Sri Vagdevi Stava – श्री वाग्देवी स्तवः (अर्थ सहित)

॥ श्री वाग्देवी स्तवः ॥
वादे शक्तिप्रदात्री प्रणतजनततेः सन्ततं सत्सभायां
प्रश्नानां दुस्तराणामपि लघु सुसमाधानमाश्वेव वक्तुम् ।
वागीशाद्यैः सुराग्र्यैर्विविधफलकृते सन्ततं पूज्यमाना
वाग्देवी वाञ्छितं मे वितरतु तरसा शृङ्गभूभृन्निवासा ॥ १ ॥
(जो प्रणत (झुके हुए) भक्तों के समूह को विद्वानों की सभा (सत्सभा) में वाद-विवाद करने की शक्ति प्रदान करती हैं, जो कठिन से कठिन प्रश्नों का भी तुरंत और सहज समाधान बोलने की क्षमता देती हैं, जिनकी पूजा स्वयं बृहस्पति (वागीश) और अन्य श्रेष्ठ देवता विविध फलों की प्राप्ति के लिए निरंतर करते हैं—वे शृंग-पर्वत (शृंगेरी) पर निवास करने वाली माँ वाग्देवी मेरी मनोकामना शीघ्र पूर्ण करें।)
व्याख्यामुद्राक्षमालाकलशसुलिखितै राजदम्भोजपाणिः
काव्यालङ्कारमुख्येष्वपि निशितधियं सर्वशास्त्रेषु तूर्णम् ।
मूकेभ्योऽप्यार्द्रचित्ता दिशति करुणया या जवात्सा कृपाब्धि-
-र्वाग्देवी वाञ्छितं मे वितरतु तरसा शृङ्गभूभृन्निवासा ॥ २ ॥
(जिनके कमल रूपी हाथों में व्याख्या मुद्रा (ज्ञान मुद्रा), अक्षमाला, कलश और पुस्तक (सुलिखित) सुशोभित हैं; जो अपनी करुणा से मूक (गूँगे) व्यक्तियों को भी काव्य, अलंकार और समस्त शास्त्रों में शीघ्र ही तीक्ष्ण बुद्धि (निशित धियं) प्रदान कर देती हैं—वे दया की सागर और शृंगेरी निवासिनी माँ वाग्देवी मेरी मनोकामना शीघ्र पूर्ण करें।)
जाड्यध्वान्तार्कपङ्क्तिस्तनुजितरजनीकान्तगर्वागमानां
शीर्षैः संस्तूयमाना मुनिवरनिकरैः सन्ततं भक्तिनम्रैः ।
कारुण्यापारवारांनिधिरगतनयासिन्धुकन्याभिवाद्या
वाग्देवी वाञ्छितं मे वितरतु तरसा शृङ्गभूभृन्निवासा ॥ ३ ॥
(जो अज्ञान (जाड्य) रूपी अंधकार को नष्ट करने के लिए सूर्य-समूह के समान हैं; जो अपनी देह-कांति से चंद्रमा (रजनीकान्त) के गर्व को जीतने वाली हैं; जिनकी स्तुति श्रेष्ठ मुनिगण वेदों (आगम) के शीर्ष (उपनिषदों) द्वारा भक्तिपूर्वक झुककर करते हैं; जो करुणा का अपार सागर हैं और जिन्हें पार्वती (अगतनया) तथा लक्ष्मी (सिन्धुकन्या) भी नमन करती हैं—वे शृंगेरी निवासिनी माँ वाग्देवी मेरी मनोकामना शीघ्र पूर्ण करें।)
॥ इति श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवनृसिंहभारतीस्वामिभिः विरचितः श्री वाग्देवी स्तवः ॥
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परिचय: श्री वाग्देवी स्तवः
श्री वाग्देवी स्तवः (Sri Vagdevi Stava) संस्कृत भाषा में रचित 3 श्लोकों का एक अत्यंत सिद्ध स्तोत्र है। इसके रचयिता जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी (शृंगेरी शारदा पीठ के 33वें आचार्य) हैं।
इस स्तोत्र में माँ सरस्वती को 'वाग्देवी' (वाणी की देवी) और 'शृङ्गभूभृन्निवासा' (शृंगेरी पर्वत पर निवास करने वाली) कहकर संबोधित किया गया है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन विद्यार्थियों और वक्ताओं के लिए वरदान है जो सभा में बोलने से डरते हैं या अपनी बात प्रभावी ढंग से नहीं रख पाते।
इस स्तोत्र की विशेषताएँ
यद्यपि यह स्तोत्र छोटा है, परन्तु इसका प्रभाव अत्यंत गहरा है:
- वाद-विवाद में विजय: पहले श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि यह 'सत्सभा' (विद्वानों की सभा) में कठिन प्रश्नों का उत्तर देने की शक्ति देता है।
- बुद्धि की तीव्रता: दूसरे श्लोक के अनुसार, यह मूक (कम बोलने वाले) व्यक्ति को भी शास्त्रों का ज्ञाता बनाने में सक्षम है।
- त्रिदेवी वंदना: तीसरे श्लोक में बताया गया है कि माँ वाग्देवी इतनी महान हैं कि माँ पार्वती और माँ लक्ष्मी भी उनका सम्मान करती हैं।
पाठ के लाभ
1. परीक्षा और साक्षात्कार (Interview) में सफलता
जो छात्र परीक्षा (Viva) या नौकरी के इंटरव्यू में घबराते हैं, उन्हें इसका पाठ अवश्य करना चाहिए। यह तुरंत सही उत्तर सूझने की शक्ति देता है।
2. वाणी दोष निवारण
हकलाने या तुतलाने की समस्या में यह स्तोत्र, विशेष रूप से श्री वाग्वादिनी सहस्रनाम स्तोत्रम् के साथ, अत्यंत लाभकारी है।
3. लेखन और काव्य शक्ति
लेखकों और कवियों के लिए यह स्तोत्र प्रेरणा (Inspiration) का स्रोत है।
पाठ विधि
- प्रतिदिन स्नान के बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके पाठ करें।
- यदि किसी विशेष प्रतियोगिता या परीक्षा में जा रहे हैं, तो जाने से पूर्व 11 बार इस स्तोत्र का पाठ करें।
- माँ सरस्वती के चित्र के सामने घी का दीपक जलाकर पाठ करने से शीघ्र फल मिलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'वाग्देवी' का क्या अर्थ है?
'वाक' का अर्थ है वाणी और 'देवी' का अर्थ है ईश्वरी। अतः वाग्देवी का अर्थ है 'वाणी की देवी' अर्थात माँ सरस्वती।
2. इस स्तोत्र में 'शृङ्गभूभृन्निवासा' किसे कहा गया है?
'शृङ्गभूभृत्' का अर्थ है शृंग पर्वत (Sringeri)। वहाँ निवास करने वाली माँ शारदा को 'शृङ्गभूभृन्निवासा' कहा गया है।
3. 'मूकेभ्योऽप्यार्द्रचित्ता' पंक्ति का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है कि माँ सरस्वती का हृदय इतना कोमल (आर्द्र) है कि वे मूक (गूँगे) या अज्ञानी व्यक्ति पर भी दया करके उसे विद्वान बना देती हैं। कालिदास इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।
4. क्या यह स्तोत्र वैदिक है या पौराणिक?
यह रचित स्तोत्र है, जो आदि शंकराचार्य की परंपरा के जगद्गुरु श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी द्वारा लिखा गया है।
5. इसका पाठ किस समय करना चाहिए?
प्रातःकाल पढ़ाई शुरू करने से पहले इसका पाठ करना विद्यार्थियों के लिए सर्वश्रेष्ठ है।