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Maha Tripura Sundari Hrudayam – श्री महात्रिपुरसुन्दरी हृदयम्

Sri Maha Tripura Sundari Hrudayam: The Sacred Heart of Tripura Sundari

Maha Tripura Sundari Hrudayam – श्री महात्रिपुरसुन्दरी हृदयम्
॥ श्री महात्रिपुरसुन्दरी हृदयम् ॥ अस्य श्री महात्रिपुरसुन्दरी हृदय स्तोत्र महामन्त्रस्य, श्री आनन्दभैरव ऋषिः, देवी गायत्री छन्दः, श्री महात्रिपुरसुन्दरी देवता, ऐं बीजं, सौः शक्तिः, क्लीं कीलकं, धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः । ध्यानम् बालार्कमण्डलाभासां चतुर्बाहुं त्रिलोचनाम् । पाशाङ्कुशधनुर्बाणान् धारयन्तीं शिवां भजे ॥ वन्दे सिन्दूरवर्णाभं वामोरुन्यस्तवल्लभम् । इक्षुवारिधिमध्यस्थमिभराजमुखं महः ॥ १ ॥ गम्भीरलहरीजालगण्डूषितदिगन्तरः । अव्यान्माममृताम्भोधिरनर्घमणिसम्युतः ॥ २ ॥ मध्ये तस्य मनोहारि मधुपारवमेदुरम् । प्रसूनविगलन्माध्वीप्रवाहपरिपूरितम् ॥ ३ ॥ किन्नरीगानमेदस्वि क्रीडाकन्दरदन्तुरम् । काञ्चनद्रुमधूलीभिः कल्पितावालवद्द्रुमम् ॥ ४ ॥ मुग्धकोकिलनिक्वाणमुखरीकृतदिङ्मुखम् । मन्दारतरुसन्तानमञ्जरीपुञ्जपिञ्जरम् ॥ ५ ॥ नासानाडिन्धमस्मेरनमेरुसुमसौरभम् । आवृन्तहसिताम्भोजदीव्यद्विभ्रमदीर्घिकम् ॥ ६ ॥ मन्दरक्तशुकीदष्टमातुलुङ्गफलान्वितम् । सविधस्यन्दमानाभ्रसरित्कल्लोलवेल्लितम् ॥ ७ ॥ प्रसूनपांसुसौरभ्यपश्यतोहरमारुतम् । वकुलप्रसवाकीर्णं वन्दे नन्दनकाननम् ॥ ८ ॥ तन्मध्ये नीपकान्तारं तरणिस्तम्भकारणम् । मधुपालिविमर्दालिकलक्वाणकरम्बितम् ॥ ९ ॥ कोमलश्वशनाधूतकोरकोद्गतधूलिभिः । सिन्दूरितनभोमार्गं चिन्तितं सिद्धवन्दिभिः ॥ १० ॥ मध्ये तस्य मरुन्मार्गलम्बिमाणिक्यतोरणम् । शाणोल्लिखितवैदूर्यक्लुप्तसालसमाकुलम् ॥ ११ ॥ माणिक्यस्तम्भपटलीमयूखव्याप्तदिक्तटम् । पञ्चविंशतिसालाढ्यां नमामि नगरोत्तमम् ॥ १२ ॥ तत्र चिन्तामणिगृहं तडित्कोटिसमुज्ज्वलम् । नीलोत्पलसमाकीर्णनिर्यूहशतसङ्कुलम् ॥ १३ ॥ सोमकान्तमणिक्लुप्तसोपानोद्भासिवेदिकम् । चन्द्रशालाचरत्केतुसमालीढनभोन्तरम् ॥ १४ ॥ गारुत्मतमणीक्लुप्तमण्डपव्यूहमण्डितम् । नित्यसेवापरामर्त्यनिबिडद्वारशोभितम् ॥ १५ ॥ अधिष्ठितं द्वारपालैरसितोमरपाणिभिः । नमामि नाकनारीणां सान्द्रसङ्गीतमेदुरम् ॥ १६ ॥ तन्मध्ये तरुणार्काभं तप्तकाञ्चननिर्मितम् । शक्रादिमद्द्वारपालैः सन्ततं परिवेष्टितम् ॥ १७ ॥ चतुष्षष्टिमहाविद्याकलाभिरभिसंवृतम् । रक्षितं योगिनीबृन्दै रत्नसिंहासनं भजे ॥ १८ ॥ मध्ये तस्य मरुत्सेव्यं चतुर्द्वारसमुज्ज्वलम् । चतुरस्रत्रिरेखाढ्यां चारुत्रिवलयान्वितम् ॥ १९ ॥ कलादलसमायुक्तं कनदष्टदलान्वितम् । चतुर्दशारसहितं दशारद्वितयान्वितम् ॥ २० ॥ अष्टकोणयुतं दिव्यमग्निकोणविराजितम् । योगिभिः पूजितं योगियोगिनीगणसेवितम् ॥ २१ ॥ सर्वदुःखप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनम् । विषज्वरहरं पुण्यं विविधापद्विदारणम् ॥ २२ ॥ सर्वदारिद्र्यशमनं सर्वभूपालमोहनम् । आशाभिपूरकं दिव्यमर्चकानामहर्निशम् ॥ २३ ॥ अष्टादशसुमर्माढ्यं चतुर्विंशतिसन्धिनम् । श्रीमद्बिन्दुगृहोपेतं श्रीचक्रं प्रणमाम्यहम् ॥ २४ ॥ तत्रैव बैन्दवस्थाने तरुणादित्यसन्निभम् । पाशाङ्कुशधनुर्बाणपरिष्कृतकराम्बुजम् ॥ २५ ॥ पूर्णेन्दुबिम्बवदनं फुल्लपङ्कजलोचनम् । कुसुमायुधशृङ्गारकोदण्डकुटिलभ्रुवम् ॥ २६ ॥ चारुचन्द्रकलोपेतं चन्दनागुरुरूषितम् । मन्दस्मितमधूकालिकिञ्जल्कितमुखाम्बुजम् ॥ २७ ॥ पाटीरतिलकोद्भासिफालस्थलमनोहरम् । अनेककोटिकन्दर्पलावण्यमरुणाधरम् ॥ २८ ॥ तपनीयांशुकधरं तारुण्यश्रीनिषेवितम् । कामेश्वरमहं वन्दे कामितार्थप्रदं नृणाम् ॥ २९ ॥ तस्याङ्कमध्यमासीनां तप्तहाटकसन्निभाम् । माणिक्यमुकुटच्छायामण्डलारुणदिङ्मुखाम् ॥ ३० ॥ कलवेणीकनत्फुल्लकह्लारकुसुमोज्ज्वलाम् । उडुराजकृतोत्तंसामुत्पलश्यामलालकाम् ॥ ३१ ॥ चतुर्थीचन्द्रसच्छात्रफालरेखापरिष्कृताम् । कस्तूरीतिलकारूढकमनीयललन्तिकाम् ॥ ३२ ॥ भ्रूलताश्रीपराभूतपुष्पायुधशरासनाम् । नालीकदलदायादनयनत्रयशोभिताम् ॥ ३३ ॥ करुणारससम्पूर्णकटाक्षहसितोज्ज्वलाम् । भव्यमुक्तामणिचारुनासामौक्तिकवेष्टिताम् ॥ ३४ ॥ कपोलयुगलीनृत्यकर्णताटङ्कशोभिताम् । माणिक्यवालीयुगलीमयूखारुणदिङ्मुखाम् ॥ ३५ ॥ परिपक्वसुबिम्बाभापाटलाधरपल्लवाम् । मञ्जुलाधरपर्वस्थमन्दस्मितमनोहराम् ॥ ३६ ॥ द्विखण्डद्विजराजाभगण्डद्वितयमण्डिताम् । दरफुल्ललसद्गण्डधवलापूरिताननाम् ॥ ३७ ॥ पचेलिमेन्दुसुषमापाटच्चरमुखप्रभाम् । कन्धराकान्तिहसितकम्बुबिम्बोकडम्बराम् ॥ ३८ ॥ कस्तूरीकर्दमाश्यामकन्धरामूलकन्दराम् । वामांसशिखरोपान्तव्यालम्बिघनवेणिकाम् ॥ ३९ ॥ मृणालकाण्डदायादमृदुबाहुचतुष्टयाम् । मणिकेयूरयुगलीमयूखारुणविग्रहाम् ॥ ४० ॥ करमूललसद्रत्नकङ्कणक्वाणपेशलाम् । करकान्तिसमाधूतकल्पानोकहपल्लवाम् ॥ ४१ ॥ पद्मरागोर्मिकाश्रेणिभासुराङ्गुलिपालिकाम् । पुण्ड्रकोदण्डपुष्पास्त्रपाशाङ्कुशलसत्कराम् ॥ ४२ ॥ तप्तकाञ्चनकुम्भाभस्तनमण्डलमण्डिताम् । घनस्तनतटीक्लुप्तकाश्मीरक्षोदपाटलाम् ॥ ४३ ॥ कूलङ्कषकुचस्फारतारहारविराजिताम् । चारुकौसुम्भकूर्पासच्छन्नवक्षोजमण्डलाम् ॥ ४४ ॥ नवनीलघनश्यामरोमराजिविराजिताम् । लावण्यसागरावर्तनिभनाभिविभूषिताम् ॥ ४५ ॥ डिम्भमुष्टितलग्राह्यमध्ययष्टिमनोहराम् । नितम्बमण्डलाभोगनिक्वणन्मणिमेखलाम् ॥ ४६ ॥ सन्ध्यारुणक्षौमपटीसञ्छन्नजघनस्थलाम् । घनोरुकान्तिहसितकदलीकाण्डविभ्रमाम् ॥ ४७ ॥ जानुसम्पुटकद्वन्द्वजितमाणिक्यदर्पणाम् । जङ्घायुगलसौन्दर्यविजितानङ्गकाहलाम् ॥ ४८ ॥ प्रपदच्छायसन्तानजितप्राचीनकच्छपाम् । नीरजासनकोटीरनिघृष्टचरणाम्बुजाम् ॥ ४९ ॥ पादशोभापराभूतपाकारितरुपल्लवाम् । चरणाम्भोजशिञ्जानमणिमञ्जीरमञ्जुलाम् ॥ ५० ॥ विबुधेन्द्रवधूत्सङ्गविन्यस्तपदपल्लवाम् । पार्श्वस्थभारतीलक्ष्मीपाणिचामरवीजिताम् ॥ ५१ ॥ पुरतो नाकनारीणां पश्यन्तीं नृत्तमद्भुतम् । भ्रूलताञ्चलसम्भूतपुष्पायुधपरम्पराम् ॥ ५२ ॥ प्रत्यग्रयौवनोन्मत्तपरिफुल्लविलोचनाम् । ताम्रोष्ठीं तरलापाङ्गीं सुनासां सुन्दरस्मिताम् ॥ ५३ ॥ चतुरर्थध्रुवोदारां चाम्पेयोद्गन्धिकुन्तलाम् । मधुस्नपितमृद्वीकमधुरालापपेशलाम् ॥ ५४ ॥ शिवां षोडशवार्षीकां शिवाङ्कतलवासिनीम् । चिन्मयीं हृदयाम्भोजे चिन्तयेज्जापकोत्तमः ॥ ५५ ॥ इति त्रिपुरसुन्दर्या हृदयं सर्वकामदम् । सर्वदारिद्र्यशमनं सर्वसम्पत्प्रदं नृणाम् ॥ ५६ ॥ तापज्वरार्तिशमनं तरुणीजनमोहनम् । महाविषहरं पुण्यं माङ्गल्यकरमद्भुतम् ॥ ५७ ॥ अपमृत्युहरं दिव्यमायुष्यश्रीकरं परम् । अपवर्गैकनिलयमवनीपालवश्यदम् ॥ ५८ ॥ पठति ध्यानरत्नं यः प्रातः सायमतन्द्रितः । न विषादैः स च पुमान् प्राप्नोति भुवनत्रयम् ॥ ५९ ॥ ॥ इति श्रीमहात्रिपुरसुन्दरीहृदयं सम्पूर्णम् ॥

श्री महात्रिपुरसुन्दरी हृदयम् - परिचय (Introduction)

श्री महात्रिपुरसुन्दरी हृदयम् (Maha Tripura Sundari Hrudayam) कोई साधारण स्तुति नहीं, बल्कि यह आदि शक्ति का 'हृदय' अर्थात उनका गूढ़तम रहस्य है। 'त्रिपुरसुन्दरी' दश महाविद्याओं में तृतीय और सर्वोच्च 'श्री कुल' (Sri Kula) की अधिष्ठात्री देवी हैं। उन्हें 'ललिता' (लीला करने वाली) और 'राजराजेश्वरी' (सम्राटों की स्वामिनी) भी कहा जाता है।

इस हृदय स्तोत्र में देवी के उस अलौकिक स्वरूप का वर्णन है जो देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। यह स्तोत्र साधक को बाहरी कर्मकांडों से ऊपर उठाकर 'अंतर्मुखी' साधना की ओर ले जाता है। इसमें देवी के निवास (मणिद्वीप), उनके आयुध (पाश, अंकुश, धनुष, बाण) और उनके दिव्य सौंदर्य का ऐसा सजीव चित्रण है कि साधक ध्यानस्थ हो जाता है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

श्री चक्र का रहस्य: यह स्तोत्र श्री चक्र (Sri Chakra) की संरचना को शब्दों में पिरोता है। श्री यंत्र में ९ आवरण (Enclosures) होते हैं, और यह स्तोत्र साधक की चेतना को सबसे बाहरी आवरण से लेकर केंद्र बिंदु (बिंदु रूपी शिव-शक्ति) तक की यात्रा कराता है।

तीन पुरों की स्वामिनी: 'त्रिपुर' का अर्थ है तीन लोक (स्वर्ग, मर्त्य, पाताल), तीन गुण (सत्व, रज, तम), और तीन अवस्थाएं (जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति)। माँ त्रिपुरसुन्दरी इन तीनों से परे, तुरीय अवस्था (शुद्ध चेतना) हैं। "हृदयम्" का पाठ करने वाला साधक इन तीनों बंधनों से मुक्त होकर परम पद को प्राप्त करता है।

फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)

  • शत्रु नाश और सुरक्षा: इस स्तोत्र के प्रभाव से गुप्त और प्रत्यक्ष शत्रुओं का नाश होता है। यह साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच का निर्माण करता है।

  • वाक्सिद्धि (Power of Speech): देवी का वाग्भव बीज 'ऐं' (Aim) ज्ञान और बुद्धि का दाता है। इसके नियमित पाठ से साधक की वाणी सिद्ध हो जाती है - वह जो बोलता है, सत्य और प्रभावशाली होता है।

  • अतुलनीय ऐश्वर्य: माँ ललिता 'लक्ष्मी' स्वरूप भी हैं। यह पाठ दरिद्रता का समूल नाश कर साधक को धन, धान्य और राजसी सुख प्रदान करता है।

  • अकाल मृत्यु से रक्षा: यह 'मृत्युंजय' विद्या का भी कार्य करता है। साधक को अकाल मृत्यु, दुर्घटना और असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है।

  • मोक्ष प्राप्ति: अंततः, यह ज्ञान प्रदान कर जीवन-मरण के चक्र से मुक्त करता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

इस गुह्य स्तोत्र का पूर्ण लाभ उठाने के लिए सही विधि का पालन करें:
  • समय (Time): यद्यपि प्रतःकाल इसका पाठ किया जा सकता है, किंतु महानिशीथ काल (मध्यरात्रि 11:30 - 12:30) इसके लिए सर्वश्रेष्ठ है। शुक्रवार और पूर्णिमा की रात्रि विशेष फलदायी है।

  • आसन (Asana): लाल (Red) ऊनी आसन या कंबल का प्रयोग करें।

  • दिशा (Direction): उत्तर (North) दिशा (धन/मोक्ष के लिए) या पूर्व (East) दिशा (ज्ञान के लिए) की ओर मुख करें।

  • नैवेद्य (Offering): देवी को लाल पुष्प (गुड़हल/जपाकुसुम) सबसे प्रिय हैं। भोग में खीर, मिश्री, या पान अर्पित करें।

  • न्यास (Nyasa): पाठ शुरू करने से पहले 'विनियोग' और 'ऋषिन्यास' अवश्य करें (जैसा स्तोत्र के आरम्भ में दिया गया है)।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री महात्रिपुरसुन्दरी हृदयम् का क्या महत्व है?

यह स्तोत्र देवी त्रिपुरसुन्दरी का 'हृदय' यानी उनका सार तत्त्व है। इसमें श्री विद्या, श्री चक्र और देवी के विराट स्वरूप का वर्णन है। यह साधक को बाहरी पूजा से आंतरिक ध्यान की ओर ले जाता है।

2. त्रिपुरसुन्दरी को 'षोडशी' क्यों कहा जाता है?

वे 16 कलाओं से पूर्ण हैं और सदा 16 वर्ष की किशोरी के रूप में रहती हैं। 'षोडशी' अवस्था पूर्णता, सौंदर्य और अनंत यौवन का प्रतीक है।

3. इस स्तोत्र के पाठ का सर्वश्रेष्ठ समय क्या है?

महानिशीथ काल (मध्यरात्रि) इस पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसके अलावा, शुक्रवार, पूर्णिमा और नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।

4. क्या पुरुष और स्त्री दोनों इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, माँ की भक्ति में लिंग का भेद नहीं है। पवित्रता और श्रद्धा के साथ कोई भी इसका पाठ कर सकता है।

5. इस पाठ से कौन सी सिद्धियां प्राप्त होती हैं?

प्रमुख रूप से 'वाक्सिद्धि' (वाणी की सत्यता), 'आकर्षण' (सम्मोहन), और 'शत्रु नाश' की शक्ति प्राप्त होती है। यह साधक को 'राजराजेश्वर' जैसा ऐश्वर्य प्रदान करता है।

6. क्या बिना गुरु दीक्षा के यह पाठ किया जा सकता है?

यह एक तांत्रिक स्तोत्र है। इसे भक्ति भाव से पढ़ा जा सकता है, लेकिन पूर्ण फल और सुरक्षा के लिए 'श्री विद्या' की दीक्षा किसी योग्य गुरु से लेना उत्तम है।

7. श्री चक्र (Sri Chakra) से इसका क्या संबंध है?

यह हृदय स्तोत्र श्री चक्र के नौ आवरणों (Enclosures) और उनके देवताओं की स्तुति करता है। यह श्री चक्र की शाब्दिक अर्चना मानी जाती है।

8. साधना में किस रंग के आसन का प्रयोग करें?

माँ त्रिपुरसुन्दरी की साधना के लिए 'लाल' (Red) रंग का ऊनी आसन सर्वश्रेष्ठ है। यह शक्ति और रजस गुण का प्रतीक है।

9. क्या यह पाठ दांपत्य जीवन के लिए लाभकारी है?

हाँ, यह देवी कामेश्वर-कामेश्वरी का युगल रूप हैं। इनका पाठ वैवाहिक सुख, प्रेम और परिवार में शांति के लिए अत्यंत लाभकारी है।

10. इस स्तोत्र में 'कामकला' का क्या अर्थ है?

'कामकला' सृजन की वह आदि शक्ति है जो शिव और शक्ति के मिलन से उत्पन्न होती है। यह ब्रह्मांड की उत्पत्ति का बीज है जिसकी उपासना इस स्तोत्र में की गई है।