Devi Bhujanga Stotram – देवी भुजङ्ग स्तोत्रम् (Shankaracharya Kritam)
Devi Bhujanga Stotram: The Serpentine Hymn to the Goddess

देवी भुजङ्ग स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
देवी भुजङ्ग स्तोत्रम् (Devi Bhujanga Stotram) जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अद्वितीय स्तोत्र है। यह 28 श्लोकों में भुजंग प्रयात छंद में रचित है। 'भुजंग' का अर्थ है सर्प—जैसे सर्प बलखाते हुए चलता है, वैसे ही इस छंद की लय तरंगित होती है। यह छंद कुंडलिनी शक्ति (जो मूलाधार में सर्पाकार कुंडली मारकर सोई हुई है) के प्रतीक रूप में प्रयुक्त होता है।
शंकराचार्य यद्यपि अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक थे, परन्तु उन्होंने शक्ति उपासना पर अनेक महत्वपूर्ण ग्रंथ रचे—सौंदर्यलहरी, आनंदलहरी और यह देवी भुजङ्ग स्तोत्रम्। इस स्तोत्र में अद्वैत दर्शन, कुंडलिनी योग, पंच कोश सिद्धांत और सांख्य दर्शन के 25 तत्त्वों का सुंदर समन्वय है।
पहले ही श्लोक में शंकराचार्य घोषणा करते हैं—'महस्त्रैपुरं शङ्कराद्वैतमव्यात्'—त्रिपुरसुंदरी और शंकर अद्वैत (अभिन्न) हैं। यह शक्ति और शिव की एकता का उद्घोष है। देवी पंच लोकपालों (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव) द्वारा धारित 'महानंद पीठ' पर विराजमान हैं।
दार्शनिक महत्व (Philosophical Significance)
यह स्तोत्र केवल भक्ति काव्य नहीं, बल्कि वेदांत और योग का सार है:
पंच कोश सिद्धांत (श्लोक 2): 'अन्नादिभिः पञ्चभिः कोशजालैः'—आत्मा पाँच कोशों (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनंदमय) में आवृत है। देवी इन सबके भीतर 'महायोगपीठ' पर विराजमान हैं।
जीव-शिव अभेद (श्लोक 4-5): देवी एक चैतन्य को खेल के लिए जीव और शिव में विभाजित करती हैं। परन्तु कुंडलिनी योग द्वारा (मूलाधार से प्राण उठाकर, आज्ञा चक्र में मन को स्थिर करके) जीव पुनः शिव बन जाता है।
वैराग्य और कृपाकटाक्ष (श्लोक 6): संसार में इतने कष्ट हैं—शरीर रोगी, शत्रु भयंकर, संतान चिंता, पत्नी-धन का भय—फिर भी मनुष्य वैराग्य नहीं लेता! बिना देवी की कृपा दृष्टि के तत्त्वबोध असंभव है।
तत्त्वमसि (श्लोक 7): जब वैराग्य आता है और सद्गुरु मिलता है, तो समाधि में जो आकस्मिक ज्योति प्रकट होती है—वही 'तत्त्वमसि' (तू वही है) का साक्षात्कार है।
पञ्चविंशात्मिका (श्लोक 9): सांख्य के 25 तत्त्व और 5 कलाएं (निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शांति, शांत्यतीता)—सब देवी की ही शक्तियाँ हैं।
अद्वैत समर्पण (श्लोक 27): 'त्वमेकैव कर्त्री त्वमेकैव भोक्त्री'—तुम ही कर्ता हो, तुम ही भोक्ता। न मेरा पुण्य-पाप है, न बंध-मोक्ष। यह पूर्ण शरणागति और अद्वैत का चरम है।
पाठ के लाभ (Benefits)
इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
आध्यात्मिक उन्नति: यह स्तोत्र वेदांत और योग का सार है। इसका पाठ आत्मज्ञान की ओर ले जाता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
कुंडलिनी जागरण: भुजंग छंद स्वयं में कुंडलिनी का प्रतीक है। इसके लयबद्ध पाठ से नाड़ियाँ शुद्ध होती हैं और प्राण ऊर्जा का प्रवाह सुचारू होता है।
वैराग्य प्राप्ति: श्लोक 6-7 का ध्यान करने से सांसारिक आसक्ति कम होती है और वैराग्य उत्पन्न होता है।
मोह नाश: 'महामोहपाशौघबद्धं'—महामोह के पाशों से मुक्ति मिलती है।
बाधा निवारण: संसार सागर को पार करने के लिए देवी के चरण-रूपी नौका का आश्रय मिलता है।
सरस्वती कृपा (श्लोक 13): जो देवी का ध्यान करता है, वह 'भारतीवल्लभ' (सरस्वती का प्रिय) अर्थात विद्वान बनता है।
पाठ विधि (Ritual Method)
इस दार्शनिक स्तोत्र का पाठ ध्यानपूर्वक करना चाहिए:
दैनिक पाठ विधि:
- समय: ब्रह्म मुहूर्त (प्रातः 4-6 बजे) या संध्या काल। शुक्रवार और नवरात्रि विशेष शुभ हैं।
- स्थान: शांत स्थान में पूर्व या उत्तर मुख करके बैठें। योग आसन (पद्मासन/सुखासन) लगाएं।
- पूजन: त्रिपुरसुंदरी या श्री यंत्र के सामने घी का दीपक, कुमकुम, लाल पुष्प अर्पित करें।
- प्राणायाम: पाठ से पूर्व कुछ गहरी श्वासें लें। भुजंग छंद की लय श्वास के साथ जुड़ी है।
- पाठ: 1 या 3 बार पूर्ण पाठ करें। प्रत्येक श्लोक का अर्थ मन में ध्यान करें।
- मनन: पाठ के बाद 5-10 मिनट मौन रहें और श्लोकों के भाव पर चिंतन करें।
कुंडलिनी साधकों के लिए:
श्लोक 5 और 11 पर विशेष ध्यान दें। मूलाधार पर ध्यान करते हुए पाठ आरंभ करें और सहस्रार की ओर चेतना को ले जाएं। यह स्तोत्र नाद योग (ध्वनि ध्यान) के लिए भी उपयुक्त है।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?
इस स्तोत्र के रचयिता जगद्गुरु आदि शंकराचार्य हैं। यद्यपि शंकराचार्य अद्वैत वेदांत के प्रवर्तक माने जाते हैं, उन्होंने शक्ति उपासना पर भी अनेक स्तोत्र रचे जिनमें सौंदर्यलहरी और यह देवी भुजङ्ग स्तोत्रम् प्रमुख हैं।
2. 'भुजंग प्रयात' छंद क्या है?
'भुजंग' का अर्थ है सर्प और 'प्रयात' का अर्थ है गति। जैसे सर्प बलखाते हुए चलता है, वैसे ही इस छंद की लय होती है—य-गण य-गण य-गण य-गण (UUUU)। यह छंद कुंडलिनी शक्ति (जो सर्पाकार है) के जागरण से जुड़ा माना जाता है।
3. श्लोक 1 में 'महस्त्रैपुरं शङ्कराद्वैतमव्यात्' का क्या अर्थ है?
यह अद्वैत सिद्धांत का सार है। 'त्रैपुर' अर्थात त्रिपुरसुंदरी और 'शंकर' अर्थात शिव—ये दोनों 'अद्वैत' (अभिन्न) हैं। देवी और शिव में कोई भेद नहीं है। यह शक्ति-शिव की एकता का उद्घोष है।
4. श्लोक 2 में 'पंच कोश' का क्या संकेत है?
'अन्नादिभिः पञ्चभिः कोशजालैः' पंच कोश सिद्धांत का संकेत है: अन्नमय (शरीर), प्राणमय (श्वास), मनोमय (मन), विज्ञानमय (बुद्धि), और आनंदमय (आत्मा)। देवी इन पांचों कोशों के भीतर 'महायोगपीठ' पर विराजमान हैं।
5. श्लोक 4-5 में जीव और शिव का क्या रहस्य है?
देवी एक चैतन्य को 'जीव' और 'शिव' दो नामों में विभाजित करती हैं। जीव बंधन में है, शिव मुक्त है। परन्तु कुंडलिनी योग द्वारा (मूलाधार से सहस्रार तक प्राण उठाकर) जीव पुनः शिव बन जाता है। यह आत्मज्ञान का मार्ग है।
6. श्लोक 6 में 'कष्ट' और 'कटाक्ष' का क्या संबंध है?
शंकराचार्य कहते हैं—शरीर में कष्ट है, शत्रु हैं, संतान की चिंता है, पत्नी-धन का भय है—फिर भी मनुष्य वैराग्य नहीं लेता! आश्चर्य! बिना देवी के कृपा-कटाक्ष के तत्त्वबोध (आत्मज्ञान) संभव नहीं है।
7. श्लोक 9 में 'पञ्चविंशात्मिका' का क्या अर्थ है?
यह सांख्य दर्शन से जुड़ा है। 25 तत्त्व (पुरुष + प्रकृति + 23 विकार) से यह जगत बना है। देवी इन 25 तत्त्वों की अधिष्ठात्री हैं। साथ ही पाँच कलाएं (निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या, शांति, शांत्यतीता) भी उन्हीं की शक्तियाँ हैं।
8. श्लोक 10 में 'संसार पंक' का क्या भाव है?
संसार को 'पंक' (कीचड़) कहा गया है जिसमें जीव फंसा हुआ है। कलत्र (पत्नी) आदि का भार, मोह के पाश—इनसे मुक्ति केवल देवी ही दे सकती हैं। 'त्वमेकैव शक्ता' (तुम ही एकमात्र समर्थ हो) यह शरणागति का भाव है।
9. क्या यह स्तोत्र कुंडलिनी साधकों के लिए है?
जी हाँ। श्लोक 5 और 11 में स्पष्ट रूप से कुंडलिनी योग का वर्णन है—'मूलं... ब्रह्मचक्रं' (मूलाधार से सहस्रार), 'भ्रूबिल' (आज्ञा चक्र)। योगी प्राण को मूल से ब्रह्मरंध्र तक ले जाकर देवी के दिव्य चक्रों में 'नादानुपास्ते' (नाद की उपासना) करते हैं।
10. श्लोक 28 में 'बालस्य मौर्ख्यं' का क्या भाव है?
यह शंकराचार्य की विनम्रता है। वे कहते हैं—मैंने प्रेम के आवेग में कुछ कह दिया, तत्त्व को समझे बिना। जैसे माता बालक की मूर्खता को क्षमा करती है, वैसे ही हे माँ, मेरी इस प्रलाप-स्तुति को स्वीकार करो।