Sri Taramba (Tara) Hrudayam – श्री ताराम्बा हृदयम्
Sri Tara Hrudayam: Secret Ugratara Mantra for Vashikaran & Protection

श्री ताराम्बा हृदयम् - परिचय (Introduction)
श्री ताराम्बा हृदयम् (Sri Taramba Hrudayam) जिसे उग्रतारा हृदयम् भी कहा जाता है, माँ तारा की उपासना का सार (essence) है। यह पवित्र स्तोत्र भैरवी तन्त्र के अंतर्गत भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद के रूप में प्राप्त है। इसमें शिवजी ने उग्रतारा साधना के उन गोपनीय रहस्यों को उजागर किया है जो "तीनों लोकों में दुर्लभ" (दुर्लभानि जगत्त्रये) हैं।
भक्ति प्रधान स्तोत्रों के विपरीत, यह 'हृदय स्तोत्र' क्रिया प्रधान और सिद्धि दायक है। इसमें केवल स्तुति नहीं है, बल्कि विशिष्ट वस्तुओं (जल, चंदन, भस्म, फूल, अक्षत, काजल) का उपयोग करके इच्छित फल प्राप्त करने की तांत्रिक विधियाँ (Prayogam) दी गई हैं। प्राचीन काल में देवराज इन्द्र ने भी असुरों के विनाश और बल-यश की प्राप्ति के लिए इसी हृदय स्तोत्र का पाठ किया था।
इस स्तोत्र में तारा के उग्र स्वरूप की प्रधानता है जो शत्रुओं और बाधाओं का नाश करने के लिए जानी जाती हैं। साथ ही, यह 'सर्वपापप्रणाशनं' है - समस्त पापों का नाश करने वाला और गंगा आदि तीर्थों से भी करोड़ों गुना अधिक पुण्य देने वाला है।
विशिष्ट तांत्रिक प्रयोग (Tantric Experiments)
रोग निवारण (Healing): (श्लोक 15) 'स्त्रीं ह्रीं हूं त्रीं फट्' मंत्र से जल को अभिमंत्रित करके रोगी पर छिड़कने या उसे पिलाने से सभी प्रकार के रोग नष्ट होते हैं।
लोक वशीकरण (Attraction): (श्लोक 16) 'त्रीं स्वाहा' मंत्र से चंदन को अभिमंत्रित करके तिलक लगाने वाला व्यक्ति सबको वश में कर लेता है।
शत्रु नाश (Protection): (श्लोक 17) (चेतावनी: केवल आत्मरक्षा हेतु) श्मशान की भस्म को मंत्र से अभिमंत्रित कर शत्रु के घर फेंकने से शत्रु का विनाश होता है। यह उग्र प्रयोग है।
उच्चाटन (Driving away enemies): (श्लोक 18) फूल को 7 बार मंत्र से शोधित करके फेंकने से शत्रुओं का उच्चाटन (स्थान परिवर्तन/भाग जाना) हो जाता है।
आकर्षण: (श्लोक 19) अक्षत (चावल) को मंत्र से अभिमंत्रित कर फेंकने से इच्छित व्यक्ति शीघ्र पास आ जाता है।
जगनमोहन (Mesmerism): (श्लोक 20) विशेष मंत्र 'हंसः ओं ह्रीं स्त्रीं हूं हंसः' से काजल (Kajal) को अभिमंत्रित कर आँखों में लगाने से पूरा जगत मोहित हो जाता है।
फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)
अतुलनीय पुण्य: यह स्तोत्र गंगा आदि सभी तीर्थों के स्नान और राजसूय आदि यज्ञों से भी करोड़ों गुना (कोटि कोटि गुणोत्तरम्) अधिक फलदायी है।
संकट निवारण: 'महादुःखे महारोगे सङ्कटे प्राणसम्शये' - महान दुःख, लाइलाज बीमारी, घोर संकट और प्राणों पर बनी परिस्थिति में इसका पाठ निश्चित रक्षा करता है।
शिव की सेवा: श्लोक 13 में शिव कहते हैं कि जो इसका पाठ करता है, "मैं उसका सेवक (किंकर) बन जाता हूँ" (किङ्करत्वं करोम्यहम्)। यह भगवान शिव का अपनी शक्ति के प्रति अगाध प्रेम दर्शाता है।
पाठ विधि (Ritual Method)
न्यास: पाठ से पूर्व विनियोग, करन्यास (हाथों में) और अंगन्यास (शरीर के अंगों में) अवश्य करें। इससे शरीर मंत्रमय और सुरक्षित हो जाता है।
ध्यान: श्लोक 4 में वर्णित देवी के रक्तांग (लाल वर्ण) और चतुर्भुज स्वरूप का ध्यान करें।
गोपनीयता: इस स्तोत्र को गुप्त रखना चाहिए ('गोपनीयं प्रयत्नेन')। इसे सार्वजनिक रूप से गाएं नहीं, बल्कि मन ही मन या मंद स्वर में पाठ करें।
अधिकारी: पशु भाव (अज्ञानी/भोग विलास में लिप्त) वाले व्यक्तियों को यह स्तोत्र नहीं बताना चाहिए। यह वीर और दिव्य भाव के साधकों के लिए है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'तारा हृदयम्' और 'तारा स्तोत्र' में क्या अंतर है?
तारा स्तोत्र में देवी की स्तुति और गुणगान होता है। 'हृदयम्' में देवी का सार तत्व और सिद्धिदायक मंत्र प्रयोग होते हैं। हृदयम् अधिक गोपनीय और तांत्रिक माना जाता है।
2. क्या मैं घर पर इसका पाठ कर सकता हूँ?
सामान्य पाठ घर पर किया जा सकता है। लेकिन श्लोक 17 जैसे श्मशान प्रयोग घर पर नहीं करने चाहिए और न ही किसी गुरु के बिना करने चाहिए।
3. 'स्त्रीं' बीज मंत्र का क्या महत्व है?
'स्त्रीं' (Striim) तारा का मुख्य बीज मंत्र है। यह वधु (Wife) बीज भी कहलाता है जो शक्ति के विस्तार और शत्रु नाश का प्रतीक है। न्यास में इसका प्रमुखता से प्रयोग हुआ है।
4. क्या रोग निवारण के लिए जल प्रयोग कोई भी कर सकता है?
हाँ, श्लोक 15 में वर्णित जल प्रयोग (Healing Water) एक निरापद प्रयोग है। कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति जल को अभिमंत्रित कर रोगी को दे सकता है।
5. 'न पशूनां प्रकाशयेत्' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'पशु स्वभाव वालों को न बताएं'। तंत्र में 'पशु' वे हैं जो अज्ञानी हैं, केवल शारीरिक सुखों में लिप्त हैं और जिनमें गुरु/देवता के प्रति भक्ति नहीं है।
6. क्या इसके लिए लाल कपड़े पहनना जरूरी है?
ध्यान श्लोक में देवी को 'रक्तवस्त्रा' (लाल वस्त्र वाली) और 'रक्तमाला' (लाल माला वाली) कहा गया है। अतः लाल वस्त्र पहनना और लाल आसन का प्रयोग करना श्रेष्ठ है।
7. क्या यह स्तोत्र किसी विशेष समस्या में पढ़ा जाता है?
हाँ, श्लोक 23 के अनुसार जब व्यक्ति 'प्राणसंशय' (Life threatening situation) में हो, या 'महाघोर भय' हो, तब इसका पाठ प्राण रक्षा करता है।
8. न्यास कैसे करते हैं?
करन्यास में अंगूठे, तर्जनी आदि उंगलियों को मंत्र के साथ स्पर्श करते हैं। अंगन्यास में हृदय, सिर, शिखा आदि अंगों को छूते हैं। यह शरीर को देवमय बनाने की क्रिया है।
9. क्या इसके पाठ से शिव प्रसन्न होते हैं?
अवश्य। स्वयं शिव कहते हैं कि तारा के भक्तों का मैं सेवक बन जाता हूँ। तारा शिव की ही शक्ति हैं, अतः उनकी पूजा से शिव स्वतः प्रसन्न होते हैं।
10. 'किंकरत्वं करोम्यहम्' का क्या भाव है?
यह महादेव की विनम्रता और भक्त वत्सलता की पराकाष्ठा है। वे कहते हैं, "मैं उस भक्त का नौकर (किंकर) बन जाता हूँ जो एकनिष्ठ होकर तारा का भजन करता है।"