श्री महावाराही अष्टोत्तरशतदिव्यनाम स्तोत्र
Sri Maha Varahi Ashtottara Shatadivyanama Stotram

॥ श्री महावाराही अष्टोत्तरशतदिव्यनाम स्तोत्र ॥
॥ विनियोगः ॥
अस्य श्रीमहावाराहीअष्टोत्तरशतदिव्यनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य ।
श्रीशिव ऋषिः ।
जगती छन्दः ।
श्रीमहावाराही देवता ।
ग्लौँ बीजम् ।
ऐँ शक्तिः ।
ठः ठः ठः ठः कीलकम् ।
श्रीमहावाराही प्रीतये जपे विनियोगः ॥
॥ ऋष्यादि न्यासः ॥
श्रीशिवऋषये नमः शिरसि ।
जगतीछन्दसे नमः मुखे ।
श्रीमहावाराहीदेवतायै नमः हृदि ।
ग्लौं बीजाय नमः गुह्ये ।
ऐं शक्तये नमः पादयोः ।
ठः ठः ठः ठः कीलकाय नमः नाभौ ।
श्रीमहावाराहीप्रीतये स्तोत्रपारायणे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।
इति ऋष्यादि न्यासः ॥
॥ करन्यासः ॥
ॐ ऐँ ग्लौँ ऐँ नमो भगवति वार्तालि वार्तालि अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ वाराही वाराही तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ वराहमुखि वराहमुखि मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ अन्धे अन्धिनि नमः अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ रुन्धे रुन्धिनि नमः कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ जम्भे जम्भिनि नमः मोहे मोहिनि नमः स्तम्भे स्तम्भिनि नमः सर्वदुष्टप्रदुष्टानां सर्वेषां सर्ववाक्चित्तचक्षुर्मुखगतिजिह्वास्तम्भनं कुरु कुरु शीघ्रं वश्यं ऐँ ग्लौँ ठः ठः ठः ठः हुँ अस्त्राय फट् करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः ॥
॥ अङ्गन्यासः ॥
ॐ ऐँ ग्लौँ ऐँ नमो भगवति वार्तालि वार्तालि हृदयाय नमः ।
ॐ वाराही वाराही शिरसे स्वाहा ।
ॐ वराहमुखि वराहमुखि शिखायै वषट् ।
ॐ अन्धे अन्धिनि नमः कवचाय हुँ ।
ॐ रुन्धे रुन्धिनि नमः नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ जम्भे जम्भिनि नमः मोहे मोहिनि नमः स्तम्भे स्तम्भिनि नमः सर्वदुष्टप्रदुष्टानां सर्वेषां सर्ववाक्चित्तचक्षुर्मुखगतिजिह्वास्तम्भनं कुरु कुरु शीघ्रं वश्यं ऐँ ग्लौँ ठः ठः ठः ठः हुँ अस्त्राय फट् अस्त्राय फट् ।
इति षडङ्गन्यासः ॥
॥ ध्यानम् ॥
वन्दे वराहवक्त्रां वरमणिमुकुटां विद्रुमश्रोत्रभूषाम् ।
हाराग्रैवेयतुङ्गस्तनभरनमितां पीतकैशेयवस्त्राम् ॥
देवीं दक्षोर्ध्वहस्ते मुसलमथपरं लाङ्गलं वा कपालम् ।
वामाभ्यां धारयन्तीं कुवलयकलितां श्यामलां सुप्रसन्नाम् ॥
॥ पञ्चपूजा ॥
लं पृथिव्यात्मिकायै गन्धं कल्पयामि नमः ।
हं आकाशात्मिकायै पुष्पं कल्पयामि नमः ।
यं वाय्वात्मिकायै धूपं कल्पयामि नमः ।
रं अग्न्यात्मिकायै दीपं कल्पयामि नमः ।
वं अमृतमहानैवेद्यं कल्पयामि नमः ।
सं सर्वात्मिकायै सर्वोपचारपूजां कल्पयामि नमः ।
॥ वाराही गायत्री मन्त्रः ॥
वराहमुख्यै विद्महे ।
दण्डनाथायै धीमहि ।
तन्नो अर्घ्नि प्रचोदयात् ॥
॥ श्री महावाराही अष्टोत्तरशतदिव्यनाम स्तोत्रम् ॥
नमस्तेस्तु महामाया वाराही नामधारिणी ।
कोलस्या च महारौद्री वज्रतुण्डधारिणी ॥ १ ॥
सहस्रसूर्यसङ्काशा तेजःपुञ्जसमन्विता ।
रुद्ररूपमहाघोरा घोररूपा भयङ्करी ॥ २ ॥
बन्धूकपुष्पसङ्काशा दाडिमी कुसुमोपमा ।
तीक्ष्णसिन्धूरसङ्काशा जपाकुसुमसन्निभा ।
यौवनस्था मदोन्मत्ता तुङ्गपीनपयोधरा ॥ ३ ॥
सर्वालङ्कारभूषाङ्गी मुण्डमालाविलम्बिनी ।
नेत्रत्रया रक्तघोराक्षी दंष्ट्राकरालभासुरा ॥ ४ ॥
चतुर्भुजधरा देवी अथ चाष्टभुजाधरी ।
दक्षिणे च हलं धृत्वा मुसलं वामकरे ॥ ५ ॥
वरदा वरधरा देवी नानालङ्कारमण्डिता ।
रक्ताम्भोजासना देवी प्रेतस्योपरिसंस्थिता ॥ ६ ॥
सर्वलक्षणसंयुक्ता सर्वावयवशोभिता ।
मद्यमांसप्रिया देवी मदिरानन्दवन्दिता ॥ ७ ॥
पूजिता सर्वलोकैस्तु त्रैलोक्ये सचराचरे ।
त्रिकोणाख्यमहाचक्रे संस्थिता विश्वयोगिनी ॥ ८ ॥
पञ्चकोणाख्यमहाचक्रे संस्थिता पञ्चदेवता ।
अन्धिनी रुन्धिनी चैव जम्भिनी मोहिनी तथा ॥ ९ ॥
स्तम्भिनी च समायुक्ता पूजनीया सदा बुधैः ।
बाह्यषट्कोणचक्रे च शृङ्गमध्ये तु पूजिता ॥ १० ॥
ईशानकोणमध्ये तु डाकिनी च प्रपूजिता ।
भक्षिणी त्वच्कर्माणि सर्वाणि क्षयकारिणी ॥ ११ ॥
अग्निकोणे च राकिन्या शत्रुरुधिरपायिनी ।
पश्चिमे कोणमासाद्य लाकिनी मांसभक्षिणी ॥ १२ ॥
काकिनी वायुकोणे तु अस्थिधातुं च भक्षिणी ।
पूर्वकोणे तु साकिन्या मेदोधातुं च गृह्णति ॥ १३ ॥
राक्षसी कोणमासाद्य हाकिनी मज्जभक्षिणी ।
याकिनी कुसुमालिन्या षडश्रपुरमध्यगा ॥ १४ ॥
शुक्लधातुं च भक्षन्ति कायसंहारकारिणी ।
इदं देव्या समाराध्य निग्रहानुग्रहात्मनि ॥ १५ ॥
पूजिता तु समाध्यात्वा सर्वसिद्धिकरी परा ।
मारणोच्चाटनकरी देवी कृष्णवर्णसुतेजसा ॥ १६ ॥
प्रेतस्योपरिमास्थाय भुजाष्टकं च धारिणी ।
खड्गं चक्रं च मुसलं वरदं दक्षिणे करे ॥ १७ ॥
खेटं शङ्खं हलं चैव अभयं वामके करे ।
मारणे सर्वभूतानां सर्वशत्रुक्षयङ्करी ॥ १८ ॥
पीता स्तम्भादियोगेन मोहने रक्तरूपिणी ।
बन्धनी रोदनी चैव कृष्णानलसमन्निभा ॥ १९ ॥
जम्भके धूम्रवर्णाभा स्फटिका मुक्तिहेतवे ।
सर्वकार्येषु रक्ताङ्गी सङ्ग्रामे कृष्णरूपधृक् ॥ २० ॥
पूजयेद्विविधाकारा अनेककोलमूर्तिभिः ।
आहवेषु च सर्वेषां निरष्टाहाररूपिणी ॥ २१ ॥
त्रैलोक्ये वन्दिता देवी उग्ररूपभयङ्करी ।
तुण्डप्रहारसम्पूर्णा घोरघुत्कारनादिनी ॥ २२ ॥
चर्वयन्ती महाशत्रुं कटकरायमण्डिता ।
रुधिरपानपीत्वा च मदाघूर्णितलोचना ॥ २३ ॥
नृत्यमाना महादेवी नित्यं श्मशानवासिनी ।
स्मरणात्सर्वसङ्कटहरा ॥ २४ ॥
॥ इति श्रीमहावाराही अष्टोत्तरशतदिव्यनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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श्री महावाराही अष्टोत्तरशतदिव्यनाम स्तोत्र की अपार महिमा
श्रीमहावाराही अष्टोत्तरशतदिव्यनाम स्तोत्र (Sri Maha Varahi 108 Divine Names Stotram) तंत्र शास्त्र का एक अत्यन्त गोपनीय और प्रचंड स्तोत्र है। सामान्य 108 नामावली केवल नामों का संकलन होती है, जबकि इस स्तोत्र में देवी वाराही के शक्ति स्वरूपों, उनके अस्त्रों (मुसल, हल, खड्ग) और उनके चक्रों (त्रिकोण, पंचकोण, षट्कोण) का सूक्ष्म व काव्यात्मक वर्णन श्लोकबद्ध किया गया है।
यह कोई साधन मात्र नहीं, बल्कि सम्पूर्ण तन्त्र-प्रयोग विधि (Tantrik Protocol) है। इसमें विनियोग (प्रतिज्ञा), ऋष्यादि अंगन्यास (सुरक्षा-कवच), करन्यास (हाथों में ऊर्जा स्थापना) और पञ्चपूजा (पांच तत्वों से मानसिक पूजा) का समावेश है। विशेष रूप से करन्यास व अङ्गन्यास में दिए गए मन्त्र — "अन्धे अन्धिनि, रुन्धे रुन्धिनि, जम्भे जम्भिनि, मोहे मोहिनि, स्तम्भे स्तम्भिनि..." शत्रु के वाणी, चित्त, चक्षु, मुख और गति का स्तम्भन (Paralysis) कर देने वाली घोर शक्तियां हैं।
श्लोकों में स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि देवी का वास श्मशान भूमि में भी है — जो अविद्या और शत्रु-शक्तियों का श्मशान है ("नृत्यमाना महादेवी नित्यं श्मशानवासिनी")। इस स्तोत्र में डाकिनी, हाकिनी, लाकिनी, काकिनी आदि उन यक्षिणियों/शक्तियों का उल्लेख है (श्लोक 11-15) जो दिशाओं में स्थित होकर साधक के शत्रुओं का निग्रह (सम्पूर्ण नाश) करती हैं।
महत्त्वपूर्ण निर्देश: चूँकि इस स्तोत्र में मारण, उच्चाटन और स्तम्भन (मारणोच्चाटनकरी देवी - श्लोक 16) का स्पष्ट उल्लेख है, इसका पाठ पूर्ण पवित्रता, समर्पण और किसी अनुभवी तंत्र-वेत्ता (गुरु) के मार्गदर्शन में ही करना उचित रहता है। केवल स्व-रक्षा (रक्षा-कवच) हेतु मानसिक या सामान्य पाठ किया जा सकता है।
स्तोत्र पाठ के 5 सबसे बड़े लाभ (Benefits)
1. प्रखर शत्रु निग्रह और वाक्-स्तम्भन: जो लोग आपके विरुद्ध षड्यंत्र रचते हैं या झूठे आरोप (कोर्ट-कचहरी) लगाते हैं, यह स्तोत्र उनके "वाक्, चित्त, चक्षु, मुख, गति" का स्तम्भन (ठप्प) कर देता है। देवी उनके कुतर्कों को नष्ट करती हैं।
2. मारण-उच्चाटन तंत्र की काट: यदि किसी ने साधक पर भयानक काला जादू, तांत्रिक मारण प्रयोग या अघोर-विद्या का प्रयोग किया हो, तो श्लोक 16-18 के अनुसार देवी स्वयं अपने अष्टबाहु रूप में आकर उसका संहार (रिवर्स) करती हैं।
3. चक्रों की जाग्रति (षडचक्र भेदन): इस स्तोत्र में त्रिकोण, पञ्चकोण (श्लोक 8-9) और विभिन्न शक्तियों (डाकिनी, लाकिनी आदि) का वर्णन है। यह सीधे साधक के षडचक्रों (मूलाधार से आज्ञा चक्र तक) को जागृत कर कुंडलिनी को ऊर्ध्व गति देता है।
4. अजेय आत्मविश्वास और तेज: देवी का तेज "सहस्रसूर्यसङ्काशा तेजःपुञ्जसमन्विता" (हजारों सूर्यों के समान) है। नियमित पाठ साधक के भीतर भयंकर आत्मविश्वास, निर्भयता और पराक्रम भर देता है।
5. सर्वसङ्कट हरण: अंतिम श्लोक की घोषणा है — "स्मरणात्सर्वसङ्कटहरा" (केवल स्मरण मात्र से सभी भयंकर संकट दूर हो जाते हैं)। घोर विपत्ति, मृत्यु-तुल्य कष्ट या दुर्घटना से बचाव हेतु यह ढाल है।
स्तोत्र-पारायण की प्रमाणित विधि
दिशा और समय: रात्रि वेला (8 PM के बाद) या निशीथ काल (मध्यरात्रि)। दिशा दक्षिण या पश्चिम की ओर मुख करके बैठें।
आसन और परिधान: गहरे रंग (विशेषकर लाल या काला) का ऊनी आसन। देवी को रक्तपुष्प (गुड़हल/जपाकुसुम) अत्यधिक प्रिय है ("जपाकुसुमसन्निभा")।
न्यास क्रम (अति आवश्यक): पाठ आरम्भ करने से पूर्व हाथ में जल लेकर विनियोग करें, फिर सिर, मुख, हृदय, नाभि आदि अंगों का स्पर्श करते हुए ऋष्यादि न्यास तथा अङ्ग/कर न्यास अवश्य करें। यहीं से ऊर्जा लॉक (Lock) होती है।
पञ्चोपचार पूजा: श्लोकों से पूर्व दी गई 'पञ्चपूजा' विधि से मानसिक गंध, पुष्प, धूप, नैवेद्य चढ़ाकर ध्यान श्लोक "वन्दे वराहवक्त्रां..." का पाठ करते हुए देवी की छवि का एकाग्र चिंतन करें।
अनुष्ठान: विशेष कार्य सिद्धि (जैसे विजय प्राप्ति) हेतु 11 या 21 दिनों तक नित्य रात्रिकाल में लाल चंदन की माला से संकल्प सहित स्तोत्र का 11 या 21 बार पाठ करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्री महावाराही अष्टोत्तरशतदिव्यनाम स्तोत्र क्या है?
यह देवी वाराही के 108 दिव्य नामों का श्लोकबद्ध स्तोत्र है, जो महान तांत्रिक शक्तियों को जागृत करता है और शत्रु शमन में अत्यंत प्रभावी है।
2. इस स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?
दीक्षित साधकों के लिए यह अत्यंत लाभकारी है। बिना दीक्षा के भी इसे श्रद्धापूर्वक पढ़ा जा सकता है, विशेषकर संकट की स्थिति में।
3. पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?
रात्रि काल (विशेषकर मध्यरात्रि) या संध्या के समय। पंचमी, अष्टमी, चतुर्दशी और अमावस्या इसके लिए विशेष सिद्ध मुहूर्त माने जाते हैं।
4. इस स्तोत्र में 'न्यास' का क्या महत्व है?
स्तोत्र से पूर्व ऋष्यादि, करन्यास और अङ्गन्यास शरीर और शक्तियों को जाग्रत कर दिशा-बंधन करते हैं, जिससे बाहरी नकारात्मक शक्तियां पाठ में बाधा नहीं डाल पातीं।
5. विनियोग (Viniyoga) का क्या अर्थ है?
विनियोग वह संकल्प है जो इस स्तोत्र के ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति और कीलक की पुष्टि कर पाठ का उद्देश्य स्पष्ट करता है।
6. इस स्तोत्र से कैसे लाभ मिलते हैं?
शत्रु स्तम्भन (बोलती बंद करना), तंत्र-मंत्र की काट, विरोधियों से सुरक्षा, कोर्ट-कचहरी में विजय और भयानक से भयानक संकटों से मुक्ति मिलती है।
7. क्या महिलाएँ इसका पाठ कर सकती हैं?
हाँ, देवी तो स्वयं स्त्री-तत्त्व का सर्वोच्च शिखर हैं। रजस्वला (मासिक धर्म) के दिनों में मानसिक पाठ करें या 5-7 दिन का विराम दें।
8. ध्यानम् श्लोक पाठ करना क्यों ज़रूरी है?
ध्यान श्लोक में देवी के वराह-मुख, मुकुट, अष्टबाहु रूप और श्याम रंग का चिंतन किया जाता है। बिना देवी के स्वरूप को मन में उतारे स्तोत्र का पूर्ण प्रभाव नहीं मिलता।
9. स्तोत्र में उल्लेखित डाकिनी, शाकिनी कौन हैं?
ये विभिन्न चक्रों और दिशाओं की यक्षिणी-शक्तियाँ हैं, जो अष्टोत्तरशत नामों के भीतर आकर शत्रुओं के दुष्प्रभावों का भक्षण कर साधक की रक्षा करती हैं।
10. पञ्चपूजा कैसे की जाती है?
यहाँ पञ्चपूजा मानसिक रूप से की जाती है — "लं" बीज से पृथ्वी तत्त्व (गंध), "हं" से आकाश तत्त्व (पुष्प) अर्पित कर देवी को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड ही नैवेद्य रूप में चढ़ाया जाता है।