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Sri Padma Kavacham – श्री पद्मा कवचम्

Sri Padma Kavacham – श्री पद्मा कवचम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री पद्मा कवचम् ॥ नारायण उवाच । शृणु विप्रेन्द्र पद्मायाः कवचं परमं शुभम् । पद्मनाभेन यद्दत्तं ब्रह्मणे नाभिपद्मके ॥ १ ॥ सम्प्राप्य कवचं ब्रह्म तत्पद्मे ससृजे जगत् । पद्मालयाप्रसादेन सलक्ष्मीको बभूव सः ॥ २ ॥ पद्मालयावरं प्राप्य पाद्मश्च जगतां प्रभुः । पाद्मेन पद्मकल्पे च कवचं परमाद्भुतम् ॥ ३ ॥ दत्तं सनत्कुमाराय प्रियपुत्राय धीमते । कुमारेण च यद्दत्तं पुष्कराक्षाय नारद ॥ ४ ॥ यद्धृत्वा पठनाद्ब्रह्मा सर्वसिद्धेश्वरो महान् । परमैश्वर्यसम्युक्तः सर्वसम्पत्समन्वितः ॥ ५ ॥ यद्धृत्वा च धनाध्यक्षः कुबेरश्च धनाधिपः । स्वायम्भुवो मनुः श्रीमान्पठनाद्धारणाद्यतः ॥ ६ ॥ प्रियव्रतोत्तानपादौ लक्ष्मीवन्तौ यतो मुने । पृथुः पृथ्वीपतिः सद्यो ह्यभवद्धारणाद्यतः ॥ ७ ॥ कवचस्य प्रसादेन स्वयं दक्षः प्रजापतिः । धर्मश्च कर्मणां साक्षी पाता यस्य प्रसादतः ॥ ८ ॥ यद्धृत्वा दक्षिणे बाहौ विष्णुः क्षीरोदशायितः । भक्त्या विधत्ते कण्ठे च शेषो नारायणांशकः ॥ ९ ॥ यद्धृत्वा वामनं लेभे कश्यपश्च प्रजापतिः । सर्वदेवाधिपः श्रीमान्महेन्द्रो धारणाद्यतः ॥ १० ॥ राजा मरुत्तो भगवानभवद्धारणाद्यतः । त्रैलोक्याधिपतिः श्रीमान्नहुषो यस्य धारणात् ॥ ११ ॥ विश्वं विजिग्ये खट्वाङ्गः पठनाद्धारणाद्यतः । मुचुकुन्दो यतः श्रीमान्मान्धातृतनयो महान् ॥ १२ ॥ सर्वसम्पत्प्रदस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः । ऋषिश्छन्दश्च बृहती देवी पद्मालया स्वयम् ॥ १३ ॥ धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः । पुण्यबीजं च महतां कवचं परमाद्भुतम् ॥ १४ ॥ ॥ अथ कवचम् (Anga Nyasa) ॥ ओं ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा मे पातु मस्तकम् । श्रीं मे पातु कपालं च लोचने श्रीं श्रियै नमः ॥ १५ ॥ ओं श्रीं श्रियै स्वाहेति च कर्णयुग्मं सदाऽवतु । ओं [ह्रीं] श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मे पातु नासिकाम् ॥ १६ ॥ ओं श्रीं पद्मालयायै च स्वाहा दन्तान्सदाऽवतु । ओं श्रीं कृष्णप्रियायै च दन्तरन्ध्रं सदाऽवतु ॥ १७ ॥ ओं श्रीं नारायणेशायै मम कण्ठं सदाऽवतु । ओं श्रीं केशवकान्तायै मम स्कन्धं सदाऽवतु ॥ १८ ॥ ओं श्रीं पद्मनिवासिन्यै स्वाहा नाभिं सदाऽवतु । ओं ह्रीं श्रीं संसारमात्रे मम वक्षः सदाऽवतु ॥ १९ ॥ ओं श्रीं ओं कृष्णकान्तायै स्वाहा पृष्ठं सदाऽवतु । ओं ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहा च मम हस्तौ सदाऽवतु ॥ २० ॥ ओं श्रीनिवासकान्तायै मम पादौ सदाऽवतु । ओं ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहा सर्वाङ्गं मे सदाऽवतु ॥ २१ ॥ ॥ दिग्बन्धन (Directional Protection) ॥ प्राच्यां पातु महालक्ष्मीराग्नेय्यां कमलालया । पद्मा मां दक्षिणे पातु नैरृत्यां श्रीहरिप्रिया ॥ २२ ॥ पद्मालया पश्चिमे मां वायव्यां पातु सा स्वयम् । उत्तरे कमला पातु चैशान्यां सिन्धुकन्यका ॥ २३ ॥ नारायणी च पातूर्ध्वमधो विष्णुप्रियाऽवतु । सन्ततं सर्वतः पातु विष्णुप्राणाधिका मम ॥ २४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम् । सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥ २५ ॥ सुवर्णपर्वतं दत्वा मेरुतुल्यं द्विजातये । यत्फलं लभते धर्मी कवचेन ततोऽधिकम् ॥ २६ ॥ गुरुमभ्यर्च्य विधिवत्कवचं धारयेत्तु यः । कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ स श्रीमान्प्रतिजन्मनि ॥ २७ ॥ अस्ति लक्ष्मीर्गृहे तस्य निश्चला शतपूरुषम् । देवेन्द्रैश्चासुरेन्द्रैश्च सोऽवध्यो निश्चितं भवेत् ॥ २८ ॥ स सर्वपुण्यवान् धीमान् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । स स्नातः सर्वतीर्थेषु यस्येदं कवचं गले ॥ २९ ॥ यस्मै कस्मै न दातव्यं लोभमोहभयैरपि । गुरुभक्ताय शिष्याय शरण्याय प्रकाशयेत् ॥ ३० ॥ इदं कवचमज्ञात्वा जपेल्लक्ष्मीं जगत्प्रसूम् । कोटिसङ्ख्यं प्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सिद्धिदायकः ॥ ३१ ॥ ॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते महापुराणे तृतीये गणपतिखण्डे अष्टात्रिंशत्तमोऽध्याये नारदनारायणसंवादे श्री लक्ष्मी कवचम् ॥

कवच परिचय

यह कवच महालक्ष्मी उपासना का आधार स्तंभ है। श्लोक 31 चेतावनी देता है कि इस कवच को जाने बिना लक्ष्मी मंत्र का जप करने से 'करोड़ों जप' (Koti Sankhya) भी सिद्धि नहीं देते।
ग्रंथब्रह्मवैवर्त महापुराण (गणपति खण्ड, अ॰ 38)
प्रथम वक्ताभगवान श्री हरि (पद्मनाभ)
प्रथम श्रोताब्रह्मा जी (नाभिकमल पर आसीन)
ऋषिप्रजापति (Prajapati)
छंदबृहती (Brihati)
देवीपद्मालया (Padmalaya - Lotus Resident)
विनियोगधर्म, अर्थ, काम, मोक्ष प्राप्ति

अंग न्यास (रक्षा विधान)

इस कवच में शरीर के विभिन्न अंगों की रक्षा के लिए विशेष मंत्र दिए गए हैं। पाठ करते समय इन अंगों का मानसिक या स्पर्श द्वारा ध्यान करें:
अंग (Body Part)रक्षक देवी (Deity)मंत्र भाग
मस्तक (Head)कमलवासिनीओं ह्रीं कमलवासिन्यै...
भाल (Forehead)श्रीश्रीं मे पातु कपालं...
नेत्र (Eyes)श्रीलोचने श्रीं श्रियै नमः
कर्ण (Ears)श्रीश्रीं श्रियै स्वाहेति...
नासिका (Nose)महालक्ष्मीओं ह्रीं श्रीं क्लीं...
दांत (Teeth)पद्मालया, कृष्णप्रियाश्रीं पद्मालयायै...
कण्ठ (Throat)नारायणेशाश्रीं नारायणेशायै...
स्कन्ध (Shoulders)केशवकान्ताश्रीं केशवकान्तायै...
नाभि (Navel)पद्मनिवासिनीश्रीं पद्मनिवासिन्यै...
वक्ष (Chest)संसारमाताह्रीं श्रीं संसारमात्रे...
पृष्ठ (Back)कृष्णकान्ताश्रीं ओं कृष्णकान्तायै...
हस्त (Hands)श्रीह्रीं श्रीं श्रियै...
पाद (Feet)श्रीनिवासकान्ताश्रीनिवासकान्तायै...
सर्वांग (All Body)श्रीह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै...

दिग्बन्धन (दिशा रक्षण)

पूर्व (East)महालक्ष्मीआग्नेय (South-East)कमलालया
दक्षिण (South)पद्मार्नैरृत्य (South-West)हरिप्रिया
पश्चिम (West)पद्मालयावायव्य (North-West)पद्मालया
उत्तर (North)कमलाईशान (North-East)सिंधुकन्यका
ऊर्ध्व (Up)नारायणीअधः (Down)विष्णुप्रिया

पौराणिक लाभार्थी (Historical Lineage)

इस कवच की शक्ति का प्रमाण इस बात से मिलता है कि इसे धारण करके अनेक महापुरुषों ने अपनी सिद्धियां प्राप्त कीं। श्लोक 5-12 में इनकी सूची दी गई है:
  • ब्रह्मा: इसे धारण कर 'सर्वसिद्धेश्वर' और 'सर्वसम्पत् समन्वयित' बने।
  • कुबेर: यक्षराज कुबेर इसी कवच के बल पर 'धनाधिप' (धन के स्वामी) बने।
  • मनु: स्वायम्भुव मनु, प्रियव्रत और उत्तानपाद ने इससे 'लक्ष्मी' (राजश्री) पायी।
  • दक्ष प्रजापति: सृष्टि कर्म के साक्षी बने।
  • इन्द्र: देवराज इन्द्र ने इसे धारण कर 'सर्वदेवाधिपत्य' (देवताओं का राजा होना) प्राप्त किया।
  • नहुष, खट्वाङ्ग: इन चक्रवर्ती राजाओं ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की।
यहां तक कि स्वयं भगवान शेषनाग इसे गले में धारण करते हैं और भगवान विष्णु इसे अपनी दक्षिण भुजा (Right Arm) में धारण करते हैं (श्लोक 9)।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. इस कवच का नाम 'पद्मा कवच' क्यों है?

क्योंकि यह सर्वप्रथम भगवान पद्मनाभ ने पद्म (कमल) पर बैठे ब्रह्मा को दिया था। इसमें देवी के 'पद्मालया', 'कमला', 'पद्मनिवासिनी' जैसे कमल-युक्त नामों की प्रधानता है।

2. क्या इस कवच को धारण करना (पहनना) चाहिए?

हाँ, श्लोक 27 में स्पष्ट कहा गया है - "कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ"। इसे भोजपत्र पर लिखकर ताबीज में भरकर गले में या दाईं भुजा (Right Arm) पर बांधने से "प्रतिजन्म" (हर जन्म में) श्री (धन) की प्राप्ति होती है।

3. क्या केवल पाठ करने से लाभ होगा?

बिल्कुल। श्लोक 5 में "यद्धृत्वा पठनाद्ब्रह्मा" (धारण करके और पढ़ने से) दोनों का उल्लेख है। यदि आप धारण नहीं कर सकते, तो नित्य भक्तिपूर्वक पाठ करना भी समान फलदायी है।

4. इसके पाठ का विशेष फल क्या है?

सबसे बड़ा फल है - स्थिर लक्ष्मी। श्लोक 29 कहता है कि साधक के घर में लक्ष्मी "निश्चला" (स्थिर) होकर 100 पीढ़ियों (शतपूरुषम्) तक निवास करती हैं। यह वंश वृद्धि और धन स्थिरता के लिए अमोघ है।

5. 'कवच' और 'स्तोत्र' में क्या अंतर है?

स्तोत्र में देवता की स्तुति (तारीफ) होती है, जबकि कवच में देवता से 'रक्षा' (Protection) मांगी जाती है। जैसे इस कवच में - "मस्तकं पातु" (मेरे सिर की रक्षा करो), "नेत्रं पातु" (आंखों की रक्षा करो)। यह एक आध्यात्मिक ढाल (Shield) है।