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Sri Tara Dhyanam – श्रीताराध्यानम् (सात्विक, राजस, तामस ध्यान)

Sri Tara Dhyanam – श्रीताराध्यानम् (सात्विक, राजस, तामस ध्यान)
॥ श्रीताराध्यानम् ॥ १. उग्रतारा ध्यानम् (मुख्य ध्यान) विश्वव्यापकवारिमध्यविलसच्छ्वेताम्बुजन्मस्थिताम् । कर्त्रीखड्गकपालनीलनलिनैः राजत्करां नीलभाम् ॥ काञ्चीकुण्डलहारकङ्कणलसत्केयूरमञ्जीरकाम् । आप्तैर्नागवरैर्विभूषिततनुं चारक्तनेत्रत्रयाम् ॥ पिङ्गैकाग्रजटां लसत्सुरसनां दंष्ट्राकरालाननाम् । हस्तैश्चापि वरं कटौ विदधतीं श्वेतास्थिपट्टालिकाम् ॥ अक्षोभ्येण विराजमानशिरसं स्मेराननाम्भोरुहाम् । तारं शावहृदासनां दृढकुचामम्बां त्रिलोक्यां भजे ॥ २. सौम्य तारा ध्यानम् श्वेताम्बरां शारदचन्द्रकान्तिं सद्भूषणां चन्द्रकलावतंसाम् । कर्त्रीकपालान्वितपादपद्मां तारां त्रिनेत्रां प्रभजेऽखिलर्द्ध्यै ॥ ३. लघु उग्रतारा ध्यानम् प्रत्यालीढपदार्पिताङ्घ्रिशवहृद्घोराट्टहासा परा । खड्गेन्दीवरकर्त्रिखर्परभुजा हुङ्कारबीजोद्भवा ॥ खर्वा नीलविशालपिङ्गलजटाजूटैकनागैर्युता । जाड्यं न्यस्य कपालके त्रिजगतां हन्त्युग्रतारा स्वयम् ॥ ४. सात्त्विकमूर्तिध्यानम् श्वेताम्बराढ्यां हंसस्थां मुक्ताभरणभूषिताम् । चतुर्वक्त्रामष्टभुजैर्दधानां कुण्डिकाम्बुजे ॥ वराभये पाशशक्ती अक्षस्रक्पुष्पमालिके । शब्दपाथोनिधेर्मध्ये तारां स्थितिकरीं भजे ॥ ५. राजसमूर्तिध्यानम् रक्ताम्बरां रक्तसिंहासनस्थां हेमभूषिताम् । एकवक्त्रां वेदसङ्ख्यैर्भुजैः सम्बिभ्रतीं क्रमात् ॥ अक्षमालां पानपात्रमभयं वरमुत्तमम् । श्वेतद्वीपस्थितां वन्दे तारां स्थितिपरायणाम् ॥ ६. तामसमूर्तिध्यानम् कृष्णाम्बराढ्यां नौसंस्थामस्थ्याभरणभूषिताम् । नववक्त्रां भुजैरष्टादशभिर्दधतीं वरम् ॥ अभयं परशुं दर्वीं खड्गं पाशुपतं हलम् । भिन्दिं शूलं च मुसलं कर्त्रीं शक्तिं त्रिशीर्षकम् ॥ संहारास्त्रं वज्रपाशौ खट्वाङ्गं गदया सह । रक्ताम्भोधौ स्थितां वन्दे देवीं संहारकारिणीम् ॥ ॥ इति श्रीताराध्यानम् सम्पूर्णम् ॥

श्रीताराध्यानम्: तांत्रिक परिचय एवं रहस्य (Introduction & Tantric Secrets)

माँ तारा दशमहाविद्याओं में दूसरी शक्ति हैं। 'तारा' का अर्थ है 'तारने वाली' (Saviour)। वे घोर संकटों, अज्ञान के अंधकार और भवसागर से अपने भक्तों को पार लगाती हैं। तंत्र शास्त्र में माँ तारा को 'नील सरस्वती' भी कहा जाता है, क्योंकि वे ज्ञान और वाक-सिद्धि की अधिष्ठात्री हैं। यह श्रीताराध्यानम् देवी के विभिन्न रूपों—उग्र (Tamasic), सौम्य (Sattvic), और राजसी (Rajasic)—का एक अद्भुत संग्रह है।

अक्षोभ्य शिव का रहस्य: प्रथम ध्यान में देवी के मस्तक पर 'अक्षोभ्येण विराजमानशिरसं' का वर्णन है। 'अक्षोभ्य' का अर्थ है 'जो क्षुब्ध (विचलित) न हो'। पौराणिक कथा के अनुसार, जब हलाहल विष पीने से भगवान शिव को जलन हुई, तब माँ तारा ने उन्हें अपना स्तनपान कराकर शांत किया। इसलिए वे शिव के मस्तक पर गुरु रूप में विराजमान हैं। यह देवी की सर्वोच्चता का प्रतीक है।

त्रिगुणात्मक स्वरूप: इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें देवी के त्रिगुणात्मक (सत्व, रज, तम) रूपों का अलग-अलग ध्यान दिया गया है। सात्विक रूप (श्वेत) मोक्ष और ज्ञान के लिए, राजस रूप (रक्त) ऐश्वर्य और भोग के लिए, और तामस रूप (कृष्ण/नील) शत्रु नाश और मारण कर्मों के लिए ध्याया जाता है।

ध्यान श्लोकों का गूढ़ प्रतीकात्मक अर्थ (Symbolism of the Dhyana)

प्रत्येक ध्यान में देवी के अस्त्र-शस्त्र, वाहन और परिवेश का एक गहरा अर्थ है:

  • विश्वव्यापक वारि (Cosmic Water): प्रथम ध्यान में देवी को प्रलय काल के जल के मध्य श्वेत कमल पर स्थित बताया गया है। यह दर्शाता है कि सृष्टि के अंत और आरंभ के बीच की अवस्था में केवल तारा (शक्ति) ही विद्यमान रहती हैं।
  • कर्त्री और खप्पर: देवी के हाथों में कैंची (कर्त्री) और खोपड़ी (खप्पर/कपाल) है। कैंची अहंकार और अज्ञान के बंधनों को काटती है, और खप्पर उस अहंकार के विसर्जन का पात्र है।
  • जाड्यं न्यस्य कपालके (Removal of Ignorance): तीसरे ध्यान में एक बहुत सुंदर बात कही गई है—देवी तीनों लोकों की जड़ता (मूर्खता/अज्ञान) को निकालकर अपने हाथ के कपाल में रख लेती हैं और उसे नष्ट कर देती हैं। इसीलिए वे ज्ञान की देवी हैं।
  • हंसवाहिनी (Swan Vehicle): सात्विक ध्यान में देवी हंस पर आरूढ़ हैं और उनके चार मुख हैं (चतुर्वक्त्रा)। यह उन्हें ब्रह्माणी और सरस्वती के समकक्ष स्थापित करता है, जो विवेक (हंस) और वेदों (चार मुख) की प्रतीक हैं।
  • श्मशान और शव: उग्र रूप में वे श्मशान में शव (Shava) के हृदय पर प्रत्यालीढ़ मुद्रा (योद्धा की मुद्रा) में खड़ी हैं। यह मृत्यु पर विजय और निर्भयता का प्रतीक है।

फलश्रुति: ध्यान से प्राप्त होने वाले लाभ (Benefits of Meditation)

तन्त्र शास्त्रों के अनुसार, केवल मंत्र जप पर्याप्त नहीं है। जब तक साधक देवी के स्वरूप का अपने भीतर स्पष्ट 'ध्यान' नहीं करता, मंत्र सिद्ध नहीं होता। इन ध्यानों के लाभ इस प्रकार हैं:

  • वाक-सिद्धि और कवित्व: माँ तारा वाग्देवी हैं। उनके 'नील सरस्वती' स्वरूप का ध्यान करने से साधक को अद्भुत कवित्व शक्ति, भाषण कला और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त होता है।
  • घोर संकटों से मुक्ति: 'तारयति इति तारा' — जो तार दे। उग्र तारा का ध्यान बड़े से बड़े संकट, मुकदमों, और शत्रुओं के भय से तत्काल मुक्ति दिलाता है।
  • कुण्डलिनी जागरण: तारा मणिपुर चक्र (नाभि) की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। उनके ध्यान से मणिपुर चक्र जाग्रत होता है और साधक को तेज और आत्मविश्वास मिलता है।
  • मोक्ष और भोग: सात्विक ध्यान से मोक्ष (स्थितिकरी), राजस ध्यान से राज्य सुख और धन (स्थिति परायणा), और तामस ध्यान से शत्रुओं का संहार (संहारकारिणी) होता है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)

साधक को अपनी आवश्यकता और स्वभाव के अनुसार किसी एक रूप का चयन करके उसका ध्यान करना चाहिए।

उग्र तारा साधना (शत्रु/संकट नाश हेतु): स्नानादि के बाद नीले वस्त्र पहनकर उत्तर दिशा की ओर मुख करें। माँ तारा के चित्र के सामने सरसों के तेल का दीपक जलाएं। देवी को नीले फूल (अपराजिता) अर्पित करें। श्लोक 1 या 3 का पाठ करते हुए देवी के उग्र रूप का मानसिक चित्रण करें और फिर 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्' मंत्र का जप करें।

नील सरस्वती साधना (ज्ञान हेतु): श्वेत या पीले वस्त्र पहनकर पूर्व दिशा की ओर मुख करें। घी का दीपक जलाएं। श्लोक 4 (सात्विक मूर्ति) का पाठ करें और देवी को श्वेत कमल पर हंस के साथ देखें। यह विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए सर्वोत्तम है।

विशेष मुहूर्त: चैत्र मास की नवमी (तारा जयंती), शुक्ल पक्ष की नवमी, और ग्रहण काल इस ध्यान की सिद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ समय हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. माँ तारा और माँ काली में क्या अंतर है?
दोनों का स्वरूप (नील वर्ण, मुण्डमाला, खड्ग) बहुत मिलता-जुलता है। मुख्य अंतर यह है कि काली 'शव' पर आरूढ़ हैं, जबकि तारा 'प्रत्यालीढ' मुद्रा में शव के हृदय पर पैर रखकर खड़ी हैं और उनके मस्तक पर अक्षोभ्य शिव (नाग रूप में) विराजमान हैं।
2. 'प्रत्यालीढ' मुद्रा क्या है?
यह एक वीर मुद्रा है जिसमें बायां पैर आगे की ओर मुड़ा हुआ और दायां पैर पीछे की ओर सीधा होता है। यह युद्ध के लिए तत्परता और सक्रियता का प्रतीक है।
3. क्या गृहस्थ सात्विक ध्यान कर सकते हैं?
जी हाँ। श्लोक 4 में वर्णित 'सात्विक मूर्ति' का ध्यान गृहस्थों और विद्यार्थियों के लिए अत्यंत निरापद और कल्याणकारी है। इससे ज्ञान और शांति मिलती है।
4. 'हुङ्कारबीजोद्भवा' का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'हुं' (Hum) बीज से उत्पन्न होने वाली। 'हूं' कूर्च बीज है जो क्रोध और प्रचंड शक्ति का प्रतीक है। देवी इसी ध्वनि-कम्पन से प्रकट होती हैं।
5. 'पिङ्गैकाग्रजटां' (पिंगला जटा) का क्या रहस्य है?
देवी की जटाएं (बाल) पिंगल (भूरे/सुनहरे) रंग की हैं और एक ही जटा (एकजटा) के रूप में ऊपर बंधी हैं। यह उनकी एकाग्रता, तप और सूर्य नाड़ी (पिंगला) के नियंत्रण को दर्शाता है।
6. क्या तारा साधना से धन मिलता है?
जी हाँ। श्लोक 5 (राजस मूर्ति) में देवी को 'रक्तसिंहासनस्थां' और 'रक्ताम्बरां' कहा गया है। यह लक्ष्मी स्वरूप है जो साधक को राजसी ऐश्वर्य और धन प्रदान करता है।
7. 'खर्वा' (लंबोदरी/नाटी) रूप का क्या अर्थ है?
देवी को 'खर्वा' (छोटे कद वाली) और 'लम्बोदरी' (बड़े पेट वाली) कहा गया है। इसका अर्थ है कि वे अपने उदर (पेट) में संपूर्ण ब्रह्मांड को समाहित किए हुए हैं।
8. 'अक्षेभ्येण विराजमानशिरसं' का क्या मतलब है?
अक्षोभ्य शिव (जो कभी विचलित नहीं होते) देवी के सिर पर नाग रूप में या ऋषि रूप में स्थित हैं। यह दर्शाता है कि उग्रता के बीच भी देवी का ज्ञान पक्ष (शिव) स्थिर और शांत है।
9. क्या इस पाठ के लिए दीक्षा जरुरी है?
सामान्य ध्यान पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन अगर आप इसे तांत्रिक सिद्धि या बीज मंत्रों के साथ कर रहे हैं, तो गुरु दीक्षा आवश्यक है।
10. 'जाड्यं न्यस्य' का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है 'जड़ता का नाश करना'। देवी अज्ञान, आलस्य और मूर्खता को निकालकर कपाल में रख देती हैं, जिससे साधक बुद्धिमान हो जाता है।