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Sri Vasara Saraswati Stotram – श्री वासर सरस्वती स्तोत्रम्

Sri Vasara Saraswati Stotram – श्री वासर सरस्वती स्तोत्रम्
॥ श्री वासर सरस्वती स्तोत्रम् (आदिकवि वाल्मीकि कृतम्) ॥ शरच्चन्द्रवक्त्रां लसत्पद्महस्तां सरोजाभनेत्रां स्फुरद्रत्नमौलिम् । घनाकारवेणीं निराकारवृत्तिं भजे शारदां वासरापीठवासाम् ॥ १ ॥ (जिनका मुख शरद ऋतु के चन्द्रमा के समान (सुन्दर और शीतल) है, जिनके हाथों में सुशोभित कमल है, जिनके नेत्र कमल के समान हैं, जिनके मस्तक पर रत्नों का मुकुट स्फुरित हो रहा है, जिनकी वेणी (चोटी) बादलों (घन) के आकार की (काली और घनी) है, और जो निराकार वृत्ति वाली हैं - उन 'वासरा पीठ' (बासर) में निवास करने वाली माँ शारदा को मैं भजता हूँ।) धराभारपोषां सुरानीकवन्द्यां मृणालीलसद्बाहुकेयूरयुक्ताम् । त्रिलोकैकसाक्षीमुदारस्तनाढ्यां भजे शारदां वासरापीठवासाम् ॥ २ ॥ (जो धरा (पृथ्वी) के भार का पोषण करने वाली हैं, देवताओं की सेना (सुरानीक) द्वारा वंदनीय हैं, जिनकी भुजाएँ मृणाल (कमल की नाल) की तरह कोमल और केयूर (बाजूबंद) से युक्त हैं; जो तीनों लोकों की एकमात्र साक्षी हैं - उन 'वासरा पीठ' निवासिनी शारदा को मैं भजता हूँ।) दुरासारसंसारतीर्थाङ्घ्रिपोतां क्वणत्स्वर्णमाणिक्यहाराभिरामाम् । शरच्चन्द्रिकाधौतवासोलसन्तीं भजे शारदां वासरापीठवासाम् ॥ ३ ॥ (जिनके चरण इस दुस्तर संसार-सागर को पार करने के लिए जहाज (पोत) के समान हैं, जो खनकते हुए सोने और माणिक्य के हारों से अभिराम (सुन्दर) लग रही हैं, और जो शरद-चांदनी (की तरह श्वेत) वस्त्रों में सुशोभित हैं - उन 'वासरा पीठ' निवासिनी शारदा को मैं भजता हूँ।) विरिञ्चीन्द्रविष्ण्वादियोगीन्द्र पूज्यां प्रसन्नां विपन्नार्तिनाशां शरण्याम् । त्रिलोकाधिनाथाधिनाथां त्रिशून्यां भजे शारदां वासरापीठवासाम् ॥ ४ ॥ (जो ब्रह्मा (विरिञ्चि), इन्द्र, विष्णु आदि और बड़े-बड़े योगियों द्वारा पूजी जाती हैं; जो सदा प्रसन्न रहती हैं और विपत्तियों व दुःखों (विपन्न-आर्ति) का नाश करती हैं; जो शरण देने वाली (शरण्या) हैं; जो त्रिलोक के स्वामियों (ब्रह्मादि) की भी स्वामिनी हैं - उन 'वासरा पीठ' निवासिनी शारदा को मैं भजता हूँ।) अनन्तामगम्यामनाद्यामभाव्या- -मभेद्यामदाह्यामलेप्यामरूपाम् । अशोष्यामसङ्गामदेहामवाच्यां भजे शारदां वासरापीठवासाम् ॥ ५ ॥ (जो अनन्त हैं, अगम्य (मन-बुद्धि से परे) हैं, अनादि (जिनका कोई आरम्भ नहीं) हैं; जो अभेद्य, अदाह्य, अलेप्य और अरूप (निराकार) हैं; जो अशोष्य (सूखने वाली नहीं), असंग (लिप्त न होने वाली), देह-रहित और वाणी से परे (अवाच्या) हैं - उन 'वासरा पीठ' निवासिनी शारदा को मैं भजता हूँ।) मनोवागतीतामनाम्नीमखण्डा- -मभिन्नात्मिकामद्वयां स्वप्रकाशाम् । चिदानन्दकन्दां परञ्ज्योतिरूपां भजे शारदां वासरापीठवासाम् ॥ ६ ॥ (जो मन और वाणी से अतीत (परे) हैं, जिनका कोई (प्राकृत) नाम नहीं, जो अखण्ड और अभिन्न आत्म-स्वरूप हैं; जो अद्वैत और स्व-प्रकाश हैं; जो चिदानन्द (चेतना और आनन्द) की कन्द (मूल) हैं और परम ज्योति स्वरूप हैं - उन 'वासरा पीठ' निवासिनी शारदा को मैं भजता हूँ।) सदानन्दरूपां शुभयोगरूपां अशेषात्मिकां निर्गुणां निर्विकाराम् । महावाक्यवेद्यां विचारप्रसङ्गां भजे शारदां वासरापीठवासाम् ॥ ७ ॥ (जो सदानन्द रूप, शुभ योग रूप, अशेष (पूर्ण) आत्मिका, निर्गुण और विकार-रहित हैं; जो महावाक्यों (तत्त्वमसि आदि) द्वारा जानने योग्य हैं और विचार (ब्रह्म-विचार) का विषय हैं - उन 'वासरा पीठ' निवासिनी शारदा को मैं भजता हूँ।) परात्मस्वरूपामविद्यानिहन्त्रीं सदा नित्ययुक्तां सदा शुद्धबोधाम् । त्रिकालैकरूपामशेषैकहृत्स्थां भजे शारदां वासरापीठवासाम् ॥ ८ ॥ (जो परमात्मा स्वरूप हैं और अविद्या (अज्ञान) का नाश करने वाली हैं; जो सदा नित्य-मुक्त (या योग-युक्त) और सदा शुद्ध-बोध (ज्ञान) स्वरूप हैं; जो तीनों कालों में एक रूप रहती हैं और सबके हृदय में स्थित हैं - उन 'वासरा पीठ' निवासिनी शारदा को मैं भजता हूँ।) ॥ इति श्रीवाल्मीकि कृत श्री वासर सरस्वती स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री वासर सरस्वती स्तोत्रम्

श्री वासर सरस्वती स्तोत्रम् माँ सरस्वती की एक दुर्लभ और सिद्ध प्रार्थना है। इसकी रचना रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि द्वारा मानी जाती है। यह स्तोत्र विशेष रूप से भारत के तेलंगाना राज्य में स्थित बासर (Basara) के प्राचीन ज्ञान सरस्वती मंदिर से जुड़ा है।

'वासर' शब्द मूलतः 'व्यासपुर' या 'वासरा' का संस्कृत रूप है। जनश्रुति के अनुसार, महाभारत युद्ध के बाद महर्षि वेदव्यास मानसिक शांति की खोज में यहाँ आए थे और उन्होंने गोदावरी के तट पर बालू से माँ सरस्वती, लक्ष्मी और काली की प्रतिमाएँ बनाकर तपस्या की थी। तभी से यह स्थान 'व्यासर' और कालांतर में 'बासर' कहलाया। यह स्तोत्र उसी ज्ञान पीठ (वासरा पीठ) में विराजमान देवी की महिमा गाता है।

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

यह स्तोत्र केवल वाणी की देवी की स्तुति नहीं है, बल्कि इसमें अद्वैत वेदांत के गहरे तत्त्व भी छिपे हैं (जैसे श्लोक 6 और 7 में - 'चिदानन्दकन्दां', 'निर्गुणां')। इसका महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि:

  • आदिकवि का आशीर्वाद: इसे वाल्मीकि कृत माना जाता है, जो स्वयं तपस्या से 'वाक्-सिद्ध' हुए थे। अतः कवियों, लेखकों और वक्ताओं के लिए यह महामंत्र है।
  • अक्षरारम्भ (Aksharabhyasam): बासर मंदिर में बच्चों का विद्या-आरम्भ (अक्षर-अभ्यास) कराने की परंपरा है। इस स्तोत्र का पाठ बच्चों की बुद्धि खोलने के लिए किया जाता है।
  • त्रिदेव पूजित: श्लोक 4 में कहा गया है कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी जिनकी पूजा करते हैं, वे ही वासरा-वासिनी सरस्वती हैं।

स्तोत्र के प्रमुख भाव और लाभ

इस स्तोत्र के श्रद्धापूर्वक पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

1. अविद्या का नाश

श्लोक 8 में देवी को 'अविद्यानिहन्त्रीं' कहा गया है। यह अज्ञान, भ्रम और जड़ता को दूर कर शुद्ध ज्ञान (Pure Consciousness) प्रदान करती हैं।

2. वाणी और स्मरण शक्ति

जो छात्र मन्दबुद्धि हैं या जिन्हें याद नहीं रहता, उनके लिए यह स्तोत्र रामबाण है। यह जिह्वा पर सरस्वती का वास कराता है।

3. संकट निवारण

देवी को 'विपन्नार्तिनाशां' कहा गया है, अर्थात वे विपत्तियों और दुःखों का नाश करने वाली हैं।

4. मोक्ष प्राप्ति

वे 'संसारतीर्थाङ्घ्रिपोतां' हैं - संसार सागर को पार कराने वाली नौका। साधकों को वे मोक्ष भी प्रदान करती हैं।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • ब्रह्म मुहूर्त: सर्वोत्तम समय प्रातःकाल (4 बजे से 6 बजे) है। स्नान के बाद श्वेत वस्त्र धारण कर पूर्व या उत्तर मुख होकर बैठें।
  • नवरात्रि और वसंत पंचमी: माघ शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी) और शारदीय नवरात्रि के मूल नक्षत्र में इसका पाठ 108 बार करने से विशेष विद्या सिद्धि मिलती है।
  • परीक्षा के दिनों में: विद्यार्थी परीक्षा से पूर्व 11 बार इसका पाठ करके जाएँ तो भय समाप्त होता है और स्मृति साथ देती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'वासर' (Vasara) और 'बासर' (Basara) में क्या संबंध है?

'वासर' बासर का ही संस्कृत नाम है। प्राचीन काल में इसे 'व्यासपुर' या 'वासरा' कहा जाता था। यह गोदावरी नदी के तट पर स्थित एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ और विद्या का केंद्र है।

2. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस स्तोत्र की पुष्पिका (अंतिम पंक्ति) में स्पष्ट लिखा है - 'इति श्रीवाल्मीकि कृत...'। अतः इसके रचयिता आदिकवि वाल्मीकि हैं।

3. क्या छोटे बच्चे इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, अवश्य। यदि बच्चे स्वयं नहीं पढ़ सकते, तो माता-पिता उन्हें सुना सकते हैं। यह बच्चों के मानसिक विकास और वाणी दोष (तुतलाना आदि) को दूर करने में सहायक है।

4. 'शारदा' और 'सरस्वती' में क्या अंतर है?

कोई अंतर नहीं है। 'शारदा' माँ सरस्वती का ही एक नाम है, जिसका अर्थ है 'शरद काल की' (शीतल और उज्ज्वल) या 'सार देने वाली'। कश्मीरी और दक्षिण भारतीय परंपरा में उन्हें अक्सर शारदा कहा जाता है।

5. इस स्तोत्र में देवी को 'निराकारवृत्तिं' क्यों कहा गया है?

क्योंकि माँ सरस्वती केवल मूर्ति तक सीमित नहीं हैं। वे साक्षात ज्ञान स्वरूप हैं और ज्ञान (Knowledge) का कोई आकार नहीं होता, वह निराकार और सर्वव्यापक है।

6. क्या यह स्तोत्र संगीत और कला साधकों के लिए उपयोगी है?

जी हाँ। माँ सरस्वती वीणावादिनी और कला की देवी हैं। संगीत, नृत्य और चित्रकला सीखने वालों को अपनी साधना शुरू करने से पहले इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।

7. पाठ के लिए कौन सा आसन और दिशा श्रेष्ठ है?

सफेद या पीले रंग का आसन श्रेष्ठ है। विद्या प्राप्ति के लिए 'पूर्व दिशा' (East) और मानसिक शांति के लिए 'उत्तर दिशा' (North) की ओर मुख करके पाठ करें।

8. 'अविद्यानिहन्त्रीं' का व्यवहारिक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है अज्ञान को मारने वाली। व्यवहार में इसका मतलब है कि यह स्तोत्र हमारे मन से कन्फ्यूजन, गलतफहमी और मूर्खता को हटाकर सही समझ (Right Understanding) देता है।

9. क्या स्त्रियाँ और कन्याएँ मासिक धर्म के दौरान इसे पढ़ सकती हैं?

मानसिक जप (मन ही मन) किसी भी अवस्था में किया जा सकता है, लेकिन शुद्धता बनाए रखने के लिए मंदिर या पूजा स्थल पर वाचिक (बोलकर) पाठ उन दिनों में वर्जित माना जाता है।

10. इसे कितनी बार पढ़ना चाहिए?

सामान्य रूप से दिन में 1 बार पाठ पर्याप्त है। विशेष कामना सिद्धि के लिए 41 दिनों तक नित्य 11 बार पाठ करने का विधान है।