॥ श्री महावाराही मन्त्र जपः ॥
(श्रीविद्यार्णवतन्त्रम्, दक्षिणामूर्तिसंहिता, परशुरामकल्पसूत्राधारितम्)
॥ १. विनियोगः ॥
अस्य श्रीमहावाराहीमन्त्रस्य ।
दक्षिणामूर्ति ऋषिः ।
गायत्री छन्दः ।
श्रीवाराही देवता ।
मम सर्वाभीष्टसिद्धये जपे विनियोगः ॥
॥ २. ऋष्यादि न्यासः ॥
दक्षिणामूर्ति ऋषये नमः शिरसि ।
गायत्री छन्दसे नमः मुखे ।
श्रीवाराही देवतायै नमः हृदि ।
ॐ विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।
इति ऋष्यादिन्यासः ॥
॥ ३. पदन्यासः ॥
ऐँ शिरसि ।
ग्लौँ मुखवृत्ते ।
ऐँ नेत्रयोः ।
नमः श्रोत्रयोः ।
भगवति नासिकयोः ।
वार्तालि गण्डयोः ।
वार्तालि ओष्ठयोः ।
वाराहि दन्तपङ्क्तये ।
वाराहि मूर्ध्नि ।
वराहमुखि आस्ये ।
वराहमुखि दक्षदोर्मूले ।
अन्धे दक्षमणिबन्धे ।
अन्धिनि दक्षकराङ्गुलिमूले ।
नमः दक्षकराग्रे ।
रुन्धे वामबाहुमूले ।
रुन्धिनि वामकूर्परे ।
नमः वाममणिबन्धे ।
जम्भे वामकराङ्गुलिमूले ।
जम्भिनि वामकराग्रे ।
नमः दक्षोरुमूले ।
मोहे दक्षजानुनि ।
मोहिनि दक्षगुल्फे ।
नमः दक्षपादाङ्गुलिमूले ।
स्तम्भे दक्षपादाग्रे ।
स्तम्भिनि वामोरुमूले ।
नमः वामजानुनि ।
सर्वदुष्टप्रदुष्टानां वामगुल्फे ।
सर्वेषां वामपादाङ्गुलिमूले ।
सर्ववाक्चित्तचक्षुर्मुखगतिजिह्वास्तम्भं वामपादाग्रे ।
कुरु पार्श्वयोः ।
कुरु पृष्ठे ।
शीघ्रं नाभौ ।
वश्यं जठरे ।
कुरु हृत्पूर्वे ।
कुरु दक्षांसे ।
ऐँ अपरगले ।
ग्लौँ वामांसे ।
ठः हृदादिदक्षकराग्रान्तम् ।
ठः हृदादिवामकराग्रान्तम् ।
ठः हृदादिदक्षपादाग्रान्तम् ।
ठः हृदादिवामपादाग्रान्तम् ।
हुँ हृदयादिनाभ्यान्तम् ।
फट् हृदादिवक्त्रान्तम् ।
स्वाहा शिरसि ।
इति पदन्यासः ॥
॥ ४. करन्यासः ॥
ॐ वार्तालि वार्तालि अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ वाराहि वाराहि तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ वराहमुखि वराहमुखि मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ अन्धे अन्धिनि अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ रुन्धे रुन्धिनि कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ जम्भे जम्भिनि करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः ॥
॥ ५. षडङ्गन्यासः ॥
ॐ वार्तालि वार्तालि हृदयाय नमः ।
ॐ वाराहि वाराहि शिरसे स्वाहा ।
ॐ वराहमुखि वराहमुखि शिखायै वषट् ।
ॐ अन्धे अन्धिनि कवचाय हुं ।
ॐ रुन्धे रुन्धिनि नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ जम्भे जम्भिनि अस्त्राय फट् ।
इति षडङ्गन्यासः ॥
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
॥ ६. ध्यानम् ॥
प्रत्यग्ररुणसङ्काशं पद्यान्तर्गतवासिनीम् ।
इन्द्रनीलमहातेजः प्रकाशां विश्वमातरम् ॥
रुण्डं च मुण्डमालाढ्यां नवरत्नविभूषिताम् ।
अनर्घ्यरत्नघटितमुकुटश्रीविराजिताम् ॥
कौशेयार्धोरुकां चारुप्रवालमणिभूषिताम् ।
हलेन मुसलेनापि वरदेनाभयेन च ॥
विराजितचतुर्बाहुं कपिलाक्षीं सुमध्यमाम् ।
नितम्बिनीमुत्पलाभां कठोरघनसत्कृचाम् ॥
कोलाननां यजेद्देवीमुपचारैः सहेतुभिः ॥
॥ ७. पञ्चपूजा ॥
लं पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि ।
हं आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि ।
यं वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि ।
रं अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि ।
वं अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि ।
सं सर्वात्मिकायै सर्वोपचारपूजां समर्पयामि ॥
॥ ८. जपमाला मन्त्रः ॥
ॐ मां माले महामाये सर्वमन्त्रस्वरूपिणि ।
चतुर्वर्गस्त्वयिन्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥
॥ ९. गुरु मन्त्रः ॥
ॐ ह्रीं सिद्धगुरो प्रसीद ह्रीं ॐ ॥
॥ १०. पञ्चोत्तरशत्यक्षरि मन्त्रः ॥
ऐँ ग्लौँ ऐँ नमो भगवति वार्तालि वार्तालि
वाराहि वाराहि वराहमुखि वराहमुखि
अन्धे अन्धिनि नमः रुन्धे रुन्धिनि नमः
जम्भे जम्भिनि नमः मोहे मोहिनि नमः
स्तम्भे स्तम्भिनि नमः
सर्वदुष्टप्रदुष्टानां सर्वेषां सर्ववाक्चित्तचक्षुर्मुखगतिजिह्वास्तम्भनं
कुरु कुरु शीघ्रं वश्यं कुरु कुरु
ऐँ ग्लौँ ठः ठः ठः ठः हुँ फट् स्वाहा ॥
॥ ११. जपसमर्पणम् ॥
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम् ।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्थिरा ॥
॥ १२. जपानन्तरं मालामन्त्रः ॥
ॐ त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव ।
शुभं कुरुष्व मे भद्रे यशो वीर्यं च देहि मे ॥
ॐ ह्रीं सिद्ध्यै नमः ॥
॥ इति श्री महावाराही मन्त्र जपः सम्पूर्णम् ॥
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पञ्चोत्तरशत्यक्षरी (135 अक्षर) मन्त्र — परिचय और रहस्य
श्री महावाराही मन्त्र श्रीविद्या परंपरा का अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली मन्त्र है। इसे पञ्चोत्तरशत्यक्षरी (135 अक्षरों वाला) कहा जाता है। यह तीन प्रमुख ग्रन्थों पर आधारित है: श्रीविद्यार्णवतन्त्र, दक्षिणामूर्तिसंहिता, और परशुरामकल्पसूत्र।
मन्त्र का मूल स्वरूप "ऐँ ग्लौँ ऐँ..." से आरंभ होता है जहाँ ऐँ = वाक् (सरस्वती) बीज और ग्लौँ = वाराही का मूल बीजाक्षर है। मन्त्र में देवी के छह प्रमुख नाम-युग्म हैं: वार्तालि-वार्तालि, वाराहि-वाराहि, वराहमुखि-वराहमुखि, अन्धे-अन्धिनि, रुन्धे-रुन्धिनि, जम्भे-जम्भिनि — ये ही कर न्यास और षडङ्ग न्यास के आधार भी हैं।
मन्त्र के उत्तरार्ध में पांच महाशक्तियां वर्णित हैं: अन्धन (अंधा करना), रुन्धन (रोकना), जम्भन (जड़ करना), मोहन (मोहित करना), स्तम्भन (ठहरा देना)। ये पांचों शत्रु की वाक्, चित्त, चक्षु, मुख, गति और जिह्वा को स्तम्भित करते हैं। अंत में ठः ठः ठः ठः (चार बार कीलक) और हुँ फट् स्वाहा से मन्त्र की शक्ति प्रकट होती है।
12-चरण जप विधान — क्रमवार व्याख्या
१. विनियोग: मन्त्र का "परिचय पत्र" — ऋषि (दक्षिणामूर्ति), छन्द (गायत्री), देवता (वाराही) और प्रयोजन (सर्वाभीष्ट सिद्धि) बोलकर संकल्प व्यक्त करना। बिना विनियोग के जप अधूरा माना जाता है।
२. ऋष्यादि न्यास: शिर पर ऋषि, मुख पर छन्द, हृदय पर देवता और सर्वांग पर विनियोग — चार स्थानों पर करन्यास।
३. पदन्यास (विशेष): यह इस मन्त्र की विशिष्टता है। मन्त्र के प्रत्येक पद को शरीर के विशिष्ट अंग पर न्यस्त किया जाता है — शिर (ऐँ) से लेकर दोनों हाथों, पैरों, नाभि, जठर, पृष्ठ तक 45 अंगों पर। यह सम्पूर्ण शरीर को कवच की भांति मन्त्रमय बना देता है।
४. करन्यास: छह उंगलियों/भागों पर (अंगुष्ठ → तर्जनी → मध्यमा → अनामिका → कनिष्ठिका → करतल-करपृष्ठ) — वार्तालि, वाराहि, वराहमुखि, अन्धे-अन्धिनि, रुन्धे-रुन्धिनि, जम्भे-जम्भिनि।
५. षडङ्ग न्यास: हृदय (नमः), शिर (स्वाहा), शिखा (वषट्), कवच (हुं), नेत्रत्रय (वौषट्), अस्त्र (फट्) — छह अंगों पर।
६. ध्यान: देवी का प्रत्यग्ररुणसंकाश (ताज़ी लाल सुबह की किरणों जैसा) स्वरूप। इन्द्रनीलमहातेज, मुण्डमाला, नवरत्न आभूषण, चार भुजाओं में हल, मुसल, वरद, अभय और कोलानना (वराह-मुखी)।
७. पञ्चपूजा: पंचतत्व पूजा — पृथ्वी (गन्ध), आकाश (पुष्प), वायु (धूप), अग्नि (दीप), अमृत (नैवेद्य) — और अंत में सर्वात्मिका (सभी उपचार)।
८-९. माला मन्त्र और गुरु मन्त्र: जपमाला को जाग्रत करने का मन्त्र और गुरु स्मरण।
१०. मूल मन्त्र जप: 135 अक्षरी मन्त्र — यही मुख्य जप है। एक माला (108 बार) या संकल्प अनुसार।
११-१२. समर्पण: जप का फल देवी को समर्पित करना और माला को विसर्जित करना।
ध्यान श्लोक का भावार्थ
देवी का स्वरूप प्रत्यग्ररुणसंकाश (ताज़ी सुबह के सूर्य की भांति लालिमायुक्त) है। वे पद्म (कमल) के भीतर विराजमान हैं। उनका तेज इन्द्रनील (नीलम) के समान महान है और वे विश्वमातृ (संसार की माता) हैं।
वे मुण्डमाला धारण किए हुई हैं, नवरत्नों से विभूषित हैं, अमूल्य रत्नों से जड़ित मुकुट उनके मस्तक पर शोभित है। रेशमी वस्त्र और प्रवाल-मणि आभूषणों से सुशोभित हैं।
चार भुजाओं में हल (कृषि/निर्माण शक्ति), मुसल (संहार/दमन शक्ति), वरद (वर देना) और अभय (भयमुक्ति) — ये चार आयुध हैं। उनके नेत्र कपिल (भूरे-लाल) हैं, कमर सुन्दर है, कमल-सी आभा है, और उनका मुख कोल (वराह) के समान है।
इस मन्त्र जप के प्रमुख लाभ
1. पञ्चविध शत्रु-नाश: अन्धन, रुन्धन, जम्भन, मोहन, स्तम्भन — शत्रुओं की समस्त शक्तियों का दमन।
2. वाक्-स्तम्भन: शत्रु की वाणी, दुष्प्रचार और झूठी गवाही को रोकने में अत्यंत सिद्ध मन्त्र।
3. तांत्रिक सुरक्षा: 45-अंग पदन्यास से सम्पूर्ण शरीर मन्त्रमय कवच बन जाता है।
4. वश्यकरण: मन्त्र में "शीघ्रं वश्यं कुरु कुरु" — सात्विक आकर्षण और प्रभाव वृद्धि।
5. सर्वाभीष्ट सिद्धि: विनियोग में स्पष्ट है — "सर्वाभीष्टसिद्धये" — समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्री महावाराही मन्त्र कितने अक्षरों का है?
यह पञ्चोत्तरशत्यक्षरी (135 अक्षर) महामन्त्र है। "ऐँ ग्लौँ ऐँ नमो भगवति वार्तालि..." से "ठः ठः ठः ठः हुँ फट् स्वाहा" तक।
2. इस मन्त्र के ऋषि, छन्द और देवता कौन हैं?
ऋषि: दक्षिणामूर्ति, छन्द: गायत्री, देवता: श्रीवाराही।
3. पदन्यास क्या है?
मन्त्र के प्रत्येक पद को शरीर के विशिष्ट अंगों पर स्पर्श करके न्यस्त करना — शिर से पादाग्र तक 45 अंगों पर। यह करन्यास और षडङ्गन्यास से अधिक विस्तृत है।
4. वार्तालि, वाराहि और वराहमुखि में क्या अंतर है?
तीनों वाराही देवी के ही नाम: वार्तालि = पवनगति शक्ति, वाराहि = वराह शक्ति स्वरूपा, वराहमुखि = वराह मुख धारिणी।
5. अन्धे-अन्धिनि, रुन्धे-रुन्धिनि, जम्भे-जम्भिनि का अर्थ?
अन्धे-अन्धिनि = अंधा करने वाली, रुन्धे-रुन्धिनि = रोकने वाली, जम्भे-जम्भिनि = जड़ करने वाली।
6. मोहे-मोहिनि और स्तम्भे-स्तम्भिनि का अर्थ?
मोहे-मोहिनि = मोहित करने वाली, स्तम्भे-स्तम्भिनि = स्तम्भित (जड़) करने वाली।
7. ठः ठः ठः ठः क्या है?
ठः कीलक बीजाक्षर है, चार बार दोहराया गया। वाराही की विशेष शक्ति को जाग्रत करता है।
8. क्या बिना दीक्षा के जप कर सकते हैं?
यह गोपनीय तांत्रिक मन्त्र है, गुरु-दीक्षा अनिवार्य है। बिना दीक्षा के ध्यान श्लोक और पञ्चपूजा कर सकते हैं।
9. पञ्चपूजा में कौन-कौन से तत्व हैं?
पृथ्वी (गन्ध), आकाश (पुष्प), वायु (धूप), अग्नि (दीप), अमृत (नैवेद्य) — और सर्वात्मिका (समस्त उपचार)।
10. जपसमर्पण श्लोक का अर्थ?
"हे गुह्य से भी अतिगुह्य रहस्यों की रक्षा करने वाली! मेरे द्वारा किया गया जप स्वीकार करो। आपकी कृपा से सिद्धि मुझमें स्थिर हो।"
