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Devi Bhujanga Stotram – देवी भुजङ्ग स्तोत्रम् (Shankaracharya Kritam)

Devi Bhujanga Stotram: The Serpentine Hymn to the Goddess

Devi Bhujanga Stotram – देवी भुजङ्ग स्तोत्रम् (Shankaracharya Kritam)
विरिञ्च्यादिभिः पञ्चभिर्लोकपालैः – समूढे महानन्दपीठे निषण्णम् । धनुर्बाणपाशाङ्कुशप्रोतहस्तं – महस्त्रैपुरं शङ्कराद्वैतमव्यात् ॥ १ ॥ यदन्नादिभिः पञ्चभिः कोशजालैः – शिरःपक्षपुच्छात्मकैरन्तरन्तः । निगूढे महायोगपीठे निषण्णं – पुरारेरथान्तःपुरं नौमि नित्यम् ॥ २ ॥ विरिञ्चादिरूपैः प्रपञ्चे विहृत्य – स्वतन्त्रा यदा स्वात्मविश्रान्तिरेषा । तदा मानमातृप्रमेयातिरिक्तं – परानन्दमीडे भवानि त्वदीयम् ॥ ३ ॥ विनोदाय चैतन्यमेकं विभज्य – द्विधा देवि जीवः शिवश्चेति नाम्ना । शिवस्यापि जीवत्वमापादयन्ती – पुनर्जीवमेनं शिवं वा करोषि ॥ ४ ॥ समाकुञ्च्य मूलं हृदि न्यस्य वायुं – मनो भ्रूबिलं प्रापयित्वा निवृत्ताः । ततः सच्चिदानन्दरूपे पदे ते – भवन्त्यम्ब जीवाः शिवत्वेन केचित् ॥ ५ ॥ शरीरेऽतिकष्टे रिपौ पुत्रवर्गे – सदाभीतिमूले कलत्रे धने वा । न कश्चिद्विरज्यत्यहो देवि चित्रं – कथं त्वत्कटाक्षं विना तत्त्वबोधः ॥ ६ ॥ शरीरे धनेऽपत्यवर्गे कलत्रे – विरक्तस्य सद्देशिकादिष्टबुद्धेः । यदाकस्मिकं ज्योतिरानन्दरूपं – समाधौ भवेत्तत्त्वमस्यम्ब सत्यम् ॥ ७ ॥ मृषान्यो मृषान्यः परो मिश्रमेनं – परः प्राकृतं चापरो बुद्धिमात्रम् । प्रपञ्चं मिमीते मुनीनां गणोऽयं – तदेतत्त्वमेवेति न त्वां जहीमः ॥ ८ ॥ निवृत्तिः प्रतिष्ठा च विद्या च शान्ति- स्तथा शान्त्यतीतेति पञ्चीकृताभिः । कलाभिः परे पञ्चविंशात्मिकाभि- स्त्वमेकैव सेव्या शिवाभिन्नरूपा ॥ ९ ॥ अगाधेऽत्र संसारपङ्के निमग्नं – कलत्रादिभारेण खिन्नं नितान्तम् । महामोहपाशौघबद्धं चिरान्मां – समुद्धर्तुमम्ब त्वमेकैव शक्ता ॥ १० ॥ समारभ्य मूलं गतो ब्रह्मचक्रं – भवद्दिव्यचक्रेश्वरीधामभाजः । महासिद्धिसङ्घातकल्पद्रुमाभा- नवाप्याम्ब नादानुपास्ते च योगी ॥ ११ ॥ गणेशैर्ग्रहैरम्ब नक्षत्रपङ्क्त्या – तथा योगिनीराशिपीठैरभिन्नम् । महाकालमात्मानमामृश्य लोकं – विधत्से कृतिं वा स्थितिं वा महेशि ॥ १२ ॥ लसत्तारहारामतिस्वच्छचेलां – वहन्तीं करे पुस्तकं चाक्षमालाम् । शरच्चन्द्रकोटिप्रभाभासुरां त्वां – सकृद्भावयन्भारतीवल्लभः स्यात् ॥ १३ ॥ समुद्यत्सहस्रार्कबिम्बाभवक्त्रां – स्वभासैव सिन्दूरिताजाण्डकोटिम् । धनुर्बाणपाशाङ्कुशान्धारयन्तीं – स्मरन्तः स्मरं वापि संमोहयेयुः ॥ १४ ॥ मणिस्यूतताटङ्कशोणास्यबिम्बां – हरित्पट्टवस्त्रां त्वगुल्लासिभूषाम् । हृदा भावयंस्तप्तहेमप्रभां त्वां – श्रियो नाशयत्यम्ब चाञ्चल्यभावम् ॥ १५ ॥ महामन्त्रराजान्तबीजं पराख्यं – स्वतो न्यस्तबिन्दु स्वयं न्यस्तहार्दम् । भवद्वक्त्रवक्षोजगुह्याभिधानं – स्वरूपं सकृद्भावयेत्स त्वमेव ॥ १६ ॥ तथान्ये विकल्पेषु निर्विण्णचित्ता- स्तदेकं समाधाय बिन्दुत्रयं ते । परानन्दसन्धानसिन्धौ निमग्नाः – पुनर्गर्भरन्ध्रं न पश्यन्ति धीराः ॥ १७ ॥ त्वदुन्मेषलीलानुबन्धाधिकारा- न्विरिञ्च्यादिकांस्त्वद्गुणाम्भोधिबिन्दून् । भजन्तस्तितीर्षन्ति संसारसिन्धुं – शिवे तावकीना सुसम्भावनेयम् ॥ १८ ॥ कदा वा भवत्पादपोतेन तूर्णं – भवाम्भोधिमुत्तीर्य पूर्णान्तरङ्गः । निमज्जन्तमेनं दुराशाविषाब्धौ – समालोक्य लोकं कथं पर्युदास्से ॥ १९ ॥ कदावा हृषीकाणि साम्यं भजेयुः – कदा वा न शत्रुर्न मित्रं भवानि । कदा वा दुराशाविषूचीविलोपः – कदा वा मनो मे समूलं विनश्येत् ॥ २० ॥ नमोवाकमाशास्महे देवि युष्म- त्पदाम्भोजयुग्माय तिग्माय गौरि । विरिञ्च्यादिभास्वत्किरीटप्रतोली- प्रदीपायमानप्रभाभास्वराय ॥ २१ ॥ कचे चन्द्ररेखं कुचे तारहारं – करे स्वादुचापं शरे षट्पदौघम् । स्मरामि स्मरारेरभिप्रायमेकं – मदाघूर्णनेत्रं मदीयं निधानम् ॥ २२ ॥ शरेष्वेव नासा धनुष्वेव जिह्वा – जपापाटले लोचने ते स्वरूपे । त्वगेषा भवच्चन्द्रखण्डे श्रवो मे – गुणे ते मनोवृत्तिरम्ब त्वयि स्यात् ॥ २३ ॥ जगत्कर्मधीरान्वचोधूतकीरान् – कुचन्यस्तहाराङ्कृपासिन्धुपूरान् । भवाम्भोधिपारान्महापापदूरान् – भजे वेदसारांशिवप्रेमदारान् ॥ २४ ॥ सुधासिन्धुसारे चिदानन्दनीरे – समुत्फुल्लनीपे सुरत्रान्तरीपे । मणिव्यूहसाले स्थिते हैमशाले – मनोजारिवामे निषण्णं मनो मे ॥ २५ ॥ दृगन्ते विलोला सुगन्धीषुमाला – प्रपञ्चेन्द्रजाला विपत्सिन्धुकूला । मुनिस्वान्तशाला नमल्लोकपाला – हृदि प्रेमलोलामृतस्वादुलीला ॥ २६ ॥ जगज्जालमेतत्त्वयैवाम्ब सृष्टं – त्वमेवाद्य यासीन्द्रियैरर्थजालम् । त्वमेकैव कर्त्री त्वमेकैव भोक्त्री – न मे पुण्यपापे न मे बन्धमोक्षौ ॥ २७ ॥ इति प्रेमभारेण किञ्चिन्मयोक्तं – न बुध्वैव तत्त्वं मदीयं त्वदीयं । विनोदाय बालस्य मौर्ख्यं हि मात- स्तदेतत्प्रलापस्तुतिं मे गृहाण ॥ २८ ॥

देवी भुजङ्ग स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

देवी भुजङ्ग स्तोत्रम् (Devi Bhujanga Stotram) जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अद्वितीय स्तोत्र है। यह 28 श्लोकों में भुजंग प्रयात छंद में रचित है। 'भुजंग' का अर्थ है सर्प—जैसे सर्प बलखाते हुए चलता है, वैसे ही इस छंद की लय तरंगित होती है। यह छंद कुंडलिनी शक्ति (जो मूलाधार में सर्पाकार कुंडली मारकर सोई हुई है) के प्रतीक रूप में प्रयुक्त होता है।

शंकराचार्य यद्यपि अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक थे, परन्तु उन्होंने शक्ति उपासना पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ रचे—सौंदर्यलहरी, आनंदलहरी और यह देवी भुजङ्ग स्तोत्रम्। इस स्तोत्र में अद्वैत दर्शन, कुंडलिनी योग, पंच कोश सिद्धांत और सांख्य दर्शन के 25 तत्त्वों का सुंदर समन्वय है।

पहले ही श्लोक में शंकराचार्य घोषणा करते हैं—'महस्त्रैपुरं शङ्कराद्वैतमव्यात्'—त्रिपुरसुंदरी और शंकर अद्वैत (अभिन्न) हैं। यह शक्ति और शिव की एकता का उद्घोष है। देवी पंच लोकपालों (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव) द्वारा धारित 'महानंद पीठ' पर विराजमान हैं।

दार्शनिक महत्व (Philosophical Significance)

यह स्तोत्र केवल भक्ति काव्य नहीं, बल्कि वेदांत और योग का सार है:

  • पंच कोश सिद्धांत (श्लोक 2): 'अन्नादिभिः पञ्चभिः कोशजालैः'—आत्मा पाँच कोशों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय) में आवृत है। देवी इन सबके भीतर 'महायोगपीठ' पर विराजमान हैं।

  • जीव-शिव अभेद (श्लोक 4-5): देवी एक चैतन्य को खेल के लिए जीव और शिव में विभाजित करती हैं। परन्तु कुंडलिनी योग द्वारा (मूलाधार से प्राण उठाकर, आज्ञा चक्र में मन को स्थिर करके) जीव पुनः शिव बन जाता है।

  • वैराग्य और कृपाकटाक्ष (श्लोक 6): संसार में इतने कष्ट हैं—शरीर रोगी, शत्रु भयंकर, संतान चिंता, पत्नी-धन का भय—फिर भी मनुष्य वैराग्य नहीं लेता! बिना देवी की कृपा दृष्टि के तत्त्वबोध असंभव है।

  • तत्त्वमसि (श्लोक 7): जब वैराग्य आता है और सद्गुरु मिलता है, तो समाधि में जो आकस्मिक ज्योति प्रकट होती है—वही 'तत्त्वमसि' (तू वही है) का साक्षात्कार है।

  • पञ्चविंशात्मिका (श्लोक 9): सांख्य के 25 तत्त्व और 5 कलाएं (निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शांति, शांत्यतीता)—सब देवी की ही शक्तियाँ हैं।

  • अद्वैत समर्पण (श्लोक 27): 'त्वमेकैव कर्त्री त्वमेकैव भोक्त्री'—तुम ही कर्ता हो, तुम ही भोक्ता। न मेरा पुण्य-पाप है, न बंध-मोक्ष। यह पूर्ण शरणागति और अद्वैत का चरम है।

पाठ के लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • आध्यात्मिक उन्नति: यह स्तोत्र वेदांत और योग का सार है। इसका पाठ आत्मज्ञान की ओर ले जाता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।

  • कुंडलिनी जागरण: भुजंग छंद स्वयं में कुंडलिनी का प्रतीक है। इसके लयबद्ध पाठ से नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं और प्राण ऊर्जा का प्रवाह सुचारू होता है।

  • वैराग्य प्राप्ति: श्लोक 6-7 का ध्यान करने से सांसारिक आसक्ति कम होती है और वैराग्य उत्पन्न होता है।

  • मोह नाश: 'महामोहपाशौघबद्धं'—महामोह के पाशों से मुक्ति मिलती है।

  • बाधा निवारण: संसार सागर को पार करने के लिए देवी के चरण-रूपी नौका का आश्रय मिलता है।

  • सरस्वती कृपा (श्लोक 13): जो देवी का ध्यान करता है, वह 'भारतीवल्लभ' (सरस्वती का प्रिय) अर्थात विद्वान बनता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

इस दार्शनिक स्तोत्र का पाठ ध्यानपूर्वक करना चाहिए:

दैनिक पाठ विधि:

  1. समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4-6 बजे) या संध्या काल। शुक्रवार और नवरात्रि विशेष शुभ हैं।
  2. स्थान: शांत स्थान में पूर्व या उत्तर मुख करके बैठें। योग आसन (पद्मासन/सुखासन) लगाएं।
  3. पूजन: त्रिपुरसुंदरी या श्री यंत्र के सामने घी का दीपक, कुमकुम, लाल पुष्प अर्पित करें।
  4. प्राणायाम: पाठ से पूर्व कुछ गहरी श्वासें लें। भुजंग छंद की लय श्वास के साथ जुड़ी है।
  5. पाठ: 1 या 3 बार पूर्ण पाठ करें। प्रत्येक श्लोक का अर्थ मन में ध्यान करें।
  6. मनन: पाठ के बाद 5-10 मिनट मौन रहें और श्लोकों के भाव पर चिंतन करें।

कुंडलिनी साधकों के लिए:

श्लोक 5 और 11 पर विशेष ध्यान दें। मूलाधार पर ध्यान करते हुए पाठ आरंभ करें और सहस्रार की ओर चेतना को ले जाएं। यह स्तोत्र नाद योग (ध्वनि ध्यान) के लिए भी उपयुक्त है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस स्तोत्र के रचयिता जगद्गुरु आदि शंकराचार्य हैं। यद्यपि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक माने जाते हैं, उन्होंने शक्ति उपासना पर भी अनेक स्तोत्र रचे जिनमें सौंदर्यलहरी और यह देवी भुजङ्ग स्तोत्रम् प्रमुख हैं।

2. 'भुजंग प्रयात' छंद क्या है?

'भुजंग' का अर्थ है सर्प और 'प्रयात' का अर्थ है गति। जैसे सर्प बलखाते हुए चलता है, वैसे ही इस छंद की लय होती है—य-गण य-गण य-गण य-गण (UUUU)। यह छंद कुंडलिनी शक्ति (जो सर्पाकार है) के जागरण से जुड़ा माना जाता है।

3. श्लोक 1 में 'महस्त्रैपुरं शङ्कराद्वैतमव्यात्' का क्या अर्थ है?

यह अद्वैत सिद्धांत का सार है। 'त्रैपुर' अर्थात त्रिपुरसुंदरी और 'शंकर' अर्थात शिव—ये दोनों 'अद्वैत' (अभिन्न) हैं। देवी और शिव में कोई भेद नहीं है। यह शक्ति-शिव की एकता का उद्घोष है।

4. श्लोक 2 में 'पंच कोश' का क्या संकेत है?

'अन्नादिभिः पञ्चभिः कोशजालैः' पंच कोश सिद्धांत का संकेत है: अन्नमय (शरीर), प्राणमय (श्वास), मनोमय (मन), विज्ञानमय (बुद्धि), और आनंदमय (आत्मा)। देवी इन पांचों कोशों के भीतर 'महायोगपीठ' पर विराजमान हैं।

5. श्लोक 4-5 में जीव और शिव का क्या रहस्य है?

देवी एक चैतन्य को 'जीव' और 'शिव' दो नामों में विभाजित करती हैं। जीव बंधन में है, शिव मुक्त है। परन्तु कुंडलिनी योग द्वारा (मूलाधार से सहस्रार तक प्राण उठाकर) जीव पुनः शिव बन जाता है। यह आत्मज्ञान का मार्ग है।

6. श्लोक 6 में 'कष्ट' और 'कटाक्ष' का क्या संबंध है?

शंकराचार्य कहते हैं—शरीर में कष्ट है, शत्रु हैं, संतान की चिंता है, पत्नी-धन का भय है—फिर भी मनुष्य वैराग्य नहीं लेता! आश्चर्य! बिना देवी के कृपा-कटाक्ष के तत्त्वबोध (आत्मज्ञान) संभव नहीं है।

7. श्लोक 9 में 'पञ्चविंशात्मिका' का क्या अर्थ है?

यह सांख्य दर्शन से जुड़ा है। 25 तत्त्व (पुरुष + प्रकृति + 23 विकार) से यह जगत बना है। देवी इन 25 तत्त्वों की अधिष्ठात्री हैं। साथ ही पाँच कलाएं (निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शांति, शांत्यतीता) भी उन्हीं की शक्तियाँ हैं।

8. श्लोक 10 में 'संसार पंक' का क्या भाव है?

संसार को 'पंक' (कीचड़) कहा गया है जिसमें जीव फंसा हुआ है। कलत्र (पत्नी) आदि का भार, मोह के पाश—इनसे मुक्ति केवल देवी ही दे सकती हैं। 'त्वमेकैव शक्ता' (तुम ही एकमात्र समर्थ हो) यह शरणागति का भाव है।

9. क्या यह स्तोत्र कुंडलिनी साधकों के लिए है?

जी हाँ। श्लोक 5 और 11 में स्पष्ट रूप से कुंडलिनी योग का वर्णन है—'मूलं... ब्रह्मचक्रं' (मूलाधार से सहस्रार), 'भ्रूबिल' (आज्ञा चक्र)। योगी प्राण को मूल से ब्रह्मरंध्र तक ले जाकर देवी के दिव्य चक्रों में 'नादानुपास्ते' (नाद की उपासना) करते हैं।

10. श्लोक 28 में 'बालस्य मौर्ख्यं' का क्या भाव है?

यह शंकराचार्य की विनम्रता है। वे कहते हैं—मैंने प्रेम के आवेग में कुछ कह दिया, तत्त्व को समझे बिना। जैसे माता बालक की मूर्खता को क्षमा करती है, वैसे ही हे माँ, मेरी इस प्रलाप-स्तुति को स्वीकार करो।