Sri Shodashi Ashtottara Shatanama Stotram – श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
Sri Shodashi Ashtottara Shatanama Stotram: 108 Names of Goddess Shodashi

श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Shodashi Ashtottara Shatanama Stotram) प्राचीन आगम ग्रंथों, विशेषकर ब्रह्मयामल तन्त्र का एक बहुमूल्य रत्न है। इस स्तोत्र की उत्पत्ति ऋषि भृगु और जगतपिता ब्रह्मा के संवाद से हुई है। भृगु जी की जिज्ञासा शांत करने के लिए ब्रह्मा जी ने देवी त्रिपुरसुन्दरी के 1000 नामों (सहस्रनाम) का सार निकालकर ये 108 नाम प्रकट किए।
'षोडशी' का अर्थ है - सोलह कलाओं से पूर्ण। देवी सदा सोलह वर्ष की अवस्था में रहती हैं, जो पूर्णता, सौंदर्य और शक्ति का प्रतीक है। यह स्तोत्र साधक को देवी के सौम्य और उग्र, दोनों रूपों के दर्शन कराता है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
विशिष्ट महत्व (Significance)
महाविद्या साधना का सार: यह स्तोत्र केवल नामों की सूची नहीं है, बल्कि मंत्र विज्ञान का एक अद्भुत उदाहरण है। इसमें 'महाविद्या', 'श्री विद्या', 'काली', 'तारा', 'छिन्नमस्ता' आदि के बीज मंत्रों और शक्तियों का समावेश है।
गोपनीय विद्या: ब्रह्मा जी स्वयं कहते हैं - "गुह्याद्गुह्यतरं गुह्यं" (यह गोपनीय से भी गोपनीय है)। यह कलियुग में शीघ्र फल देने वाला और साधक को 'शिव-तुल्य' बनाने वाला स्तोत्र है।
फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)
सहस्रनाम का फल: शास्त्रों के अनुसार, इस स्तोत्र का एक बार पाठ करने से 'सहस्रनाम' (1000 नाम) के पाठ से भी करोड़ गुना अधिक पुण्य मिलता है।
परम अद्भुत भोग: साधक को इस लोक में दुर्लभ और प्रिय भोग प्राप्त होते हैं और अंत में वह मोक्ष का अधिकारी बनता है।
पाप नाश: यह 'महापातकनाशनम्' है, अर्थात गंभीर से गंभीर पापों और कर्म बंधनों को काटने में सक्षम है।
ज्ञान और सौंदर्य: इसके पाठ से बुद्धि निर्मल होती है, आकर्षण शक्ति बढ़ती है और साधक में देवी का तेज समाहित होता है।
पाठ विधि (Ritual Method)
- समय (Time):
- महानिशीथ काल: मध्यरात्रि का समय (तन्त्र साधना के लिए)।
- अरुणोदय: सूर्योदय से पूर्व (ब्रह्म मुहूर्त)।
- प्रदोष काल: सूर्यास्त का समय।
विशेष तिथियाँ: नवमी (विशेषकर नवरात्रि), पूर्णिमा और शुक्रवार।
पूजन (Pancha Puja): पाठ से पूर्व 'पंचोपचार पूजा' (गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य) करें।
आसन: लाल रंग का ऊनी आसन प्रयोग करें और उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् का स्रोत क्या है?
यह स्तोत्र 'ब्रह्मयामल तन्त्र' (Brahma Yamala Tantra) के पूर्व खंड से लिया गया है। यह संवाद भृगु ऋषि और भगवान ब्रह्मा के बीच का है।
2. माँ षोडशी (त्रिपुरसुन्दरी) की उपासना क्यों की जाती है?
वे श्री कुल की अधिष्ठात्री हैं और भोग व मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं। उनकी साधना से साधक को राजसी सुख, तेज और अंत में आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है।
3. इस स्तोत्र के पाठ का विशेष फल क्या है?
ग्रंथ के अनुसार, इस स्तोत्र का पाठ 'सहस्रनाम' (1000 नाम) के पाठ से भी अधिक फलदायी माना गया है (कोटिगुणं पुण्यं)। यह महापातक (गंभीर पापों) का नाश करता है।
4. पाठ करने का सर्वोत्तम समय (Muhurat) क्या है?
महानिशीथ काल (मध्यरात्रि), अरुणोदय (ब्रह्म मुहूर्त), प्रदोष काल और नवमी तिथि इसके पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।
5. क्या पुरुष और स्त्री दोनों इसका पाठ कर सकते हैं?
हाँ, माँ की भक्ति में सभी का अधिकार है। पवित्रता और श्रद्धा मुख्य आवश्यकताएं हैं।
6. इस स्तोत्र में 'त्रिपुर' का अर्थ क्या है?
'त्रिपुर' का अर्थ है तीन लोक, तीन अवस्थाएं (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति) और तीन गुण। देवी इन तीनों से परे और इनका संचालन करने वाली शक्ति हैं।
7. क्या इसके लिए दीक्षा अनिवार्य है?
स्तोत्र पाठ के लिए सामान्यतः दीक्षा अनिवार्य नहीं है, परन्तु 'श्री विद्या' की साधना बिना गुरु के पूर्ण नहीं मानी जाती। भक्ति भाव से पाठ सुरक्षित है।
8. नैवेद्य (Bhog) में क्या अर्पित करना चाहिए?
माँ को खीर, मिश्री, शहद, और पान अत्यंत प्रिय है। लाल पुष्प (जपाकुसुम) अवश्य चढ़ाएं।
9. क्या यह स्तोत्र शत्रुओं से रक्षा करता है?
हाँ, यह साधक को अभय प्रदान करता है और सभी प्रकार के भय तथा शत्रुओं का नाश करता है।
10. इस स्तोत्र और नामावली में क्या अंतर है?
स्तोत्र में मंत्रों को श्लोकबद्ध रूप में गाया जाता है, जबकि नामावली में प्रत्येक नाम के साथ 'नमः' लगाकर अर्चन किया जाता है। दोनों का फल समान है।