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Sri Surya Chandrakala Stotram – श्री सूर्यचन्द्रकला स्तोत्रम्

Sri Surya Chandrakala Stotram – श्री सूर्यचन्द्रकला स्तोत्रम्
॥ श्री सूर्यचन्द्रकला स्तोत्रम् ॥ दिवानाथ निशानाथौ तौ च्छायारोहिणिप्रियौ । कश्यपाऽत्रिसमुद्भूतौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ १ ॥ ग्रहराजौ पुष्पवन्तौ सिंहकर्कटकाधिपौ । अत्युष्णानुष्णकिरणौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ २ ॥ एकचक्रत्रिचक्राढ्यरथौ लोकैकसाक्षिणौ । लसत्पद्मगदाहस्तौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ ३ ॥ द्वादशात्मा सुधात्मानौ दिवाकरनिशाकरौ । सप्तमी दशमी जातौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ ४ ॥ अदित्याख्यानसूयाख्य देवीगर्भसमुद्भवौ । आरोग्याह्लादकर्तारौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ ५ ॥ महात्मानौ चक्रवाकचकोरप्रीतिकारकौ । सहस्रषोडशकलौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ ६ ॥ कलिङ्गयमुनाधीशौ कमलोत्पलबान्धवौ । माणिक्यमुक्तासुप्रीतौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ ७ ॥ शनितारेयजनकौ वार्धिशोषकतोषकौ । वृष्टिसस्याकरकरौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ ८ ॥ विष्णुनेत्रात्मकौ रुद्ररथचक्रात्मकावुभौ । रामकृष्णान्वयकरौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ ९ ॥ हरिसप्ताश्वधवलौ दशाश्वौ पापहारिणौ । सिद्धान्तव्याकृतिकरौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ १० ॥ सुवर्तुलचतुष्कोणमण्डलाढ्यौ तमोपहौ । गोधूमतण्डुलप्रीतौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ ११ ॥ लोकेशावातपज्ज्योत्स्नाशालिनौ राहुसूचकौ । मन्देहदेवजेतारौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ १२ ॥ अरुणाख्यसुबन्ध्वाख्यसारथी व्योमचारिणौ । महाध्वरप्रकर्तारौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ १३ ॥ अर्कपालाशसुप्रीतौ प्रभाकरसुधाकरौ । यमुनानर्मदातारौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ १४ ॥ पाषाणज्वालविद्रावकारिणौ कालसूचकौ । विशाखाकृत्तिकाजातौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ १५ ॥ उपेन्द्रलक्ष्मीसहजौ ग्रहनक्षत्रनायकौ । क्षत्रद्विजमहाराजौ सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम ॥ १६ ॥ श्रीचामुण्डाकृपापात्र श्रीकृष्णेन्द्रविनिर्मितम् । विलसत्पुष्पवत् स्तोत्र कलाश्लोकविराजितम् ॥ १७ ॥ ॥ फलश्रुति (Benefits) ॥ इदं पापहरं स्तोत्रं सदा भक्त्या पठन्ति ये । ते लभन्ते पुत्रपौत्राद्यायुरारोग्यसम्पदः ॥ १८ ॥ ॥ इति श्री सूर्यचन्द्रकला स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का महत्व (Significance)

श्री सूर्यचन्द्रकला स्तोत्रम् नवग्रहों में प्रधान सूर्य और मन के कारक चन्द्रमा को एक साथ प्रसन्न करने का साधन है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को 'आत्मा' और चन्द्रमा को 'मन' कहा गया है। जब ये दोनों अनुकूल होते हैं, तो व्यक्ति को मानसिक शांति और शारीरिक तेज दोनों प्राप्त होते हैं।

श्लोक 17 में उल्लिखित है कि यह स्तोत्र "श्रीचामुण्डाकृपापात्र श्रीकृष्णेन्द्रविनिर्मितम्" है, अर्थात चामुण्डा देवी के भक्त श्री कृष्णेन्द्र द्वारा रचित है।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • संतान सुख (Progeny): "पुत्रपौत्राद्य" - इस स्तोत्र के पाठ से पुत्र और पौत्र का सुख प्राप्त होता है।

  • दीर्घायु और आरोग्य (Longevity & Health): सूर्य और चन्द्रमा दोनों के आशीर्वाद से व्यक्ति को लंबी आयु और उत्तम स्वास्थ्य ("आयुरारोग्य") मिलता है।

  • धन-संपदा (Wealth): यह स्तोत्र घर में सुख-समृद्धि और संपदा ("सम्पदः") लाता है।

  • पाप नाश (Removal of Sins): इसे "पापहरं स्तोत्रं" कहा गया है, अर्थात इसके भक्तिपूर्वक पाठ से पापों का नाश करता है।

पाठ करने की विधि (Method of Chanting)

  • शुभ दिन: रविवार (सूर्य) और सोमवार (चन्द्र) को इसका पाठ विशेष फलदायी है।

  • विशेष तिथियां: अमावस्या और पूर्णिमा को किया गया पाठ अनंत गुना फल देता है।

  • समय: प्रातःकाल स्नान के बाद, सूर्योदय के समय पूर्वाभिमुख होकर पाठ करें।

  • संकल्प: जल, अक्षत और पुष्प लेकर आरोग्य और मनोकामना पूर्ति का संकल्प लें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. सूर्यचन्द्रकला स्तोत्र की रचना किसने की?

इस स्तोत्र की रचना श्री कृष्णेन्द्र ने की है। श्लोक 17 में वे स्वयं को "श्रीचामुण्डाकृपापात्र" (माँ चामुण्डा की कृपा का पात्र) बताते हैं।

2. इस स्तोत्र की क्या विशेषता है?

सामान्यतः हम सूर्य या चन्द्रमा की अलग-अलग स्तुति करते हैं। यह एक दुर्लभ स्तोत्र है जहाँ "सूर्यचन्द्रौ गतिर्मम" (सूर्य और चन्द्र मेरी गति/आश्रय हैं) कहकर दोनों की युगल रूप में उपासना की गई है।

3. इसका पाठ कब करना चाहिए?

इसका पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल स्नान के बाद किया जा सकता है। विशेष रूप से अमावस्या (जब सूर्य-चन्द्र साथ होते हैं) या पूर्णिमा के दिन इसका पाठ श्रेष्ठ है।

4. क्या यह स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है?

हाँ, सूर्य आरोग्य के देवता हैं और चन्द्रमा औषधियों के। इस स्तोत्र में उन्हें "आरोग्याह्लादकर्तारौ" (आरोग्य और आनंद देने वाले) कहा गया है।

5. 'पुष्पवन्तौ' शब्द का क्या अर्थ है?

श्लोक 2 में सूर्य और चन्द्रमा को 'पुष्पवन्तौ' कहा गया है। यह ज्योतिष में सूर्य और चन्द्रमा के युगल रूप के लिए प्रयोग किया जाने वाला विशेष शब्द है।