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Sri Tara Ashtottara Shatanama Stotram – श्री ताराम्बा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Tara Ashtottara Shatanama Stotram: 108 Names for Protection & Siddhi

Sri Tara Ashtottara Shatanama Stotram – श्री ताराम्बा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री ताराम्बा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ श्री शिव उवाच ॥ तारिणी तरला तन्वी तारा तरुणवल्लरी । ताररूपा तरी श्यामा तनुक्षीणपयोधरा ॥ १ ॥ तुरीया तरुणा तीव्रगमना नीलवाहिनी । उग्रतारा जया चण्डी श्रीमदेकजटाशिरा ॥ २ ॥ तरुणी शांभवी छिन्नफाला स्याद्भद्रदायिनी । उग्रा उग्रप्रभा नीला कृष्णा नीलसरस्वती ॥ ३ ॥ द्वितीया शोभना नित्या नवीना नित्यभीषणा । चण्डिका विजयाराध्या देवी गगनवाहिनी ॥ ४ ॥ अट्टहासा करालास्या चरास्यादीशपूजिता । सगुणाऽसगुणाऽराध्या हरीन्द्रादिप्रपूजिता ॥ ५ ॥ रक्तप्रिया च रक्ताक्षी रुधिरास्यविभूषिता । बलिप्रिया बलिरता दुर्गा बलवती बला ॥ ६ ॥ बलप्रिया बलरता बलरामप्रपूजिता । अर्धकेशेश्वरी केशा केशवा स्रग्विभूषिता ॥ ७ ॥ पद्ममाला च पद्माक्षी कामाख्या गिरिनन्दिनी । दक्षिणा चैव दक्षा च दक्षजा दक्षिणेरता ॥ ८ ॥ वज्रपुष्पप्रिया रक्तप्रिया कुसुमभूषिता । माहेश्वरी महादेवप्रिया पन्नगभूषिता ॥ ९ ॥ इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्नाप्राणरूपिणी । गान्धारी पञ्चमी पञ्चाननादिपरिपूजिता ॥ १० ॥ तथ्यविद्या तथ्यरूपा तथ्यमार्गानुसारिणी । तत्त्वरूपा तत्त्वप्रिया तत्त्वज्ञानात्मिकाऽनघा ॥ ११ ॥ ताण्डवाचारसन्तुष्टा ताण्डवप्रियकारिणी । तालनादरता क्रूरतापिनी तरणिप्रभा ॥ १२ ॥ त्रपायुक्ता त्रपामुक्ता तर्पिता तृप्तिकारिणी । तारुण्यभावसन्तुष्टा शक्ति-र्भक्तानुरागिणी ॥ १३ ॥ शिवासक्ता शिवरतिः शिवभक्तिपरायणा । ताम्रद्युति-स्ताम्ररागा ताम्रपात्रप्रभोजिनी ॥ १४ ॥ बलभद्रप्रेमरता बलिभु-ग्बलिकल्पनी । रामप्रिया रामशक्ती रामरूपानुकारिणी ॥ १५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इत्येतत्कथितं देवि रहस्यं परमाद्भुतं । श्रुत्वामोक्षमवाप्नोति तारादेव्याः प्रसादतः ॥ १६ ॥ य इदं पठति स्तोत्रं तारास्तुतिरहस्यजं । सर्वसिद्धियुतो भूत्वा विहरेत् क्षिति मण्डले ॥ १७ ॥ तस्यैव मन्त्रसिद्धिः स्यान्मयि भक्तिरनुत्तमा । भवत्येव महामाये सत्यं सत्यं न सम्शयः ॥ १८ ॥ मन्दे मङ्गलवारे च यः पठेन्निशि सम्युतः । तस्यैव मन्त्रसिद्धिस्स्याद्गाणापत्यं लभेत सः ॥ १९ ॥ श्रद्धयाऽश्रद्धया वाऽपि पठेत्तारा रहस्यकं । सोऽचिरेणैवकालेन जीवन्मुक्तश्शिवो भवेत् ॥ २० ॥ सहस्रावर्तनाद्देवि पुरश्चर्याफलं लभेत् । एवं सततयुक्ता ये ध्यायन्तस्त्वामुपासते ॥ २१ ॥ ते कृतार्था महेशानि मृत्युसंसारवर्त्मनः ॥ २२ ॥ ॥ इति श्री स्वर्णमालातन्त्रे ताराम्बाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥

श्री ताराम्बा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री ताराम्बा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् माँ तारा की उपासना का एक दुर्लभ और सिद्ध स्तोत्र है जो स्वर्णमाला तन्त्र में वर्णित है। अष्टोत्तरशतनाम का अर्थ है '108 नाम'। हिंदू धर्म में 108 की संख्या ब्रह्मांडीय पूर्णता का प्रतीक है। इस स्तोत्र में माँ तारा के 108 दिव्य नामों का संकलन है जो उनके विभिन्न गुणों, शक्तियों और लीलाओं को प्रकट करते हैं।

भगवान शिव द्वारा वर्णित यह स्तोत्र केवल नामोच्चारण नहीं है, बल्कि प्रत्येक नाम एक सिद्ध मंत्र की भांति कार्य करता है। इसमें देवी के सौम्य और उग्र दोनों रूपों का समावेश है। जहाँ वे 'तरुणी' और 'पद्ममाला' (कमल की माला पहनने वाली) हैं, वहीं वे 'उग्रतारा' और 'नित्यभीषणा' (सदा भय उत्पन्न करने वाली) भी हैं। यह दिखाता है कि माँ तारा पालनकर्ता और संहारकर्ता दोनों हैं।

इस स्तोत्र में तारा विद्या और तंत्र के गूढ़ रहस्यों का भी संकेत है। नाम जैसे 'इडा', 'पिङ्गला', 'सुषुम्नाप्राणरूपिणी' स्पष्ट करते हैं कि तारा कुण्डलिनी शक्ति और प्राण ऊर्जा का ही स्वरूप हैं। योग साधकों के लिए इन नामों का विशेष महत्व है क्योंकि वे नाड़ी शोधन और चक्र जागरण की प्रक्रिया से जुड़े हैं।

विशिष्ट महत्व (Significance)

नामों की शक्ति: इस स्तोत्र के कुछ नाम अत्यंत शक्तिशाली बीज मंत्रों के समान हैं:

  • नीलसरस्वती: ज्ञान और वाक् की अधिष्ठात्री।
  • एकजटा: एक जटा धारण करने वाली, एकाग्रता की प्रतीक।
  • कामरूपा: इच्छा शक्ति की देवी।
  • श्मशानवासिनी: मृत्यु भय को जीतने वाली।

साधना में स्थान: तारा साधना में कवच और स्तोत्र पाठ के बाद नामावली या अष्टोत्तरशतनाम का पाठ किया जाता है। यह देवी के साथ व्यक्तिगत संबंध स्थापित करने का सबसे उत्तम माध्यम है।

सर्वधर्म समन्वय: इसमें देवी को 'तथ्यविद्या', 'तथ्यरूपा' और 'बौद्धार्तित्राणकारिणी' (बौद्ध धर्म में पूजित) जैसे भावों से भी जोड़ा जाता है, जो उनकी व्यापकता को दर्शाता है। (हालांकि इस विशिष्ट स्तोत्र में सभी नाम विशुद्ध तांत्रिक संस्कृत हैं)।

फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)

स्वयं भगवान शिव ने इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 16-22) में इसके अद्भुत लाभ बताए हैं:
  • मोक्ष प्राप्ति: 'श्रुत्वामोक्षमवाप्नोति' - केवल सुनने मात्र से भी मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। नियमित पाठ से जीवन्मुक्ति मिलती है।

  • सर्वसिद्धि: 'सर्वसिद्धियुतो भूत्वा' - साधक को अणिमा, गरिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ और सांसारिक सफलताएं प्राप्त होती हैं।

  • मंत्र सिद्धि: 'तस्यैव मन्त्रसिद्धिः स्यात्' - यदि कोई साधक तारा मंत्र (बीज मंत्र) का जप कर रहा है और सिद्धि नहीं मिल रही, तो इस स्तोत्र के पाठ से मंत्र शीघ्र सिद्ध हो जाता है।

  • मंगलवार का विशेष फल: 'मन्दे मङ्गलवारे च' - विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार की रात्रि में पाठ करने से 'गाणपत्य' (नेत्रृत्व क्षमता और गणों का स्वामी होना) प्राप्त होता है।

  • अद्भुत प्रभाव: 'श्रद्धयाऽश्रद्धया वाऽपि' - यह स्तोत्र इतना प्रभावशाली है कि चाहे श्रद्धा से पढ़ें या बिना श्रद्धा के, यह अपना फल अवश्य देता है और साधक को शिव तुल्य बना देता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • समय: तारा साधना के लिए रात्रि (निशीथ काल) सर्वश्रेष्ठ है। दिन में प्रातःकाल भी कर सकते हैं।

  • पुरश्चरण विधि: श्लोक 21 में कहा गया है - 'सहस्रावर्तनाद्देवि पुरश्चर्याफलं लभेत्'। यदि कोई साधक इस स्तोत्र का 1000 बार पाठ रता है, तो उसे पुरश्चरण (मंत्र जगाने) का पूर्ण फल मिलता है।

  • नित्य पाठ: प्रतिदिन 1, 3, 5 या 11 बार पाठ करना सामान्य साधकों के लिए उत्तम है।

  • समर्पण: पाठ के अंत में जल छोड़कर पुण्य फल माँ तारा और भगवान शिव को समर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. अष्टोत्तरशतनाम और सहस्रनाम में क्या अंतर है?

अष्टोत्तरशतनाम में 108 प्रमुख नाम होते हैं, जबकि सहस्रनाम में 1000 नाम होते हैं। दैनिक पूजा के लिए 108 नाम (अष्टोत्तर) अधिक सुविधाजनक और प्रचलित हैं।

2. क्या इस स्तोत्र के लिए दीक्षा आवश्यक है?

नहीं, भगवान शिव ने कहा है कि इसे 'श्रद्धा या अश्रद्धा' से भी पढ़ा जा सकता है। यह स्तुति है, अतः दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन गुरु का आशीर्वाद सदैव लाभकारी होता है।

3. 'स्वर्णमाला तंत्र' क्या है?

स्वर्णमाला तंत्र एक दुर्लभ शाक्त तंत्र ग्रंथ है जिसमें देवी के विभिन्न स्तोत्र और गोपनीय साधना विधियां वर्णित हैं। यह स्तोत्र उसी ग्रंथ का एक अंश है।

4. तारा के 108 नामों के पाठ का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

सबसे बड़ा लाभ 'वाक्सिद्धि' और 'बुद्धि विकास' है। इसके अलावा, यह आकस्मिक संकटों से रक्षा करने में बहुत प्रभावी है।

5. 'श्रीमदेकजटाशिरा' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - जिनके सिर पर एक जटा सुशोभित है। 'एकजटा' तारा का वह स्वरूप है जो मन की एकाग्रता और एकनिष्ठ भक्ति का प्रतीक है।

6. क्या मैं इसे हिंदी अनुवाद के साथ पढ़ सकता हूँ?

स्तोत्र का फल मूल संस्कृत शब्दों की ध्वनि (Sound Vibrations) में है। अर्थ समझना अच्छा है, लेकिन पाठ संस्कृत में ही करना चाहिए।

7. 'गाणपत्यं लभेत सः' का क्या अभिप्राय है?

इसका अर्थ है 'गणों का स्वामी होना'। आध्यात्मिक रूप से इसका अर्थ है अपनी इंद्रियों और मन पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त करना।

8. क्या गर्भवती महिलाएं इसका पाठ कर सकती हैं?

सामान्यतः सौम्य देवताओं का पाठ गर्भवती महिलाओं के लिए सुझाया जाता है। उग्र तारा का पाठ करने से पहले अपने गुरु या ज्योतिषी से परामर्श लेना उचित है।

9. 'ताम्रपात्रप्रभोजिनी' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - तांबे के पात्र में भोजन ग्रहण करने वाली। तंत्र साधना में धातुओं का विशेष महत्व है और तांबा पवित्र माना जाता है।

10. क्या यह स्तोत्र मोक्ष देता है?

हाँ, श्लोक 20 में स्पष्ट है - 'जीवन्मुक्तश्शिवो भवेत्'। यह साधक को जीवन-मरण के चक्र से मुक्त कर शिव स्वरूप बना देता है।