Sri Tara Shatanama Stotram (Kalivilasa Tantra) – ताराशतनामस्तोत्रम्

श्रीताराशतनामस्तोत्रम्: परिचय एवं दार्शनिक पृष्ठभूमि (Introduction & Philosophical Background)
श्रीताराशतनामस्तोत्रम् (कालीविलास तन्त्र) तारा महाविद्या के अन्य स्तोत्रों से अपनी दार्शनिक गहराई और समन्वयात्मक दृष्टि के कारण विशिष्ट है। जहाँ मुण्डमाला तन्त्र का शतनाम 'उग्र' और 'घोर' स्वरूपों पर केंद्रित है, वहीं कालीविलास तन्त्र का यह स्तोत्र 'अद्वैत' (Non-duality) और 'भक्ति' (Devotion) पर अधिक बल देता है। इसका आरम्भ ही "ॐ अद्वैतरूपिणी आद्या" से होता है, जो यह घोषित करता है कि माँ तारा ही वह परमसत्ता हैं जहाँ द्वैत (भक्त और भगवान का भेद) समाप्त हो जाता है।
राम और कृष्ण शक्ति: इस स्तोत्र का सबसे अद्भुत पहलू यह है कि इसमें देवी को स्पष्ट रूप से 'रामशक्ति', 'रामपूज्या', 'कृष्णशक्ति', और 'कृष्णपूज्या' कहा गया है (श्लोक 7-8)। यह शाक्त (देवी उपासक) और वैष्णव (राम/कृष्ण उपासक) मतों के बीच की खाई को पाट देता है। यह बताता है कि भगवान राम और कृष्ण की जो अद्भुत लीला-शक्ति थी, वह साक्षात् माँ तारा ही थीं।
नदी और तीर्थ स्वरूप: श्लोक 11 में देवी को गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिन्धु, और कावेरी जैसी पवित्र नदियों का स्वरूप बताया गया है। साथ ही श्लोक 13 में उन्हें 'काशी' और 'प्रयाग' तीर्थ का रूप कहा गया है। इसका अर्थ है कि तारा की उपासना से समस्त तीर्थों और पवित्र नदियों के स्नान का पुण्य स्वतः प्राप्त हो जाता है।
स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक और यौगिक महत्व (Spiritual Significance)
यह स्तोत्र योग और वेदांत के गूढ़ रहस्यों को सरल नामों में पिरोता है:
- कुण्डलिनी योग: श्लोक 4 में 'इडा' और 'पिङ्गला' नाड़ियों का उल्लेख है। तारा ही हमारे शरीर में प्राण-शक्ति बनकर इन नाड़ियों में प्रवाहित होती हैं, जो कुण्डलिनी जागरण का आधार है।
- विरोधाभासी गुण: देवी को 'घोररूपिणी' और 'अघोरा' (शांत), 'पापरूपा' और 'निष्पापा', 'क्रोधरूपा' और 'अक्रोधा' (श्लोक 3, 10, 13) कहा गया है। यह विरोधाभास (Paradox) यह सिद्ध करता है कि देवी समस्त गुणों और दोषों से परे, निर्गुण ब्रह्म हैं। वे ही सब कुछ हैं।
- तुरीया अवस्था: श्लोक 5 में उन्हें 'तुरीया' कहा गया है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुम्ना के बाद की जो चौथी अवस्था (समाधि/मोक्ष) है, वह माँ तारा का ही स्वरूप है।
- विष्णु और महेश शक्ति: श्लोक 6 में देवी को 'विष्णुशक्ति' और 'महेशशक्ति' दोनों कहा गया है। वे ही पालन (विष्णु) और संहार (महेश) की मूल ऊर्जा हैं।
फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)
कालीविलास तन्त्र में इस स्तोत्र के पाठ के अमोघ फलों का वर्णन किया गया है:
- सर्वसिद्धीश्वरत्व: श्लोक 15 में कहा गया है — "सर्वसिद्धीश्वरो भवेत्"। जो साधक इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह सभी सिद्धियों का स्वामी बन जाता है।
- अष्टसिद्धि प्राप्ति: श्लोक 16 के अनुसार, पृथ्वी पर विचरण करते हुए साधक अष्टसिद्धियों (अणिमा, महिमा आदि) का स्वामी हो जाता है।
- मुक्ति (मोक्ष): पूजा के समय या मध्यरात्रि (निशीथ) में इसका पाठ करने से साधक को अंत में मुक्ति (मोक्ष) की प्राप्ति होती है।
- चतुर्वर्ग सिद्धि: विनियोग में स्पष्ट है — "चतुर्वर्गसिद्धये विनियोगः"। यह पाठ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को देने वाला है।
- पाप और कलंक नाश: 'पापहरा', 'पापारि', 'कलंकनाशिनी' जैसे नामों के जप से बड़े से बड़े पाप और समाज में लगा कलंक (Bad Reputation) भी धुल जाता है।
पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)
तन्त्रोक्त होने के कारण इस स्तोत्र का पाठ विधि-विधान से करना चाहिए, यद्यपि यह सात्विक साधकों के लिए भी सुलभ है।
दैनिक पाठ विधि: प्रातःकाल, मध्याह्न और सायंकाल (त्रिसन्ध्यं) स्नान करके नीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। माँ तारा के चित्र के सामने घी का दीपक जलाएं। सबसे पहले विनियोग करें, फिर 100 नामों का पाठ करें।
जप और पाठ का क्रम: फलश्रुति (श्लोक 14) में एक विशेष विधि बताई गई है — पहले तारा के मूल मंत्र (ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्) का 108 बार (अष्टोत्तरशतं) जप करें, फिर इस स्तोत्र का पाठ करें, और अंत में पुनः 10 बार मंत्र जप करें। यह क्रम अत्यंत शक्तिशाली है।
विशेष मुहूर्त: मध्यरात्रि (निशीथ) का समय तारा साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ है। इसके अलावा नवरात्रि, अष्टमी/नवमी तिथि और ग्रहण काल में इसका पाठ करने से मन्त्र शीघ्र सिद्ध होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)