Sri Tara Stotram – श्री तारा स्तोत्रम्
Sri Tara Stotram: Powerful Mahavidya Stotra for Vak Siddhi, Protection & Moksha

श्री तारा स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
श्री तारा स्तोत्रम् भारतीय तंत्र परंपरा का एक अत्यंत प्राचीन और प्रभावशाली स्तोत्र है जो दश महाविद्याओं में द्वितीय देवी तारा की स्तुति में रचा गया है। महाविद्या परंपरा में काली के बाद तारा का स्थान है, और कुछ तांत्रिक ग्रंथों में इन्हें काली के समतुल्य ही माना गया है। यह स्तोत्र ताराष्टकम् के नाम से भी प्रसिद्ध है क्योंकि इसमें आठ मुख्य श्लोक और दो फलश्रुति के श्लोक हैं।
तारा शब्द का अर्थ है 'तारने वाली' या 'पार उतारने वाली'। जिस प्रकार तारे रात्रि के अंधकार में मार्ग दिखाते हैं, उसी प्रकार माँ तारा अपने भक्तों को संसार रूपी भवसागर से पार उतारती हैं। बृहन्नील तंत्र में कहा गया है कि तारा देवी 'भवतारिणी' हैं - वे भव (संसार) से तारने वाली हैं। इसीलिए उन्हें भवतारिणी भी कहा जाता है।
तारा देवी को नीलसरस्वती भी कहा जाता है। जहाँ श्वेत सरस्वती सौम्य विद्या और शास्त्रीय ज्ञान की देवी हैं, वहीं नीलसरस्वती तांत्रिक विद्या, गूढ़ ज्ञान और वाक् शक्ति की अधिष्ठात्री हैं। तारा रहस्य ग्रंथ के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने नीलसरस्वती की आराधना करके ही अठारह महापुराणों की रचना की थी। इसी कारण तारा देवी को वाचामीश्वरी (वाणी की ईश्वरी) और गद्य-पद्य रचना में सिद्धि देने वाली कहा गया है।
तारा देवी के तीन प्रमुख स्वरूप हैं - एकजटा, उग्रतारा और नीलसरस्वती। एकजटा एक जटा वाली उग्र देवी हैं जो शत्रुनाश में सिद्ध हैं। उग्रतारा भयंकर स्वरूप है जो तांत्रिक साधना के लिए पूजित हैं। नीलसरस्वती विद्या और वाक् सिद्धि प्रदान करती हैं। इस स्तोत्र में तीनों स्वरूपों के गुणों की स्तुति की गई है।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें तारा देवी के ध्यान श्लोक भी सम्मिलित हैं जो साधक को देवी के दिव्य स्वरूप का दर्शन कराते हैं। ध्यान में वर्णित है कि देवी प्रत्यालीढ़ मुद्रा में (बायाँ पैर आगे) शव के हृदय पर खड़ी हैं, अट्टहास (भयंकर हँसी) करती हैं, और हाथों में खड्ग (तलवार), कर्त्री (कैंची), कपाल (खोपड़ी) और इंदीवर (नीलकमल) धारण किए हैं। उनका वर्ण नील (गहरा नीला) है और वे हुंकार बीज से उत्पन्न हुई हैं।
तारा साधना का प्रमुख केंद्र पश्चिम बंगाल का तारापीठ है जो 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ माता सती का तृतीय नेत्र (नयन तारा) गिरा था। इस पीठ पर महान सिद्ध बामाखेपा ने तारा साधना की थी। तारापीठ में आज भी तांत्रिक साधना की प्राचीन परंपरा जीवित है।
विशिष्ट महत्व (Significance)
तंत्र शास्त्र में तारा का स्थान अद्वितीय है। तारा तंत्र, ब्रह्मयामल, रुद्रयामल और बृहन्नील तंत्र में तारा देवी की विस्तृत उपासना पद्धति वर्णित है। इन ग्रंथों के अनुसार तारा देवी आदिशक्ति का वह स्वरूप हैं जो शब्द ब्रह्म (ध्वनि की परम शक्ति) को नियंत्रित करती हैं।
स्तोत्र के प्रथम श्लोक में देवी को 'नीलसरस्वती' और 'सौभाग्यसम्पत्प्रदे' (सौभाग्य और संपत्ति देने वाली) कहा गया है। द्वितीय श्लोक में उन्हें 'वाचामीश्वरी' (वाणी की ईश्वरी), 'भक्तिकल्पलतिका' (भक्तों की कल्पलता) और 'सर्वार्थसिद्धीश्वरी' (सभी कार्यों की सिद्धि देने वाली) संबोधित किया गया है।
तारा और काली का संबंध: कुछ तांत्रिक ग्रंथों में तारा को काली का ही एक स्वरूप माना गया है। दोनों का ध्यान लगभग समान है - शव पर खड़ी, नीलवर्णा, मुंडमाला धारिणी। अंतर यह है कि काली मुख्यतः काल (समय) की शक्ति हैं जबकि तारा शब्द (वाक्) की शक्ति हैं। जो साधक वाक्सिद्धि, कवित्व और विद्या चाहते हैं, उनके लिए तारा साधना विशेष उपयुक्त है।
बौद्ध परंपरा में तारा: तारा देवी हिंदू और बौद्ध दोनों परंपराओं में पूजित हैं। तिब्बती बौद्ध धर्म में 21 तारा रूप माने गए हैं। हरित तारा और श्वेत तारा सबसे प्रसिद्ध हैं। दोनों परंपराओं में तारा का मूल भाव एक है - करुणा और भवसागर से तारण।
फलश्रुति - स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits)
कवित्व और विद्या प्राप्ति: 'लभते कवितां विद्याम्' - साधक को काव्य रचना और विद्या की सिद्धि मिलती है। लेखक, कवि, वक्ता और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत लाभकारी।
सर्वशास्त्र ज्ञान: 'सर्वशास्त्रार्थविद्भवेत्' - सभी शास्त्रों का अर्थ समझने की बुद्धि प्राप्त होती है।
अक्षय लक्ष्मी: 'लक्ष्मीमनश्वराम्' - कभी न नष्ट होने वाली लक्ष्मी (धन-संपत्ति) की प्राप्ति।
इच्छित भोग: 'भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान्' - मनोवांछित सांसारिक सुखों का भोग।
कीर्ति और कांति: 'कीर्तिं कान्तिं' - यश और सौंदर्य की प्राप्ति।
आरोग्य: 'नैरुज्यम्' - रोगों से मुक्ति और स्वास्थ्य लाभ।
मोक्ष: 'अन्ते मोक्षमाप्नुयात्' - अंत में मोक्ष (मुक्ति) की प्राप्ति।
श्लोक 7 में कहा गया है कि तारा के नाम स्मरण मात्र से भूत, प्रेत, पिशाच, राक्षस, यक्ष, नाग, दैत्य, दानव, व्याघ्र आदि भाग जाते हैं और साधक को देख भी नहीं पाते। यह तारा मंत्र की अद्भुत रक्षा शक्ति का प्रमाण है।
श्लोक 8 में वाक्सिद्धि का विशेष वर्णन है: 'क्षुद्रोऽपि वाचस्पतिः' - अत्यंत साधारण व्यक्ति भी वाचस्पति (बृहस्पति/वाक् के स्वामी) के समान हो जाता है। यही कारण है कि तारा देवी को वाग्देवी और नीलसरस्वती कहा जाता है।
पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)
समय: फलश्रुति में तीन समय बताए गए हैं - 'प्रातर्मध्याह्नकाले च सायाह्ने' (प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल)। रात्रि में पाठ विशेष फलदायी है क्योंकि तारा साधना मूलतः रात्रिकालीन है।
स्थान: शुद्ध एकांत स्थान। तांत्रिक साधना के लिए श्मशान या एकांत स्थल उत्तम। गृहस्थ पूजा स्थल पर भी पाठ किया जा सकता है।
आसन: काला या नीला ऊनी आसन उत्तम। लाल आसन भी प्रयोग किया जा सकता है।
दिशा: उत्तर या पूर्व मुख। तांत्रिक साधना में दक्षिण मुख भी विहित है।
शुद्धि: 'नियतः शुचिः' - नियमित और पवित्र रहकर पाठ करें। स्नान आदि से शुद्ध होकर पाठ करना चाहिए।
भक्ति: 'भक्तिमान् यः पठेन्नरः' - भक्तिपूर्वक पाठ करने पर ही फल मिलता है।
- अमावस्या: तारा साधना के लिए सर्वोत्तम तिथि
- अष्टमी और चतुर्दशी: शाक्त साधना हेतु उत्तम
- मंगलवार और शनिवार: साप्ताहिक पाठ के लिए
- नवरात्रि: विशेषकर गुप्त नवरात्रि में तारा पूजन
- काली पूजा (दीपावली): तारा भी काली स्वरूपा होने से इस दिन पूजित
महत्वपूर्ण: तांत्रिक मंत्र साधना के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है। बिना दीक्षा के उग्र तांत्रिक साधना नहीं करनी चाहिए। हालाँकि, यह स्तोत्र भक्ति भाव से सभी पढ़ सकते हैं। स्तोत्र पाठ मंत्र जप से भिन्न है और इसके लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. तारा देवी कौन हैं?
तारा देवी दश महाविद्याओं में द्वितीय स्थान रखती हैं। माँ काली के बाद वे सबसे प्रमुख तांत्रिक देवी हैं। उन्हें नीलसरस्वती, उग्रतारा, एकजटा और भवतारिणी के नाम से भी जाना जाता है। 'तारा' का अर्थ है 'तारने वाली' - जो भवसागर से पार उतारती हैं।
2. नीलसरस्वती और श्वेत सरस्वती में क्या अंतर है?
श्वेत सरस्वती सौम्य विद्या, संगीत और शास्त्रीय ज्ञान की देवी हैं। नीलसरस्वती (तारा) उग्र तांत्रिक रूप हैं जो गूढ़ ज्ञान, वाक्सिद्धि और रचनात्मक शक्ति प्रदान करती हैं। बृहन्नील तंत्र के अनुसार महर्षि वेदव्यास ने नीलसरस्वती की कृपा से 18 महापुराणों की रचना की।
3. यह स्तोत्र किन तंत्र ग्रंथों में वर्णित है?
तारा देवी के प्रमुख प्रामाणिक ग्रंथ हैं: तारा तंत्र, बृहन्नील तंत्र, रुद्रयामल, ब्रह्मयामल और तारा रहस्य (ब्रह्मानंदगिरि कृत)। तंत्रसार में भी तारा साधना का विस्तृत वर्णन है।
4. तारा स्तोत्र का मुख्य लाभ क्या है?
फलश्रुति के अनुसार प्रमुख लाभ हैं: कवित्व (काव्य रचना शक्ति), विद्या (ज्ञान), सर्वशास्त्र ज्ञान, अक्षय लक्ष्मी (स्थायी धन), कीर्ति, कांति (सौंदर्य), आरोग्य और अंत में मोक्ष। विशेषकर वाक्सिद्धि के लिए यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावी है।
5. तारा साधना के लिए उत्तम समय कौन सा है?
तारा साधना मूलतः रात्रिकालीन है। अमावस्या सर्वोत्तम तिथि है। अष्टमी और चतुर्दशी भी शुभ हैं। साप्ताहिक पाठ के लिए मंगलवार और शनिवार उत्तम हैं। गुप्त नवरात्रि में तारा पूजन विशेष फलदायी है।
6. क्या बिना गुरु दीक्षा के यह स्तोत्र पढ़ सकते हैं?
स्तोत्र पाठ मंत्र जप से भिन्न है। यह स्तोत्र भक्तिभाव से सभी पढ़ सकते हैं। तांत्रिक मंत्र साधना (जैसे तारा बीज मंत्र, एकजटा मंत्र आदि) के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है। बिना दीक्षा के उग्र तांत्रिक साधना न करें।
7. तारा देवी का ध्यान (Visualization) कैसा है?
ध्यान श्लोक के अनुसार: प्रत्यालीढ़ मुद्रा में शव के हृदय पर खड़ी, नीलवर्णा, तीन नेत्रों वाली, पिंगल जटाजूट से सुशोभित, नागों से अलंकृत, हाथों में खड्ग, कर्त्री (कैंची), कपाल और नीलकमल धारण किए, अट्टहास करती भयंकर देवी।
8. उग्रतारा, एकजटा और नीलसरस्वती में क्या अंतर है?
ये तीनों तारा देवी के ही रूप हैं। उग्रतारा - अत्यंत भयंकर स्वरूप, शत्रुनाश और तांत्रिक सिद्धियों के लिए। एकजटा - एक जटा वाली, रक्षा और मारण प्रयोगों में सिद्ध। नीलसरस्वती - विद्या, वाक्सिद्धि और कवित्व प्रदान करने वाली। साधक अपनी आवश्यकता अनुसार किसी भी रूप की उपासना करता है।
9. तारापीठ का क्या महत्व है?
तारापीठ (बीरभूम, पश्चिम बंगाल) 51 शक्तिपीठों में से एक है। यहाँ माता सती का तृतीय नेत्र (नयन तारा) गिरा था। यह तारा साधना का सबसे प्रमुख केंद्र है। यहाँ बामाखेपा जैसे महान सिद्ध साधकों ने साधना की। मंदिर में आज भी तांत्रिक पूजा की प्राचीन परंपरा जीवित है।
10. हिंदू तारा और बौद्ध तारा में क्या संबंध है?
दोनों परंपराओं में तारा पूजित हैं और मूल भाव समान है - करुणा और भवसागर से तारण। तिब्बती बौद्ध धर्म में 21 तारा रूप हैं, जिनमें हरित तारा और श्वेत तारा प्रमुख हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि बौद्ध तारा का उद्गम हिंदू तारा से ही हुआ है, जो बंगाल और उड़ीसा से तिब्बत पहुँची।