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Sri Siddhi Devi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री सिद्धिदेवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Siddhi Devi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री सिद्धिदेवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री सिद्धिदेवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ सूर्य उवाच स्वानन्दभवनान्तस्थहर्म्यस्था गणपप्रिया । सम्योगस्वानन्दब्रह्मशक्तिः सम्योगरूपिणी ॥ १ ॥ अतिसौन्दर्यलावण्या महासिद्धिर्गणेश्वरी । वज्रमाणिक्यमकुटकटकादिविभूषिता ॥ २ ॥ कस्तूरीतिलकोद्भासिनिटिला पद्मलोचना । शरच्चाम्पेयपुष्पाभनासिका मृदुभाषिणी ॥ ३ ॥ लसत्काञ्चनताटङ्कयुगला योगिवन्दिता । मणिदर्पणसङ्काशकपोला काङ्क्षितार्थदा ॥ ४ ॥ ताम्बूलपूरितस्मेरवदना विघ्ननाशिनी । सुपक्वदाडिमीबीजरदना रत्नदायिनी ॥ ५ ॥ कम्बुवृत्तसमच्छायकन्धरा करुणायुता । मुक्ताभा दिव्यवसना रत्नकल्हारमालिका ॥ ६ ॥ गणेशबद्धमाङ्गल्या मङ्गला मङ्गलप्रदा । वरदाभयहस्ताब्जा भवबन्धविमोचिनी ॥ ७ ॥ सुवर्णकुम्भयुग्माभसुकुचा सिद्धिसेविता । बृहन्नितम्बा विलसज्जघना जगदीश्वरी ॥ ८ ॥ सौभाग्यजातशृङ्गारमध्यमा मधुरस्वना । दिव्यभूषणसन्दोहरञ्जिता ऋणमोचिनी ॥ ९ ॥ पारिजातगुणाधिक्यपदाब्जा परमात्मिका । सुपद्मरागसङ्काशचरणा चिन्तितार्थदा ॥ १० ॥ ब्रह्मभावमहासिद्धिपीठस्था पङ्कजासना । हेरम्बनेत्रकुमुदचन्द्रिका चन्द्रभूषणा ॥ ११ ॥ सचामरशिवावाणीसव्यदक्षिणवीजिता । भक्तरक्षणदाक्षिण्यकटाक्षा कमलासना ॥ १२ ॥ गणेशालिङ्गनोद्भूतपुलकाङ्गी परात्परा । लीलाकल्पितब्रह्माण्डकोटिकोटिसमन्विता ॥ १३ ॥ वाणीकोटिसमायुक्तकोटिब्रह्मनिषेविता । लक्ष्मीकोटिसमायुक्तविष्णुकोटिप्रपूजिता ॥ १४ ॥ गौरीकोटिसमायुक्तशम्भुकोटिसुसेविता । प्रभाकोटिसमायुक्तकोटिभास्करवन्दिता ॥ १५ ॥ भानुकोटिप्रतीकाशा चन्द्रकोटिसुशीतला । चतुष्षष्टिकोटिसिद्धिनिषेवितपदाम्बुजा ॥ १६ ॥ मूलाधारसमुत्पन्ना मूलबन्धविमोचनी । मूलाधारैकनिलया योगकुण्डलिभेदिनी ॥ १७ ॥ मूलाधारा मूलभूता मूलप्रकृतिरूपिणी । मूलाधारगणेशानवामभागनिवासिनी ॥ १८ ॥ मूलविद्या मूलरूपा मूलग्रन्थिविभेदिनी । स्वाधिष्ठानैकनिलया ब्रह्मग्रन्धिविभेदिनी ॥ १९ ॥ मणिपूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्धिविभेदिनी । अनाहतैकनिलया रुद्रग्रन्धिविभेदिनी ॥ २० ॥ विशुद्धिस्थाननिलया जीवभावप्रणाशिनी । आज्ञाचक्रान्तरालस्था ज्ञानसिद्धिप्रदायिनी ॥ २१ ॥ ब्रह्मरन्ध्रैकनिलया ब्रह्मभावप्रदायिनी । षट्कोणाष्टदलयुतश्रीसिद्धियन्त्रमध्यगा ॥ २२ ॥ अन्तर्मुखजनानन्तफलदा शोकनाशिनी । अव्याजकरुणापूरपूरिता वसुधारिणी ॥ २३ ॥ दारिद्र्यनाशिनी लक्ष्मीः सर्वपापप्रणाशिनी । भुक्तिसिद्धिर्मुक्तिसिद्धिः सुधामण्डलमध्यगा ॥ २४ ॥ चिन्तामणिः सर्वसिद्धिः कमल वल्लभा शिवा । सिद्धलक्ष्मीर्मोक्षलक्ष्मीर्जयलक्ष्मीर्वरप्रदा ॥ २५ ॥ रमा नन्दा महालक्ष्मीर्विभूतिर्भक्तिवर्धिनी । अष्टोत्तरशतं नाम्नां महासिद्धेरिदं वरम् ॥ २६ ॥ आज्ञया गणनाथस्य गणकेन प्रकीर्तितम् । यः पठेद्गाणपो भक्त्या पूजयेद्वा सुनामभिः । धर्ममर्थं च कामं च लब्ध्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ २७ ॥ इति श्री सिद्धिदेवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री सिद्धिदेवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय

श्री सिद्धिदेवी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् माँ आदिशक्ति के नौवें और अंतिम स्वरूप 'सिद्धिदात्री' को समर्पित एक दुर्लभ और शक्तिशाली स्तोत्र है। इस स्तोत्र के वक्ता स्वयं भगवान सूर्य ('सूर्य उवाच') हैं, और यह भगवान गणेश की आज्ञा ('आज्ञया गणनाथस्य') से प्रकट हुआ है, जो इसकी दिव्यता और प्रमाणिकता को सिद्ध करता है।
सिद्धिदात्री वह देवी हैं जो अणिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व, वशित्व और कामावसायिता - इन अष्ट सिद्धियों की स्वामिनी हैं। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने इन्हीं की कठोर तपस्या करके अर्धनारीश्वर स्वरूप और समस्त सिद्धियाँ प्राप्त की थीं।
इस स्तोत्र में देवी के 108 दिव्य नामों का वर्णन है जो उनके विभिन्न गुणों को प्रकट करते हैं। उन्हें 'महासिद्धिः' (महान सिद्धि देने वाली), 'योगकुण्डलिभेदिनी' (कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करने वाली), 'दारिद्र्यनाशिनी लक्ष्मी' (दरिद्रता मिटाने वाली लक्ष्मी), और 'विघ्ननाशिनी' (बाधाओं को हरने वाली) कहा गया है। यह स्तोत्र न केवल आध्यात्मिक उन्नति देता है, बल्कि भौतिक जीवन की सभी आवश्यकताओं को भी पूरा करता है।

स्तोत्र में वर्णित लाभ (Benefits)

इस अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • अष्ट सिद्धि प्राप्ति: देवी 'अष्टोत्तरशतं नाम्नां महासिद्धेरिदं वरम्' - यह स्तोत्र महान सिद्धियाँ प्रदान करने वाला वरदान है।
  • चतुर्वर्ग फल: 'धर्ममर्थं च कामं च लब्ध्वा मोक्षमवाप्नुयात्' - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि होती है।
  • कुण्डलिनी जागरण: 'मूलाधारैकनिलया... ब्रह्मग्रन्धिविभेदिनी' - यह मूलाधार से आज्ञा चक्र तक सभी चक्रों का भेदन कर कुण्डलिनी शक्ति को जागृत करता है।
  • दरिद्रता नाश: 'दारिद्र्यनाशिनी लक्ष्मीः' - यह घोर दरिद्रता का नाश कर घर में स्थायी लक्ष्मी का वास कराता है।
  • पाप मुक्ति: 'सर्वपापप्रणाशिनी' - समस्त पापों और कर्म बंधनों का नाश होता है।
  • विघ्न निवारण: देवी 'विघ्ननाशिनी' हैं, अतः पाठ करने वाले के जीवन से सभी बाधाएं दूर होती हैं।
  • अभय और मंगल: 'वरदाभयहस्ताब्जा' और 'मङ्गला मङ्गलप्रदा' - साधक को भयमुक्त जीवन और सर्वत्र मंगल की प्राप्ति होती है।
  • ज्ञान और वाणी: 'ज्ञानसिद्धिप्रदायिनी' - विद्यार्थियों और साधकों को दिव्य ज्ञान और वाकसिद्धि मिलती है।

पाठ विधि (Recitation Method)

इस स्तोत्र की सिद्धि के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:
  • शुभ समय: ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पहले) या संध्या काल। नवरात्रि, महानवमी, और शुक्रवार विशेष फलदायी हैं।
  • आसन: लाल या पीले रंग का ऊनी आसन प्रयोग करें।
  • दिशा: पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • ध्यान: सर्वप्रथम गणेश जी का ध्यान करें ('गणेशबद्धमाङ्गल्या'), फिर सूर्य देव को प्रणाम करें ('सूर्य उवाच'), और अंत में कमल पर विराजमान माँ सिद्धिदात्री ('पङ्कजासना', 'कमलासना') का ध्यान करें।
  • माला: स्फटिक या रुद्राक्ष की माला से जप करें।
  • नैवेद्य: देवी को हलवा, खीर, नारियल या अनार का भोग लगाएं।
  • विशेष प्रयोग: किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिए लगातार 41 दिनों तक 108 पाठ करने का विधान है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री सिद्धि देवी कौन हैं?

श्री सिद्धि देवी (या सिद्धिदात्री) नवदुर्गा का नौवां और सर्वोच्च स्वरूप हैं। वे अणिमा, महिमा, गरिमा आदि समस्त सिद्धियों की स्वामिंनी हैं। शिव महापुराण के अनुसार, भगवान शिव ने भी इनकी कृपा से ही अर्धनारीश्वर रूप और आठों सिद्धियाँ प्राप्त की थीं।

2. 'अष्टोत्तरशतनाम' का क्या अर्थ है और इसके पाठ का क्या लाभ है?

'अष्टोत्तरशत' का अर्थ है 108। इस स्तोत्र में देवी के 108 सिद्ध नामों का संकलन है। प्रत्येक नाम एक विशेष शक्ति का स्रोत है। इसका पाठ साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (चतुर्वर्ग) प्रदान करता है।

3. क्या यह स्तोत्र धन और आर्थिक समस्याओं के लिए प्रभावी है?

जी हाँ। स्तोत्र में देवी को 'दारािद्र्यनाशिनी लक्ष्मी' (गरीबी मिटाने वाली लक्ष्मी) और 'रत्नदायिनी' कहा गया है। यह कर्ज, दरिद्रता और आर्थिक तंगी को दूर करने के लिए अत्यंत शक्तिशाली है।

4. कुण्डलिनी जागरण में यह कैसे सहायक है?

स्तोत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया है - 'मूलाधारैकनिलया... योगकुण्डलिभेदिनी' और 'चिन्तामणिः'। यह मूलाधार से लेकर आज्ञा चक्र और सहस्रार तक सभी शक्ति केंद्रों को जागृत करने की क्षमता रखता है।

5. विद्यार्थियों के लिए इसका क्या महत्व है?

देवी 'वाणीकोटिसमायुक्त' और 'ज्ञानसिद्धिप्रदायिनी' हैं। छात्र यदि इसका पाठ करें तो उन्हें तीव्र बुद्धि, स्मरण शक्ति और वाकसिद्धि (वाणी में प्रभाव) की प्राप्ति होती है।

6. क्या इसका पाठ केवल नवरात्रि में ही करना चाहिए?

नवरात्रि की नवमी तिथि इसका सर्वश्रेष्ठ समय है, लेकिन सिद्धि प्राप्ति के लिए इसे किसी भी शुक्रवार, पूर्णिमा या शुभ मुहूर्त में शुरू करके नियमित रूप से पढ़ा जा सकता है।

7. विवाह और पारिवारिक सुख के लिए कौन से नाम प्रभावी हैं?

देवी को 'गणेशबद्धमाङ्गल्या' और 'मङ्गला मङ्गलप्रदा' कहा गया है। सुखी वैवाहिक जीवन और योग्य वर/वधू की प्राप्ति के लिए इन नामों का ध्यान करते हुए पाठ करना चाहिए।

8. 'विघ्ननाशिनी' नाम का क्या तात्पर्य है?

गणेश जी की तरह ही देवी भी 'विघ्ननाशिनी' हैं। जीवन में बार-बार आने वाली बाधाओं, असफलताओं और रुके हुए कार्यों को सिद्ध करने के लिए यह नाम और स्तोत्र राम बाण है।

9. क्या शत्रु भय से मुक्ति मिलती है?

हाँ। स्तोत्र में देवी को 'वरदाभयहस्ताब्जा' (अभय देने वाली और वरदान देने वाली) कहा गया है। यह साधक को निडर बनाती हैं और शत्रुओं का शमन करती हैं।

10. इस स्तोत्र के ऋषि कौन हैं?

यह स्तोत्र भगवान सूर्य ('सूर्य उवाच') द्वारा कथित है। सूर्य देव ने स्वयं देवी की स्तुति की है, जिससे इसका तेज और प्रभाव कई गुणा बढ़ जाता है।

11. 'सर्वपापप्रणाशिनी' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'सभी पापों को नष्ट करने वाली'। अनजाने में किए गए पाप कर्मों के प्रभाव को नष्ट करके शुद्ध चित्त और आत्मिक शांति प्रदान करना इस स्तोत्र का एक प्रमुख फल है।

12. सिद्धि प्राप्ति के लिए विशेष अनुष्ठान कैसे करें?

किसी विशेष मनोकामना के लिए 41 दिनों तक ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके लाल आसन पर बैठकर 108 बार इस स्तोत्र का पाठ करें। अंतिम दिन कन्या पूजन और हवन करें।