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Sri Kasi Visalakshi Stotram (Vyasa Krutam) – श्री विशालाक्षी स्तोत्रम् (व्यास कृतम्)

Sri Kasi Visalakshi Stotram (Vyasa Krutam) – श्री विशालाक्षी स्तोत्रम् (व्यास कृतम्)
॥ श्री विशालाक्षी स्तोत्रम् ॥ व्यास उवाच । विशालाक्षि नमस्तुभ्यं परब्रह्मात्मिके शिवे । त्वमेव माता सर्वेषां ब्रह्मादीनां दिवौकसाम् ॥ १ ॥ इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिस्त्वमेव हि । ऋज्वी कुण्डलिनी सुक्ष्मा योगसिद्धिप्रदायिनी ॥ २ ॥ स्वाहा स्वधा महाविद्या मेधा लक्ष्मीः सरस्वती । सती दाक्षायणी विद्या सर्वशक्तिमयी शिवा ॥ ३ ॥ अपर्णा चैकपर्णा च तथा चैकैकपाटला । उमा हैमवती चापि कल्याणी चैव मातृका ॥ ४ ॥ ख्यातिः प्रज्ञा महाभागा लोके गौरीति विश्रुता । गणाम्बिका महादेवी नन्दिनी जातवेदसी ॥ ५ ॥ सावित्री वरदा पुण्या पावनी लोकविश्रुता । आयती नियती रौद्री दुर्गा भद्रा प्रमाथिनी ॥ ६ ॥ कालरात्री महामाया रेवती भूतनायिका । गौतमी कौशिकी चाऽऽर्था चण्डी कात्यायनी सती ॥ ७ ॥ वृषध्वजा शूलधरा परमा ब्रह्मचारिणी । महेन्द्रोपेन्द्रमाता च पार्वती सिंहवाहना ॥ ८ ॥ फलश्रुतिः एवं स्तुत्वा विशालाक्षीं दिव्यैरेतैः सुनामभिः । कृतकृत्योऽभवद्व्यासो वाराणस्यां द्विजोत्तमाः ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीसौरपुराणे अष्टमोऽध्याये व्यास कृतं विशालाक्षी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री विशालाक्षी स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री विशालाक्षी स्तोत्रम् (Sri Visalakshi Stotram) काशी (वाराणसी) की अधिष्ठात्री देवी और 51 शक्ति पीठों में प्रमुख 'विशालाक्षी' (Broad-Eyed Goddess) की स्तुति है। इसकी रचना स्वयं महर्षि वेद व्यास ने की थी, जिनका काशी और भगवान शिव से गहरा संबंध है।

शक्ति पीठ की कथा: जब भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के 51 टुकड़े किए। जहाँ-जहाँ ये अंग गिरे, वहाँ शक्ति पीठ बने। काशी के मणिकर्णिका घाट क्षेत्र में सती के नेत्र (Eyes) या कुंडल (Earrings) गिरे थे। इसलिए इस स्थान की देवी को 'विशालाक्षी' (विशाल नेत्रों वाली) और 'मणिकर्णिका' भी कहा जाता है। यह मंदिर मीर घाट, वाराणसी में स्थित है और इसे दक्षिण भारत के मंदिरों (जैसे कांची कामाक्षी, मदुरै मीनाक्षी) के समान अत्यंत पवित्र माना जाता है।

व्यास और काशी: स्कंद पुराण और काशी खंड के अनुसार, एक बार महर्षि व्यास को काशी में भिक्षा नहीं मिली। क्रुद्ध होकर उन्होंने काशी को श्राप देने का विचार किया। तब देवी अन्नपूर्णा/विशालाक्षी ने स्वयं उन्हें भोजन कराया और ज्ञान दिया। प्रसन्न होकर व्यास जी ने देवी की स्तुति की, जो आज 'विशालाक्षी स्तोत्र' या 'व्यास कृत स्तोत्र' के नाम से प्रसिद्ध है।

इस स्तोत्र में व्यास जी ने देवी को "परब्रह्मात्मिके" (परब्रह्म स्वरूपा) कहकर नमन किया है। वे उन्हें "इच्छाशक्ति", "क्रियाशक्ति" और "ज्ञानशक्ति" का मूल स्रोत बताते हैं। श्लोक 3 से 8 तक देवी के अनेक नाम जैसे सावित्री, गौरी, चंडी, कात्यायनी, अपर्णा आदि का उल्लेख है, जो यह सिद्ध करता है कि विशालाक्षी ही सर्व-देवमयी (Embodiment of all Goddesses) हैं।

काशी वास करने वाले साधकों के लिए इस स्तोत्र का पाठ अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि विशालाक्षी की कृपा के बिना काशी में 'शिव-सायुज्य' (मोक्ष) प्राप्त करना कठिन है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

  • मोक्ष दायिनी: काशी को 'आनंद वन' और 'मुक्तिक्षेत्र' कहा जाता है। विशालाक्षी इस क्षेत्र की शक्ति हैं। मान्यता है कि मृत्यु के समय भगवान शिव तारक मंत्र देते हैं और विशालाक्षी (शक्ति) जीव के कर्म-बंधनों को काटकर उसे मुक्त करती हैं।

  • कुंडलिनी जागरण: श्लोक 2 में देवी को "ऋज्वी कुण्डलिनी सूक्ष्मा" कहा गया है। योग साधकों के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। विशालाक्षी की साधना से मूलाधार में स्थित कुंडलिनी शक्ति जागृत होकर उर्ध्वगामी होती है और 'योग सिद्धि' (यौगिक उपलब्धियाँ) प्रदान करती है।

  • त्रिदेवी रूप: विशालाक्षी को मीनाक्षी (मदुरै) और कामाक्षी (कांचीपुरम) के साथ त्रिदेवियों में गिना जाता है। दक्षिण भारतीय परंपरा में इनका विशेष स्थान है।

पाठ के लाभ (Benefits)

'व्यास कृत' होने के कारण यह स्तोत्र अत्यंत सिद्ध और प्रभावशाली है। इसके पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • काशी वास का पुण्य: जो भक्त काशी नहीं जा सकते, वे यदि प्रतिदिन इसका पाठ करें, तो उन्हें काशी यात्रा और गंगा स्नान समान पुण्य प्राप्त होता है।

  • सर्व-मनोकामना पूर्ति: स्तोत्र के अंत में कहा गया है - "कृतकृत्योऽभवद्व्यासो" (व्यास जी कृतकृत्य हो गए)। यह साधक की सभी सात्विक इच्छाओं (विद्या, धन, संतान) को पूर्ण करता है।

  • संतान सुख: विशालाक्षी को 'संतान दात्री' भी माना जाता है। भाद्रपद माह की कजरी तीज पर महिलाएं संतान और पति की लंबी आयु के लिए उनका विशेष पूजन करती हैं।

  • भय और रोग नाश: देवी "दुर्गा" और "भद्रा" (कल्याणकारी) हैं। उनका स्मरण सभी प्रकार के भय, शत्रु बाधा और रोगों को नष्ट करता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

माँ विशालाक्षी की कृपा प्राप्ति के लिए इस सरल विधि को अपनाएं:

  • मानसिक पूजा: पाठ शुरू करने से पहले, नेत्र बंद करके मानसिक रूप से स्वयं को काशी के मणिकर्णिका घाट पर स्थित मानें और माँ विशालाक्षी के विशाल नेत्रों का ध्यान करें।

  • समय: प्रातः काल या संध्या समय। नवरात्रि और कजरी तीज (Kajari Teej) का दिन विशेष फलदायी है।

  • अर्पण: देवी को लाल पुष्प (गुड़हल), कुमकुम और अक्षत अत्यंत प्रिय हैं। यदि संभव हो, तो सुहाग की सामग्री अर्पित करें।

  • दिशा: उत्तर दिशा (जो काशी की दिशा मानी जाती है) की ओर मुख करके पाठ करना उत्तम है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. विशालाक्षी देवी कौन हैं?

विशालाक्षी देवी भगवान विश्वनाथ की अर्धांगिनी और काशी (वाराणसी) की प्रधान शक्ति हैं। वे 51 शक्ति पीठों में से एक हैं, जहाँ सती के 'नेत्र' (Eyes) या 'कुंडल' (Earrings) गिरे थे। उनका मंदिर मणिकर्णिका घाट के पास मीर घाट पर स्थित है।

2. इस स्तोत्र की रचना किसने की?

इस स्तोत्र की रचना महाभारत और पुराणों के रचयिता महर्षि वेद व्यास ने की थी। इसीलिए इसे 'व्यास कृत विशालाक्षी स्तोत्र' कहा जाता है। उन्होंने काशी में देवी की कृपा प्राप्त करने के बाद यह स्तुति गाई थी।

3. विशालाक्षी और अन्नपूर्णा में क्या संबंध है?

काशी में विशालाक्षी और अन्नपूर्णा दोनों ही देवी पार्वती के स्वरूप हैं। विशालाक्षी 'शक्ति पीठ' की देवी हैं (तंत्रीय महत्ता), जबकि अन्नपूर्णा काशी की 'भोजन दात्री' माता हैं। भक्त प्रायः दोनों के दर्शन एक साथ करते हैं।

4. इस स्तोत्र के पाठ का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

इसका सबसे बड़ा लाभ 'मोक्ष' (Liberation) है। काशी को 'मोक्ष दायिनी' नगरी कहा जाता है, और विशालाक्षी की स्तुति से भक्त को जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिलती है। साथ ही, यह समस्त सांसारिक भय का नाश करता है।

5. 'विशालाक्षी' नाम का क्या अर्थ है?

'विशाल' का अर्थ है बड़ा/व्यापक और 'अक्षी' का अर्थ है आँखें। अर्थात, 'बड़ी आँखों वाली देवी'। उनकी दृष्टि इतनी करुणामयी और व्यापक है कि वह समस्त ब्रह्मांड पर कृपा बरसाती हैं।

6. क्या घर पर पाठ करने से काशी यात्रा का फल मिलता है?

हाँ। शास्त्र कहते हैं कि यदि कोई भक्त काशी जाने में असमर्थ है, तो वह घर पर ही पूर्ण श्रद्धा से मानसिक रूप से काशी और विशालाक्षी मंदिर का ध्यान करके इस स्तोत्र का पाठ करे, तो उसे काशी यात्रा का पुण्य प्राप्त होता है।

7. पाठ के लिए विशेष दिन कौन से हैं?

भाद्रपद माह की कजरी तीज (Kajari Teej - कृष्ण तृतीया), नवरात्रि के नौ दिन, और प्रत्येक मंगलवार या शुक्रवार का दिन विशालाक्षी देवी की साधना के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है।

8. क्या अविवाहित कन्याएं इसका पाठ कर सकती हैं?

अवश्य। जैसे गौरी पूजन (कात्यायनी व्रत) से विवाह बाधा दूर होती है, वैसे ही विशालाक्षी (गौरी का ही एक रूप) की स्तुति से सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है और विवाह शीघ्र संपन्न होता है।

9. नैवेद्य में क्या अर्पित करना चाहिए?

देवी को सुहाग की सामग्री (सिंदूर, बिंदी, चूड़ियाँ) और मीठा पान, नारियल या खीर का भोग लगाना चाहिए। दक्षिण भारतीय भक्त उन्हें 'साड़ी' भी अर्पित करते हैं, जो उनकी परंपरा का हिस्सा है।

10. श्लोक 9 में 'कृतकृत्य' शब्द का क्या अर्थ है?

'कृतकृत्य' का अर्थ है 'जिसका कार्य सिद्ध हो गया हो' या 'जो पूर्ण संतुष्ट हो गया हो'। व्यास जी ने देवी की स्तुति करके जीवन का परम लक्ष्य पा लिया था। इसी प्रकार, साधक भी इस पाठ से जीवन में पूर्णता (Fulfillment) प्राप्त करता है।