Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Tara Shatanama Stotram (Mundamala Tantra) – ताराशतनामस्तोत्रम्

Sri Tara Shatanama Stotram (Mundamala Tantra) – ताराशतनामस्तोत्रम्
॥ श्रीताराशतनामस्तोत्रम् (मुण्डमाला/स्वर्णमाला तन्त्र) ॥ ॥ श्रीशिव उवाच ॥ ॐ तारिणी तरला तन्वी तारा तरुणवल्लरी । तीव्ररूपा तरी श्यामा तनुक्षीणपयोधरा ॥ १॥ तुरीया तरला तीव्रगमना नीलवाहिनी । उग्रतारा जया चण्डी श्रीमदेकजटाशिराः ॥ २॥ तरुणी शाम्भवी छिन्नभाला च भद्रतारिणी । उग्रा चोग्रप्रभा नीला कृष्णा नीलसरस्वती ॥ ३॥ द्वितीया शोभना नित्या नवीना नित्यनूतना । चण्डिका विजयाराध्या देवी गगनवाहिनी ॥ ४॥ अट्टहास्या करालास्या चरास्या दितिपूजिता । सगुणा सगुणाराध्या हरीन्द्रदेवपूजिता ॥ ५॥ रक्तप्रिया च रक्ताक्षी रुधिरास्यविभूषिता । बलिप्रिया बलिरता दुर्गा बलवती बला ॥ ६॥ बलप्रिया बलरता बलरामप्रपूजिता । अर्धकेशेश्वरी केशा केशवासविभूषिता ॥ ७॥ पद्ममाला च पद्माक्षी कामाख्या गिरिनन्दिनी । दक्षिणा चैव दक्षा च दक्षजा दक्षिणे रता ॥ ८॥ वज्रपुष्पप्रिया रक्तप्रिया कुसुमभूषिता । माहेश्वरी महादेवप्रिया पञ्चविभूषिता ॥ ९॥ इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना प्राणरूपिणी । गान्धारी पञ्चमी पञ्चाननादि परिपूजिता ॥ १०॥ तथ्यविद्या तथ्यरूपा तथ्यमार्गानुसारिणी । तत्त्वप्रिया तत्त्वरूपा तत्त्वज्ञानात्मिकाऽनघा ॥ ११॥ ताण्डवाचारसन्तुष्टा ताण्डवप्रियकारिणी । तालदानरता क्रूरतापिनी तरणिप्रभा ॥ १२॥ त्रपायुक्ता त्रपामुक्ता तर्पिता तृप्तिकारिणी । तारुण्यभावसन्तुष्टा शक्तिर्भक्तानुरागिणी ॥ १३॥ शिवासक्ता शिवरतिः शिवभक्तिपरायणा । ताम्रद्युतिस्ताम्ररागा ताम्रपात्रप्रभोजिनी ॥ १४॥ बलभद्रप्रेमरता बलिभुग्बलिकल्पिनी । रामरूपा रामशक्ती रामरूपानुकारिणी ॥ १५॥ ॥ फलश्रुति ॥ इत्येतत्कथितं देवि रहस्यं परमाद्भुतम् । श्रुत्वा मोक्षमवाप्नोति तारादेव्याः प्रसादतः ॥ १६॥ य इदं पठति स्तोत्रं तारास्तुतिरहस्यकम् । सर्वसिद्धियुतो भूत्वा विहरेत् क्षितिमण्डले ॥ १७॥ तस्यैव मन्त्रसिद्धिः स्यान्ममसिद्धिरनुत्तमा । भवत्येव महामाये सत्यं सत्यं न संशयः ॥ १८॥ मन्दे मङ्गलवारे च यः पठेन्निशि संयतः । तस्यैव मन्त्रसिद्धिस्स्याद्गाणपत्यं लभेत सः ॥ १९॥ श्रद्धयाऽश्रद्धया वापि पठेत्तारारहस्यकम् । सोऽचिरेणैव कालेन जीवन्मुक्तः शिवो भवेत् ॥ २०॥ सहस्रावर्तनाद्देवि पुरश्चर्याफलं लभेत् । एवं सततयुक्ता ये ध्यायन्तस्त्वामुपासते । ते कृतार्था महेशानि मृत्युसंसारवर्त्मनः ॥ २१॥ ॥ इति स्वर्णमालातन्त्रे (तथा मुण्डमालातन्त्रे हरपार्वतीसंवादे त्रयोदशपटलान्तर्गतं) ताराशतनामस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

ताराशतनामस्तोत्रम्: तांत्रिक परिचय एवं पृष्ठभूमि (Introduction & Tantric Background)

श्रीताराशतनामस्तोत्रम् तंत्र साहित्य के दो अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रामाणिक ग्रंथों — 'मुण्डमाला तन्त्र' (13वां पटल) और 'स्वर्णमाला तन्त्र' — में समान रूप से प्राप्त होता है। यह भगवान शिव और माता पार्वती के बीच का एक परम गोपनीय संवाद है। 'तारा' दशमहाविद्याओं में दूसरी शक्ति हैं, जो 'तारने' (भवसागर से पार लगाने) और 'तीव्र गति' से फल देने के लिए जानी जाती हैं। भगवान शिव इस स्तोत्र को "रहस्यं परमाद्भुतम्" (परम अद्भुत रहस्य) कहते हैं, जिसका श्रवण मात्र ही मोक्ष प्रदान करने वाला है।

'त' (तकार) की प्रधानता: इस स्तोत्र के अधिकांश नाम 'त' वर्ण से शुरू होते हैं या 'त' ध्वनि की प्रधानता रखते हैं (जैसे तारिणी, तरला, तन्वी, तारा, तुरीया, तीव्ररूपा)। तंत्र में 'त' वर्ण को 'तारक बीज' माना गया है। यह ध्वनि अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है। यह स्तोत्र साधक को स्थूल जगत से तुरीय अवस्था (समाधि) की ओर ले जाता है।

उग्र और सौम्य का संगम: इस शतनाम में देवी के 'उग्रतारा', 'करालास्या', 'रक्तप्रिया' जैसे भयंकर रूप भी हैं और 'सुन्दरी', 'शोभना', 'नित्या' जैसे सौम्य रूप भी। यह दर्शाता है कि तारा ही विध्वंस और सृजन दोनों की शक्ति हैं।

स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक और यौगिक महत्व (Spiritual Significance)

यह स्तोत्र केवल नामों की सूची नहीं है, बल्कि इसमें योग और तत्वज्ञान के गहरे रहस्य छिपे हैं:

  • नाड़ी विज्ञान: श्लोक 10 में स्पष्ट रूप से 'इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना प्राणरूपिणी' कहा गया है। तारा ही हमारे शरीर में प्राण शक्ति बनकर इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों में प्रवाहित होती हैं। यह कुण्डलिनी योग का आधार है।
  • तत्व ज्ञान: श्लोक 11 में देवी को 'तत्त्वप्रिया', 'तत्त्वरूपा' और 'तत्त्वज्ञानात्मिका' कहा गया है। वे केवल मूर्ति नहीं, बल्कि पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और उससे भी परे आत्म-तत्व का ज्ञान हैं।
  • राम और तारा का अभेद: श्लोक 15 में एक अद्भुत रहस्य है — 'रामरूपा रामशक्ती रामरूपानुकारिणी'। यह सिद्ध करता है कि भगवान राम और माता तारा एक ही हैं। तारा ही राम की शक्ति (सीता) हैं और राम ही तारा के पुरुष रूप हैं। यह वैष्णव और शाक्त मत का एकीकरण है।
  • नील सरस्वती: श्लोक 3 में देवी को 'नीलसरस्वती' कहा गया है। यह उनका ज्ञान-प्रदायक रूप है। जो साधक विद्या और वाक-सिद्धि चाहता है, उसके लिए यह नाम कल्पवृक्ष है।

फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)

भगवान शिव ने स्वयं इस स्तोत्र के पाठ के अमोघ फलों का वर्णन किया है:

  • मन्त्रसिद्धि: श्लोक 18-19 में कहा गया है — "तस्यैव मन्त्रसिद्धिः स्यात्"। जो साधक इसका पाठ करता है, उसका कोई भी रुका हुआ मन्त्र सिद्ध हो जाता है। यह स्तोत्र मन्त्रों को 'उत्कीलित' (जाग्रत) करता है।
  • गाणपत्य और सर्वसिद्धि: "गाणपत्यं लभेत सः" (श्लोक 19) — साधक को गणों का अधिपति (नेता) बनने का सौभाग्य मिलता है। वह पृथ्वी पर 'सर्वसिद्धियुतो' (सभी सिद्धियों से युक्त) होकर विचरण करता है।
  • जीवन्मुक्ति: श्लोक 20 के अनुसार, चाहे श्रद्धा से पढ़ें या बिना श्रद्धा के (श्रद्धयाऽश्रद्धया वापि), साधक शीघ्र ही 'जीवन्मुक्त' (जीते जी मोक्ष प्राप्त) हो जाता है और शिव स्वरूप बन जाता है।
  • पुरश्चरण का फल: श्लोक 21 में कहा गया है कि इस स्तोत्र का 1000 बार पाठ (सहस्रावर्तनाद्) करने से एक पूर्ण 'पुरश्चरण' का फल मिलता है, जो महान तपस्या के बराबर है।
  • शत्रु नाश और विजय: 'उग्रतारा', 'जया', 'विजयाराध्या' जैसे नामों के प्रभाव से साधक के सभी शत्रु परास्त होते हैं और उसे सर्वत्र विजय मिलती है।

पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)

यह एक सिद्ध तांत्रिक स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ विधि-विधान से करना चाहिए।

दैनिक पाठ विधि: स्नानादि से निवृत्त होकर नीले या काले वस्त्र धारण करें। उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। माँ तारा के चित्र या यंत्र के सामने घी या तेल का दीपक जलाएं। सबसे पहले 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्' (तारा बीज मंत्र) का 108 बार जप करें, फिर इस शतनाम का पाठ करें।

विशेष मुहूर्त (Siddha Muhurat): श्लोक 19 में स्पष्ट निर्देश है — "मन्दे मङ्गलवारे च यः पठेन्निशि संयतः"। अर्थात, शनिवार (मंद) और मंगलवार की रात्रि (निशीथ काल) में संयमित होकर इसका पाठ करने से मन्त्रसिद्धि निश्चित होती है। इसके अलावा नवरात्रि और ग्रहण काल भी श्रेष्ठ हैं।

अर्चन विधि: विशेष कामना पूर्ति के लिए प्रत्येक नाम के साथ 'ॐ' और 'नमः' लगाकर (जैसे- ॐ तारिण्यै नमः) देवी को नीले कमल (Indivara), जवा कुसुम (गुड़हल) या अक्षत अर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तोत्र किस तंत्र ग्रंथ से लिया गया है?
यह स्तोत्र 'स्वर्णमाला तन्त्र' और 'मुण्डमाला तन्त्र' (13वें पटल) दोनों में पाया जाता है। यह अत्यंत प्रामाणिक और प्राचीन है।
2. 'एकजटा' का क्या अर्थ है?
एकजटा माँ तारा का ही एक उग्र स्वरूप है। इनकी जटाएं (बाल) बिखरी नहीं होतीं, बल्कि एक ही जटा के रूप में ऊपर बंधी होती हैं, जो एकाग्रता और प्रलयंकारी शक्ति का प्रतीक है।
3. क्या गृहस्थ इसका पाठ कर सकते हैं?
हाँ। श्लोक 20 में 'श्रद्धयाऽश्रद्धया वापि' (श्रद्धा हो या न हो) पाठ करने की बात कही गई है, जो इसकी सरलता और गृहस्थों के लिए सुलभता को दर्शाता है।
4. 'छिन्नभाला' (श्लोक 3) का क्या मतलब है?
इसका अर्थ है 'मस्तक कटी हुई'। यह छिन्नमस्ता देवी का संकेत है। तारा और छिन्नमस्ता दोनों उग्र महाविद्याएं हैं और कई बार एक ही मानी जाती हैं।
5. 'ताम्रद्युति' और 'ताम्रपात्रप्रभोजिनी' का क्या रहस्य है?
ताम्र (तांबा) सूर्य और मंगल का धातु है। देवी का रंग तांबे जैसा चमकता है और वे तांबे के पात्र में भोजन (भोग) ग्रहण करना पसंद करती हैं। यह उनकी उष्ण (गर्म) प्रकृति को दर्शाता है।
6. क्या इस पाठ के लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?
स्तोत्र पाठ के लिए अनिवार्य नहीं है, लेकिन मन्त्रसिद्धि और तांत्रिक प्रयोगों के लिए गुरु दीक्षा और मार्गदर्शन आवश्यक है।
7. 'बलिप्रिया' का आधुनिक संदर्भ में क्या अर्थ है?
शाब्दिक अर्थ पशु बलि है, लेकिन सात्विक साधकों के लिए इसका अर्थ अपने 'पशुत्व' (काम, क्रोध, लोभ) की बलि देना है। देवी अहंकार की बलि से सबसे अधिक प्रसन्न होती हैं।
8. 'पंचमी' नाम क्यों है?
पंचमी का अर्थ है पांचवीं शक्ति या पांच मकारों की अधिष्ठात्री। साथ ही, शुक्ल और कृष्ण पक्ष की पंचमी तिथि देवी को प्रिय है।
9. क्या इस पाठ से वाक-सिद्धि मिलती है?
जी हाँ। तारा 'नील सरस्वती' हैं। इस स्तोत्र के पाठ से वाणी में तेज आता है और साधक जो बोलता है, वह सत्य होने लगता है।
10. 'जीवन्मुक्त' का क्या अर्थ है?
जीवन्मुक्त वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति शरीर में रहते हुए भी मोह-माया और कर्म-बंधनों से मुक्त हो जाता है। उसे सुख-दुख प्रभावित नहीं करते।