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Tripura Sundari Pancharatna Stotram – श्री त्रिपुरसुन्दरी पञ्चरत्न स्तोत्रम्

Tripura Sundari Pancharatna Stotram: Adi Shankaracharya's 5 Jewels of Praise

Tripura Sundari Pancharatna Stotram – श्री त्रिपुरसुन्दरी पञ्चरत्न स्तोत्रम्
॥ श्री त्रिपुरसुन्दरी पञ्चरत्न स्तोत्रम् ॥ नीलालकां शशिमुखीं नवपल्लवोष्ठीं चाम्पेयपुष्पसुषमोज्ज्वलदिव्यनासाम् । पद्मेक्षणां मुकुरसुन्दरगण्डभागां त्वां साम्प्रतं त्रिपुरसुन्दरि देवि वन्दे ॥ १ ॥ श्रीकुन्दकुड्मलशिखोज्ज्वलदन्तबृन्द- -मन्दस्मितद्युतितिरोहितचारुवाणीम् । नानामणिस्थगितहारसुचारुकण्ठीं त्वां साम्प्रतं त्रिपुरसुन्दरि देवि वन्दे ॥ २ ॥ पीनस्तनीं घनभुजां विपुलाब्जहस्तां भृङ्गावलीजितसुशोभितरोमराजिम् । मत्तेभकुम्भकुचभारसुनम्रमध्यां त्वां साम्प्रतं त्रिपुरसुन्दरि देवि वन्दे ॥ ३ ॥ रम्भोज्ज्वलोरुयुगलां मृगराजपत्रा- -मिन्द्रादिदेवमकुटोज्ज्वलपादपद्माम् । हेमाम्बरां घनघृताञ्चितखड्गवल्लीं त्वां साम्प्रतं त्रिपुरसुन्दरि देवि वन्दे ॥ ४ ॥ मत्तेभवक्त्रजननीं मृडदेहयुक्तां शैलाग्रमध्यनिलयां वरसुन्दराङ्गीम् । कोटीश्वराख्यहृदिसंस्थितपादपद्मां त्वां साम्प्रतं त्रिपुरसुन्दरि देवि वन्दे ॥ ५ ॥ बाले त्वत्पादयुगलं ध्यात्वा सम्प्रति निर्मितम् । नवीनं पञ्चरत्नं च धार्यतां चरणद्वये ॥ ६ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्री त्रिपुरसुन्दरी पञ्चरत्न स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री त्रिपुरसुन्दरी पञ्चरत्न स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री त्रिपुरसुन्दरी पञ्चरत्न स्तोत्रम् (Tripura Sundari Pancharatna Stotram) प्रसिद्ध अद्वैत वेदांती आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक अत्यंत मधुर और प्रभावशाली स्तोत्र है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है - 'पञ्चरत्न' - यह 5 बहुमूल्य रत्नों (श्लोकों) का एक संग्रह है।

इस स्तोत्र में शंकराचार्य जी ने देवी त्रिपुरसुन्दरी (ललिता/षोडशी) के नख-शिख सौन्दर्य का वर्णन किया है। उनके नीले बाल (नीलालकां), चन्द्रमा जैसा मुख (शशिमुखी), नए पत्तों जैसे होंठ (नवपल्लवोष्ठी) और कमल जैसे नेत्रों (पद्मेक्षणां) का वर्णन पढ़कर साधक का मन देवी के स्वरूप में लीन हो जाता है।

अंतिम श्लोक में इसे 'नवीनं पञ्चरत्नं' कहा गया है और प्रार्थना की गई है कि देवी "बाले" (हे बाला!) इसे अपने चरणों में धारण करें।

विशिष्ट महत्व (Significance)

सौन्दर्य लहरी का सार: यह छोटा सा स्तोत्र आदि शंकराचार्य की प्रसिद्ध रचना 'सौन्दर्य लहरी' के भावों को ही संक्षेप में प्रस्तुत करता प्रतीत होता है। यह देवी के सगुण साकार रूप की उपासना है।

श्री विद्या प्रवेश: यह स्तोत्र श्री विद्या साधना में प्रवेश करने वाले साधकों के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह देवी के स्थूल रूप का ध्यान कराता है, जो चित्त की एकाग्रता (सविकल्प समाधि) के लिए आवश्यक है।

भोग और मोक्ष: त्रिपुरसुन्दरी को 'राजराजेश्वरी' कहा जाता है। उनकी उपासना से साधक को इस लोक में भोग (भौतिक सुख) और अंत में मोक्ष (मुक्ति) दोनों प्राप्त होते हैं।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • विवाह बाधा निवारण: यह स्तोत्र विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने और सुयोग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए अचूक माना जाता है।

  • दाम्पत्य सुख: पति-पत्नी के बीच प्रेम और सामंजस्य बढ़ाने के लिए भी इसका पाठ लाभकारी है।

  • धन और ऐश्वर्य: देवी की कृपा से घर में धन, धान्य और सुख-समृद्धि का वास होता है (दारिद्र्य नाश)।

  • सौन्दर्य और आकर्षण: साधक के व्यक्तित्व में एक दिव्य आकर्षण और तेज उत्पन्न होता है।

  • शत्रु और बाधा नाश: जीवन की कठिनाइयों और शत्रुओं का शमन होता है।

  • मानसिक शांति: देवी के सौन्दर्य का ध्यान मन को शांत और प्रसन्न करता है।

पाठ विधि (Ritual Method)

  • शुभ दिन: शुक्रवार और पूर्णिमा इस साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं। नवरात्रि में इसका निशीथ काल (रात्रि) में पाठ विशेष फलदायी है।

  • पूजन: देवी के चित्र या श्री यंत्र के सामने घी का दीपक जलाएं। लाल फूल (गुड़हल या गुलाब) अर्पित करें।

  • ध्यान: स्तोत्र के अर्थ का चिंतन करते हुए देवी के रूप का मानस पटल पर ध्यान करें।

  • कुमकुमार्चन: संभव हो तो 'ललिता सहस्रनाम' या देवी के 108 नामों के साथ कुमकुम से अर्चन करें, फिर इस स्तोत्र का पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. त्रिपुरसुन्दरी पञ्चरत्न स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस स्तोत्र के रचयिता श्री आदि शंकराचार्य हैं। उन्होंने देवी के सौन्दर्य और महिमा का वर्णन 5 अद्भुत श्लोकों में किया है।

2. 'पञ्चरत्न' का क्या अर्थ है?

'पञ्चरत्न' का अर्थ है 5 रत्न। ये पांच श्लोक रत्नों के समान बहुमूल्य और फलदायी हैं। अंतिम श्लोक इसे 'नवीनं पञ्चरत्नं' कहता है।

3. क्या यह स्तोत्र विवाह के लिए लाभकारी है?

हाँ, विवाह में देरी या बाधाओं को दूर करने के लिए यह स्तोत्र अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। सुयोग्य वर/वधू की प्राप्ति के लिए भक्त इसका संकल्प लेकर पाठ करते हैं।

4. इस स्तोत्र का सटीक पाठ समय क्या है?

सामान्यतः प्रातःकाल पूजा के समय। विशेष कामना सिद्धि के लिए शुक्रवार की शाम या नवरात्रि की रात्रि में इसका पाठ करना चाहिए।

5. देवी को 'त्रिपुरसुन्दरी' क्यों कहते हैं?

क्योंकि वे तीनों लोकों (त्रिपुर) - स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल - में सबसे सुंदर हैं। 'त्रिपुर' का अर्थ तीन अवस्थाओं (जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति) का स्वामी भी है।

6. क्या स्त्रियाँ और पुरुष दोनों इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, देवी की भक्ति कोई भी कर सकता है। पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ सभी के लिए यह पाठ खुला है।

7. क्या इसके लिए गुरु दीक्षा अनिवार्य है?

यह एक स्तोत्र है, बीज मंत्र नहीं। इसलिए सामान्य पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है। हालांकि, श्री विद्या साधना के लिए गुरु आवश्यक हैं।

8. 'मत्तेभकुम्भकुचभार...' का क्या अर्थ है?

यह देवी के मातृत्व और पोषण स्वरूप का वर्णन है। कवि ने उपमाओं के माध्यम से देवी के दिव्य शारीरिक सौन्दर्य की स्तुति की है।

9. क्या यह धन प्राप्ति में सहायक है?

हाँ, देवी को 'महालक्ष्मी' स्वरूप भी माना जाता है। उनकी कृपा से दारिद्र्य (गरीबी) का नाश होता है और वैभव प्राप्त होता है।

10. पाठ के साथ कौन सा प्रसाद चढ़ाना चाहिए?

देवी को खीर, दूध, शहद या कोई भी सात्विक मिठाई प्रिय है। सबसे महत्वपूर्ण 'भाव' का प्रसाद है।