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बृहद् वाराही स्तोत्रम्

Brihad Varahi Stotram — ब्रह्मा जी रचित विस्तृत स्तोत्र

बृहद् वाराही स्तोत्रम्
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ बृहद् वाराही स्तोत्रम् ॥ विनियोगः अस्य श्री बृहद्वाराहीस्तोत्रमहामन्त्रस्य। ब्रह्मा ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः। श्री वाराही देवता। ॐ बीजम्। ह्रीं शक्तिः। स्वाहा कीलकम्। मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः॥ ध्यानम् वाराहीं वरदां देवीं वराहासनसंस्थिताम्। पाशाङ्कुशधरां देवीं ध्यायेत् सर्वार्थसिद्धये॥ नीलोत्पलदलश्यामां वाराहवदनोज्ज्वलाम्। दंष्ट्राकरालवदनां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम्॥ मुद्गरं मुसलं पाशम् अङ्कुशं च कराम्बुजैः। बिभ्राणां भूषणैः स्निग्धां नानारत्नविराजिताम्॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ नमो वाराहि देव्यै च नमो भूतगणार्चिते। नमः सर्वस्वरूपायै नमो विघ्नविनाशिनि॥ १॥ नमो भूम्यै नमो देव्यै नमः शक्त्यै नमो नमः। नमो विष्णुप्रियायै च नमो यज्ञवराहिणि॥ २॥ नमो दंष्ट्राधरायै च नमो विश्वधरायिणि। नमः पातालवासिन्यै नमो भूधरधारिणि॥ ३॥ नमो वाराहमुख्यै च नमो योगेश्वरी प्रिये। नमो सङ्ग्रामदुर्गायै नमो मायाविनोदिनि॥ ४॥ नमो वज्रधरायै च नमो शूलधरायिणि। नमः खड्गधरायै च नमो दण्डधरायिणि॥ ५॥ नमश्चक्रधरायै च नमः शङ्खधरायिणि। नमः पाशधरायै च नमो मुद्गरधारिणि॥ ६॥ नमो मुसलहस्तायै नमो हलधरायिणि। नमो भिण्डिपालहस्तायै नमो शक्तिधरायिणि॥ ७॥ नमस्ते जगदम्बायै नमस्ते परमात्मिके। नमस्ते योगनिद्रायै नमस्ते व्योमचारिणि॥ ८॥ नमः स्थूलतनवे देव्यै नमः सूक्ष्मविहारिणि। नमो वामाधिदेव्यै च नमो ज्येष्ठाधिदेवते॥ ९॥ नमो रौद्र्यै नमो देव्यै नमो महाविभूतये। नमश्चण्डोग्ररूपायै नमो घोरविघातिनि॥ १०॥ नमो महिषवाहायै नमो गजविभूषिते। नमो रथविहारायै नमो अश्ववलाहिणि॥ ११॥ नमो ध्वजपताकिन्यै नमो भेरीनिनादिनि। नमो शङ्खप्रियायै च नमो नादप्रियायिणि॥ १२॥ नमो स्निग्धाङ्गधारिण्यै नमो रक्ताङ्गधारिणि। नमो कृष्णाङ्गधारिण्यै नमो धूम्राङ्गधारिणि॥ १३॥ नमो वज्रशरीरायै नमो वज्रनखायिणि। नमो वज्रप्रहारायै नमो वज्राङ्गधारिणि॥ १४॥ नमो रक्षाकरायै च नमो भक्तप्रियायिणि। नमो विघ्नविनाशिन्यै नमो दुःखविनाशिनि॥ १५॥ नमस्ते त्रिपुरेशान्यै नमस्ते जगदीश्वरि। नमस्ते ब्रह्मविद्यायै नमस्ते परमार्थिनि॥ १६॥ नमः पञ्चदशाक्षर्यै नमः षोडशपूजिते। नमस्ते ललिताकार्यै नमो श्रीचक्रवासिनि॥ १७॥ नमो दण्डिनि दण्डायै नमो वार्ताल्यै नमो नमः। नमो पोत्रिणि पोत्र्यै च नमो मातङ्गिके नमः॥ १८॥ ॥ फलश्रुति ॥ य इदं पठते स्तोत्रं बृहद्वाराहिसंज्ञकम्। स सर्वान् रिपुसङ्घान् वै जयत्येव न संशयः॥ त्रिसन्ध्यं पठते यस्तु मासमेकं समाहितः। तस्य शत्रुक्षयो भूयात् सर्वकार्यजयो भवेत्॥ षण्मासान्पठते यस्तु नित्यं भक्तिसमन्वितः। वाराही तस्य सुप्रीता भवेद्राज्यप्रदायिनी॥ वत्सरं पठते यस्तु सर्वसिद्धीश्वरो भवेत्। वाराहीं प्रणमेद्भक्त्या सर्वकामफलप्रदाम्॥ ॥ इति बृहद्वाराहीस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

बृहद् वाराही स्तोत्रम् — परिचय और उत्पत्ति

बृहद् वाराही स्तोत्रम् (Brihad Varahi Stotram) माँ वाराही देवी का सबसे विस्तृत और सम्पूर्ण स्तोत्र है। संस्कृत में 'बृहद्' का अर्थ है 'विस्तृत' या 'महान', जो इस स्तोत्र की व्यापकता को दर्शाता है। जहाँ अन्य वाराही स्तोत्र (जैसे किरात वाराही स्तोत्र) किसी एक विशिष्ट पहलू पर केंद्रित हैं, वहीं यह बृहद् स्तोत्र देवी के सम्पूर्ण स्वरूप — उनके आयुधों, वाहनों, रंगों, शक्तियों और तांत्रिक पहचान — का एक साथ वर्णन करता है।

इस स्तोत्र के ऋषि स्वयं ब्रह्मा जी हैं, छन्द अनुष्टुप् है, और देवता श्री वाराही हैं। विनियोग में कहा गया है कि इसका जप "सर्वाभीष्ट सिद्धि" (सभी मनोकामनाओं की पूर्ति) के लिए किया जाता है। ब्रह्मा जी का ऋषित्व इस स्तोत्र को विशेष महत्व देता है क्योंकि ब्रह्मा सृष्टि के रचयिता हैं और उनके द्वारा रचित स्तोत्र 'सृजनात्मक शक्ति' से ओत-प्रोत होता है।

विशेषता: यह एकमात्र वाराही स्तोत्र है जिसमें देवी को पाँच भिन्न-भिन्न शारीरिक वर्णों (स्निग्ध/गौर, रक्त/लाल, कृष्ण/काला, धूम्र/धूसर, और वज्र/सुनहरा) में वर्णित किया गया है (श्लोक 13-14), जो तांत्रिक साधना में पंचतत्वों और पंच-मकारों से संबंधित है।

18 श्लोकों का विश्लेषण — देवी के स्वरूप

इस स्तोत्र की संरचना अत्यंत व्यवस्थित है। 18 श्लोकों में देवी वाराही के 50 से अधिक दिव्य नाम आए हैं, जिन्हें विषयानुसार वर्गीकृत किया जा सकता है:

श्लोक 1-3 — मूल पहचान: देवी को भूतगणार्चिता (भूतगणों द्वारा पूजित), विष्णुप्रिया (विष्णु की प्रिय शक्ति), यज्ञवाराहिणी (यज्ञ की रक्षक), पातालवासिनी (पाताल में निवास करने वाली), और भूधरधारिणी (पृथ्वी को धारण करने वाली) कहा गया है। ये नाम भगवान वराह अवतार की शक्ति के रूप में देवी की पहचान स्थापित करते हैं।

श्लोक 4-7 — आयुध और शक्तियाँ: इन श्लोकों में देवी के 12 दिव्य आयुधों का वर्णन है — वज्र, शूल (त्रिशूल), खड्ग (तलवार), दण्ड, चक्र, शंख, पाश, मुद्गर, मूसल, हल, भिण्डिपाल (भाला), और शक्ति। यह आयुधों का सबसे विस्तृत वर्णन है जो किसी अन्य वाराही स्तोत्र में नहीं मिलता। प्रत्येक आयुध एक विशेष शक्ति का प्रतीक है — पाश बंधन (शत्रु स्तम्भन) का, चक्र कर्म-विनाश का, और मूसल दुष्ट शक्तियों को कुचलने का प्रतीक है।

श्लोक 8-10 — ब्रह्मांडीय स्वरूप: यहाँ देवी को जगदम्बा (विश्व-माता), परमात्मिका (परम चेतना), योगनिद्रा (विष्णु की योगनिद्रा शक्ति), और व्योमचारिणी (आकाश में विचरण करने वाली) कहा गया है। ये नाम देवी को केवल एक सुरक्षा देवी से ऊपर उठाकर परब्रह्म की शक्ति के रूप में स्थापित करते हैं।

श्लोक 11-14 — युद्ध स्वरूप और पंचवर्ण: देवी के चार वाहनों — महिष (भैंसा), गज (हाथी), रथ, और अश्व (घोड़ा) — का उल्लेख है। साथ ही देवी के पाँच शारीरिक वर्णों (स्निग्ध, रक्त, कृष्ण, धूम्र, वज्र) का वर्णन है, जो तांत्रिक पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से संबंधित है।

श्लोक 15-18 — श्री विद्या स्वरूप: यह सबसे महत्वपूर्ण खंड है। यहाँ देवी को त्रिपुरेशानी (त्रिपुरसुंदरी की शक्ति), ब्रह्मविद्या (परम ज्ञान), पञ्चदशाक्षरी (15 अक्षर मंत्र वाली), षोडशपूजिता (16 नित्या देवियों द्वारा पूजित), ललिताकार्या (ललिता के कार्य करने वाली), श्रीचक्रवासिनी (श्री चक्र में निवास करने वाली), और दण्डिनी (सेनापति) बताया गया है। ये नाम वाराही देवी को श्री विद्या परंपरा के केंद्र में स्थापित करते हैं।

श्री विद्या में वाराही का स्थान

श्री विद्या उपासना पद्धति में माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की दो प्रमुख सेनापतियाँ हैं — दण्डनाथा (वाराही) और मन्त्रिणी (श्यामला/मातंगी)। वाराही देवी को 'दण्डनाथा' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे ललिता देवी की सैन्य शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। जब भी भक्तों या साधकों पर कोई आक्रमण होता है, वाराही देवी अग्रिम पंक्ति में खड़ी होकर रक्षा करती हैं।

इसी कारण इस स्तोत्र के श्लोक 17 में देवी को "श्रीचक्रवासिनी" कहा गया है — अर्थात वे श्री चक्र यंत्र के भीतर सक्रिय रूप से निवास करती हैं। पञ्चदशी मंत्र (16 अक्षर) और षोडशी पूजन का उल्लेख भी श्री विद्या की उच्चतम साधना की ओर संकेत करता है। यह स्तोत्र श्री विद्या साधकों के लिए अत्यंत मूल्यवान है क्योंकि यह वाराही के तांत्रिक और भक्ति दोनों पहलुओं को एक साथ प्रस्तुत करता है।

फलश्रुति — समय अनुसार लाभ

इस स्तोत्र की फलश्रुति अत्यंत स्पष्ट और समयबद्ध है, जो इसे अन्य स्तोत्रों से विशिष्ट बनाती है:

  • तत्काल प्रभाव: "स सर्वान् रिपुसङ्घान् वै जयत्येव न संशयः" — जो इसका पाठ करता है, वह निश्चय ही सभी शत्रु-समूहों पर विजय प्राप्त करता है। यह तुरंत आत्मविश्वास और मानसिक बल प्रदान करता है।
  • एक मास (30 दिन): त्रिसंध्या (दिन में 3 बार) पाठ करने से शत्रुक्षय (शत्रुओं का पूर्ण विनाश) और सर्वकार्यजय (सभी कार्यों में सफलता) प्राप्त होती है।
  • छह मास (180 दिन): भक्तिपूर्वक नित्य पाठ से माँ वाराही प्रसन्न होकर राज्यप्रदायिनी बन जाती हैं — अर्थात सत्ता, प्रभुत्व, उच्च पद और सम्मान प्रदान करती हैं।
  • एक वर्ष (365 दिन): पूर्ण एक वर्ष का अखण्ड पाठ करने वाला साधक "सर्वसिद्धीश्वर" बन जाता है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

पाठ विधि (Sadhana Vidhi)

समय: त्रिसंध्या (सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्त) में पाठ सर्वोत्तम माना गया है। यदि तीन बार संभव न हो तो कम से कम प्रातः काल या रात्रि में एक बार अवश्य पाठ करें।

विशेष तिथियाँ: अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, अमावस्या और नवरात्रि काल में पाठ अत्यधिक फलदायी है। मंगलवार और शनिवार को भी विशेष प्रभाव मिलता है।

दिशा और आसन: शत्रु नाश हेतु दक्षिण दिशा की ओर मुख करें। सामान्य पूजा के लिए पूर्व दिशा उत्तम है। लाल या काले ऊनी आसन का प्रयोग करें।

माला: लाल चंदन, रुद्राक्ष या रक्त मूंगा की माला से 108 बार पाठ करना विशेष सिद्धि प्रदान करता है।

नैवेद्य: माँ वाराही को गुड़, तिल, काले उड़द की बड़ी, और मांसाहारी नैवेद्य (तांत्रिक विधि में) अत्यंत प्रिय है। सात्विक पूजा में गुड़ और तिल पर्याप्त है।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. बृहद् वाराही स्तोत्रम् क्या है?

बृहद् वाराही स्तोत्रम् माँ वाराही का सबसे विस्तृत स्तोत्र है जिसमें 18 श्लोकों में देवी के 50+ दिव्य नामों और शक्तियों का वर्णन है। 'बृहद्' का अर्थ है 'विस्तृत' या 'महान'। इसके ऋषि स्वयं ब्रह्मा जी हैं और छन्द अनुष्टुप् है।

2. इसके पाठ से क्या लाभ होते हैं?

फलश्रुति के अनुसार, एक मास के त्रिसंध्या पाठ से शत्रु नाश और सभी कार्यों में विजय, छह मास से राज्य सुख (सत्ता, प्रभुत्व), और एक वर्ष तक अखण्ड पाठ से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है।

3. बृहद् और लघु वाराही स्तोत्र में क्या अंतर है?

'बृहद्' का अर्थ है विस्तृत और 'लघु' का अर्थ है संक्षिप्त। बृहद् वाराही स्तोत्र में 18 श्लोक और 50+ नाम हैं, जबकि लघु स्तोत्र छोटा होता है। बृहद् स्तोत्र देवी के अधिक स्वरूपों को आवाहित करता है इसलिए इसका फल अधिक व्यापक होता है।

4. क्या इसे बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?

हाँ, यह मुख्यतः भक्ति-प्रधान स्तोत्र है जिसमें 'नमः' (नमस्कार) पद्धति से देवी की स्तुति की गई है। इसलिए सामान्य भक्त भी श्रद्धापूर्वक पाठ कर सकते हैं। विशेष सिद्धि या काम्य प्रयोग हेतु गुरु मार्गदर्शन उचित है।

5. इसे पढ़ने का उत्तम समय क्या है?

त्रिसंध्या (सूर्योदय, मध्याह्न, सूर्यास्त) में पाठ करना फलश्रुति के अनुसार सर्वोत्तम है। विशेष रूप से अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी, नवरात्रि, और मंगलवार या शनिवार को पाठ करना अधिक फलदायी माना जाता है।

6. त्रिसंध्या पाठ का क्या अर्थ है?

त्रिसंध्या का अर्थ है दिन में तीन बार — सूर्योदय (प्रातः संध्या, लगभग 6 बजे), मध्याह्न (दोपहर संध्या, 12 बजे), और सूर्यास्त (सायं संध्या, लगभग 6 बजे) के समय पाठ करना। ये तीन समय ब्रह्मांडीय ऊर्जा के परिवर्तन के क्षण हैं।

7. श्लोक 17 में श्री चक्र का उल्लेख क्यों है?

श्लोक 17 में देवी को 'श्रीचक्रवासिनी' कहा गया है क्योंकि वाराही देवी श्री विद्या परंपरा में ललिता त्रिपुरसुंदरी की प्रधान सेनापति (दण्डनाथा) हैं। श्री चक्र यंत्र में वाराही देवी का विशेष आवरण है जहाँ वे सक्रिय रूप से साधक की रक्षा करती हैं।

8. वाराही को दण्डनाथा क्यों कहते हैं?

दण्डनाथा का अर्थ है 'सेना की अधिपति' या 'न्यायाधीश'। श्री विद्या परंपरा में माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की दो सेनापतियाँ हैं — दण्डनाथा (वाराही) और मन्त्रिणी (श्यामला)। वाराही देवी ललिता की सेना का नेतृत्व करती हैं और दुष्टों एवं शत्रुओं को दण्ड देती हैं।

9. इस स्तोत्र में कौन सी माला प्रयोग करें?

वाराही साधना में लाल चंदन की माला, रुद्राक्ष माला, या रक्त मूंगा (Red Coral) की माला उपयुक्त है। सामान्य भक्ति पाठ के लिए स्फटिक (Crystal) माला भी प्रयोग कर सकते हैं। माला में 108 मनके होने चाहिए।

10. क्या यह कोर्ट केस या सरकारी बाधाओं में सहायक है?

हाँ, वाराही देवी को दण्डनाथा (न्याय की देवी) कहा जाता है। फलश्रुति में 'सर्वकार्यजयो भवेत्' (सभी कार्यों में विजय) कहा गया है, जिसमें न्यायालय के मामले, सरकारी बाधाएं, और प्रतियोगी परीक्षाएं भी सम्मिलित हैं। एक मास का नियमित त्रिसंध्या पाठ इन स्थितियों में विशेष सहायक माना जाता है।