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Sri Tara Kavacham – श्री तारा कवचम्

Sri Tara Kavacham: The Ultimate Tantric Shield from Rudrayamala Tantra

Sri Tara Kavacham – श्री तारा कवचम्
॥ श्री तारा कवचम् ॥ ॥ ईश्वर उवाच ॥ कोटितन्त्रेषु गोप्या हि विद्यातिभयमोचिनी । दिव्यं हि कवचं तस्याः शृणुष्व सर्वकामदम् ॥ १ ॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीताराकवचस्य अक्षोभ्य ऋषिः त्रिष्टुप् छन्दः भगवती तारा देवता सर्वमन्त्रसिद्धि समृद्धये जपे विनियोगः । ॥ कवचम् ॥ प्रणवो मे शिरः पातु ब्रह्मरूपा महेश्वरी । ललाटे पातु ह्रीङ्कारो बीजरूपा महेश्वरी ॥ २ ॥ स्त्रीङ्कारो वदने नित्यं लज्जारूपा महेश्वरी । हूङ्कारः पातु हृदये भवानीरूपशक्तिधृक् ॥ ३ ॥ फट्कारः पातु सर्वाङ्गे सर्वसिद्धिफलप्रदा । खर्वा मां पातु देवेशी गण्डयुग्मे भयापहा ॥ ४ ॥ निम्नोदरी सदा स्कन्धयुग्मे पातु महेश्वरी । व्याघ्रचर्मावृता कट्यां पातु देवी शिवप्रिया ॥ ५ ॥ पीनोन्नतस्तनी पातु पार्श्वयुग्मे महेश्वरी । रक्तवर्तुलनेत्रा च कटिदेशे सदाऽवतु ॥ ६ ॥ ललज्जिह्वा सदा पातु नाभौ मां भुवनेश्वरी । करालास्या सदा पातु लिङ्गे देवी हरप्रिया ॥ ७ ॥ पिङ्गोग्रैकजटा पातु जङ्घायां विघ्ननाशिनी । प्रेतखर्परभृद्देवी जानुचक्रे महेश्वरी ॥ ८ ॥ नीलवर्णा सदा पातु जानुनी सर्वदा मम । नागकुण्डलधर्त्री च पातु पादयुगे ततः ॥ ९ ॥ नागहारधरा देवी सर्वाङ्गं पातु सर्वदा । नागकङ्कधरा देवी पातु प्रान्तरदेशतः ॥ १० ॥ चतुर्भुजा सदा पातु गमने शत्रुनाशिनी । खड्गहस्ता महादेवी श्रवणे पातु सर्वदा ॥ ११ ॥ नीलाम्बरधरा देवी पातु मां विघ्ननाशिनी । कर्त्रिहस्ता सदा पातु विवादे शत्रुमध्यतः ॥ १२ ॥ ब्रह्मरूपधरा देवी सङ्ग्रामे पातु सर्वदा । नागकङ्कणधर्त्री च भोजने पातु सर्वदा ॥ १३ ॥ शवकर्णा महादेवी शयने पातु सर्वदा । वीरासनधरा देवी निद्रायां पातु सर्वदा ॥ १४ ॥ धनुर्बाणधरा देवी पातु मां विघ्नसङ्कुले । नागाञ्चितकटी पातु देवी मां सर्वकर्मसु ॥ १५ ॥ छिन्नमुण्डधरा देवी कानने पातु सर्वदा । चितामध्यस्थिता देवी मारणे पातु सर्वदा ॥ १६ ॥ द्वीपिचर्मधरा देवी पुत्रदारधनादिषु । अलङ्कारान्विता देवी पातु मां हरवल्लभा ॥ १७ ॥ ॥ दिशा रक्षण ॥ रक्ष रक्ष नदीकुञ्जे हूं हूं फट् सुसमन्विते । बीजरूपा महादेवी पर्वते पातु सर्वदा ॥ १८ ॥ मणिभृद्वज्रिणी देवी महाप्रतिसरे तथा । रक्ष रक्ष सदा हूं हूं ओं ह्रीं स्वाहा महेश्वरी ॥ १९ ॥ पुष्पकेतुरजार्हेति कानने पातु सर्वदा । ओं ह्रीं वज्रपुष्पं हुं फट् प्रान्तरे सर्वकामदा ॥ २० ॥ ओं पुष्पे पुष्पे महापुष्पे पातु पुत्रान्महेश्वरी । हूं स्वाहा शक्तिसम्युक्ता दारान् रक्षतु सर्वदा ॥ २१ ॥ ओं आं हूं स्वाहा महेशानी पातु द्यूते हरप्रिया । ओं ह्रीं सर्वविघ्नोत्सारिणी देवी विघ्नान्मां सदाऽवतु ॥ २२ ॥ ओं पवित्रवज्रभूमे हुं फट् स्वाहा समन्विता । पूरिका पातु मां देवी सर्वविघ्नविनाशिनी ॥ २३ ॥ ओं आः सुरेखे वज्ररेखे हुं फट् स्वाहा समन्विता । पाताले पातु सा देवी लाकिनी नामसञ्ज्ञिका ॥ २४ ॥ ह्रीङ्कारी पातु मां पूर्वे शक्तिरूपा महेश्वरी । स्त्रीङ्कारी पातु देवेशी वधूरूपा महेश्वरी ॥ २५ ॥ हूंस्वरूपा महादेवी पातु मां क्रोधरूपिणी । फट् स्वरूपा महामाया उत्तरे पातु सर्वदा ॥ २६ ॥ पश्चिमे पातु मां देवी फट् स्वरूपा हरप्रिया । मध्ये मां पातु देवेशी हूं स्वरूपा नगात्मजा ॥ २७ ॥ नीलवर्णा सदा पातु सर्वतो वाग्भवा सदा । भवानी पातु भवने सर्वैश्वर्यप्रदायिनी ॥ २८ ॥ विद्यादानरता देवी वक्त्रे नीलसरस्वती । शास्त्रे वादे च सङ्ग्रामे जले च विषमे गिरौ ॥ २९ ॥ भीमरूपा सदा पातु श्मशाने भयनाशिनी । भूतप्रेतालये घोरे दुर्गमा श्रीघनाऽवतु ॥ ३० ॥ पातु नित्यं महेशानी सर्वत्र शिवदूतिका । कवचस्य माहात्म्यं नाहं वर्षशतैरपि ॥ ३१ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ शक्नोमि गदितुं देवि भवेत्तस्य फलं च यत् । पुत्रदारेषु बन्धूनां सर्वदेशे च सर्वदा ॥ ३२ ॥ न विद्यते भयं तस्य नृपपूज्यो भवेच्च सः । शुचिर्भूत्वाऽशुचिर्वापि कवचं सर्वकामदम् ॥ ३३ ॥ प्रपठन् वा स्मरन्मर्त्यो दुःखशोकविवर्जितः । सर्वशास्त्रे महेशानि कविराड्भवति ध्रुवम् ॥ ३४ ॥ सर्ववागीश्वरो मर्त्यो लोकवश्यो धनेश्वरः । रणे द्यूते विवादे च जयस्तत्र भवेद्ध्रुवम् ॥ ३५ ॥ पुत्रपौत्रान्वितो मर्त्यो विलासी सर्वयोषिताम् । शत्रवो दासतां यान्ति सर्वेषां वल्लभः सदा ॥ ३६ ॥ गर्वी खर्वी भवत्येव वादी स्खलति दर्शनात् । मृत्युश्च वश्यतां याति दासास्तस्यावनीभुजः ॥ ३७ ॥ प्रसङ्गात्कथितं सर्वं कवचं सर्वकामदम् । प्रपठन्वा स्मरन्मर्त्यः शापानुग्रहणे क्षमः ॥ ३८ ॥ आनन्दवृन्दसिन्धूनामधिपः कविराड्भवेत् । सर्ववागीश्वरो मर्त्यो लोकवश्यः सदा सुखी ॥ ३९ ॥ गुरोः प्रसादमासाद्य विद्यां प्राप्य सुगोपिताम् । तत्रापि कवचं देवि दुर्लभं भुवनत्रये ॥ ४० ॥ गुरुर्देवो हरः साक्षात्तत्पत्नी तु हरप्रिया । अभेदेन भजेद्यस्तु तस्य सिद्धिरदूरतः ॥ ४१ ॥ मन्त्राचारा महेशानि कथिताः पूर्ववत्प्रिये । नाभौ ज्योतिस्तथा रक्तं हृदयोपरि चिन्तयेत् ॥ ४२ ॥ ऐश्वर्यं सुकवित्वं च महावागीश्वरो नृपः । नित्यं तस्य महेशानि महिलासङ्गमं चरेत् ॥ ४३ ॥ पञ्चाचाररतो मर्त्यः सिद्धो भवति नान्यथा । शक्तियुक्तो भवेन्मर्त्यः सिद्धो भवति नान्यथा ॥ ४४ ॥ ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च ये देवासुरमानुषाः । तं दृष्ट्वा साधकं देवि लज्जायुक्ता भवन्ति ते ॥ ४५ ॥ स्वर्गे मर्त्ये च पाताले ये देवाः सिद्धिदायकाः । प्रशंसन्ति सदा देवि तं दृष्ट्वा साधकोत्तमम् ॥ ४६ ॥ विघ्नात्मकाश्च ये देवाः स्वर्गे मर्त्ये रसातले । प्रशंसन्ति सदा सर्वे तं दृष्ट्वा साधकोत्तमम् ॥ ४७ ॥ इति ते कथितं देवि मया सम्यक्प्रकीर्तितम् । भुक्तिमुक्तिकरं साक्षात्कल्पवृक्षस्वरूपकम् ॥ ४८ ॥ आसाद्याद्यगुरुं प्रसाद्य य इदं कल्पद्रुमालम्बनं मोहेनापि मदेन चापि रहितो जाड्येन वा युज्यते । सिद्धोऽसौ भुवि सर्वदुःखविपदां पारं प्रयात्यन्तके मित्रं तस्य नृपाश्च देवि विपदो नश्यन्ति तस्याशु च ॥ ४९ ॥ तद्गात्रं प्राप्य शस्त्राणि ब्रह्मास्त्रादीनि वै भुवि । तस्य गेहे स्थिरा लक्ष्मीर्वाणी वक्त्रे वसेद्ध्रुवम् ॥ ५० ॥ इदं कवचमज्ञात्वा तारां यो भजते नरः । अल्पायुर्निर्धनो मूर्खो भवत्येव न संशयः ॥ ५१ ॥ ॥ लेखन विधि ॥ लिखित्वा धारयेद्यस्तु कण्ठे वा मस्तके भुजे । तस्य सर्वार्थसिद्धिः स्याद्यद्यन्मनसि वर्तते ॥ ५२ ॥ गोरोचना कुङ्कुमेन रक्तचन्दनकेन वा । यावकैर्वा महेशानि लिखेन्मन्त्रं समाहितः ॥ ५३ ॥ अष्टम्यां मङ्गलदिने चतुर्दश्यामथापि वा । सन्ध्यायां देवदेवेशि लिखेद्यन्त्रं समाहितः ॥ ५४ ॥ मघायां श्रवणे वापि रेवत्यां वा विशेषतः । सिंहराशौ गते चन्द्रे कर्कटस्थे दिवाकरे ॥ ५५ ॥ मीनराशौ गुरौ याते वृश्चिकस्थे शनैश्चरे । लिखित्वा धारयेद्यस्तु उत्तराभिमुखो भवेत् ॥ ५६ ॥ श्मशाने प्रान्तरे वापि शून्यागारे विशेषतः । निशायां वा लिखेन्मन्त्रं तस्य सिद्धिरचञ्चला ॥ ५७ ॥ भूर्जपत्रे लिखेन्मन्त्रं गुरुणा च महेश्वरि । ध्यान धारण योगेन धारयेद्यस्तु भक्तितः । अचिरात्तस्य सिद्धिः स्यान्नात्र कार्या विचारणा ॥ ५८ ॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले तन्त्रे उग्रताराकवचं सम्पूर्णम् ॥

श्री तारा कवचम् - परिचय (Introduction)

श्री तारा कवचम् (Sri Tara Kavacham) केवल एक सुरक्षा स्तोत्र नहीं, बल्कि तांत्रिक साधना का एक शक्तिशाली 'वज्र-पंजर' (अभेद्य किला) है। यह कवच रुद्रयामल तन्त्र के अंतर्गत भगवान शिव (ईश्वर) और देवी पार्वती के संवाद के रूप में प्रकट हुआ है। शिवजी स्वयं इसके महत्व का वर्णन करते हुए कहते हैं कि यह विद्या "करोड़ों तन्त्रों में गोपनीय" (कोटितन्त्रेषु गोप्या) है। यह कवच साधक को देवी तारा के उग्र और सौम्य दोनों स्वरूपों की सुरक्षा प्रदान करता है।

इस कवच के ऋषि अक्षोभ्य हैं। 'अक्षोभ्य' का अर्थ है - 'जिसे क्षुब्ध या विचलित न किया जा सके'। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब समुद्र मंथन के दौरान भगवान शिव ने हलाहल विष का पान किया था, तो विष की तीव्र ज्वाला से वे व्याकुल हो उठे थे। उस समय माँ तारा ने उन्हें अपना स्तन्दपान कराकर शीतलता प्रदान की और विष के प्रभाव को कंठ में ही रोक दिया। इस प्रकार शिव 'नीलकंठ' और 'अक्षोभ्य' बने। इसलिए तारा साधना में अक्षोभ्य ऋषि की न्यास के रूप में स्थापना अनिवार्य मानी जाती है।

इस कवच में देवी के विभिन्न स्वरूपों जैसे लज्जारूपा, उग्रतारा, नीलसरस्वती, एकजटा और महाकाली का आह्वान किया गया है ताकि वे साधक के शरीर के प्रत्येक अंग - सिर से लेकर पैर के नाखूनों तक - की रक्षा करें। इसमें 'स्त्रीं' (तारा बीज), 'ह्रीं' (माया बीज), 'हूं' (क्रोध बीज) और 'फट्' (अस्त्र बीज) जैसे शक्तिशाली बीजाक्षरों का प्रयोग किया गया है जो इसे एक अस्त्र की भांति कार्य करने वाला बनाते हैं।

जो साधक इस कवच को सिद्ध कर लेता है, उसके लिए संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। यह कवच विशेष रूप से उन लोगों के लिए वरदान है जो श्मशान साधना, घोर तांत्रिक कर्म, या वाद-विवाद (शास्त्रार्थ/मुकदमा) में विजय प्राप्त करना चाहते हैं। नीलसरस्वती के रूप में यह कवच वाणी में अद्भुत ओज और तर्क शक्ति भर देता है, जिससे बड़े-बड़े विद्वान भी साधक के सामने निरुत्तर हो जाते हैं।

कवच का सामर्थ्य (Power & Benefits)

फलश्रुति (श्लोक 32-51) में इस कवच के चमत्कारी लाभ बताए गए हैं:
  • अजेय सुरक्षा: 'न विद्यते भयं तस्य' (श्लोक 33) - साधक को किसी भी प्रकार का भय (मृत्यु, शत्रु, हिंसक पशु, भूत-प्रेत) नहीं रहता। ब्रह्मास्त्र जैसे घातक अस्त्र भी उसके शरीर को स्पर्श कर व्यर्थ हो जाते हैं (श्लोक 50)।

  • वाक्सिद्धि और कवित्व: 'कविराड्भवति ध्रुवम्' (श्लोक 34) - साधक कवियों का राजा बन जाता है। उसके मुख में स्वयं सरस्वती निवास करती हैं। वाद-विवाद में विपक्षी उसे देखते ही लड़खड़ाने लगते हैं (बादी स्खलति दर्शनात्)।

  • लक्ष्मी की स्थिरता: 'तस्य गेहे स्थिरा लक्ष्मी' (श्लोक 50) - साधक के घर में लक्ष्मी स्थिर हो जाती हैं। दरिद्रता और दुर्भाग्य सदा के लिए नष्ट हो जाते हैं।

  • सम्मोहन शक्ति: यह कवच साधक को 'लोकवश्य' (सबको वश में करने वाला) और राजाओं द्वारा पूजित (नृपपूज्यो) बनाता है।

  • मोक्ष और भोग: यह 'भुक्ति-मुक्तिकरं' है, अर्थात यह भौतिक सुख और अंतिम मोक्ष दोनों एक साथ प्रदान करता है, जो दुर्लभ है।

साधना व लेखन विधि (Ritual & Writing)

  • धारण विधि: इस कवच को केवल पढ़ने से ही नहीं, बल्कि धारण करने से भी सिद्धि मिलती है। श्लोक 52-58 में इसे भोजपत्र पर लिखने की विधि दी गई है।

  • द्रव्य: गोरोचन, कुमकुम, रक्त चंदन या लाख (यावक) की स्याही से इसे लिखना चाहिए।

  • समय: अष्टमी, चतुर्दशी, मंगलवार, या ग्रहण काल (सूर्य/चंद्र ग्रहण) में इसे लिखना श्रेष्ठ है।

  • स्थान: श्मशान भूमि, निर्जन वन या एकांत घर में उत्तर मुख होकर लिखने से यह तुरंत प्रभावशाली होता है। इसे ताबीज (गुलिका) में भरकर गले या दाहिनी भुजा में धारण करें।

  • नित्य पाठ: जो लोग धारण नहीं कर सकते, वे प्रतिदिन सुबह-शाम इसका पाठ करें। पाठ से पूर्व 'विनियोग' और 'ऋषिन्यास' अवश्य करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. तारा कवच के ऋषि 'अक्षोभ्य' क्यों हैं?

समुद्र मंथन के समय जब शिव ने हलाहल विष पी लिया था, तब माँ तारा ने माता के रूप में उन्हें अपना दुग्धपान कराकर शांत किया था। शिव 'क्षोभ' (विचलन) से रहित हो गए, इसलिए वे 'अक्षोभ्य' कहलाए। तारा साधना में अक्षोभ्य ऋषि का स्थान सर्वोपरि है।

2. रुद्रयामल तन्त्र का क्या महत्व है?

रुद्रयामल तन्त्र शाक्त और शैव परंपरा का एक प्रामाणिक ग्रंथ है। इसमें वर्णित स्तोत्र और कवच अत्यंत प्रभावशाली और 'जाग्रत' माने जाते हैं, अर्थात वे तुरंत फल देने वाले होते हैं।

3. इस कवच में 'खर्वा' और 'लम्बोदरी' किसे कहा गया है?

ये माँ तारा के ही स्वरूप हैं। 'खर्वा' का अर्थ है छोटे कद वाली (जो वामन रूप में विराट शक्ति रखती हैं) और 'लम्बोदरी' का अर्थ है जिसका उदर विशाल है (जो ब्रह्मांड को अपने भीतर समाए हुए हैं)।

4. क्या यह कवच वाक्सिद्धि देता है?

हाँ, श्लोक 35 में कहा गया है - 'सर्ववागीश्वरो मर्त्यो'। जो इस कवच का पाठ करता है, वह बृहस्पति के समान विद्वान और वक्ता हो जाता है। उसकी वाणी में सरस्वती का वास होता है।

5. श्मशान में कवच पाठ का क्या नियम है?

श्लोक 57 के अनुसार, श्मशान, सुनसान जंगल (प्रान्तर) या खाली घर (शून्यागार) में बैठकर पाठ करने से 'अचला सिद्धि' (स्थिर सिद्धि) प्राप्त होती है। यह उग्र साधना है।

6. क्या इसे भोजपत्र पर लिखकर धारण कर सकते हैं?

जी हाँ, श्लोक 58 में विधान है कि भोजपत्र पर अष्टगंध या गोरोचन से लिखकर, 'गुलिका' (ताबीज) बनाकर धारण करने से भी पूर्ण सिद्धि मिलती है।

7. 'स्त्रीं' बीज का क्या अर्थ है?

'स्त्रीं' (Striim) तारा का मुख्य बीज मंत्र है। यह सृजन, पालन और संहार की शक्ति के साथ-साथ 'तारने' (मोक्ष दिलाने) की शक्ति को धारण करता है।

8. पाठ के लिए श्रेष्ठ तिथियाँ कौन सी हैं?

अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, संक्रांति और ग्रहण काल इस कवच के पाठ और सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं।

9. क्या स्त्रियाँ यह पाठ कर सकती हैं?

हाँ, माँ तारा स्त्री स्वरूप हैं, अतः स्त्रियाँ इस कवच का पाठ निर्भय होकर कर सकती हैं। यह उन्हें विशेष सुरक्षा और आत्मविश्वास प्रदान करता है।

10. शत्रु भय में यह कैसे कार्य करता है?

कवच का पाठ करने वाले को देखकर शत्रु 'दास' (Servant) बन जाते हैं (शत्रवो दासतां यान्ति)। हिंसक जंतु और विरोधी भी उसके सामने शांत हो जाते हैं।