श्री सूर्याष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् – Sri Surya Ashtottara Shatanama Stotram | 108 Names of Sun God

॥ श्री सूर्याष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥
॥ प्रथम मंगलाचरण ॥
सूर्योऽर्यमा भगस्त्वष्टा पूषार्कः सविता रविः ।
गभस्तिमानजः कालो मृत्युर्धाता प्रभाकरः ॥ १ ॥
पृथिव्यापश्च तेजश्च खं वायुश्च परायणः ।
सोमो बृहस्पतिः शुक्रो बुधोऽङ्गारक एव च ॥ २ ॥
॥ नवग्रह और लोकपाल रूप ॥
इन्द्रो विवस्वान् दीप्तांशुः शुचिः शौरिः शनैश्चरः ।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च स्कन्दो वैश्रवणो यमः ॥ ३ ॥
वैद्युतो जाठरश्चाग्निरैन्धनस्तेजसां पतिः ।
धर्मध्वजो वेदकर्ता वेदाङ्गो वेदवाहनः ॥ ४ ॥
॥ काल (समय) रूप ॥
कृतं त्रेता द्वापरश्च कलिः सर्वामराश्रयः ।
कला काष्ठा मुहूर्ताश्च पक्षा मासा ऋतुस्तथा ॥ ५ ॥
संवत्सरकरोऽश्वत्थः कालचक्रो विभावसुः ।
पुरुषः शाश्वतो योगी व्यक्ताव्यक्तः सनातनः ॥ ६ ॥
॥ सृष्टि के रक्षक ॥
लोकाध्यक्षः प्रजाध्यक्षो विश्वकर्मा तमोनुदः ।
वरुणः सागरोऽम्शुश्च जीमूतो जीवनोऽरिहा ॥ ७ ॥
भूताश्रयो भूतपतिः सर्वभूतनिषेवितः ।
मणिः सुवर्णो भूतादिः कामदः सर्वतोमुखः ॥ ८ ॥
जयो विशालो वरदः शीघ्रगः प्राणधारणः ।
धन्वन्तरिर्धूमकेतुरादिदेवोऽदितेः सुतः ॥ ९ ॥
॥ द्वादश आत्मा ॥
द्वादशात्मारविन्दाक्षः पिता माता पितामहः ।
स्वर्गद्वारं प्रजाद्वारं मोक्षद्वारं त्रिविष्टपम् ॥ १० ॥
देहकर्ता प्रशान्तात्मा विश्वात्मा विश्वतोमुखः ।
चराचरात्मा सूक्ष्मात्मा मैत्रेण वपुषान्वितः ॥ ११ ॥
॥ माहात्म्य (Significance) ॥
एतद्वै कीर्तनीयस्य सूर्यस्यैव महात्मनः ।
नाम्नामष्टोत्तरशतं प्रोक्तं शक्रेण धीमता ॥ १२ ॥
शक्राच्च नारदः प्राप्तो धौम्यश्च तदनन्तरम् ।
धौम्याद्युधिष्ठिरः प्राप्य सर्वान् कामानवाप्तवान् ॥ १३ ॥
॥ ध्यान ॥
सुरपितृगणयक्षसेवितं
ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम् ।
वरकनकहुताशनप्रभं
त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम् ॥ १४ ॥
॥ फलश्रुति (Benefits) ॥
सूर्योदये यस्तु समाहितः पठेत्
स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान् ।
लभेत जातिस्मरतां सदा नरः
स्मृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान् ॥ १५ ॥
इमं स्तवं देववरस्य यो नरः
प्रकीर्तयेच्छुद्धमनाः समाहितः ।
स मुच्यते शोकदवाग्निसागरा-
-ल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान् ॥ १६ ॥
॥ इति श्रीमन्महाभारते आरण्यकपर्वणि तृतीयोऽध्याये श्री सूर्याष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् संपूर्णम् ॥
अन्य सूर्य स्तोत्र
स्तोत्र का पौराणिक संदर्भ (Legend & Context)
महाभारत के वन पर्व में जब युधिष्ठिर चितित थे, तब ऋषि धौम्य ने उन्हें बताया कि पूर्वकाल में देवराज इंद्र ने नारद जी से, और नारद जी ने मुझे (धौम्य को) इन 108 नामों का ज्ञान दिया था। धौम्य ने कहा:
"हे राजन! जो ये 108 नाम सूर्य देव के हैं, उनका कीर्तन करने से मनुष्य शोक के सागर (Ocean of Grief) से पार उतर जाता है और मनचाही वस्तु प्राप्त करता है।"
युधिष्ठिर ने इन्हीं नामों के जप से सूर्य देव को प्रसन्न किया, जिसके फलस्वरूप उन्हें अक्षय पात्र मिला और पांडवों का वनवास सुरक्षित बीता।
प्रमुख नामों का गूढ़ अर्थ (Deep Meaning of Sacred Names)
| संस्कृत नाम | अर्थ और महत्व |
|---|---|
| शौरिः / शनैश्चरः | ये नाम बताते हैं कि शनि भी सूर्य का ही अंश हैं। सूर्य की उपासना से शनि देव स्वतः शांत हो जाते हैं। |
| धन्वन्तरि | सूर्य आरोग्य के देवता हैं। वे ही आयुर्वेद के जनक धन्वन्तरि भी हैं, जो रोगों का नाश करते हैं। |
| कालचक्रः | समय का पहिया (Wheel of Time)। समय अच्छा हो या बुरा, सब सूर्य की गति पर निर्भर है। उनकी कृपा से बुरा समय (Bad Time) टल जाता है। |
| प्राणधारणः | प्राणों को धारण करने वाले। सूर्य ही ऑक्सीजन (प्राण वायु) और जीवन ऊर्जा के मूल स्रोत हैं। |
| स्वर्गद्वारं / मोक्षद्वारं | सूर्य लोक (Solar Realm) को स्वर्ग और मोक्ष का द्वार माना गया है। मृत्यु के बाद जीवात्मा सूर्य मार्ग (देवयान) से ही मुक्त होती है। |
पाठ के लाभ (Phalashruti Benefits)
स्वयं देवराज इंद्र ने इन नामों के पाठ के चार मुख्य लाभ बताए हैं:
1. पुत्र लाभ (Progeny):"स पुत्रलाभं..." - निःसंतान दंपत्ति यदि सूर्योदय के समय इसका पाठ करें, तो उन्हें तेजस्वी संतान की प्राप्ति होती है।
2. अपार धन (Wealth):"धनरत्नसञ्चयान्" - पाठक को धन और रत्नों के संचय (Savings) का वरदान मिलता है।
3. स्मरण शक्ति (Memory):"स्मृतिं च मेधां च" - यह पाठ बुद्धि (Intellect) और याददाश्त (Memory) को तीव्र करता है, जो छात्रों के लिए अनिवार्य है।
4. जातिस्मरता (Past Lives):सबसे दुर्लभ वरदान - साधक को अपने पूर्व जन्मों (Jatismara) का ज्ञान हो जाता है, जिससे उसका आध्यात्मिक जीवन उन्नति करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. इन 108 नामों का मूल स्रोत (Origin) क्या है?
ये 108 नाम 'महाभारत' के 'वन पर्व' (अध्याय 3) से लिए गए हैं। ऋषि धौम्य ने युधिष्ठिर को यह ज्ञान दिया था ताकि वे वनवास में अपने परिवार का भरण-पोषण कर सकें और सुरक्षित रह सकें।
2. क्या यह सूर्य सहस्रनाम (1000 names) से अलग है?
जी हाँ। सहस्रनाम में 1000 नाम होते हैं, जबकि यह 'अष्टोत्तरशतनाम' (100+8 = 108) स्तोत्र है। नित्य (Daily) पाठ के लिए यह संक्षिप्त, सरल और अत्यंत प्रभावशाली है।
3. इसका पाठ किस समय करना चाहिए?
श्लोक 15 में स्पष्ट निर्देश है: 'सूर्योदये यस्तु समाहितः पठेत्' (जो सूर्योदय के समय एकाग्रचित्त होकर पढ़ता है)। अतः प्रातः काल, जब सूर्य उग रहे हों, वही समय सर्वश्रेष्ठ है।
4. 'जातिस्मर' (Jatismara) बनने का क्या अर्थ है?
फलश्रुति के अनुसार, इसका साधक 'जातिस्मर' हो जाता है, अर्थात उसे अपने पूर्व जन्मों (Past Lives) का ज्ञान हो जाता है। यह सिद्ध करता है कि यह स्तोत्र चित्त की गहराइयों (Deep Subconscious) को शुद्ध कर देता है।
5. क्या यह संतान प्राप्ति (Progeny) में सहायक है?
बिल्कुल। फलश्रुति कहती है: 'स पुत्रलाभं धनरत्नसञ्चयान्'। भारत में हजारों निःसंतान दंपत्तियों द्वारा सूर्य उपासना और इस स्तोत्र के पाठ से संतान सुख पाने की परंपरा रही है।
6. विद्यार्थियों के लिए इसका क्या लाभ है?
यह स्तोत्र 'स्मृतिं च मेधां च' (स्मरण शक्ति और बुद्धि) प्रदान करता है। जो छात्र पढ़ाई में कमजोर हैं, ध्यान नहीं लगा पाते, या पढ़ा हुआ भूल जाते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र रामबाण है।
7. किसे इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिए?
जो व्यक्ति जीवन में खोया हुआ (Lost) महसूस कर रहा हो, अवसाद (Depression) में हो, या जिसे अपनी दिशा (Direction) न मिल रही हो, उसे सूर्य के इन नामों का आश्रय लेना चाहिए।
8. 'धन्वन्तरि' नाम का क्या महत्व है?
इसमें सूर्य को 'धन्वन्तरि' (देवताओं के वैद्य) कहा गया है। यह सिद्ध करता है कि सूर्य उपासना केवल पूजा नहीं, बल्कि एक चिकित्सा (Healing process) है जिससे असाध्य रोग भी ठीक हो सकते हैं।
9. अष्टोत्तर शतनाम (108) का क्या महत्व है?
108 का अंक ब्रह्मांड की पूर्णता का प्रतीक है (1=ईश्वर, 0=शून्य/जगत, 8=अनंत)। 108 नामों का जाप करने से साधक ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Cosmic Energy) से लयबद्ध (Align) हो जाता है।
10. पाठ के बाद क्या करना चाहिए?
पाठ के अंत में सूर्य देव को जल (अर्घ्य) देना चाहिए और कम से कम 2 मिनट मौन रहकर सूर्य के प्रकाश और ऊर्जा को अपने हृदय और मस्तिष्क में उतरते हुए महसूस करना चाहिए।