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Panchastavi 3. Ghata Stava – पञ्चस्तवि ३. घटस्तवः | Recitation & Meaning

Panchastavi 3. Ghata Stava – पञ्चस्तवि ३. घटस्तवः | Recitation & Meaning
॥ पञ्चस्तवि - ३. घटस्तवः ॥ आनन्दमन्थरपुरन्दरमुक्तमाल्यं मौलौ हठेन निहितं महिषासुरस्य । पादाम्बुजं भवतु मे विजयाय मञ्जु- -मञ्जीरशिञ्जितमनोहरमम्बिकायाः ॥ १ ॥ देवि त्र्यम्बकपत्नि पार्वति सति त्रैलोक्यमातः शिवे शर्वाणि त्रिपुरे मृडानि वरदे रुद्राणि कात्यायनि । भीमे भैरवि चण्डि शर्वरिकले कालक्षये शूलिनि त्वत्पादप्रणताननन्यमनसः पर्याकुलान्पाहि नः ॥ २ ॥ देवि त्वां सकृदेव यः प्रणमति क्षोणीभृतस्तं नम- -न्त्याजन्मस्फुरदङ्घ्रिपीठविलुठत्कोटीरकोटिच्छटाः । यस्त्वामर्चति सोऽर्च्यते सुरगणैर्यः स्तौति स स्तूयते यस्त्वां ध्यायति तं स्मरार्तिविधुरा ध्यायन्ति वामभ्रुवः ॥ ३ ॥ उन्मत्ता इव सग्रहा इव विषव्यासक्तमूर्छा इव प्राप्तप्रौढमदा इवार्तिविरहग्रस्ता इवार्ता इव । ये ध्यायन्ति हि शैलराजतनयां धन्यास्त एवाग्रतः त्यक्तोपाधिविवृद्धरागमनसो ध्यायन्ति तान्सुभ्रुवः ॥ ४ ॥ ध्यायन्ति ये क्षणमपि त्रिपुरे हृदि त्वां लावण्ययौवनधनैरपि विप्रयुक्ताः । ते विस्फुरन्ति ललितायतलोचनानां चित्तैकभित्तिलिखितप्रतिमाः पुमांसः ॥ ५ ॥ एतं किं नु दृशा पिबाम्युत विशाम्यस्याङ्गमङ्गैर्निजैः किं वाऽमुं निगराम्यनेन सहसा किं वैकतामाश्रये । यस्येत्थं विवशो विकल्पललिताकूतेन योषिज्जनः किं तद्यन्न करोति देवि हृदये यस्य त्वमावर्तसे ॥ ६ ॥ विश्वव्यापिनि यद्वदीश्वर इति स्थाणावनन्याश्रयः शब्दः शक्तिरिति त्रिलोकजननि त्वय्येव तथ्यस्थितिः । इत्थं सत्यपि शक्नुवन्ति यदिमाः क्षुद्रा रुजो बाधितुं त्वद्भक्तानपि न क्षिणोषि च रुषा तद्देवि चित्रं महत् ॥ ७ ॥ इन्दोर्मध्यगतां मृगाङ्कसदृशच्छायां मनोहारिणीं पाण्डूत्फुल्लसरोरुहासनगता स्निग्धप्रदीपच्छविम् । वर्षन्तीममृतं भवानि भवतीं ध्यायन्ति ये देहिनः ते निर्मुक्तरुजो भवन्ति रिपवः प्रोज्झन्ति तान्दूरतः ॥ ८ ॥ पूर्णेन्दोः शकलैरिवातिबहलैः पीयूषपूरैरिव क्षीराब्धेर्लहरीभरैरिव सुधापङ्कस्य पिण्डैरिव । प्रालेयैरिव निर्मितं तव वपुर्ध्यायन्ति ये श्रद्धया चित्तान्तर्निहितार्तितापविपदस्ते सम्पदं बिभ्रति ॥ ९ ॥ ये संस्मरन्ति तरलां सहसोल्लसन्तीं त्वां ग्रन्थिपञ्चकभिदं तरुणार्कशोणाम् । रागार्णवे बहलरागिणि मज्जयन्तीं कृत्स्नं जगद्दधति चेतसि तान्मृगाक्ष्यः ॥ १० ॥ लाक्षारसस्नपितपङ्कजतन्तुतन्वीं अन्तः स्मरत्यनुदिनं भवतीं भवानि । यस्तं स्मरप्रतिममप्रतिमस्वरूपाः नेत्रोत्पलैर्मृगदृशो भृशमर्चयन्ति ॥ ११ ॥ स्तुमस्त्वां वाचमव्यक्तां हिमकुन्देन्दुरोचिषम् । कदम्बमालां बिभ्राणामापादतललम्बिनीम् ॥ १२ ॥ मूर्ध्नीन्दोः सितपङ्कजासनगतां प्रालेयपाण्डुत्विषं वर्षन्तीममृतं सरोरुहभुवो वक्त्रेऽपि रन्ध्रेऽपि च । अच्छिन्ना च मनोहरा च ललिता चातिप्रसन्नापि च त्वामेवं स्मरतः स्मरारिदयिते वाक्सर्वतो वल्गति ॥ १३ ॥ ददातीष्टान्भोगान् क्षपयति रिपून्हन्ति विपदो दहत्याधीन्व्याधीन् शमयति सुखानि प्रतनुते । हठादन्तर्दुःखं दलयति पिनष्टीष्टविरहं सकृद्ध्याता देवी किमिव निरवद्यं न कुरुते ॥ १४ ॥ यस्त्वां ध्यायति वेत्ति विन्दति जपत्यालोकते चिन्तय- -त्यन्वेति प्रतिपद्यते कलयति स्तौत्याश्रयत्यर्चति । यश्च त्र्यम्बकवल्लभे तव गुणानाकर्णयत्यादरात् तस्य श्रीर्न गृहादपैति विजयस्तस्याग्रतो धावति ॥ १५ ॥ किं किं दुःखं दनुजदलिनि क्षीयते न स्मृतायां का का कीर्तिः कुलकमलिनि ख्याप्यते न स्तुतायाम् । का का सिद्धिः सुरवरनुते प्राप्यते नार्चितायां कं कं योगं त्वयि न चिनुते चित्तमालम्बितायाम् ॥ १६ ॥ ये देवि दुर्धरकृतान्तमुखान्तरस्थाः ये कालि कालघनपाशनितान्तबद्धाः । ये चण्डि चण्डगुरुकल्मषसिन्धुमग्नाः तान्पासि मोचयसि तारयसि स्मृतैव ॥ १७ ॥ लक्ष्मीवशीकरणचूर्णसहोदराणि त्वत्पादपङ्कजरजांसि चिरं जयन्ति । यानि प्रणाममिलितानि नृणां ललाटे लुम्पन्ति दैवलिखितानि दुरक्षराणि ॥ १८ ॥ रे मूढाः किमयं वृथैव तपसा कायः परिक्लिश्यते यज्ञैर्वा बहुदक्षिणैः किमितरे रिक्तीक्रियन्ते गृहाः । भक्तिश्चेदविनाशिनी भगवतीपादद्वयी सेव्यतां उन्निद्राम्बुरुहातपत्रसुभगा लक्ष्मीः पुरो धावति ॥ १९ ॥ याचे न कञ्चन न कञ्चन वञ्चयामि सेवे न कञ्चन निरस्तसमस्तदैन्यः । श्लक्ष्णं वसे मधुरमद्मि भजे वरस्त्रीः देवी हृदि स्फुरति मे कुलकामधेनुः ॥ २० ॥ नमामि यामिनीनाथलेखालङ्कृतकुन्तलाम् । भवानीं भवसन्तापनिर्वापणसुधानदीम् ॥ २१ ॥ ॥ इति श्रीमदाचार्यविरचित पञ्चस्तव्यां तृतीयः घटस्तवः समाप्तः ॥

घटस्तव: परिचय एवं दार्शनिक महत्व

घटस्तव (Ghata Stava) कश्मीरी शैव दर्शन का एक अत्यंत रहस्यमय और प्रभावशाली स्तोत्र है। पञ्चस्तवि संग्रह का यह तीसरा अनमोल रत्न है। 'घट' शब्द यहाँ एक गूढ़ प्रतीक है - यह हमारे शरीर, मन और व्यक्तित्व (Personality) के उस सीमित पात्र (Container) को दर्शाता है जिसे देवी की शक्ति (कुण्डलिनी) भरकर पूर्ण और दिव्य बना देती है।

शांभव उपाय (Shambhav Upaya): कश्मीरी शैव मत में मोक्ष के तीन उपाय (मार्ग) बताए गए हैं - आणव, शाक्त और शांभव। घटस्तव मुख्य रूप से 'शांभव उपाय' की ओर संकेत करता है। यहाँ साधक क्रियाओं और मंत्रों के जंजाल से ऊपर उठकर, केवल तीव्र इच्छाशक्ति (Iccha Shakti) और शुद्ध भावना के द्वारा देवी के साथ एक रूप होने का अनुभव करता है।

इस स्तोत्र की भाषा अत्यंत काव्यात्मक (Poetic) और लालित्यपूर्ण है। यह कालिदास की शैली की याद दिलाती है, जहाँ भक्ति और श्रृंगार रस का अद्भुत संगम होता है। यहाँ भक्त और भगवान का भेद मिट जाता है।

स्तोत्र की मुख्य विशेषताएं

सिद्धि प्रदायक (Granting Perfection)

इसे 'सिद्धि' का स्तोत्र माना जाता है। श्लोक १८ में कहा गया है कि देवी के चरण कमलों की धूलि मस्तक पर लगते ही भाग्य के लिखे दुष्ट अक्षर (दुरक्षराणि) भी मिट जाते हैं। यह कर्म बंधनों को काटने की शक्ति रखता है।

कुण्डलिनी और चक्र भेदन

श्लोक १० में देवी को "ग्रन्थिपञ्चकभिदं" कहा गया है - अर्थात पाँच प्रकार की ग्रंथियों (जो जीव को माया में बांधती हैं) को भेदने वाली। यह देह शुद्धि और चक्र जागरण की प्रक्रिया का स्पष्ट संकेत है।

पूर्ण समर्पण और अभय

अंतिम श्लोकों (१९-२०) में भक्त की निडरता दर्शनीय है। वह कहता है - "मैं किसी से कुछ नहीं मांगता, किसी को नहीं ठगता, किसी की सेवा नहीं करता, क्योंकि मेरे हृदय में 'कुल-कामधेनु' (समस्त इच्छा पूरी करने वाली देवी) विराजमान हैं।"

पाठ के लाभ (Benefits)

घटस्तव का नियमित पाठ साधक के जीवन में आमूलचूल परिवर्तन लाता है:

  • आत्मबल और निर्भयता: साधक के भीतर असीम आत्मविश्वास जागृत होता है। वह मृत्यु (काल) से भी नहीं डरता।
  • आकर्षण शक्ति: देवी की कृपा से साधक का व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली हो जाता है कि सब उसकी ओर खिंचे चले आते हैं (वशीकरण)।
  • रोग और ताप का नाश: यह स्तोत्र शारीरिक और मानसिक संतापों (Tensions) को शीतलता प्रदान करता है, जैसे चंद्रकिरणें गर्मी को शांत करती हैं।
  • ऐश्वर्य और मोक्ष: यह भोग (सांसारिक सुख) और मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) दोनों को एक साथ प्रदान करने वाला दुर्लभ स्तोत्र है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. पञ्चस्तवि में 'घटस्तव' (Ghata Stava) का क्या स्थान है?

पञ्चस्तवि के ५ स्तोत्रों में 'घटस्तव' तीसरा स्तोत्र है। इसे 'शांभव उपाय' (Shambhav Upaya) से जोड़ा जाता है, जहाँ साधक अपनी चेतना को सीधे शिव-शक्ति में लय करने का प्रयास करता है।

2. 'घट' (Ghata) शब्द का यहाँ क्या आध्यात्मिक अर्थ है?

'घट' का साधारण अर्थ 'घड़ा' है। यहाँ यह मानव शरीर (Body) और चित्त (Mind) का प्रतीक है। जैसे कच्चा घड़ा पानी में गल जाता है, वैसे ही योग-अग्नि से पकाया हुआ शरीर रूपी 'घट' ही ब्रह्म-रस (अमृत) को धारण करने में सक्षम होता है।

3. क्या घटस्तव का सम्बन्ध कुण्डलिनी योग से है?

जी हाँ, अत्यंत गहरा सम्बन्ध है। इसमें मूलाधार से सहस्रार तक शक्ति के आरोहण और देह शुद्धि की प्रक्रिया का काव्यमय वर्णन है। श्लोक १३ में 'रन्ध्रे' (ब्रह्मरन्ध्र) से अमृत वर्षा का स्पष्ट संकेत है।

4. घटस्तव के पाठ का मुख्य फल क्या है?

इसके पाठ से साधक को 'पूर्णता' (Fullness) की अनुभूति होती है। शारीरिक और मानसिक रोग नष्ट होते हैं, शत्रु परास्त होते हैं और अंततः साधक जीवन-मुक्त अवस्था को प्राप्त करता है।

5. श्लोक १ में 'महिषासुर' का उल्लेख किस संदर्भ में है?

प्रथम श्लोक में देवी के चरणों की वंदना करते हुए कहा गया है कि उन्होंने महिषासुर के सिर पर अपना चरण रखा। यह अज्ञान और अहंकार (महिषासुर) के दमन का प्रतीक है, जिससे ज्ञान का प्रकाश होता है।

6. क्या कश्मीरी पंडितों के नित्य कर्म में इसका विशेष महत्व है?

हाँ, कश्मीरी शैव परंपरा में पञ्चस्तवि को 'लघु-वेद' के समान माना जाता है। नित्य पूजा में, विशेषकर नवरात्रि और शिवरात्रि के अवसरों पर, घटस्तव का सामूहिक पाठ करने की प्राचीन परंपरा है।

7. श्लोक ६ में 'एतं किं नु दृशा पिबामि' का क्या भाव है?

यह भक्त की तीव्र उत्कंठा (Intense Longing) को दर्शाता है। वह सोचता है कि मैं अपने इष्ट (देवी/शिव) को आँखों से पी लूँ, अंगों में समा लूँ या निगल लूँ? यह 'समावेश' (Divine Possession) की अवस्था का वर्णन है।

8. क्या यह स्तोत्र द्वैत (Duality) या अद्वैत (Non-duality) का समर्थक है?

कश्मीरी शैव दर्शन मूलतः 'परम-अद्वैत' (Absolute Non-duality) है। घटस्तव भी इसी सत्य का प्रतिपादन करता है कि जीव और शिव, शरीर और ब्रह्मांड, भक्त और भगवान - सब एक ही हैं।

9. श्लोक १० में 'ग्रन्थिपञ्चकभिदं' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'पाँच ग्रंथियों को भेदने वाली'। योग शास्त्र में शरीर के भीतर ब्रह्म ग्रंथि, विष्णु ग्रंथि आदि माया की गांठें मानी गई हैं। देवी की कृपा से ये ग्रंथियां खुल जाती हैं और ऊर्जा का प्रवाह मुक्त हो जाता है।

10. क्या गृहस्थ लोग इसका पाठ कर सकते हैं?

बिल्कुल। पञ्चस्तवि की रचना ही गृहस्थ साधकों को ध्यान में रखकर की गई है। इसके लिए वन में जाने या कठिन तप की आवश्यकता नहीं, केवल शुद्ध हृदय और नित्य अभ्यास की आवश्यकता है।