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Sri Siddha Lakshmi Stotram – श्री सिद्धलक्ष्मी स्तोत्रम्

Sri Siddha Lakshmi Stotram – श्री सिद्धलक्ष्मी स्तोत्रम्
॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीसिद्धलक्ष्मीस्तोत्रमन्त्रस्य हिरण्यगर्भ ऋषिः । अनुष्टुप् छन्दः । श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वत्यो देवताः । श्रीं बीजं । ह्रीं शक्तिः । क्लीं कीलकं । मम सर्वक्लेशपीडापरिहारार्थं सर्वदुःखदारिद्र्यनाशनार्थं सर्वकार्यसिद्ध्यर्थं श्रीसिद्धिलक्ष्मीस्तोत्र पाठे विनियोगः ॥ ॥ ऋष्यादिन्यासः ॥ ओं हिरण्यगर्भ ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमो मुखे । श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताभ्यो नमो हृदिः । श्रीं बीजाय नमो गुह्ये । ह्रीं शक्तये नमः पादयोः । क्लीं कीलकाय नमो नाभौ । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गेषु ॥ ॥ करन्यासः ॥ ओं श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं ह्रीं विष्णुतेजसे तर्जनीभ्यां नमः । ओं क्लीं अमृतानन्दायै मध्यमाभ्यां नमः । ओं श्रीं दैत्यमालिन्यै अनामिकाभ्यां नमः । ओं ह्रीं तेजः प्रकाशिन्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं क्लीं ब्राह्म्यै वैष्णव्यै रुद्राण्यै करतल करपृष्ठाभ्यां नमः ॥ ॥ अङ्गन्यासः ॥ ओं श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै हृदयाय नमः । ओं ह्रीं विष्णुतेजसे शिरसे स्वाहा । ओं क्लीं अमृतानन्दायै शिखायै वषट् । ओं श्रीं दैत्यमालिन्यै कवचाय हुम् । ओं ह्रीं तेजः प्रकाशिन्यै नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं क्लीं ब्राह्म्यै वैष्णव्यै रुद्राण्यै अस्त्राय फट् ॥ ओं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै नमः इति दिग्बन्धः ॥ ॥ ध्यानम् ॥ ब्राह्मीं च वैष्णवीं भद्रां षड्भुजां च चतुर्मुखीम् । त्रिनेत्रां खड्गत्रिशूलपद्मचक्रगदाधराम् ॥ १ ॥ पीताम्बरधरां देवीं नानालङ्कारभूषिताम् । तेजःपुञ्जधरीं श्रेष्ठां ध्यायेद्बालकुमारिकाम् ॥ २ ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ ओङ्कारं लक्ष्मीरूपं तु विष्णुं वाग्भवमव्ययम् । विष्णुमानन्दमव्यक्तं ह्रीङ्कारं बीजरूपिणीम् ॥ ३ ॥ क्लीं अमृतानन्दिनीं भद्रां सत्यानन्ददायिनीम् । श्रीं दैत्यशमनीं शक्तिं मालिनीं शत्रुमर्दिनीम् ॥ ४ ॥ तेजः प्रकाशिनीं देवीं वरदां शुभकारिणीम् । ब्राह्मीं च वैष्णवीं रौद्रीं कालिकारूपशोभिनीम् ॥ ५ ॥ अकारे लक्ष्मीरूपं तु उकारे विष्णुमव्ययम् । मकारः पुरुषोऽव्यक्तो देवी प्रणव उच्यते ॥ ६ ॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम् । तन्मध्ये निकरं सूक्ष्मं ब्रह्मरुपं व्यवस्थितम् ॥ ७ ॥ ओङ्कारं परमानन्दं सदैव सुरसुन्दरीम् । सिद्धलक्ष्मी मोक्षलक्ष्मी आद्यलक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥ श्रीङ्कारं परमं सिद्धं सर्वबुद्धिप्रदायकम् । सौभाग्याऽमृता कमला सत्यलक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥ ह्रीङ्कारं परमं शुद्धं परमैश्वर्यदायकम् । कमला धनदा लक्ष्मी भोगलक्ष्मी नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥ क्लीङ्कारं कामरूपिण्यं कामनापरिपूर्तिदम् । चपला चञ्चला लक्ष्मी कात्यायनी नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥ श्रीङ्कारं सिद्धिरूपिण्यं सर्वसिद्धिप्रदायकम् । पद्माननां जगन्मात्रे अष्टलक्ष्मीं नमोऽस्तु ते ॥ १२ ॥ सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणी नमोऽस्तु ते ॥ १३ ॥ प्रथमं त्र्यम्बका गौरी द्वितीयं वैष्णवी तथा । तृतीयं कमला प्रोक्ता चतुर्थं सुन्दरी तथा ॥ १४ ॥ पञ्चमं विष्णुशक्तिश्च षष्ठं कात्यायनी तथा । वाराही सप्तमं चैव ह्यष्टमं हरिवल्लभा ॥ १५ ॥ नवमं खड्गिनी प्रोक्ता दशमं चैव देविका । एकादशं सिद्धलक्ष्मीर्द्वादशं हंसवाहिनी ॥ १६ ॥ ॥ उत्तरन्यासः ॥ ओं श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै हृदयाय नमः । ओं ह्रीं विष्णुतेजसे शिरसे स्वाहा । ओं क्लीं अमृतानन्दायै शिखायै वषट् । ओं श्रीं दैत्यमालिन्यै कवचाय हुम् । ओं ह्रीं तेजः प्रकाशिन्यै नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं क्लीं ब्राह्म्यै वैष्णव्यै रुद्राण्यै अस्त्राय फट् ॥ ओं श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं सिद्धलक्ष्म्यै नमः इति दिग्विमोकः ॥ ॥ फलश्रुति ॥ एतत् स्तोत्रवरं देव्या ये पठन्ति सदा नराः । सर्वापद्भ्यो विमुच्यन्ते नात्र कार्या विचारणा ॥ १७ ॥ एकमासं द्विमासं च त्रिमासं च चतुस्थथा । पञ्चमासं च षण्मासं त्रिकालं यः सदा पठेत् ॥ १८ ॥ ब्राह्मणः क्लेशितो दुःखी दारिद्र्यभयपीडितः । जन्मान्तर सहस्रोत्थैर्मुच्यते सर्वकिल्बषैः ॥ १९ ॥ दरिद्रो लभते लक्ष्मीमपुत्रः पुत्रवान् भवेत् । धन्यो यशस्वी शत्रुघ्नो वह्निचौरभयेषु च ॥ २० ॥ शाकिनी भूत वेताल सर्प व्याघ्र निपातने । राजद्वारे सभास्थाने कारागृहनिबन्धने ॥ २१ ॥ ईश्वरेण कृतं स्तोत्रं प्राणिनां हितकारकम् । स्तुवन्तु ब्राह्मणाः नित्यं दारिद्र्यं न च बाधते ॥ २२ ॥ सर्वपापहरा लक्ष्मीः सर्वसिद्धिप्रदायिनीम् । साधकाः लभते सर्वं पठेत् स्तोत्रं निरन्तरम् ॥ २३ ॥ ॥ प्रार्थना ॥ या श्रीः पद्मवने कदम्बशिखरे राजगृहे कुञ्जरे श्वेते चाश्वयुते वृषे च युगले यज्ञे च यूपस्थिते । शङ्खे दैवकुले नरेन्द्रभवने गङ्गातटे गोकुले सा श्रीस्तिष्ठतु सर्वदा मम गृहे भूयात् सदा निश्चला ॥ या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी गम्भीरावर्तनाभिः स्तनभरनमिता शुद्धवस्त्रोत्तरीया । लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगणखचितैः स्नापिता हेमकुम्भैः नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मपुराणे ईश्वरविष्णुसंवादे श्री सिद्धलक्ष्मी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

बीज मंत्र महाविज्ञान (Science of Beejas)

यह स्तोत्र केवल भक्ति नहीं, बल्कि 'ध्वनि विज्ञान' (Science of Sound) है। श्लोक 3 से 12 तक चार प्रमुख बीज मंत्रों का विश्लेषण है। आइये इन्हें गहराई से समझें:

1. ॐ (Om) - परब्रह्म और मोक्ष

श्लोक 8 संदर्भ: "ओङ्कारं परमानन्दं सदैव सुरसुन्दरीम्... सिद्धलक्ष्मी मोक्षलक्ष्मी आद्यलक्ष्मी नमोऽस्तु ते"

'ॐ' केवल एक शब्द नहीं, ब्रह्मांड का प्रथम कंपन (First Vibration) है। यहाँ बताया गया है कि ॐ स्वयं 'आद्य लक्ष्मी' का रूप है। जब साधक ॐ का उच्चारण करता है, तो वह भौतिक जगत से ऊपर उठकर 'परमानन्द' (Supreme Bliss) के स्तर पर पहुँचता है। यह बीज आपको 'मोक्ष लक्ष्मी' प्रदान करता है, अर्थात् ऐसी संपत्ति जो बंधन न बने, बल्कि मुक्ति का द्वार खोले।

2. ह्रीं (Hreem) - माया और ऐश्वर्य शक्ति

श्लोक 10 संदर्भ: "ह्रीङ्कारं परमं शुद्धं परमैश्वर्यदायकम्... कमला धनदा लक्ष्मी भोगलक्ष्मी नमोऽस्तु ते"

'ह्रीं' को भुवनेश्वरी बीज या 'माया बीज' कहा जाता है। यह समस्त भौतिक जगत (Matter) को नियंत्रित करने वाली शक्ति है। यहाँ इसे 'भोगलक्ष्मी' कहा गया है। जिनके पास धन तो है पर भोगने का भाग्य नहीं, उन्हें ह्रीं बीज की उपासना करनी चाहिए। यह 'परम ऐश्वर्य' (Ultimate Wealth) देता है - केवल पैसा नहीं, बल्कि राजा जैसा जीवन।

3. श्रीं (Shreem) - पूर्णता और बुद्धि

श्लोक 9 संदर्भ: "श्रीङ्कारं परमं सिद्धं सर्वबुद्धिप्रदायकम्... सौभाग्याऽमृता कमला सत्यलक्ष्मी नमोऽस्तु ते"

'श्रीं' लक्ष्मी का अपना बीज है, जिसे 'सत्यलक्ष्मी' कहा गया है। यह केवल पैसा नहीं, बल्कि 'बुद्धि' (Wisdom) भी देता है। धन बिना बुद्धि के विनाश लाता है। श्रीं बीज यह सुनिश्चित करता है कि आपके पास आया हुआ धन 'अमृत' के समान सुखदायी हो, न कि विष के समान कष्टदायी। इसे 'सौभाग्य' (Good Fortune) का बीज माना जाता है।

4. क्लीं (Kleem) - आकर्षण और कामना

श्लोक 11 संदर्भ: "क्लीङ्कारं कामरूपिण्यं कामनापरिपूर्तिदम्... चपला चञ्चला लक्ष्मी कात्यायनी नमोऽस्तु ते"

'क्लीं' को काम बीज या आकर्षण बीज कहते हैं। यहाँ देवी को 'कात्यायनी' (माँ दुर्गा का रूप) कहा गया है। यह बीज साधक के अंदर 'चुंबकीय शक्ति' (Magnetic Power) पैदा करता है। जो व्यक्ति क्लीं का ध्यान करता है, उसकी 'कामना परिपूर्ति' (Fulfillment of Desires) होती है। लक्ष्मी उसके पास 'चपला' (बिजली) की तरह दौड़कर आती हैं।

सिद्ध लक्ष्मी के 12 रूपों का रहस्य

श्लोक 14-16 में देवी के 12 रूपों की माला है। यह केवल नाम नहीं, बल्कि चेतना के 12 स्तर हैं:
1. त्र्यम्बका (गौरी)
शिव की शक्ति, जो अकाल मृत्यु और भय से बचाती है।
2. वैष्णवी
विष्णु की शक्ति, जो पालन और पोषण करती है।
3. कमला
सौंदर्य और कोमलता का प्रतीक। जीवन में रस और प्रेम।
4. सुन्दरी
त्रिपुर सुन्दरी, जो तीनों लोकों में सबसे सुंदर हैं।
5. विष्णुशक्ति
वह ऊर्जा जिससे विष्णु संसार चलाते हैं।
6. कात्यायनी
शत्रु नाशिनी दुर्गा रूप। बाधाओं को काटने वाली।
7. वाराही
भूमि और संपत्ति की देवी। सेनापति रूप।
8. हरिवल्लभा
हरि (भगवान) की सबसे प्रिय। भक्ति प्रदान करने वाली।
9. खड्गिनी
हाथ में तलवार (खड्ग) रखने वाली। कर्म बंधनों को काटने वाली।
10. देविका
सभी देवताओं का मूल तत्व।
11. सिद्धलक्ष्मी
अष्ट सिद्धियों (अणिमा, गरिमा आदि) की स्वामिनी।
12. हंसवाहिनी
हंस पर सवार सरस्वती रूप, जो ज्ञान देती हैं।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. सिद्ध लक्ष्मी (Siddha Lakshmi) और महालक्ष्मी में क्या अंतर है?

सामान्य महालक्ष्मी 'धन' और 'समृद्धि' की देवी हैं, जबकि 'सिद्ध लक्ष्मी' धन के साथ-साथ 'सिद्धि' (अलौकिक शक्तियाँ) और 'मोक्ष' प्रदान करती हैं। सिद्ध लक्ष्मी तांत्रिक देवी हैं जो काली (शक्ति), सरस्वती (ज्ञान) और लक्ष्मी (धन) का एकीकृत रूप हैं। वे साधक को भौतिक और आध्यात्मिक दोनों उँचाइयों पर ले जाती हैं।

2. 'हिरण्यगर्भ' ऋषि का इस स्तोत्र से क्या संबंध है?

'हिरण्यगर्भ' स्वयं 'ब्रह्मा' हैं, जो सृष्टि के मूल रचनाकार हैं। चूंकि यह स्तोत्र सृष्टि के मूल तत्वों (Elements) को प्रभावित करने की क्षमता रखता है, इसलिए इसके ऋषि हिरण्यगर्भ हैं। यह दर्शाता है कि यह स्तोत्र वेदों जितना ही प्राचीन और पवित्र है।

3. क्या बिना दीक्षित व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है?

हाँ, यह स्तोत्र 'ब्रह्म पुराण' (Brahma Purana) का हिस्सा है, जो सभी के लिए उपलब्ध है। यद्यपि इसमें तांत्रिक बीज मंत्र हैं, परंतु पुराण का अंश होने के कारण यह 'कीलित' (Locked) नहीं है। कोई भी गृहस्थ श्रद्धा और पवित्रता के साथ इसका पाठ कर सकता है।

4. श्लोक 5 में 'ब्राह्मी-वैष्णवी-रौद्री' का क्या अर्थ है?

यह देवी की 'त्रिगुणात्मक' (Tri-Guna) शक्ति को दर्शाता है। वे 'ब्राह्मी' बनकर सृष्टि करती हैं (रजो गुण), 'वैष्णवी' बनकर पालन करती हैं (सत्त्व गुण), और 'रौद्री' (रुद्र शक्ति) बनकर संहार करती हैं (तमो गुण)। यह सिद्ध करता है कि वे पूर्ण ब्रह्ममयी शक्ति हैं।

5. क्लीं (Kleem) बीज को 'कीलक' क्यों कहा गया है?

'कीलक' का अर्थ होता है 'पिन' या 'चाबी' (Key)। 'क्लीं' आकर्षण और इच्छा (Desire) का बीज है। विनियोग में इसे कीलक कहा गया है क्योंकि हमारी 'तीव्र इच्छाशक्ति' (Will Power) ही वह चाबी है जो इस मंत्र की शक्ति को खोलती है (Unlock करती है)।

6. राजद्वारे (Legal Matters) में यह कैसे लाभकारी है?

श्लोक 21 में स्पष्ट कहा गया है: 'राजद्वारे सभास्थाने कारागृहनिबन्धने'। इसका अर्थ है कि यदि कोई कोर्ट केस, सरकारी अड़चन, या जेल का भय (कारागृह) हो, तो इस स्तोत्र का पाठ साधक को विजय दिलाता है। उसे समाज (सभा) में सम्मान मिलता है।

7. क्या न्यास (Anga Nyasa) करना अनिवार्य है?

तांत्रिक स्तोत्रों में 'न्यास' शरीर को 'कवच' पहनाने जैसा है। यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन अत्यधिक अनुशंसित (Highly Recommended) है। न्यास करने से आपके शरीर के विभिन्न अंग (हृदय, सिर, नेत्र) देवता की ऊर्जा से भर जाते हैं, जिससे पाठ का प्रभाव कई गुना बढ़ जाता है।

8. क्या इसका पाठ रात्रि में कर सकते हैं?

हाँ, सिद्ध लक्ष्मी का पाठ विशेष रूप से 'महानिशा' (मध्यरात्रि) में अत्यंत फलदायी होता है, क्योंकि वे तांत्रिक देवी भी हैं। दिवाली, नवरात्रि या किसी भी शुक्रवार की रात को इसका पाठ शीघ्र सिद्धि देता है।

9. नैवेद्य (Bhog) में क्या अर्पित करें?

देवी को 'खीर' (पायसम), अनार (Pomegranate) और पान (Betel Leaf) अत्यंत प्रिय है। इसके अलावा, सिद्ध लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए लौंग, इलायची और मिश्री का भोग भी लगाया जा सकता है।

10. पाठ की न्यूनतम अवधि क्या है?

श्लोक 18-20 में वर्णित फलश्रुति के अनुसार, कम से कम एक मास (1 महीना) तक नियमित पाठ करना चाहिए। विशेष कार्य सिद्धि के लिए 'एक मंडल' (48 दिन) या 6 महीने का संकल्प लेना श्रेष्ठ है।