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Sri Surya Stotram (Shiva Proktam) – श्री सूर्य स्तोत्रम् | Cure for TB, Epilepsy & Diseases

Sri Surya Stotram (Shiva Proktam)

Sri Surya Stotram (Shiva Proktam) – श्री सूर्य स्तोत्रम् | Cure for TB, Epilepsy & Diseases
॥ श्री सूर्य स्तोत्रम् (शिव प्रोक्तम्) ॥ ॥ ध्यानम् ॥ ध्यायेत्सूर्यमनन्तकोटिकिरणं तेजोमयं भास्करं भक्तानामभयप्रदं दिनकरं ज्योतिर्मयं शङ्करम् । आदित्यं जगदीशमच्युतमजं त्रैलोक्यचूडामणिं भक्ताभीष्टवरप्रदं दिनमणिं मार्ताण्डमाद्यं शुभम् ॥ १ ॥ (ध्यान: अनंत कोटि किरणों वाले, तेजोमय, भक्तों को अभय देने वाले, ज्योतिर्मय, शंकर स्वरूप, जगदीश्वर, अच्युत, अजन्मा, तीनों लोकों के चूडामणि और आदिदेव मार्तण्ड भगवान सूर्य का मैं ध्यान करता हूँ।) कालात्मा सर्वभूतात्मा वेदात्मा विश्वतोमुखः । जन्ममृत्युजराव्याधिसंसारभयनाशनः ॥ २ ॥ (वे 'कालात्मा' (समय की आत्मा), सर्वभूतों की आत्मा, वेदात्मा और विश्वतोमुख (सब ओर मुख वाले) हैं। वे जन्म, मृत्यु, बुढ़ापा, रोग और संसार के भय को नष्ट करने वाले हैं।) ब्रह्मस्वरूप उदये मध्याह्ने तु महेश्वरः । अस्तकाले स्वयं विष्णुस्त्रयीमूर्तिर्दिवाकरः ॥ ३ ॥ (भगवान सूर्य उदयकाल में 'ब्रह्मस्वरूप' हैं, मध्याह्न (दोपहर) में 'महेश्वर' (शिव) हैं, और अस्तकाल में स्वयं 'विष्णु' हैं। इस प्रकार दिवाकर 'त्रयीमूर्ति' (त्रिदेव स्वरूप) हैं।) एकचक्ररथो यस्य दिव्यः कनकभूषितः । सोऽयं भवतु नः प्रीतः पद्महस्तो दिवाकरः ॥ ४ ॥ (जिनका एक पहिये वाला (एकचक्र) दिव्य रथ सोने (कनक) से विभूषित है, वे कमल-हस्त (हाथ में कमल वाले) भगवान दिवाकर हम पर प्रसन्न हों।) पद्महस्तः परञ्ज्योतिः परेशाय नमो नमः । अण्डयोनिर्महासाक्षी आदित्याय नमो नमः ॥ ५ ॥ (हाथों में कमल धारण करने वाले, परम ज्योतिस्वरूप, परमेश्वर को नमस्कार है। जो ब्रह्माण्ड की योनि (उत्पत्ति स्थान) और महासाक्षी हैं, उन आदित्य को नमस्कार है।) कमलासन देवेश भानुमूर्ते नमो नमः । धर्ममूर्तिर्दयामूर्तिस्तत्त्वमूर्तिर्नमो नमः ॥ ६ ॥ (हे कमलासन! हे देवेश! हे भानुमूर्ति! आपको नमस्कार है। आप धर्ममूर्ति, दयामूर्ति और तत्त्वमूर्ति हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है।) सकलेशाय सूर्याय क्षान्तेशाय नमो नमः । क्षयापस्मारगुल्मादिदुर्दोषव्याधिनाशनम् ॥ ७ ॥ (सकल (समस्त) देवों के ईश, क्षमा के ईश (क्षान्तेश) भगवान सूर्य को नमस्कार है। यह स्तोत्र क्षय (TB), अपस्मार (Epilepsy) और गुल्म (Abdominal tumors) आदि दुर्दोष व्याधियों का नाश करने वाला है।) सर्वज्वरहरं चैव कुक्षिरोगनिवारणम् । एतत् स्तोत्रं शिव प्रोक्तं सर्वसिद्धिकरं परम् । सर्वसम्पत्करं चैव सर्वाभीष्टप्रदायकम् ॥ ८ ॥ (यह (स्तोत्र) सभी प्रकार के ज्वर (Fever) को हरने वाला और कुक्षी (पेट) के रोगों का निवारण करने वाला है। यह 'शिव प्रोक्त' (शिव द्वारा कहा गया) स्तोत्र परम सिद्धि देने वाला, सर्व सम्पत्ति प्रदान करने वाला और सभी अभीष्ट फलों को देने वाला है।) ॥ इति श्री सूर्य स्तोत्रम् (शिव प्रोक्तम्) सम्पूर्णम् ॥

शिव प्रोक्त सूर्य स्तोत्र: महिमा और परिचय

श्री सूर्य स्तोत्रम् (शिव प्रोक्तम्) एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली स्तुति है, जिसकी रचना स्वयं देवाधिदेव महादेव (शिव) ने की है। यह स्तोत्र 'रोग-नाशक' श्रेणी में आता है। जब औषधियाँ काम करना बंद कर दें, तब इस स्तोत्र का आश्रय लिया जाता है।

इसमें भगवान सूर्य को केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि साक्षात 'त्रयीमूर्ति' (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) और 'कालात्मा' (Time Personified) मानकर नमन किया गया है। यह स्तोत्र 8 श्लोकों का एक 'अष्टक' है, जिसके अंत में इसकी 'फलश्रुति' (Benefits) दी गई है।

सूर्य स्तोत्र पाठ के चमत्कारी लाभ (Benefits)

  • असाध्य रोगों का नाश: शिव जी स्वयं कहते हैं- "क्षयापस्मारगुल्मादि..."। यह स्तोत्र टीबी (Tuberculosis), मिर्गी (Epilepsy) और पेट की गाँठों (Tumors) को गलाने में सक्षम है।

  • तीव्र ज्वर (Fever) से मुक्ति: पुराने से पुराने बुखार (Chronic Fever) या बार-बार आने वाले बुखार में इसका पाठ 'संजीवन बूटी' समान कार्य करता है ("सर्वज्वरहरं चैव")।

  • पाचन और उदर विकार: "कुक्षिरोगनिवारणम्" - यह स्तोत्र अपच, गैस, एसिडिटी और लिवर-किडनी के गंभीर रोगों (Diseases of the belly/abdomen) को ठीक करता है।

  • त्रिदेवों का आशीर्वाद: चूंकि सूर्य ही प्रातः ब्रह्मा, दोपहर में शिव और शाम को विष्णु हैं, अतः इस एक पाठ से तीनों महाशक्तियों की कृपा प्राप्त होती है।

  • सर्व सिद्धि और संपत्ति: यह केवल स्वास्थ्य ही नहीं, बल्कि "सर्वसम्पत्करं" (धन देने वाला) और "सर्वसिद्धिकरं" (सफलता देने वाला) भी है।

पाठ विधि (Chanting Method for Cure)

विशेष नोट: यदि किसी गंभीर रोग (जैसे मिर्गी या टीबी) के निवारण हेतु पाठ कर रहे हैं, तो इसे 'अनुष्ठान' के रूप में करें।

  • समय: प्रतिदिन सूर्योदय (Sunrise) के समय जब सूर्य लालिमा लिए हो।
  • दिशा: पूर्व (East) की ओर मुख करके खड़े हों या बैठें।
  • जल अर्पण: तांबे के पात्र में जल, रोली और अक्षत लेकर सूर्य को अर्घ्य दें। जल की धार में से सूर्य को देखते हुए यह स्तोत्र पढ़ें।
  • आवृति (Repetition): सामान्य लाभ के लिए 1 बार, विशेष रोग निवारण के लिए प्रतिदिन 11 या 21 बार पाठ करें।
  • अवधि: लगातार 41 दिनों (एक मंडल) तक पाठ करने से विशेष फल की प्राप्ति होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

1. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

यह किसी साधारण कवि या ऋषि की रचना नहीं है। यह 'शिव प्रोक्तम्' है, अर्थात इसे स्वयं आदिगुरु भगवान शिव ने कहा है, इसलिए इसका प्रभाव अचूक है।

2. 'अपस्मार' (Apasmara) रोग क्या है?

आयुर्वेद में मिर्गी (Epilepsy), बेहोशी, या याददाश्त खोने की बीमारी को 'अपस्मार' कहते हैं। यह स्तोत्र मस्तिष्क की नाड़ियों को बल देकर इस रोग को शांत करता है।

3. क्या टीबी (TB) के मरीज इसे कर सकते हैं?

जी हाँ, 'क्षय' रोग का अर्थ टीबी (Tuberculosis) ही है। पुराने समय में जब इसका इलाज कठिन था, तब इसी स्तोत्र से रोगी को सूर्य की ऊर्जा दी जाती थी। दवा के साथ-साथ यह पाठ बहुत लाभकारी है।

4. सूर्य को 'त्रयीमूर्ति' क्यों कहा गया है?

क्योंकि सूर्य दिन भर में तीनों देवों का रूप लेते हैं:

  • उदय (Dawn): ब्रह्मा (सृष्टि कारक)
  • मध्याह्न (Noon): महेश्वर/शिव (संहार/तेज कारक)
  • अस्त (Dusk): विष्णु (पालन/विश्राम कारक)

5. 'गुल्म' रोग क्या होता है?

'गुल्म' (Gulma) का अर्थ है पेट में वायु का गोला बनना या कोई गांठ (Abdominal Tumor)। यह स्तोत्र पेट की सभी बीमारियों ("कुक्षिरोग") को ठीक करता है।

6. क्या स्वस्थ व्यक्ति भी इसका पाठ कर सकते हैं?

बिल्कुल! स्वस्थ व्यक्ति यदि इसका पाठ करे, तो उसे भविष्य में गंभीर रोग नहीं होते और शरीर में कांति (Glow) व ओज बना रहता है।

7. कितने दिनों में लाभ मिलता है?

श्रद्धा के साथ 21 से 41 दिनों तक लगातार पाठ करने पर प्रत्यक्ष अनुभव होने लगता है। रोग की गंभीरता के अनुसार समय कम-ज्यादा हो सकता है।

8. क्या यह स्तोत्र धन प्राप्ति कराता है?

हाँ, अंतिम श्लोक में लिखा है - "सर्वसम्पत्करं चैव"। स्वस्थ शरीर ही सबसे बड़ी संपत्ति है, और इसके साथ यह भौतिक समृद्धि भी प्रदान करता है।

9. क्या ग्रहण के समय इसका पाठ कर सकते हैं?

सूर्य ग्रहण के समय किया गया पाठ सामान्य दिनों के पाठ से 1000 गुना अधिक फलदायी होता है। ग्रहण काल में इसका जाप सिद्धिमंत्र समान है।

10. "कालात्मा" का क्या अर्थ है?

"कालात्मा" का अर्थ है कि सूर्य ही 'समय' (Time) का साक्षात स्वरूप हैं। दिन, रात, महीने और साल उन्हीं की गति से बनते हैं, इसलिए वे काल के स्वामी हैं।