Sri Tara Shatanama Stotram (Mundamala Tantra) – ताराशतनामस्तोत्रम्

ताराशतनामस्तोत्रम्: तांत्रिक परिचय एवं पृष्ठभूमि (Introduction & Tantric Background)
श्रीताराशतनामस्तोत्रम् तंत्र साहित्य के दो अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रामाणिक ग्रंथों — 'मुण्डमाला तन्त्र' (13वां पटल) और 'स्वर्णमाला तन्त्र' — में समान रूप से प्राप्त होता है। यह भगवान शिव और माता पार्वती के बीच का एक परम गोपनीय संवाद है। 'तारा' दशमहाविद्याओं में दूसरी शक्ति हैं, जो 'तारने' (भवसागर से पार लगाने) और 'तीव्र गति' से फल देने के लिए जानी जाती हैं। भगवान शिव इस स्तोत्र को "रहस्यं परमाद्भुतम्" (परम अद्भुत रहस्य) कहते हैं, जिसका श्रवण मात्र ही मोक्ष प्रदान करने वाला है।
'त' (तकार) की प्रधानता: इस स्तोत्र के अधिकांश नाम 'त' वर्ण से शुरू होते हैं या 'त' ध्वनि की प्रधानता रखते हैं (जैसे तारिणी, तरला, तन्वी, तारा, तुरीया, तीव्ररूपा)। तंत्र में 'त' वर्ण को 'तारक बीज' माना गया है। यह ध्वनि अज्ञान के अंधकार को चीरकर ज्ञान का प्रकाश फैलाती है। यह स्तोत्र साधक को स्थूल जगत से तुरीय अवस्था (समाधि) की ओर ले जाता है।
उग्र और सौम्य का संगम: इस शतनाम में देवी के 'उग्रतारा', 'करालास्या', 'रक्तप्रिया' जैसे भयंकर रूप भी हैं और 'सुन्दरी', 'शोभना', 'नित्या' जैसे सौम्य रूप भी। यह दर्शाता है कि तारा ही विध्वंस और सृजन दोनों की शक्ति हैं।
स्तोत्र का विशिष्ट आध्यात्मिक और यौगिक महत्व (Spiritual Significance)
यह स्तोत्र केवल नामों की सूची नहीं है, बल्कि इसमें योग और तत्वज्ञान के गहरे रहस्य छिपे हैं:
- नाड़ी विज्ञान: श्लोक 10 में स्पष्ट रूप से 'इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना प्राणरूपिणी' कहा गया है। तारा ही हमारे शरीर में प्राण शक्ति बनकर इडा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियों में प्रवाहित होती हैं। यह कुण्डलिनी योग का आधार है।
- तत्व ज्ञान: श्लोक 11 में देवी को 'तत्त्वप्रिया', 'तत्त्वरूपा' और 'तत्त्वज्ञानात्मिका' कहा गया है। वे केवल मूर्ति नहीं, बल्कि पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) और उससे भी परे आत्म-तत्व का ज्ञान हैं।
- राम और तारा का अभेद: श्लोक 15 में एक अद्भुत रहस्य है — 'रामरूपा रामशक्ती रामरूपानुकारिणी'। यह सिद्ध करता है कि भगवान राम और माता तारा एक ही हैं। तारा ही राम की शक्ति (सीता) हैं और राम ही तारा के पुरुष रूप हैं। यह वैष्णव और शाक्त मत का एकीकरण है।
- नील सरस्वती: श्लोक 3 में देवी को 'नीलसरस्वती' कहा गया है। यह उनका ज्ञान-प्रदायक रूप है। जो साधक विद्या और वाक-सिद्धि चाहता है, उसके लिए यह नाम कल्पवृक्ष है।
फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले सिद्ध लाभ (Benefits of Recitation)
भगवान शिव ने स्वयं इस स्तोत्र के पाठ के अमोघ फलों का वर्णन किया है:
- मन्त्रसिद्धि: श्लोक 18-19 में कहा गया है — "तस्यैव मन्त्रसिद्धिः स्यात्"। जो साधक इसका पाठ करता है, उसका कोई भी रुका हुआ मन्त्र सिद्ध हो जाता है। यह स्तोत्र मन्त्रों को 'उत्कीलित' (जाग्रत) करता है।
- गाणपत्य और सर्वसिद्धि: "गाणपत्यं लभेत सः" (श्लोक 19) — साधक को गणों का अधिपति (नेता) बनने का सौभाग्य मिलता है। वह पृथ्वी पर 'सर्वसिद्धियुतो' (सभी सिद्धियों से युक्त) होकर विचरण करता है।
- जीवन्मुक्ति: श्लोक 20 के अनुसार, चाहे श्रद्धा से पढ़ें या बिना श्रद्धा के (श्रद्धयाऽश्रद्धया वापि), साधक शीघ्र ही 'जीवन्मुक्त' (जीते जी मोक्ष प्राप्त) हो जाता है और शिव स्वरूप बन जाता है।
- पुरश्चरण का फल: श्लोक 21 में कहा गया है कि इस स्तोत्र का 1000 बार पाठ (सहस्रावर्तनाद्) करने से एक पूर्ण 'पुरश्चरण' का फल मिलता है, जो महान तपस्या के बराबर है।
- शत्रु नाश और विजय: 'उग्रतारा', 'जया', 'विजयाराध्या' जैसे नामों के प्रभाव से साधक के सभी शत्रु परास्त होते हैं और उसे सर्वत्र विजय मिलती है।
पाठ विधि एवं अनुष्ठान के नियम (Ritual Method & Guidelines)
यह एक सिद्ध तांत्रिक स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ विधि-विधान से करना चाहिए।
दैनिक पाठ विधि: स्नानादि से निवृत्त होकर नीले या काले वस्त्र धारण करें। उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। माँ तारा के चित्र या यंत्र के सामने घी या तेल का दीपक जलाएं। सबसे पहले 'ॐ ह्रीं स्त्रीं हूं फट्' (तारा बीज मंत्र) का 108 बार जप करें, फिर इस शतनाम का पाठ करें।
विशेष मुहूर्त (Siddha Muhurat): श्लोक 19 में स्पष्ट निर्देश है — "मन्दे मङ्गलवारे च यः पठेन्निशि संयतः"। अर्थात, शनिवार (मंद) और मंगलवार की रात्रि (निशीथ काल) में संयमित होकर इसका पाठ करने से मन्त्रसिद्धि निश्चित होती है। इसके अलावा नवरात्रि और ग्रहण काल भी श्रेष्ठ हैं।
अर्चन विधि: विशेष कामना पूर्ति के लिए प्रत्येक नाम के साथ 'ॐ' और 'नमः' लगाकर (जैसे- ॐ तारिण्यै नमः) देवी को नीले कमल (Indivara), जवा कुसुम (गुड़हल) या अक्षत अर्पित करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)