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ग्रहण पीडा परिहार श्लोकाः — Grahana Pida Parihara Shloka

Grahana Pida Parihara Shloka — Vedic Remedy for Solar & Lunar Eclipses

ग्रहण पीडा परिहार श्लोकाः — Grahana Pida Parihara Shloka
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ग्रहणपीडापरिहारश्लोकाः ॥ ॥ मुख्य संकल्प श्लोक ॥ इन्द्रोऽनलो दण्डधरश्च रक्षः प्राचेतसो वायुकुबेरशर्वाः । मज्जन्मऋक्षे मम राशिसंस्थे सूर्योपराग्रणशमनं शमयन्तु सर्वे ॥ ॥ अष्ट-दिक्पाल प्रार्थना ॥ योऽसौ वज्रधरो देव आदित्यानां प्रभुर्मतः । सहस्रनयनः शक्रः ग्रहपीडां व्यपोहतु ॥ १॥ (जो वज्र धारण करने वाले देव हैं, आदित्यों के प्रभु माने जाते हैं, वे सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र ग्रह पीड़ा को दूर करें।) मुखं यः सर्वदेवानां सप्तार्चिरमितद्युतिः । चन्द्रसूर्योपरागोत्थां अग्निः पीडां व्यपोहतु ॥ २॥ (जो सभी देवताओं के मुख हैं, सात ज्वालाओं वाले और असीमित तेज वाले अग्नि देव सूर्य और चन्द्र ग्रहण से उत्पन्न पीड़ा को दूर करें।) यः कर्मसाक्षी लोकानां यमो महिषवाहनः । चन्द्रसूर्योपरागोत्थां ग्रहपीडां व्यपोहतु ॥ ३॥ (जो लोकों के कर्मों के साक्षी हैं, भैंसे की सवारी करने वाले यमराज सूर्य और चन्द्र ग्रहण की ग्रह पीड़ा को दूर करें।) रक्षोगणाधिपः साक्षात् प्रलयानलसन्निभः । उग्रः करालो निऋतिः ग्रहपीडां व्यपोहतु ॥ ४॥ (जो राक्षसों के स्वामी हैं, साक्षात् प्रलय की अग्नि के समान उग्र और कराल निऋति देव ग्रह पीड़ा को दूर करें।) नागपाशधरो देवः सदा मकरवाहनः । वरुणो जललोकेशो ग्रहपीडां व्यपोहतु ॥ ५॥ (जो नागपाश धारण करने वाले देव हैं, सदैव मगरमच्छ की सवारी करने वाले जलों के स्वामी वरुण देव ग्रह पीड़ा को दूर करें।) यः प्राणरूपी लोकानां वायुः कृष्णमृगप्रियः । चन्द्रसूर्योपरागोत्थां ग्रहपीडां व्यपोहतु ॥ ६॥ (जो लोकों के प्राण स्वरूप हैं, काले हिरण के प्रेमी वायु देव सूर्य और चन्द्र ग्रहण की पीड़ा को दूर करें।) योऽसौ निधिपतिर्देवः खड्गशूलधरो वरः । चन्द्रसूर्योपरागोत्थां कलुषं मे व्यपोहतु ॥ ७॥ (जो निधियों के स्वामी देव हैं, खड्ग और शूल धारण करने वाले कुबेर देव सूर्य और चन्द्र ग्रहण के पाप/कलुश को दूर करें।) योऽसौ शूलधरो रुद्रः शङ्करो वृषवाहनः । चन्द्रसूर्योपरागोत्थां दोषं नाशयतु द्रुतम् ॥ ८॥ (जो शूल धारण करने वाले रुद्र हैं, बैल की सवारी करने वाले शंकर जी सूर्य और चन्द्र ग्रहण के दोष का शीघ्र नाश करें।) ॥ शान्ति मन्त्र ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः । ॥ इति ग्रहणपीडापरिहारश्लोकाः सम्पूर्णाः ॥

ग्रहण पीडा परिहार — वैदिक दृष्टिकोण

हिंदू धर्म और वैदिक ज्योतिष में सूर्यग्रहण (Solar Eclipse) और चन्द्रग्रहण (Lunar Eclipse) को अत्यंत संवेदनशील समय माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, इस समय राहु और केतु, जो छाया ग्रह हैं, सूर्य और चन्द्रमा (आत्मा और मन के कारक) को ग्रसने का प्रयास करते हैं।

ग्रहण पीडा परिहार श्लोक एक रक्षात्मक स्तोत्र है। जब ग्रहण उस नक्षत्र में लगता है जिसमें आपका जन्म हुआ है (जन्मनक्षत्र) या आपकी राशि पर लगता है, तो यह शारीरिक कष्ट, मानसिक तनाव और मानहानि दे सकता है। ऐसी स्थिति में, केवल ग्रहों की पूजा पर्याप्त नहीं होती; हमें दिक्पालों (Guardians of Directions) की शरण लेनी पड़ती है जो ब्रह्मांड की दसों दिशाओं को नियंत्रित करते हैं।

विशेष संकल्प: इस पाठ का मुख्य श्लोक संकल्प की तरह है—"मज्जन्मऋक्षे मम राशिसंस्थे"। यह स्पष्ट करता है कि "हे देवताओं! मेरे जन्म नक्षत्र और राशि पर आए हुए इस सूर्य/चन्द्र उपराग (ग्रहण) के दोष को शांत करें।"

अष्ट-दिक्पालों का आह्वान और उनका महत्व

इस स्तोत्र में 8 प्रमुख देवताओं से रक्षा मांगी गई है, जो 8 दिशाओं के स्वामी हैं। ग्रहण के समय अंधकार छा जाता है, इसलिए इन 'प्रकाश और शक्ति' के देवताओं का आह्वान किया जाता है:

1. इन्द्र (Indra) - पूर्व दिशा
देवताओं के राजा और वज्रधारी। वे ग्रहण जनित बाधाओं को अपने वज्र से नष्ट करते हैं।
2. अग्नि (Agni) - आग्नेय कोण
देवताओं का मुख। ग्रहण के अंधकार में अग्नि ही ज्ञान और पवित्रता का प्रकाश फैलाते हैं।
3. यम (Yama) - दक्षिण दिशा
कर्मसाक्षी और धर्मराज। वे सुनिश्चित करते हैं कि ग्रहण का दुष्प्रभाव हमारे कर्मों को दूषित न करे।
4. निऋति (Nirriti) - नैऋत्य कोण
राक्षसों के स्वामी। ग्रहण के समय नकारात्मक शक्तियां सक्रिय होती हैं, निऋति उनसे रक्षा करते हैं।
5. वरुण (Varuna) - पश्चिम दिशा
जलों के अधिपति। वे ग्रहण की अशुद्धि (Pollution) को धोकर पवित्रता प्रदान करते हैं।
6. वायु (Vayu) - वायव्य कोण
प्राण शक्ति। ग्रहण के समय वातावरण में प्राण वायु दूषित हो सकती है, वायु देव उसे शुद्ध करते हैं।
7. कुबेर (Kubera) - उत्तर दिशा
धनपति। ग्रहण अक्सर आर्थिक हानि का संकेत देता है, कुबेर देव धन-सम्पदा की रक्षा करते हैं।
8. रुद्र/शंकर (Shiva) - ईशान कोण
विनाशक और कल्याणकारी। वे अंततः सभी दोषों (Dosham Nashayatu) का तत्काल नाश करते हैं।

ग्रहण काल में पाठ विधि (Rituals during Eclipse)

ग्रहण काल एक विशिष्ट "संक्रमण काल" है। इस समय किए गए मंत्र जाप का फल सामान्य दिनों से हजार गुना अधिक माना गया है।

  1. समय: ग्रहण के स्पर्श (शुरुआत) से लेकर मोक्ष (समाप्त होने) तक लगातार इस स्तोत्र का पाठ करें। यदि संभव न हो, तो कम से कम 11 बार पाठ अवश्य करें।
  2. शुद्धि: ग्रहण लगने से पहले स्नान कर लें। ग्रहण के दौरान मूर्ति स्पर्श वर्जित है, इसलिए मानसिक जाप या माला पर जाप करें।
  3. सामग्री: अपने पास थोड़ा कुश (घास) या तुलसी दल रखें। यह विकिरण (Radiation) से रक्षा करता है।
  4. दान (Charity): ग्रहण समाप्त होने (मोक्ष) के बाद पुनः स्नान करें (वस्त्र सहित स्नान उत्तम है)। इसके बाद, किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को अन्न (चावल/गेहूं), वस्त्र और दक्षिणा का दान करें। दान देते समय भी इस श्लोक का उच्चारण करें।

ग्रहण शांति के लिए आप नवग्रह पीड़ाहर स्तोत्र का भी पाठ कर सकते हैं, जो विशेष रूप से ग्रहों की पीड़ा हरने के लिए है।

FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. ग्रहण पीडा परिहार श्लोक का मुख्य उद्देश्य क्या है?

इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य ग्रहण (सूर्य या चन्द्र) से उत्पन्न होने वाली नकारात्मक ऊर्जा को शांत करना है। विशेषकर जब ग्रहण आपकी जन्म राशि या नक्षत्र पर लग रहा हो, तब यह एक 'आध्यात्मिक ढाल' का कार्य करता है और आने वाले संकटों को टालता है।

2. इस स्तोत्र में किन देवताओं की स्तुति की गई है?

इसमें 8 दिक्पालों (Guardians of Directions) की स्तुति है: इन्द्र (पूर्व), अग्नि (दक्षिण-पूर्व), यम (दक्षिण), निऋति (दक्षिण-पश्चिम), वरुण (पश्चिम), वायु (उत्तर-पश्चिम), कुबेर (उत्तर), और रुद्र/शिव (उत्तर-पूर्व)। ये सभी मिलकर चारों ओर से साधक की रक्षा करते हैं।

3. 'मम राशिसंस्थे' का क्या अर्थ है?

श्लोक में पंक्ति है—'मज्जन्मऋक्षे मम राशिसंस्थे'। इसका अर्थ है—'मेरे जन्म नक्षत्र और मेरी राशि में स्थित'। ग्रहण सभी के लिए बुरा नहीं होता, लेकिन जिसकी राशि में लगता है, उसके लिए कष्टकारी होता है। यह पंक्ति उसी विशिष्ट कष्ट को दूर करने की प्रार्थना है।

4. क्या सूर्य और चन्द्र ग्रहण दोनों के लिए यह एक ही मंत्र है?

हाँ, यह स्तोत्र दोनों के लिए समान रूप से प्रभावी है। श्लोकों में 'चन्द्रसूर्योपरागोत्थां' (चन्द्र और सूर्य के उपराग/ग्रहण से उत्पन्न) शब्द का प्रयोग किया गया है, जो स्पष्ट करता है कि यह दोनों घटनाओं के लिए है।

5. क्या गर्भवती महिलाएं इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, गर्भवती महिलाएं ग्रहण काल में शांत बैठकर मन ही मन (बिना जोर से बोले) इस मंत्र का जाप कर सकती हैं। यह गर्भस्थ शिशु को ग्रहण की नकारात्मक तरंगों से बचाता है और मानसिक शांति देता है।

6. ग्रहण के बाद क्या करना अनिवार्य है?

ग्रहण समाप्त होते ही (जिसे 'मोक्ष' कहते हैं) स्नान करना, धुले हुए वस्त्र धारण करना और यथाशक्ति दान (गेहूं, चावल, गुड़, सिक्के) करना अनिवार्य माना गया है। दान से ग्रहण दोष पूरी तरह उतर जाता है।

7. इन्द्र और अग्नि का आह्वान सबसे पहले क्यों किया गया है?

इन्द्र देवताओं के राजा हैं और वज्र धारण करते हैं, जो किसी भी बाधा को तोड़ सकता है। अग्नि प्रकाश के देवता हैं। ग्रहण अंधकार का प्रतीक है, इसलिए प्रकाश (अग्नि) का आह्वान अंधकार को मिटाने के लिए किया जाता है।

8. क्या सूतक काल में यह पाठ किया जा सकता है?

हाँ, ग्रहण के मंत्र 'सूतक' (अशुद्धि काल) में ही सिद्ध होते हैं। भगवान के नाम स्मरण या मानसिक जप में सूतक बाधा नहीं बनता। बस मूर्ति पूजा या स्पर्श नहीं करना चाहिए।

9. वरुण देव से क्या प्रार्थना की गई है?

वरुण देव 'जल' के स्वामी हैं और 'नागपाश' धारण करते हैं। उनसे प्रार्थना है कि वे ग्रहण से उत्पन्न शारीरिक व्याधियों और मानसिक बंधनों को जल की शीतलता से धो डालें और पाश से मुक्त करें।

10. 'उपराग' (Uparaga) शब्द का क्या अर्थ है?

संस्कृत में ग्रहण को 'उपराग' भी कहते हैं। इसका अर्थ है—रंग बदलना या प्रभावित होना। जब राहु/केतु सूर्य या चन्द्रमा के प्रकाश को ढक लेते हैं, तो वह 'उपराग' कहलाता है।