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Sri Chandra Ashtottara Satanama Stotram – श्री चन्द्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Chandra Ashtottara Satanama Stotram – श्री चन्द्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री चन्द्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ श्रीमान् शशधरश्चन्द्रो ताराधीशो निशाकरः । सुधानिधिः सदाराध्यः सत्पतिः साधुपूजितः ॥ १ ॥ जितेन्द्रियो जगद्योनिः ज्योतिश्चक्रप्रवर्तकः । विकर्तनानुजो वीरो विश्वेशो विदुषां पतिः ॥ २ ॥ दोषाकरो दुष्टदूरः पुष्टिमान् शिष्टपालकः । अष्टमूर्तिप्रियोऽनन्तकष्टदारुकुठारकः ॥ ३ ॥ स्वप्रकाशः प्रकाशात्मा द्युचरो देवभोजनः । कलाधरः कालहेतुः कामकृत्कामदायकः ॥ ४ ॥ मृत्युसंहारकोऽमर्त्यो नित्यानुष्ठानदायकः । क्षपाकरः क्षीणपापः क्षयवृद्धिसमन्वितः ॥ ५ ॥ जैवातृकः शुची शुभ्रो जयी जयफलप्रदः । सुधामयः सुरस्वामी भक्तनामिष्टदायकः ॥ ६ ॥ भुक्तिदो मुक्तिदो भद्रो भक्तदारिद्र्यभञ्जकः । सामगानप्रियः सर्वरक्षकः सागरोद्भवः ॥ ७ ॥ भयान्तकृद्भक्तिगम्यो भवबन्धविमोचकः । जगत्प्रकाशकिरणो जगदानन्दकारणः ॥ ८ ॥ निस्सपत्नो निराहारो निर्विकारो निरामयः । भूच्छायाऽऽच्छादितो भव्यो भुवनप्रतिपालकः ॥ ९ ॥ सकलार्तिहरः सौम्यजनकः साधुवन्दितः । सर्वागमज्ञः सर्वज्ञो सनकादिमुनिस्तुतः ॥ १० ॥ सितच्छत्रध्वजोपेतः सिताङ्गो सितभूषणः । श्वेतमाल्याम्बरधरः श्वेतगन्धानुलेपनः ॥ ११ ॥ दशाश्वरथसंरूढो दण्डपाणिः धनुर्धरः । कुन्दपुष्पोज्ज्वलाकारो नयनाब्जसमुद्भवः ॥ १२ ॥ आत्रेयगोत्रजोऽत्यन्तविनयः प्रियदायकः । करुणारससम्पूर्णः कर्कटप्रभुरव्ययः ॥ १३ ॥ चतुरश्रासनारूढश्चतुरो दिव्यवाहनः । विवस्वन्मण्डलाग्नेयवासो वसुसमृद्धिदः ॥ १४ ॥ महेश्वरप्रियो दान्तः मेरुगोत्रप्रदक्षिणः । ग्रहमण्डलमध्यस्थो ग्रसितार्को ग्रहाधिपः ॥ १५ ॥ द्विजराजो द्युतिलको द्विभुजो द्विजपूजितः । औदुम्बरनगावास उदारो रोहिणीपतिः ॥ १६ ॥ नित्योदयो मुनिस्तुत्यो नित्यानन्दफलप्रदः । सकलाह्लादनकरः पलाशसमिधप्रियः ॥ १७ ॥ एवं नक्षत्रनाथस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ ॥ इति श्री चन्द्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री चन्द्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Chandra Ashtottara Satanama Stotram) चंद्र देव के 108 दिव्य नामों का एक विस्तृत और पवित्र संग्रह है। इस स्तोत्र में चंद्रमा को 'नक्षत्रनाथ' (तारों के स्वामी) कहा गया है, जो उनकी ज्योतिष्य महत्ता को दर्शाता है।



वैदिक ज्योतिष में चंद्रमा को मन, माता, जल और भावनाओं का कारक माना गया है। इस स्तोत्र में वर्णित नाम जैसे 'सकलार्तिहरः' (सभी दुखों को हरने वाले), 'भक्तदारिद्र्यभञ्जकः' (भक्तों की दरिद्रता को भंजन करने वाले), और 'भवबन्धविमोचकः' (संसार के बंधनों से मुक्त करने वाले) इसकी अपार शक्ति को प्रदर्शित करते हैं।

स्तोत्र के प्रमुख लाभ (Benefits)

इस 108 नामों के स्तोत्र में चंद्रमा के विभिन्न गुणों का वर्णन है जो साधक को प्राप्त होते हैं:

  • दरिद्रता निवारण: "भक्तदारिद्र्यभञ्जकः" - चंद्रमा अपने भक्तों की दरिद्रता को नष्ट करते हैं और समृद्धि प्रदान करते हैं।

  • मोक्ष और भुक्ति प्रदाता: "भुक्तिदो मुक्तिदो भद्रो" - वे जीवन में भोग (भुक्ति) और अंत में मोक्ष दोनों प्रदान करते हैं।

  • भय निवारण: "भयान्तकृत्" - सभी प्रकार के भय को नष्ट करने वाले।

  • संसार बंधन से मुक्ति: "भवबन्धविमोचकः" - जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति प्रदान करते हैं।

  • समृद्धि प्रदाता: "वसुसमृद्धिदः" - धन-संपत्ति की समृद्धि प्रदान करने वाले।

  • मृत्यु भय निवारण: "मृत्युसंहारकोऽमर्त्यो" - अकाल मृत्यु भय को दूर करने वाले।

चंद्र का स्वरूप (Form of Chandra)

इस स्तोत्र में चंद्रमा के स्वरूप का विस्तृत वर्णन है:

  • वर्ण: सिताङ्गो (श्वेत शरीर वाले), शुभ्रो (उज्ज्वल)
  • आभूषण: सितभूषणः (श्वेत आभूषण), श्वेतमाल्याम्बरधरः (श्वेत माला और वस्त्र धारण करने वाले)
  • वाहन: दशाश्वरथसंरूढो (दस अश्वों के रथ पर आरूढ़)
  • आयुध: दण्डपाणिः धनुर्धरः (दंड और धनुष धारण करने वाले)
  • भुजाएं: द्विभुजो (दो भुजाओं वाले)
  • गोत्र: आत्रेयगोत्रजः (अत्रि ऋषि के गोत्र में जन्मे)
  • राशि: कर्कटप्रभुः (कर्क राशि के स्वामी)

पाठ करने की विधि (Method of Chanting)

  • दिन: सोमवार (Monday) को विशेष फलदायी। पूर्णिमा की रात्रि को पाठ करना सर्वोत्तम है।

  • समय: रात्रि में, विशेषकर चंद्रोदय के समय पाठ करें।

  • आसन और दिशा: उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। श्वेत आसन का प्रयोग करें।

  • पूजन: चंद्र यंत्र या शिवलिंग के सामने पाठ करें। स्तोत्र में उन्हें "महेश्वरप्रियो" (शिव को प्रिय) कहा गया है।

  • समिधा: "पलाशसमिधप्रियः" - पलाश की समिधा अर्पित करना विशेष शुभ है।

  • अर्पण: सफेद फूल (कुंद पुष्प), चावल, दूध, और मिश्री अर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. चंद्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र में कितने नाम हैं?

इस स्तोत्र में चंद्र देव के 108 (अष्टोत्तरशत) दिव्य नाम हैं, जो 17 श्लोकों में वर्णित हैं।

2. चंद्रमा को 'ताराधीश' क्यों कहा गया है?

चंद्रमा सभी तारों (नक्षत्रों) के स्वामी हैं। 27 नक्षत्रों में चंद्र का भ्रमण होता है और वे उनके राजा हैं, इसीलिए उन्हें 'ताराधीश' (तारों के ईश्वर) कहा जाता है।

3. 'क्षयवृद्धिसमन्वितः' का क्या अर्थ है?

चंद्रमा की कलाएं घटती-बढ़ती रहती हैं (शुक्ल पक्ष में वृद्धि, कृष्ण पक्ष में क्षय)। यह उनकी विशेष प्रकृति है जो जीवन के उतार-चढ़ाव का प्रतीक है।

4. चंद्रमा का वाहन क्या है?

'दशाश्वरथसंरूढो' - चंद्रमा दस श्वेत अश्वों द्वारा खींचे जाने वाले रथ पर सवार होते हैं।

5. चंद्रमा किस राशि के स्वामी हैं?

'कर्कटप्रभुरव्ययः' - चंद्रमा कर्क (Cancer) राशि के स्वामी हैं।

6. 'रोहिणीपति' का क्या अर्थ है?

रोहिणी चंद्रमा की सबसे प्रिय पत्नी हैं (27 नक्षत्रों के प्रतीक 27 पत्नियों में से)। रोहिणी नक्षत्र में चंद्र सबसे बलवान होते हैं।

7. 'ग्रसितार्को' का क्या अर्थ है?

यह सूर्य ग्रहण का संकेत है। जब राहु चंद्रमा को ग्रसित करता है तो चंद्र ग्रहण होता है, और जब सूर्य को तो सूर्य ग्रहण।

8. चंद्र को कौन सी समिधा प्रिय है?

'पलाशसमिधप्रियः' - चंद्र को पलाश (ढाक) की समिधा अत्यंत प्रिय है। हवन में इसका प्रयोग करें।

9. 'सागरोद्भवः' का क्या महत्व है?

समुद्र मंथन से चंद्रमा उत्पन्न हुए, इसीलिए उन्हें 'सागरोद्भव' (सागर से उत्पन्न) कहा जाता है। यही कारण है कि चंद्रमा समुद्र के ज्वार-भाटे को प्रभावित करते हैं।

10. क्या यह स्तोत्र मानसिक रोगों में लाभकारी है?

हाँ, चंद्र मन के कारक हैं। 'सकलार्तिहरः' और 'जगदानन्दकारणः' जैसे नाम दर्शाते हैं कि वे दुखों को हरकर आनंद प्रदान करते हैं। अवसाद, चिंता और अनिद्रा में इसका पाठ विशेष लाभकारी है।