॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री अश्वारूढा देवी मन्त्र जप प्रयोगः ॥
॥ १. विनियोगः ॥
ॐ अस्य श्री अश्वारूढा महा मन्त्रस्य । ब्रह्मा ऋषिः । विराट् छन्दः ।
अश्वारूढांबा देवता । ऐँ बीजं । ह्रीँ शक्तिः । क्रोँ कीलकं ।
अश्वारूढांबा प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ॥
॥ २. कर न्यासः ॥
ॐ ऐँ अङ्गुष्ठाभ्यं नमः ।
ॐ ईँ तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ ऊँ मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ ऐँ अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ औँ फट् कनिष्टिखाभ्यां नमः ।
ॐ अः करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः ।
॥ ३. षडङ्ग न्यासः ॥
ॐ ऐँ हृदयाय नमः ।
ॐ ह्रीँ शिरसे स्वाहा ।
ॐ क्रोँ शिखायै वषट् ।
ॐ एहोहि कवचाय हुं ।
ॐ परमेश्वरि नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ स्वाहा अस्त्राय फट् ।
भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः ॥
॥ ४. ध्यानम् ॥
रक्तामश्वाधिरूढां शशिधरशकलांबद्धमौलिं त्रिनेत्रां ।
पाशेनाबध्य साध्यं स्मरशरविवशां दक्षिणेनानयन्तीं ।
हस्तेनान्येन वेत्रं वरकनकमयं धारयन्तीं मनोज्ञयां ।
देवीं ध्यायेदजस्त्रं कुचभरनमितां दिव्य हाराभिरामां ॥
(अर्थ: जो लाल रंग के अश्व पर सवार हैं, चंद्रकला मस्तक पर, त्रिनेत्रा। एक हाथ में पाश — शत्रुओं को बांधने को। दूसरे में स्वर्ण वेत्र — सन्मार्ग दिखाने को। दिव्य हारों से सुशोभित उन देवी का निरन्तर ध्यान करो।)
॥ ५. पञ्चपूजा ॥
लँ - पृथिव्यात्मिकायै गन्धं समर्पयामि ।
हँ - आकाशात्मिकायै पुष्पैः पूजयामि ।
यँ - वाय्वात्मिकायै धूपमाघ्रापयामि ।
रँ - अग्न्यात्मिकायै दीपं दर्शयामि ।
वँ - अमृतात्मिकायै अमृतं महानैवेद्यं निवेदयामि ।
सँ - सर्वात्मिकायै सर्वोपचार पूजाम् समर्पयामि ॥
॥ ६. जपमाला मन्त्रं ॥
(माला पूजन)
ॐ मां माले महामाये सर्वमन्त्र स्वरूपिणि।
चतुर्वर्ग स्त्वयिन्यस्त स्तस्मान्ये सिद्धिदा भव ॥
॥ ७. गुरु मन्त्र ॥
ॐ ह्रीं सिद्धगुरो प्रसीद ह्रीं ॐ
॥ ८. मूल मन्त्र (चतुर्दशाक्षर) ॥
(१४ अक्षरों वाला शक्तिशाली मंत्र)
ॐ ऐँ ह्रीँ क्रोँ एहोहि परमेश्वरि स्वाहा ॥
॥ ९. षडङ्ग न्यासः (पुनः) ॥
(जप के बाद पुन: न्यास करें — विधि पूर्ववत)
॥ १०. ध्यानम् (पुनः) ॥
(जप के बाद पुन: ध्यान करें — विधि पूर्ववत)
॥ ११. पञ्चपूजा (पुनः) ॥
(जप के बाद पुन: पंचपूजा करें — विधि पूर्ववत)
॥ १२. समर्पणम् ॥
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मात्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्मयि स्तिरा ॥
(जप का फल देवी को अर्पित करें)
॥ १३. जपानंतरं मालामन्त्रं ॥
श्लोक ॥ ॐ त्वं माले सर्वदेवानां प्रीतिदा शुभदा भव। शुभं कुरुष्य मे भद्रे यशो वीर्यं च देहिमे ॥
मन्त्र ॥ ॐ ह्रीं सिद्ध्यै नमः ॥
॥ १४. पुरश्चरण विधि ॥
जप: १,००,००० (एक लाख) — सिद्धि के लिए।
होम: १०,००० (शहद, घी, खीर से)।
साधारण साधकों के लिए प्रतिदिन १०८ बार (१ माला) जाप उत्तम है।
॥ इति श्री अश्वारूढा देवी मन्त्र जप प्रयोगः सम्पूर्णम् ॥
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अश्वारूढा देवी का रहस्य — अश्व = इंद्रियाँ, आरूढा = नियंत्रण
'अश्वारूढा' (Ashwaruda) का शाब्दिक अर्थ है — 'घोड़े पर सवार'। तांत्रिक दर्शन में, अश्व (घोड़ा) हमारी इंद्रियों और मन का प्रतीक है। जैसे घोड़ा अत्यंत चंचल होता है, वैसे ही मन भी चंचल है।
अश्वारूढा देवी वह शक्ति हैं जो इस चंचल मन को वश में रखती हैं। उनके हाथ में पाश (Noose) = इच्छाओं को नियंत्रित करने हेतु। स्वर्ण वेत्र (Golden Cane) = अनुशासन (Discipline) हेतु। जो साधक मन को जीत लेता है, वह सम्पूर्ण जगत को जीत सकता है।
श्रीविद्या परंपरा में, अश्वारूढा देवी ललिता परमेश्वरी की अंग देवता (अंगरक्षक/Attendant) हैं। वे देवी की सेना में अश्वसेना (Cavalry) का नेतृत्व करती हैं। इनका 14 अक्षरी मन्त्र — "ॐ ऐँ ह्रीँ क्रोँ एहोहि परमेश्वरि स्वाहा" — अत्यंत शक्तिशाली है।
विनियोग: ऋषि — ब्रह्मा। छन्द — विराट्। देवता — अश्वारूढांबा। बीज — ऐँ। शक्ति — ह्रीँ। कीलक — क्रोँ। प्रयोजन — अश्वारूढा प्रसाद सिद्धि।
साधना के 5 प्रमुख लाभ
1. मन पर नियंत्रण: चंचल मन स्थिर होता है, एकाग्रता बढ़ती है। ध्यान (Meditation) में गहराई आती है।
2. इंद्रिय निग्रह: बुरी आदतों, वासनाओं और व्यसनों पर विजय। "अश्व (इंद्रियों) को वश में करना" — यही देवी का मूल कार्य।
3. सात्विक आकर्षण (Vashikaran): जब मन वश में होता है, तो स्वाभाविक आकर्षण उत्पन्न होता है। लोग अनुकूल होते हैं। यह हानिकारक नहीं।
4. शत्रु विजय: आंतरिक शत्रु (काम, क्रोध, लोभ, मोह) और बाह्य शत्रुओं — दोनों का नाश।
5. वाक-शक्ति: वाणी में प्रभाव और अधिकार आता है। जो कहें वह होता है।
14-चरण जप विधि — सम्पूर्ण क्रम
जप से पहले (Steps 1-7): विनियोग → कर न्यास (6 उंगलियाँ) → षडङ्ग न्यास (6 अंग) → ध्यान → पञ्चपूजा → माला मन्त्र → गुरु मन्त्र।
मूल जप (Step 8): "ॐ ऐँ ह्रीँ क्रोँ एहोहि परमेश्वरि स्वाहा" — 108 बार (नित्य) या 1 लाख (सिद्धि हेतु)।
जप के बाद (Steps 9-14): पुनः न्यास → पुनः ध्यान → पुनः पञ्चपूजा → समर्पण → माला मन्त्र → पुरश्चरण।
पुरश्चरण: सिद्धि हेतु 1 लाख जप + 10,000 होम (शहद, घी, खीर)। नित्य साधना: प्रतिदिन 108 बार (1 माला)। लाल वस्त्र, लाल आसन, लाल पुष्प (गुड़हल)।
FAQ — अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. अश्वारूढा देवी कौन हैं?
ललिता त्रिपुरासुंदरी की अंग देवता (अंगरक्षक)। अश्व = इंद्रियाँ/मन, आरूढा = सवार/नियंत्रित। चंचल मन और इंद्रियों को वश में करने वाली शक्ति।
2. 14 अक्षरी मूल मन्त्र?
ॐ ऐँ ह्रीँ क्रोँ एहोहि परमेश्वरि स्वाहा — 14 अक्षरों का शक्तिशाली मन्त्र। ऐँ = सरस्वती बीज, ह्रीँ = माया बीज, क्रोँ = कीलक।
3. क्या बिना गुरु दीक्षा के जप सकते हैं?
नहीं। यह तांत्रिक मन्त्र है, गुरु दीक्षा अनिवार्य। बिना दीक्षा के ध्यान श्लोक और देवी स्तुति कर सकते हैं।
4. 'एहोहि' का अर्थ?
एहोहि = आओ, पधारो। देवी से आह्वान कि वे आएं और कृपा करें। कुछ परंपराओं में 'एहि' (Ehi) प्रयोग होता है। गुरु का दिया संस्करण मान्य।
5. क्या इससे वशीकरण होता है?
हाँ, सात्विक वशीकरण। जब इंद्रियाँ (अश्व) वश में होती हैं, तो स्वाभाविक आकर्षण उत्पन्न होता है। किसी को हानि नहीं — सकारात्मक प्रभाव।
6. न्यास कितने प्रकार?
कर न्यास (6 उंगलियों पर) और षडङ्ग न्यास (हृदय, शिर, शिखा, कवच, नेत्र, अस्त्र)। जप से पहले और बाद — दोनों में करें।
7. पुरश्चरण विधि?
सिद्धि: 1 लाख जप + 10,000 होम (शहद, घी, खीर)। नित्य: 108 बार (1 माला)। लाल वस्त्र, लाल आसन।
8. ध्यान श्लोक का अर्थ?
लाल अश्व पर सवार, चंद्रकला मस्तक पर, त्रिनेत्रा। एक हाथ पाश (इच्छा बांधने), दूसरे में स्वर्ण वेत्र (अनुशासन)। दिव्य हारों से सुशोभित।
9. कौन सा रंग शुभ?
देवी का वर्ण लाल — लाल अश्व पर सवार। लाल वस्त्र, लाल आसन, गुड़हल पुष्प सर्वोत्तम।
10. ललिता देवी से सम्बन्ध?
श्रीविद्या में अश्वारूढा ललिता की अंग देवता। अश्वसेना (Cavalry) की नायिका। ललिता की आज्ञा से शत्रुओं पर आक्रमण करती हैं।
