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Sri Chandra Stotram – श्री चन्द्र स्तोत्रम्

Sri Chandra Stotram – श्री चन्द्र स्तोत्रम्
॥ श्री चन्द्र स्तोत्रम् ॥ नमश्चन्द्राय सोमायेन्दवे कुमुदबन्धवे । विलोहिताय शुभ्राय शुक्लाम्बरधराय च ॥ १ ॥ त्वमेव सर्वलोकानामाप्यायनकरः सदा । क्षीरोद्भवाय देवाय नमः शङ्करशेखर ॥ २ ॥ युगानां युगकर्ता त्वं निशानाथो निशाकरः । संवत्सराणां मासानामृतूनां तु तथैव च ॥ ३ ॥ ग्रहाणां च त्वमेकोऽसि सौम्यः सोमकरः प्रभुः । ओषधीपतये तुभ्यं रोहिणीपतये नमः ॥ ४ ॥ इदं तु पठते स्तोत्रं प्रातरुत्थाय यो नरः । दिवा वा यदि वा रात्रौ बद्धचित्तो हि यो नरः ॥ ५ ॥ न भयं विद्यते तस्य कार्यसिद्धिर्भविष्यति । अहोरात्रकृतं पापं पठनादेव नश्यति ॥ ६ ॥ द्विजराजो महापुण्यस्तारापतिर्विशेषतः । ओषधीनां च यो राजा स सोमः प्रीयतां मम ॥ ७ ॥ ॥ इति श्री चन्द्र स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री चन्द्र स्तोत्रम् (Sri Chandra Stotram) प्रभात स्तोत्रनिधि में संकलित एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है। इसमें चंद्रमा के विभिन्न नामों और महिमा का वर्णन है। यह स्तोत्र विशेष है क्योंकि इसमें स्पष्ट रूप से इसके पाठ का समय और फल दोनों बताए गए हैं।



श्लोक 5-6 में कहा गया है: "इदं तु पठते स्तोत्रं प्रातरुत्थाय यो नरः। दिवा वा यदि वा रात्रौ..." - जो व्यक्ति प्रातःकाल, दिन में या रात में भी एकाग्र चित्त से इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे किसी प्रकार का भय नहीं होता और उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं। इसके अतिरिक्त, "अहोरात्रकृतं पापं पठनादेव नश्यति" - दिन-रात में जो भी पाप हुए हों, वे सब केवल पाठ करने से ही नष्ट हो जाते हैं।

चंद्र के दिव्य नाम (Divine Names of Chandra)

इस स्तोत्र में चंद्रमा को विभिन्न नामों से स्तुति की गई है:

  • चन्द्र - आह्लादकारी, चमकने वाले
  • सोम - अमृत स्वरूप
  • इन्दु - बिंदु स्वरूप, उज्ज्वल
  • कुमुदबन्धु - कुमुद (कमल) के मित्र
  • विलोहित - रक्त वर्ण वाले (उदय और अस्त के समय)
  • शुभ्र - श्वेत, उज्ज्वल
  • शुक्लाम्बरधर - श्वेत वस्त्र धारण करने वाले
  • क्षीरोद्भव - क्षीर सागर से उत्पन्न
  • शङ्करशेखर - शंकर के सिर पर विराजमान
  • युगकर्ता - युगों को नियंत्रित करने वाले
  • निशानाथ - रात्रि के स्वामी
  • निशाकर - रात्रि को प्रकाशित करने वाले
  • ओषधीपति - औषधियों के स्वामी
  • रोहिणीपति - रोहिणी नक्षत्र के स्वामी
  • द्विजराज - ब्राह्मणों के राजा
  • तारापति - तारों के स्वामी

स्तोत्र के प्रमुख लाभ (Benefits)

  • भय निवारण: "न भयं विद्यते तस्य" - इस स्तोत्र के नियमित पाठ से सभी प्रकार के भय दूर होते हैं।

  • कार्य सिद्धि: "कार्यसिद्धिर्भविष्यति" - सभी कार्य सफल होते हैं और मनोरथ पूर्ण होते हैं।

  • पाप नाश: "अहोरात्रकृतं पापं पठनादेव नश्यति" - दिन-रात में किए गए पाप केवल पाठ से ही नष्ट हो जाते हैं।

  • मानसिक शांति: चंद्र मन के कारक हैं, इसलिए इनकी स्तुति से मानसिक शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।

  • चंद्र कृपा: "स सोमः प्रीयतां मम" - चंद्रमा प्रसन्न होते हैं और कृपा प्रदान करते हैं।

पाठ करने की विधि (Method of Chanting)

  • समय: स्तोत्र में स्पष्ट है: "प्रातरुत्थाय" (प्रातःकाल उठकर), "दिवा वा यदि वा रात्रौ" (दिन में या रात में) - कभी भी पाठ करें।

  • दिन: सोमवार (Monday) को विशेष फलदायी। पूर्णिमा की रात्रि में पाठ सर्वोत्तम है।

  • चित्त: "बद्धचित्तो" - एकाग्र चित्त से पाठ करें। मन को स्थिर रखें।

  • आसन: उत्तर दिशा की ओर मुख करके श्वेत आसन पर बैठें।

  • पूजन: चंद्र यंत्र या शिवलिंग के समक्ष पाठ करें (चंद्र शङ्करशेखर हैं)।

  • अर्पण: श्वेत पुष्प, चावल, दूध और मिश्री अर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. चंद्र स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

इस स्तोत्र में कुल 7 श्लोक हैं जो प्रभात स्तोत्रनिधि में संकलित हैं।

2. चंद्रमा को 'शङ्करशेखर' क्यों कहा गया है?

भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक (शेखर) पर धारण किया है। इसीलिए चंद्र को 'शंकर के शेखर' (मुकुट) कहा जाता है।

3. 'कुमुदबन्धु' का क्या अर्थ है?

कुमुद एक प्रकार का रात्रि में खिलने वाला कमल है। चंद्रमा की किरणों से यह खिलता है, इसीलिए चंद्र को 'कुमुद का मित्र (बन्धु)' कहा जाता है।

4. इस स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए?

स्तोत्र में स्पष्ट है: "प्रातरुत्थाय" (प्रातःकाल), या "दिवा वा यदि वा रात्रौ" (दिन में या रात में) - किसी भी समय पाठ कर सकते हैं।

5. 'ओषधीपति' का क्या अर्थ है?

वैदिक मान्यता के अनुसार चंद्रमा की किरणों से औषधियों में जीवन शक्ति और गुण आते हैं। इसीलिए चंद्र को औषधियों का स्वामी (ओषधीपति) कहा जाता है।

6. 'क्षीरोद्भव' का क्या महत्व है?

समुद्र मंथन के समय क्षीर सागर (दूध का सागर) से चंद्रमा उत्पन्न हुए थे। इसीलिए उन्हें 'क्षीरोद्भव' (क्षीर से उत्पन्न) कहा जाता है।

7. 'युगकर्ता' का क्या तात्पर्य है?

चंद्रमा युगों, संवत्सरों, मासों और ऋतुओं को नियंत्रित करते हैं। हिंदू पंचांग (चंद्र पंचांग) चंद्रमा की गति पर आधारित है।

8. क्या यह स्तोत्र पाप नाश करता है?

हाँ, श्लोक 6 में स्पष्ट है: "अहोरात्रकृतं पापं पठनादेव नश्यति" - दिन-रात में किए गए पाप केवल पाठ करने से ही नष्ट हो जाते हैं।

9. चंद्र को 'द्विजराज' क्यों कहा गया है?

'द्विज' का अर्थ है ब्राह्मण या दो बार जन्म लेने वाला। चंद्रमा ब्राह्मणों के आराध्य और उनके राजा माने जाते हैं, इसीलिए उन्हें 'द्विजराज' कहा जाता है।

10. क्या यह स्तोत्र कार्य सिद्धि में सहायक है?

हाँ, श्लोक 6 में स्पष्ट फलश्रुति है: "न भयं विद्यते तस्य कार्यसिद्धिर्भविष्यति" - पाठ करने वाले को भय नहीं होता और उसके सभी कार्य सिद्ध होते हैं।