नवग्रह पीड़ाहर स्तोत्रम्
Navagraha Pidahara Stotram

नवग्रह पीड़ाहर स्तोत्रम् का परिचय
श्री नवग्रह पीड़ाहर स्तोत्रम् नवग्रहों की आराधना का एक अत्यन्त विशिष्ट और प्रभावशाली स्तोत्र है। 'पीडाहर' का अर्थ है — पीड़ा, दुःख, दोष और बाधाओं का हरण करने वाला। यद्यपि हिन्दू शास्त्रों में नवग्रहों की स्तुति के लिए अनेक स्तोत्र उपलब्ध हैं, तथापि इस स्तोत्र की अपनी एक अनन्य एवं अद्भुत विशेषता है — इसमें नवग्रहों को भगवान शिव के उपासक के रूप में चित्रित किया गया है।
सांसारिक जीवन में मनुष्य को कई बार अपनी जन्म कुण्डली में स्थित अशुभ ग्रहों अथवा गोचर में चल रही साढ़ेसाती, ढैय्या एवं राहु-केतु की दोषपूर्ण स्थितियों के कारण अकारण कष्टों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में इस स्तोत्र का पाठ महाशक्तिशाली सिद्ध होता है। यह स्तोत्र ग्रहों से यह निवेदन करता है कि चूँकि आप सभी देवाधिदेव महादेव की पूजा में लीन रहते हैं, इसलिए आप हम पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें और हमारी पीड़ा हर लें।
नवग्रह और भगवान शिव का सम्बन्ध
इस स्तोत्र के प्रत्येक खण्ड में नवग्रहों को शिव-भक्त कहा गया है। यह सनातन परम्परा (विशेषतः शैव परम्परा) के उस गूढ़ तथ्य को प्रमाणित करता है कि स्वयं सूर्य से लेकर केतु तक सभी ग्रह अपना तेज, सामर्थ्य और अधिकार महादेव भगवान आशुतोष से ही प्राप्त करते हैं।
- सूर्यदेव: प्रथम श्लोक में ही सूर्यदेव को 'भगवान् शिवपूजापरायणः' अर्थात् शिव पूजा में संलग्न बताया गया है।
- मङ्गल: कुज (मंगल) को भगवान शिव (रुद्र) के ध्यान में एकचित्त (रुद्रध्यानैकमनसः) और रुद्र की पूजा में परायण कहा गया है। ज्ञात हो कि मंगल की उत्पत्ति भगवान शिव के पसीने से ही शिव-पुराण में वर्णित है।
- देवगुरु बृहस्पति: सम्पूर्ण ज्ञान के भण्डार देवगुरु बृहस्पति को सदैव ईशान (शिव) की पूजा में तत्पर (ईशानार्चनतत्परः) कहा गया है।
- राहु-केतु: अत्यन्त क्रूर माने जाने वाले ग्रह राहु को भी इस स्तोत्र में 'शिवपूजापरो' (शिव पूजा में तत्पर) बताकर उनसे ग्रहों की पीड़ा हरने की प्रार्थना की गई है।
तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति शिव का भक्त है, और शिव की उपासना करता है, उसे शिव के उपासक ग्रह कभी पीड़ा नहीं देते। इसीलिए इस स्तोत्र को 'महाशान्ति' प्रदाता माना गया है।
ग्रहों का विलक्षण रूप-सौन्दर्य वर्णन
स्तोत्र में ग्रहों के स्वरूप और उनके वर्ण (रंग) का अत्यन्त काव्यात्मक वर्णन प्रस्तुत किया गया है:
जैसे, सूर्य का वर्ण सिन्दूर के समान लाल (सिन्दूरारुण रक्ताङ्गः) और नेत्र कानों तक विस्तृत (कर्णान्तायत लोचनः) हैं। चन्द्रमा सम्पूर्ण जगत् को तृप्त करने वाले और अमृत के शीतल आधार (अमृताधारशीतलः) हैं। मंगल पद्मराग मणि (माणिक्य) जैसी आभा वाले (पद्मरागनिभा नेना) हैं।
बुध के शरीर की कान्ति कुमकुम के समान (कुङ्कुमच्छविदेहेन) और वे सुन्दर प्रकाश बिखेरने वाले हैं। गुरु सोने (चामीकर) के समान कान्तियुक्त हैं। शुक्र हिम (बर्फ), कुन्द के फूल और चन्द्रमा के समान श्वेत (हिमकुन्देन्दुतुल्याभः) हैं।
शनिदेव की कान्ति काजल के ढेर जैसी (भिन्नाञ्जनचयच्छायः) भयंकर और नेत्र रक्तवर्ण (सरक्तनयनद्युतिः) हैं। राहु नीले काजल (नीलाञ्जननिभः) के समान हैं। केतु को धूएँ के आकार वाला (धूम्राकारो), भयानक (घोरदंष्ट्राकरालश्च) और पलाश के सूखे पत्तों या धूएँ जैसा (पलाशधूम्रसङ्काशो) बताया गया है। परन्तु ये सभी भयंकर स्वरूप वाले ग्रह भी शिवभक्ति के कारण उपासक को विजय और भलाई (वरदः शुभः) ही प्रदान करते हैं।
स्तोत्र की फलश्रुति और पाठ की विधि
पन्द्रहवें श्लोक में फलश्रुति है, जो स्पष्ट करती है कि 'एते ग्रहा महात्मानो महेशार्चनभाविताः' — महेश्वर (शिव) की पूजा से पवित्र (भावित) हुए ये महात्मा नवग्रह, प्रसन्न होकर मेरे लिए सदैव शान्ति करें और मेरे हितैषी (हितैषिणः) बनें।
पाठ विधि: जब किसी व्यक्ति को निरन्तर कार्य-बाधा, अकारण रोग, या मानसिक कष्ट हो रहा हो, और कुण्डली में नवग्रह दोष स्पष्ट दिख रहा हो, तो उसे इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। विशेषतः सोमवार (चूँकि यह शिव पर केन्द्रित है) अथवा शनिवार को भगवान शिव के समक्ष रुद्राक्ष की माला पहनकर इस स्तोत्र का पाठ करना ग्रह-पीड़ा का तत्काल हरण करता है। प्रतिदिन 11 पाठ 41 दिनों तक करने से असाध्य ग्रह दोष भी शान्त हो जाते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)