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Sri Ketu Stotram – श्री केतु स्तोत्रम्

Sri Ketu Stotram – श्री केतु स्तोत्रम्
॥ श्री केतु स्तोत्रम् ॥ (प्रभात स्तोत्रनिध्यन्तर्गतम्) धूम्रा द्विबाहवः सर्वे गोदानो विकृताननाः । गृध्रयानासनस्थाश्च पान्तु नः शिखिनन्दनाः ॥ १ ॥ श्रीभैरव्युवाच धन्या चानुगृहीतास्मि कृतार्थास्मि जगत्प्रभो । यच्छ्रुतं त्वन्मुखाद्देव केतुस्तोत्रमिदं शुभम् ॥ २ ॥ श्रीपरमेश्वर उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि केतुस्तवमिमं परम् । सर्वपापविशुद्धात्मा स रोगैर्मुच्यते ध्रुवम् ॥ ३ ॥ श्वेतपीतारुणः कृष्णः क्वचिच्चामीकरप्रभः । शिवार्चनरतः केतुर्ग्रहपीडां व्यपोहतु ॥ ४ ॥ नमो घोरायाघोराय महाघोरस्वरूपिणे । आनन्देशाय देवाय जगदानन्ददायिने ॥ ५ ॥ नमो भक्तजनानन्ददायिने विश्वभाविने । विश्वेशाय महेशाय केतुरूपाय वै नमः ॥ ६ ॥ नमो रुद्राय सर्वाय वरदाय चिदात्मने । त्र्यक्षाय त्रिनिवासाय नमः सङ्कटनाशिने ॥ ७ ॥ त्रिपुरेशाय देवाय भैरवाय महात्मने । अचिन्त्याय चितिज्ञाय नमश्चैतन्यरूपिणे ॥ ८ ॥ नमः शर्वाय चर्च्याय दर्शनीयाय ते नमः । आपदुद्धरणायापि भैरवाय नमो नमः ॥ ९ ॥ नमो नमो महादेव व्यापिने परमात्मने । नमो लघुमते तुभ्यं ग्राहिणे सूर्यसोमयोः ॥ १० ॥ नमश्चापद्विनाशाय भूयो भूयो नमो नमः । नमस्ते रुद्ररूपाय चोग्ररूपाय केतवे ॥ ११ ॥ नमस्ते सौररूपाय शत्रुक्षयकराय च । महातेजाय वै तुभ्यं पूजाफलविवर्धिने ॥ १२ ॥ वह्निपुत्राय ते दिव्यरूपिणे प्रियकारिणे । सर्वभक्ष्याय सर्वाय सर्वग्रहान्तकाय ते ॥ १३ ॥ नमः पुच्छस्वरूपाय महामृत्युकराय च । नमस्ते सर्वदा क्षोभकारिणे व्योमचारिणे ॥ १४ ॥ नमस्ते चित्ररूपाय मीनदानप्रियाय च । दैत्यदानवगन्धर्ववन्द्याय महते नमः ॥ १५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ य इदं पठते नित्यं प्रातरुत्थाय मानवः । ग्रहशान्तिर्भवेत्तस्य केतुराजस्य कीर्तनात् ॥ १६ ॥ यः पठेदर्धरात्रे तु वशं तस्य जगत्त्रयम् । इदं रहस्यमखिलं केतुस्तोत्रं तु कीर्तितम् ॥ १७ ॥ सर्वसिद्धिप्रदं गुह्यमायुरारोग्यवर्धनम् । गुह्यं मन्त्रं रहस्यं तु तव भक्त्या प्रकाशितम् ॥ १८ ॥ अभक्ताय न दातव्यमित्याज्ञा पारमेश्वरि ॥ १९ ॥ श्रीदेव्युवाच भगवन्भवतानेन केतुस्तोत्रस्य मे प्रभो । कथनेन महेशान सत्यं प्रीतास्म्यहं त्वया ॥ २० ॥ श्रीईश्वर उवाच इदं रहस्यं परमं न देयं यस्य कस्यचित् । गुह्यं गोप्यतमं देयं गोपनीयं स्वयोनिवत् ॥ २१ ॥ अग्निपुत्रो महातेजाः केतुः सर्वग्रहान्तकः । क्षोभयन्यः प्रजाः सर्वाः स केतुः प्रीयतां मम ॥ २२ ॥ ॥ इति श्री केतु स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री केतु स्तोत्रम् (Sri Ketu Stotram) प्रभात स्तोत्रनिधि में संकलित एक अत्यंत गोपनीय और रहस्यमय स्तोत्र है। यह स्तोत्र भगवान शिव (परमेश्वर) और भैरवी देवी के संवाद के रूप में प्रस्तुत है।



इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें केतु को शिव स्वरूप कहा गया है। श्लोक 5-15 में केतु की स्तुति भैरव, रुद्र, त्रिपुरेश, महादेव आदि शैव नामों से की गई है। इसके अतिरिक्त, केतु को 'अग्निपुत्र' (अग्नि देव के पुत्र) और 'वह्निपुत्र' (अग्नि के पुत्र) कहा गया है। श्लोक 18 में इसे 'सर्वसिद्धिप्रद' (सभी सिद्धियां देने वाला) और 'आयुरारोग्यवर्धनम्' (आयु और आरोग्य बढ़ाने वाला) कहा गया है।



भगवान शिव ने इस स्तोत्र को गोपनीय बताया है: "इदं रहस्यं परमं न देयं यस्य कस्यचित्। गुह्यं गोप्यतमं देयं गोपनीयं स्वयोनिवत्" - यह परम रहस्य किसी को भी नहीं देना चाहिए, यह अपनी योनि की तरह गोपनीय है।

केतु के शैव नाम (Shaiva Names of Ketu)

इस स्तोत्र में केतु को शिव के विभिन्न नामों से स्तुति की गई है:

  • घोर, अघोर, महाघोरस्वरूपी - भयंकर और अभय दोनों रूप
  • आनन्देश - आनंद के ईश्वर
  • विश्वेश, महेश - विश्व और महान के ईश्वर
  • रुद्र - रुद्र स्वरूप
  • त्र्यक्ष - तीन नेत्रों वाले
  • त्रिपुरेश - तीन पुरों के ईश्वर
  • भैरव - भैरव स्वरूप
  • शर्व - शिव का एक नाम
  • महादेव - महान देवता
  • परमात्मा - सर्वोच्च आत्मा
  • चैतन्यरूपी - चेतना स्वरूप

स्तोत्र के प्रमुख लाभ (Benefits)

  • पाप शुद्धि: "सर्वपापविशुद्धात्मा" - सभी पापों से आत्मा शुद्ध होती है।

  • रोग निवारण: "स रोगैर्मुच्यते ध्रुवम्" - रोगों से निश्चित मुक्ति होती है।

  • ग्रह शान्ति: "ग्रहशान्तिर्भवेत्तस्य" - प्रातःकाल पाठ से ग्रह शांति होती है।

  • जगत् वशीकरण: "यः पठेदर्धरात्रे तु वशं तस्य जगत्त्रयम्" - अर्धरात्रि में पाठ से तीनों लोक वश में होते हैं।

  • सर्व सिद्धि: "सर्वसिद्धिप्रदं गुह्यम्" - यह गोपनीय स्तोत्र सभी सिद्धियां प्रदान करता है।

  • आयु वृद्धि: "आयुरारोग्यवर्धनम्" - आयु और आरोग्य में वृद्धि होती है।

  • शत्रु क्षय: "शत्रुक्षयकराय" - शत्रुओं का क्षय होता है।

पाठ करने की विधि (Method of Chanting)

  • प्रातःकाल पाठ: "प्रातरुत्थाय" - प्रातःकाल उठकर पाठ करने से ग्रह शांति होती है।

  • अर्धरात्रि पाठ: "यः पठेदर्धरात्रे तु" - आधी रात को पाठ करने से जगत् वश होता है। यह तांत्रिक साधकों के लिए विशेष है।

  • दिन: मंगलवार और शनिवार को विशेष फलदायी।

  • गोपनीयता: "अभक्ताय न दातव्यम्" - अभक्त को यह स्तोत्र नहीं देना चाहिए।

  • भक्ति: "तव भक्त्या प्रकाशितम्" - केवल भक्तिपूर्वक पाठ करें।

  • दान: मीन (मछली) का दान केतु को प्रिय है ("मीनदानप्रियाय")।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. केतु स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

इस स्तोत्र में कुल 22 श्लोक हैं जो प्रभात स्तोत्रनिधि में संकलित हैं।

2. यह स्तोत्र किसके संवाद के रूप में है?

यह स्तोत्र भगवान शिव (परमेश्वर/ईश्वर) और भैरवी देवी के संवाद के रूप में है। भैरवी देवी ने शिव से यह स्तोत्र सुना।

3. केतु को 'अग्निपुत्र' क्यों कहा गया है?

श्लोक 22 में कहा गया है: "अग्निपुत्रो महातेजाः" - कुछ पौराणिक मान्यताओं के अनुसार केतु अग्नि देव के पुत्र हैं। यह उनके तेजस्वी स्वरूप का भी संकेत है।

4. 'ग्राहिणे सूर्यसोमयोः' का क्या अर्थ है?

ग्राहिणे = ग्रास लेने वाले, सूर्यसोमयोः = सूर्य और चंद्र को। केतु सूर्य और चंद्र को ग्रहण करते हैं (ग्रहण के समय)।

5. इस स्तोत्र को गोपनीय क्यों कहा गया है?

श्लोक 17-21 में बार-बार इसे 'रहस्य', 'गुह्य', 'गोप्यतम' कहा गया है। भगवान शिव ने कहा: "अभक्ताय न दातव्यम्" - अभक्त को यह नहीं देना चाहिए।

6. 'पुच्छस्वरूप' का क्या अर्थ है?

पुच्छ = पूंछ। केतु धूमकेतु (comet) का पूंछ भाग माने जाते हैं। ज्योतिषीय दृष्टि से राहु सिर है और केतु धड़ (पूंछ)।

7. केतु को कौन सा दान प्रिय है?

श्लोक 15 में कहा है: "मीनदानप्रियाय" - मीन (मछली) का दान केतु को प्रिय है। जलाशयों में मछलियों को दाना देना केतु शांति का उपाय है।

8. 'शिखिनन्दन' का क्या अर्थ है?

शिखी = अग्नि (जिसके शिखा/ज्वाला है), नन्दन = पुत्र। शिखिनन्दन = अग्नि के पुत्र। यह केतु के 'अग्निपुत्र' नाम का पर्यायवाची है।

9. अर्धरात्रि में पाठ का क्या विशेष लाभ है?

श्लोक 17 में कहा है: "यः पठेदर्धरात्रे तु वशं तस्य जगत्त्रयम्" - अर्धरात्रि में पाठ करने वाले के वश में तीनों लोक हो जाते हैं। यह तांत्रिक साधना का संकेत है।

10. केतु किन देवताओं द्वारा पूजित हैं?

श्लोक 15 में कहा है: "दैत्यदानवगन्धर्ववन्द्याय" - दैत्य, दानव और गन्धर्व भी केतु की वन्दना करते हैं। केतु को 'शिवार्चनरत' भी कहा गया है - वे स्वयं शिव की पूजा में रत रहते हैं।