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Sri Shodashi Ashtottara Shatanamavali – श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनामावली

Sri Shodashi Ashtottara Shatanamavali: 108 Sacred Names of Maha Tripura Sundari

Sri Shodashi Ashtottara Shatanamavali – श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनामावली
॥ श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनामावली ॥ ओं त्रिपुरायै नमः । ओं षोडश्यै नमः । ओं मात्रे नमः । ओं त्र्यक्षरायै नमः । ओं त्रितयायै नमः । ओं त्रय्यै नमः । ओं सुन्दर्यै नमः । ओं सुमुख्यै नमः । ओं सेव्यायै नमः । ९ ओं सामवेदपरायणायै नमः । ओं शारदायै नमः । ओं शब्दनिलयायै नमः । ओं सागरायै नमः । ओं सरिदम्बरायै नमः । ओं शुद्धायै नमः । ओं शुद्धतनवे नमः । ओं साध्व्यै नमः । ओं शिवध्यानपरायणायै नमः । १८ ओं स्वामिन्यै नमः । ओं शम्भुवनितायै नमः । ओं शाम्भव्यै नमः । ओं सरस्वत्यै नमः । ओं समुद्रमथिन्यै नमः । ओं शीघ्रगामिन्यै नमः । ओं शीघ्रसिद्धिदायै नमः । ओं साधुसेव्यायै नमः । ओं साधुगम्यायै नमः । २७ ओं साधुसन्तुष्टमानसायै नमः । ओं खट्वाङ्गधारिण्यै नमः । ओं खर्वायै नमः । ओं खड्गखर्परधारिण्यै नमः । ओं षड्वर्गभावरहितायै नमः । ओं षड्वर्गपरिचारिकायै नमः । ओं षड्वर्गायै नमः । ओं षडङ्गायै नमः । ओं षोढायै नमः । ३६ ओं षोडशवार्षिक्यै नमः । ओं क्रतुरूपायै नमः । ओं क्रतुमत्यै नमः । ओं ऋभुक्षक्रतुमण्डितायै नमः । ओं कवर्गादिपवर्गान्तायै नमः । ओं अन्तःस्थायै नमः । ओं अनन्तरूपिण्यै नमः । ओं अकाराकाररहितायै नमः । ओं कालमृत्युजरापहायै नमः । ४५ ओं तन्व्यै नमः । ओं तत्त्वेश्वर्यै नमः । ओं तारायै नमः । ओं त्रिवर्षायै नमः । ओं ज्ञानरूपिण्यै नमः । ओं काल्यै नमः । ओं कराल्यै नमः । ओं कामेश्यै नमः । ओं छायायै नमः । ५४ ओं सञ्ज्ञायै नमः । ओं अरुन्धत्यै नमः । ओं निर्विकल्पायै नमः । ओं महावेगायै नमः । ओं महोत्साहायै नमः । ओं महोदर्यै नमः । ओं मेघायै नमः । ओं बलाकायै नमः । ओं विमलायै नमः । ६३ ओं विमलज्ञानदायिन्यै नमः । ओं गौर्यै नमः । ओं वसुन्धरायै नमः । ओं गोप्त्र्यै नमः । ओं गवां पतिनिषेवितायै नमः । ओं भगाङ्गायै नमः । ओं भगरूपायै नमः । ओं भक्तिपरायणायै नमः । ओं भावपरायणायै नमः । ७२ ओं छिन्नमस्तायै नमः । ओं महाधूमायै नमः । ओं धूम्रविभूषणायै नमः । ओं धर्मकर्मादिरहितायै नमः । ओं धर्मकर्मपरायणायै नमः । ओं सीतायै नमः । ओं मातङ्गिन्यै नमः । ओं मेधायै नमः । ओं मधुदैत्यविनाशिन्यै नमः । ८१ ओं भैरव्यै नमः । ओं भुवनायै नमः । ओं मात्रे नमः । ओं अभयदायै नमः । ओं भवसुन्दर्यै नमः । ओं भावुकायै नमः । ओं बगलायै नमः । ओं कृत्यायै नमः । ओं बालायै नमः । ९० ओं त्रिपुरसुन्दर्यै नमः । ओं रोहिण्यै नमः । ओं रेवत्यै नमः । ओं रम्यायै नमः । ओं रम्भायै नमः । ओं रावणवन्दितायै नमः । ओं शतयज्ञमय्यै नमः । ओं सत्त्वायै नमः । ओं शतक्रतुवरप्रदायै नमः । ९९ ओं शतचन्द्राननायै नमः । ओं देव्यै नमः । ओं सहस्रादित्यसन्निभायै नमः । ओं सोमसूर्याग्निनयनायै नमः । ओं व्याघ्रचर्माम्बरावृतायै नमः । ओं अर्धेन्दुधारिण्यै नमः । ओं मत्तायै नमः । ओं मदिरायै नमः । ओं मदिरेक्षणायै नमः । १०८ ॥ इति श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥

श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनामावली - परिचय (Introduction)

श्री षोडशी अष्टोत्तरशतनामावली दश महाविद्याओं में तृतीय, परम सौम्य और राजराजेश्वरी स्वरुप माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी (Maa Lalita Tripura Sundari) की आराधना का एक परम पवित्र माध्यम है। 'षोडशी' शब्द का शाब्दिक अर्थ है 'सोलह'। यह देवी पूर्णता का प्रतीक हैं क्योंकि चंद्रमा की सोलह कलाएं (16 phases) इन्हीं में पूर्ण होती हैं। साथ ही, वे सदा 16 वर्ष की किशोरी के रूप में भी रहती हैं, जो जीवन की सबसे सुंदर, ऊर्जावान और निर्दोष अवस्था मानी जाती है।
तांत्रिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव और माता पार्वती का अर्धनारीश्वर रूप पूर्ण होता है, या जब वे अपने कामेश्वर और कामेश्वरी रूप में सृजन की इच्छा रखते हैं, तो त्रिपुरसुन्दरी प्रकट होती हैं। उनका सौंदर्य इतना अलौकिक है कि वे "तीनों लोकों में सबसे सुंदर" (त्रिपुर-सुन्दरी) मानी जाती हैं। उनकी आभा उगते हुए हजारों सूर्यों (सहस्रादित्य) के समान देदीप्यमान है, फिर भी वे भक्तों के लिए शीतल चंद्रमा के समान सुखदाई हैं।
यह नामावली (list of names) कोई साधारण स्तुति नहीं है। इसमें 'श्री विद्या' परंपरा के गूढ़ रहस्य छिपे हैं। श्री विद्या तंत्र साधना की वह शाखा है जो मानती है कि ब्रह्मांड एक दिव्य ज्यामितीय संरचना (श्री यंत्र) है, और त्रिपुरसुन्दरी उस यंत्र की मध्य बिन्दु में निवास करने वाली परम ऊर्जा हैं। वे भोग (भौतिक सुख) और मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) दोनों देने वाली एकमात्र देवी हैं।

विशिष्ट महत्व (Significance)

श्री यंत्र की अधिष्ठात्री: षोडशी साधना का सीधा संबंध श्री यंत्र (Sri Chakra) से है। यह ब्रह्मांड का सबसे जटिल और शक्तिशाली यंत्र है। जब साधक नामावली का पाठ करता है, तो वह मानसिक रूप से श्री यंत्र की नौ परतों (नवावरण) की यात्रा करता है। प्रत्येक नाम उस यंत्र की एक विशेष ऊर्जा का आह्वान है।
दश महाविद्या क्रम: महाविद्या क्रम में काली 'काल' (समय) हैं, तारा 'शब्द' (ध्वनि) हैं, और षोडशी 'पूर्णता' या 'श्री' (लक्ष्मी/सौंदर्य) हैं। काली और तारा उग्र विद्याएं हैं, जबकि षोडशी सौम्य विद्या हैं। गृहस्थ साधकों के लिए षोडशी साधना अत्यंत सुरक्षित और फलदायी मानी गई है क्योंकि वे माता के समान पालन करती हैं।
ब्रह्म ज्ञान और आनंद: षोडशी को 'ललिता' इसलिए कहा जाता है क्योंकि वे सृष्टि के साथ 'लीला' (Divine Play) करती हैं। उनका साधक संसार को त्यागता नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए भी ब्रह्मानंद का अनुभव करता है। शंकराचार्य ने 'सौंदर्य लहरी' में इन्हीं देवी की स्तुति की है।

फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)

  • अतुलनीय सौंदर्य और आकर्षण: माँ त्रिपुरसुन्दरी सौंदर्य की अधिष्ठात्री हैं। उनके नामावली पाठ से साधक के व्यक्तित्व में एक दिव्य तेज (Ojas) और चुम्बकीय आकर्षण (Vashikaran Shakti) उत्पन्न होता है। लोग उसकी ओर स्वतः आकर्षित होते हैं।
  • अखंड राजयोग और ऐश्वर्य: इन्हें 'राजराजेश्वरी' कहा जाता है। इनकी उपासना से दरिद्रता का नाश होता है और साधक को राजा के समान मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा और भौतिक सुख प्राप्त होते हैं।
  • वाक्सिद्धि और ज्ञान: इनके हाथों में पाश, अंकुश, धनुष और बाण हैं जो मन, बुद्धि और वाणी के प्रतीक हैं। पाठ करने वाले की वाणी सिद्ध हो जाती है - वह जो बोलता है, सत्य होता है। कवित्व और लेखन क्षमता का अद्भुत विकास होता है।
  • सुखी दांपत्य जीवन: यह देवी कामेश्वर-कामेश्वरी का युग्म रूप हैं। इनके आशीर्वाद से पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ता है और विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं। योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए भी यह पाठ अचूक है।
  • मोक्ष प्राप्ति: अंततः, यह साधना जीव को शिव से मिलाती है। यह जीवन-मरण के चक्र से मुक्त कर 'सायुज्य मुक्ति' प्रदान करती है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Method)

साधना की सफलता के लिए सही विधि का पालन आवश्यक है:
  • दैनिक पाठ: ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व) या संध्या काल में पाठ करना उत्तम है।
  • वस्त्र और आसन: साधक को शुद्ध होकर लाल वस्त्र धारण करने चाहिए और लाल ऊनी आसन पर बैठना चाहिए।
  • दिशा: पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • अर्चना (Archana): यह नामावली 'अर्चना' के लिए सर्वश्रेष्ठ है। एक श्री यंत्र या माँ त्रिपुरसुन्दरी का चित्र स्थापित करें। प्रत्येक नाम के साथ (जैसे - ओं त्रिपुरायै नमः) कुमकुम, लाल फूल (गुड़हल/कमल), या अक्षत (लाल रंगे हुए चावल) यंत्र के मध्य में अर्पित करें।
  • नैवेद्य: देवी को खीर, दूध, शहद या पान का भोग अति प्रिय है।
  • विशेष तिथियां: प्रत्येक शुक्रवार, पूर्णिमा (Full Moon), और नवरात्रि (विशेषकर पंचमी, सप्तमी और नवमी तिथि) इस पाठ के लिए अत्यंत प्रभावशाली हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. षोडशी देवी को 'त्रिपुरसुन्दरी' क्यों कहा जाता है?

वे तीनों लोकों (स्वर्ग, मर्त्य, पाताल), तीनों कालों (भूत, भविष्य, वर्तमान) और तीनों गुणों (सत्व, रज, तम) में सबसे अधिक सुंदर हैं, इसलिए उन्हें 'त्रिपुरसुन्दरी' कहा जाता है। साथ ही वे शिव, शक्ति और शिव-शक्ति के सामरस्य रूपी तीन पुरों की स्वामिनी हैं।

2. श्री विद्या और षोडशी साधना में क्या संबंध है?

श्री विद्या (Sri Vidya) साधना की अधिष्ठात्री देवी षोडशी ही हैं। श्री यंत्र (Sri Chakra) इनका ही निवास और स्वरूप है। यह तांत्रिक साधना की सर्वोच्च प्रणाली है जो भोग और मोक्ष दोनों एक साथ प्रदान करती है।

3. 'षोडशी' नाम का क्या रहस्य है?

'षोडशी' का अर्थ है सोलह। देवी सदा सोलह वर्ष की किशोरी के रूप में रहती हैं। यह अवस्था पूर्ण यौवन, निर्दोषता और असीम संभावनाओं का प्रतीक है। सोलह कलाएं (चंद्रमा की) भी इन्ही में पूर्ण होती हैं।

4. क्या इस नामावली का पाठ बिना गुरु दीक्षा के कर सकते हैं?

नामावली (108 नाम) का पाठ भक्ति भाव से कोई भी कर सकता है। लेकिन, 'श्री विद्या' के बीज मंत्र (जैसे पञ्चदशी या षोडशी मंत्र) का जाप केवल योग्य गुरु से दीक्षा लेकर ही करना चाहिए।

5. पाठ के लिए श्रेष्ठ दिन कौन सा है?

शुक्रवार (Friday) और पूर्णिमा (Full Moon) देवी त्रिपुरसुन्दरी की उपासना के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं। नवरात्रि (विशेषकर महालया) और गुप्त नवरात्रि में इसका विशेष महत्व है।

6. इस पाठ से क्या फल मिलता है?

इसके पाठ से 'वाक्सिद्धि' (वाणी की शक्ति), अपार धन-संपत्ति, आकर्षण शक्ति (सममोहन), और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह साधक को 'चक्रवर्ती राजा' के समान ऐश्वर्य देता है।

7. क्या ललिता सहस्रनाम और षोडशी नामावली एक ही है?

नहीं। ललिता सहस्रनाम में 1000 नाम हैं और यह ब्रह्मांड पुराण का हिस्सा है। षोडशी अष्टोत्तरशतनामावली में 108 मुख्य नाम हैं जो तंत्र शास्त्र से उद्धृत हैं। नित्य कम समय में पूजा करने के लिए अष्टोत्तर नामावली श्रेष्ठ है।

8. साधना में कौन से रंग का प्रयोग करें?

माँ त्रिपुरसुन्दरी को 'लाल' (Red) रंग अत्यंत प्रिय है। लाल वस्त्र, लाल पुष्प (विशेषकर कमल या जपापुष्प), लाल चंदन और कुमकुम का प्रयोग साधना में शीघ्र फलदायी होता है।

9. 'कामेश्वरी' नाम का क्या अर्थ है?

कामेश्वरी (Kameshwari) का अर्थ है - इच्छाओं की स्वामिनी। भगवान शिव (कामेश्वर) के साथ मिलकर जो समस्त कामनाओं को पूर्ण करती हैं और सृष्टि का सृजन करती हैं, वे कामेश्वरी हैं।

10. श्री यंत्र पर अर्चना कैसे करें?

श्री यंत्र के मध्य (बिंदु) में या मेरु पर कुमकुम से एक-एक नाम बोलकर 'नमः' के साथ अर्पण करें। इसे 'कुंकुमार्चन' कहते हैं, जो देवी को सबसे अधिक प्रसन्न करता है।