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Sri Vani Prashnamala Stava – श्री वाणी प्रश्नमाला स्तवः (अर्थ सहित)

Sri Vani Prashnamala Stava – श्री वाणी प्रश्नमाला स्तवः (अर्थ सहित)
॥ श्री वाणी प्रश्नमाला स्तवः ॥ किं नाहं पुत्रस्तव मातुः सचराचरस्य जगतोऽस्य । किं मां दूरीकुरुषे देवि गिरां ब्रूहि कारणं तत्र ॥ १ ॥ (हे वाणी! क्या मैं इस चराचर जगत की माता, आपका पुत्र नहीं हूँ? हे देवी! आप मुझे स्वयं से दूर क्यों कर रही हैं? कृपया इसका कारण बताइए।) किं चाहुराचार्यपादास्त्वद्भक्ता मद्गुरूत्तमाः पूर्वम् । औरसतनयं मां तव कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ २ ॥ (आपके भक्त और मेरे श्रेष्ठ पूर्व गुरु आचार्य चरणों ने तो मुझे आपका ही औरस (अपना) पुत्र कहा है। फिर हे वाणी! आप मुझे क्यों त्याग रही हैं? बोलिए माँ।) आनीय दूरतो मां मातस्त्वत्पादसविधमतिकृपया । परिपाल्य च सुचिरं मां कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ ३ ॥ (हे माता! अत्यंत कृपा करके आप मुझे दूर से अपने चरणों के समीप लाईं और लंबे समय तक मेरा पालन-पोषण किया। अब आप मुझे स्वयं से दूर क्यों कर रही हैं?) अतिपरिचयादवज्ञा प्रभवेत्पुत्रेषु किं सवित्रीणाम् । न हि सा क्वचिदपि दृष्टा कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ ४ ॥ (क्या माताओं को अपने पुत्रों से बहुत अधिक परिचय (निकटता) होने पर उनकी अवज्ञा होने लगती है? ऐसा तो कहीं नहीं देखा गया। फिर आप मुझे दूर क्यों कर रही हैं?) कादाचित्कनमस्कृतिकर्तॄणामप्यभीष्टदे तरसा । नाहं सकृदपि नन्ता कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ ५ ॥ (आप तो कभी-कभार नमस्कार करने वालों की भी मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण कर देती हैं। क्या मैं आपको एक बार भी नमन करने वाला (आपका भक्त) नहीं हूँ?) गुरुरूपेणाबाल्यात्सोढ्वा मन्तूंश्च मत्कृतान्विविधान् । परिरक्ष्य करुणया मां कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ ६ ॥ (बचपन से ही गुरु रूप में आपने मेरे विभिन्न अपराधों को सहा और करुणापूर्वक मेरी रक्षा की। अब आप मुझे स्वयं से दूर क्यों कर रही हैं?) जगतां पालनमनिशं कुर्वन्त्यास्ते भवेत्कियान्भारः । अहमम्ब दीनवर्यः कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ ७ ॥ (समस्त जगतों का निरंतर पालन करने वाली आप पर मेरा जैसा दीन-हीन व्यक्ति क्या कोई भारी बोझ है? हे माँ! आप मुझे क्यों दूर कर रही हैं?) पापान्निवार्य सरणौ विमलायां मे प्रवर्तने तरसा । कर्तव्ये सति कृपया कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ ८ ॥ (पापों से हटाकर मुझे शीघ्र ही निर्मल मार्ग पर प्रवृत्त करना आपका कर्तव्य है। कृपा करके बताइए, फिर भी आप मुझे दूर क्यों कर रही हैं?) यद्यप्यन्यानन्यान् देवानाराधयामि न त्वं ते । सर्वात्मिकेति चपलः कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ ९ ॥ (यद्यपि मैं अन्य देवताओं की आराधना करता हूँ, पर वे आपसे अलग नहीं हैं। आप ही 'सर्वात्मिका' (सबकी आत्मा) हैं, यह जानते हुए भी मुझ चंचल को आप दूर क्यों कर रही हैं?) यात्राशक्तमिमं मां गलितशरीरं रुजा समाक्रान्तम् । पात्रमहेतुदयायाः कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ १० ॥ (अब मैं चलने-फिरने में असमर्थ हूँ, शरीर दुर्बल हो गया है और रोगों से घिर गया हूँ। मैं आपकी अकारण दया का पात्र हूँ, फिर आप मुझे दूर क्यों कर रही हैं?) तव सद्मनि गुरुसदने विद्यातीर्थालये च बहुसुखतः । खेलां कुर्वन्तं मां कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ ११ ॥ (आपके घर में, गुरु के निवास (विद्यातीर्थालय) में सुखपूर्वक क्रीड़ा करने वाले मुझ बालक को आप स्वयं से दूर क्यों कर रही हैं?) त्वत्क्षेत्रनिकटराजन्नरसिंहाख्याचलशृङ्गाग्रे । स्वैरविहारकृतं मां कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ १२ ॥ (आपके क्षेत्र के समीप शोभायमान नरसिंह पर्वत की चोटी पर स्वेच्छा से विहार करने वाले मुझे आप दूर क्यों कर रही हैं?) त्वत्पादपूततुङ्गातीरे विजने वने चरन्तं माम् । अनुघस्रं मोदभरात् कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ १३ ॥ (आपके चरणों से पवित्र तुङ्गा नदी के तट पर, एकांत वन में प्रतिदिन हर्ष के साथ विचरण करने वाले मुझे आप दूर क्यों कर रही हैं?) तुङ्गातीरे दिनकरनिवेशनिकटस्थले विपुले । ध्यायन्तं परतत्त्वं कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ १४ ॥ (तुङ्गा के तट पर सूर्य के निवास के समीप विशाल स्थल पर 'परतत्त्व' (ब्रह्म) का ध्यान करने वाले मुझे आप दूर क्यों कर रही हैं?) तुङ्गातीरे रघुवरमन्दिरपुरतः सुदीर्घपाषाणे । कुतुकाद्विहरन्तं मां कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ १५ ॥ (तुङ्गा तट पर श्री रघुनाथ मंदिर के सामने विशाल पत्थर पर कौतुकवश विहार करने वाले मुझे आप दूर क्यों कर रही हैं?) जातु च नरसिंहपुरे तुङ्गातीरे सुसैकते मोदात् । विहृतिं कुर्वाणं मां कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ १६ ॥ (नरसिंहपुर में तुङ्गा के सुंदर रेतीले तट पर आनंदपूर्वक विहार करने वाले मुझे आप दूर क्यों कर रही हैं?) यतिवरकृतात्मविद्याविलासमनिशं पठन्तमतिमोदात् । कुहचित्तुङ्गातीरे कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ १७ ॥ (श्रेष्ठ यतियों द्वारा रचित 'आत्मविद्या विलास' का तुङ्गा तट पर निरंतर पाठ करने वाले मुझे आप दूर क्यों कर रही हैं?) शङ्करभगवत्पादप्रणीतचूडामणिं विवेकादिम् । शृण्वन्तं नृहरिवने कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि ॥ १८ ॥ (नृसिंह वन में आदि शंकराचार्य द्वारा रचित 'विवेकचूडामणि' का श्रवण करने वाले मुझे आप दूर क्यों कर रही हैं?) ॥ इति श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवनृसिंहभारतीस्वामिभिः विरचित श्री वाणी प्रश्नमाला स्तुतिः ॥

परिचय: श्री वाणी प्रश्नमाला स्तवः

श्री वाणी प्रश्नमाला स्तवः (Sri Vani Prashnamala Stava) संस्कृत साहित्य की एक अत्यंत हृदयस्पर्शी रचना है। इसके रचयिता जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी हैं, जो दक्षिण भारत के प्रसिद्ध शृंगेरी शारदा पीठ के 33वें पीठाधीश्वर थे। वे एक महान सिद्ध योगी, विद्वान और भक्त थे।

इस स्तोत्र की विशेषता इसका 'पुत्र-माता' भाव है। यहाँ भक्त (स्वयं स्वामीजी) माँ सरस्वती से प्रश्न कर रहे हैं। 'प्रश्नमाला' का अर्थ है 'प्रश्नों की लड़ी'। प्रत्येक श्लोक के अंत में 'कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि' (हे वाणी! मुझे दूर क्यों कर रही हो, बताओ) की पुकार है। यह उस भक्त की व्याकुलता है जो अपनी आराध्य देवी से एक क्षण का भी वियोग सहन नहीं कर पा रहा है।

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह शृंगेरी (Sringeri) की पवित्र भूमि, तुङ्गा नदी और वहाँ की आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत चित्रण है। इसका महत्व निम्नलिखित कारणों से है:

  • अद्वैत और भक्ति का संगम: स्वामीजी एक अद्वैतवादी सन्यासी थे, फिर भी उनकी भक्ति इतनी प्रगाढ़ थी कि वे माँ शारदा से बालक की तरह बात करते थे।
  • गुरु-शिष्य परंपरा: श्लोक 2 और 18 में आचार्य शंकराचार्य और गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई है।
  • स्थान की महिमा: इसमें तुङ्गा नदी के तट, नरसिंह पर्वत और विद्यातीर्थालय का वर्णन है, जो इस स्तोत्र को शृंगेरी शारदा पीठ से सीधे जोड़ता है।
  • आत्म-समर्पण: यह स्तोत्र सिखाता है कि जब बुद्धि और शरीर थक जाएँ (श्लोक 10), तब केवल देवी की 'अकारण दया' ही एकमात्र सहारा होती है।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ

श्रद्धापूर्वक इस 'प्रश्नमाला' का पाठ करने से साधक को अद्भुत आध्यात्मिक और मानसिक शांति प्राप्त होती है। यह विशेष रूप से उन साधकों के लिए लाभकारी है जो श्री वासर सरस्वती स्तोत्रम् का भी पाठ करते हैं।

1. माँ सरस्वती की समीपता

जो लोग एकाकीपन (Loneliness) या आध्यात्मिक शून्यता महसूस करते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र माँ से जुड़ने का सबसे सरल माध्यम है।

2. एकाग्रता और विद्या की प्राप्ति

चूँकि यह वाणी की देवी की स्तुति है, विद्यार्थियों के लिए इसका पाठ बुद्धि की जड़ता को दूर कर एकाग्रता प्रदान करता है। वाणी दोष निवारण के लिए आप श्री वाग्वादिनी सहस्रनाम स्तोत्रम् का भी पाठ कर सकते हैं।

3. अहंकार का विसर्जन

जब हम स्वयं को 'पुत्र' और ईश्वर को 'माता' मानते हैं, तो हमारा अहंकार स्वतः ही समाप्त हो जाता है, जिससे चित्त शुद्ध होता है।

4. मानसिक रोगों से मुक्ति

श्लोक 10 में शरीर और रोगों की व्याकुलता का वर्णन है। यह स्तोत्र कठिन समय में आत्मबल (Willpower) बढ़ाता है।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

इस दिव्य स्तव का पाठ करने हेतु निम्नलिखित सुझाव दिए गए हैं:
  • समय: संध्या काल या प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में पाठ करना सर्वोत्तम है।
  • भाव: पाठ करते समय मन में यह भाव रखें कि आप माँ शारदा की गोद में बैठे एक छोटे बालक हैं।
  • विशेष दिन: शुक्रवार, वसंत पंचमी, और नवरात्रि (विशेषकर शारदा नवरात्रि) के दौरान इसका पाठ करना अत्यंत शुभ फलदायी माना जाता है।
  • स्थान: यदि संभव हो तो किसी नदी के तट पर या शांत मंदिर में बैठकर पाठ करें, जैसा कि स्वामीजी ने तुङ्गा तट का वर्णन किया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'वाणी प्रश्नमाला स्तवः' का शाब्दिक अर्थ क्या है?

'वाणी' माँ सरस्वती का नाम है, 'प्रश्नमाला' का अर्थ है प्रश्नों की श्रृंखला, और 'स्तवः' का अर्थ है स्तुति। अर्थात, प्रश्नों के माध्यम से की गई सरस्वती स्तुति।

2. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इसकी रचना शृंगेरी शारदा पीठ के 33वें जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी (1858–1912) ने की थी।

3. 'कस्माद्दूरीकरोषि वद वाणि' पंक्ति का क्या महत्व है?

इसका अर्थ है "हे वाणी! आप मुझे क्यों दूर कर रही हैं, बताइए।" यह पंक्ति भक्त की तड़प और देवी के प्रति उसके अनन्य प्रेम को दर्शाती है।

4. इस स्तोत्र में तुङ्गा नदी का बार-बार उल्लेख क्यों है?

शृंगेरी पीठ तुङ्गा नदी के तट पर स्थित है। स्वामीजी ने अपने जीवन का अधिकांश समय इसी पवित्र नदी के किनारे साधना और माँ शारदा की सेवा में बिताया था।

5. क्या यह स्तोत्र केवल सन्यासियों के लिए है?

नहीं, यह स्तोत्र किसी भी आयु के गृहस्थ, विद्यार्थी या साधक के लिए है। जो भी माँ सरस्वती की कृपा चाहता है, वह इसका पाठ कर सकता है।

6. श्लोक 18 में 'विवेकचूडामणि' का जिक्र क्यों है?

विवेकचूडामणि आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक महान ग्रंथ है। स्वामीजी यह बता रहे हैं कि वे धर्म ग्रंथों के श्रवण और ज्ञान मार्ग पर चलने के बावजूद देवी की कृपा के अभिलाषी हैं।

7. क्या इस स्तोत्र के पाठ से एकाग्रता बढ़ती है?

हाँ, इसके लयबद्ध पाठ और अर्थ के चिंतन से मन की चंचलता शांत होती है, जिससे ध्यान और एकाग्रता में सुधार होता है।

8. 'विद्यातीर्थालय' का क्या अर्थ है?

यह शृंगेरी में स्थित एक पवित्र स्थान और मंदिर परिसर का हिस्सा है, जिसे गुरु विद्यातीर्थ की स्मृति में बनाया गया है।

9. कठिन समय में यह स्तोत्र कैसे सहायक है?

जब मनुष्य असहाय महसूस करता है, तब यह स्तोत्र उसे याद दिलाता है कि वह अकेला नहीं है, बल्कि माँ सरस्वती का पुत्र है और वह उनसे अपनी व्यथा कह सकता है।

10. इसे कितनी बार पढ़ना चाहिए?

नित्य एक बार पाठ करना पर्याप्त है। विशेष मानसिक शांति के लिए इसे एकांत में बैठकर 3 बार धीरे-धीरे अर्थ समझते हुए पढ़ें।