि विवाद, संपत्ति प्राप्ति, अचल सम्पत्ति हेतु विशेष।
7. पाठ विधि?
लाल वस्त्र, लाल चंदन, गुड़हल। अर्चन: प्रत्येक नाम पर फूल/कुमकुम। भोग: अनार, उरद, गुड़।
8. निग्रह और अनुग्रह?
नाम 84 = दुष्टों का दमन। नाम 85 = सज्जनों पर कृपा। वाराही दोनों कार्य एक साथ करती हैं।
9. सहस्रनाम से अंतर?
108 नाम = संक्षिप्त, नित्य जप। 1000 नाम = विस्तृत, विशेष अनुष्ठान। शुरुआत 108 से करें, फिर सहस्रनाम।
10. वार्ताली और दण्डनाथा?
वार्ताली (नाम 19) = वाणी नियंत्रित करने वाली। दण्डनाथा = ललिता की प्रधान सेनापति। दोनों वाराही के नाम।