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Sri Shaligrama Stotram – श्री शालिग्राम स्तोत्रम्: पाप निवारण और विष्णु कृपा का अमोघ मंत्र

Sri Shaligrama Stotram – श्री शालिग्राम स्तोत्रम्: पाप निवारण और विष्णु कृपा का अमोघ मंत्र
॥ श्री शालिग्राम स्तोत्रम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीशालिग्रामस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीभगवान् ऋषिः श्रीनारायणो देवता अनुष्टुप् छन्दः श्रीशालिग्रामस्तोत्रमन्त्र जपे विनियोगः । युधिष्ठिर उवाच । श्रीदेवदेव देवेश देवतार्चनमुत्तमम् । तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि ब्रूहि मे पुरुषोत्तम ॥ १ ॥ श्रीभगवानुवाच । गण्डक्यां चोत्तरे तीरे गिरिराजस्य दक्षिणे । दशयोजनविस्तीर्णा महाक्षेत्रवसुन्धरा ॥ २ ॥ शालिग्रामो भवेद्देवो देवी द्वारावती भवेत् । उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः ॥ ३ ॥ शालिग्रामशिला यत्र यत्र द्वारावती शिला । उभयोः सङ्गमो यत्र मुक्तिस्तत्र न संशयः ॥ ४ ॥ आजन्मकृतपापानां प्रायश्चित्तं य इच्छति । शालिग्रामशिलावारि पापहारि नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥ अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । विष्णोः पादोदकं पीत्वा शिरसा धारयाम्यहम् ॥ ६ ॥ शङ्खमध्ये स्थितं तोयं भ्रामितं केशवोपरि । अङ्गलग्नं मनुष्याणां ब्रह्महत्यादिकं दहेत् ॥ ७ ॥ स्नानोदकं पिबेन्नित्यं चक्राङ्कितशिलोद्भवम् । प्रक्षाल्य शुद्धं तत्तोयं ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥ ८ ॥ अग्निष्टोमसहस्राणि वाजपेयशतानि च । सम्यक् फलमवाप्नोति विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात् ॥ ९ ॥ नैवेद्ययुक्तां तुलसीं च मिश्रितां विशेषतः पादजलेन विष्णोः । योऽश्नाति नित्यं पुरतो मुरारेः प्राप्नोति यज्ञायुतकोटिपुण्यम् ॥ १० ॥ खण्डिता स्फुटिता भिन्ना वह्निदग्धा तथैव च । शालिग्रामशिला यत्र तत्र दोषो न विद्यते ॥ ११ ॥ न मन्त्रः पूजनं नैव न तीर्थं न च भावना । न स्तुतिर्नोपचारश्च शालिग्रामशिलार्चने ॥ १२ ॥ ब्रह्महत्यादिकं पापं मनोवाक्कायसम्भवम् । शीघ्रं नश्यति तत्सर्वं शालिग्रामशिलार्चनात् ॥ १३ ॥ नानावर्णमयं चैव नानाभोगेन वेष्टितम् । तथा वरप्रसादेन लक्ष्मीकान्तं वदाम्यहम् ॥ १४ ॥ नारायणोद्भवो देवश्चक्रमध्ये च कर्मणा । तथा वरप्रसादेन लक्ष्मीकान्तं वदाम्यहम् ॥ १५ ॥ कृष्णे शिलातले यत्र सूक्ष्मं चक्रं च दृश्यते । सौभाग्यं सन्ततिं धत्ते सर्वसौख्यं ददाति च ॥ १६ ॥ वासुदेवस्य चिह्नानि दृष्ट्वा पापैः प्रमुच्यते । श्रीधरः सूकरे वामे हरिद्वर्णस्तु दृश्यते ॥ १७ ॥ वराहरूपिणं देवं कूर्माङ्गैरपि चिह्नितम् । गोपदं तत्र दृश्येत वाराहं वामनं तथा ॥ १८ ॥ पीतवर्णं तु देवानां रक्तवर्णं भयावहम् । नारसिंहोऽभवद्देवो मोक्षदं च प्रकीर्तितम् ॥ १९ ॥ शङ्खचक्रगदाकूर्माः शङ्खो यत्र प्रदृश्यते । शङ्खवर्णस्य देवानां वामे देवस्य लक्षणम् ॥ २० ॥ दामोदरं तथा स्थूलं मध्ये चक्रं प्रतिष्ठितम् । पूर्णद्वारेण सङ्कीर्णा पीतरेखा च दृश्यते ॥ २१ ॥ छत्राकारे भवेद्राज्यं वर्तुले च महाश्रियः । कपटे च महादुःखं शूलाग्रे तु रणं ध्रुवम् ॥ २२ ॥ ललाटे शेषभोगस्तु शिरोपरि सुकाञ्चनम् । चक्रकाञ्चनवर्णानां वामदेवस्य लक्षणम् ॥ २३ ॥ वामपार्श्वे च वै चक्रे कृष्णवर्णस्तु पिङ्गलम् । लक्ष्मीनृसिंहदेवानां पृथग्वर्णस्तु दृश्यते ॥ २४ ॥ लम्बोष्ठे च दरिद्रं स्यात्पिङ्गले हानिरेव च । लग्नचक्रे भवेद्व्याधिर्विदारे मरणं ध्रुवम् ॥ २५ ॥ पादोदकं च निर्माल्यं मस्तके धारयेत्सदा । विष्णोर्दृष्टं भक्षितव्यं तुलसीदलमिश्रितम् ॥ २६ ॥ कल्पकोटिसहस्राणि वैकुण्ठे वसते सदा । शालिग्रामशिलाबिन्दुर्हत्याकोटिविनाशनः ॥ २७ ॥ तस्मात्सम्पूजयेद्ध्यात्वा पूजितं चापि सर्वदा । शालिग्रामशिलास्तोत्रं यः पठेच्च द्विजोत्तमः ॥ २८ ॥ स गच्छेत्परमं स्थानं यत्र लोकेश्वरो हरिः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥ २९ ॥ दशावतारो देवानां पृथग्वर्णस्तु दृश्यते । ईप्सितं लभते राज्यं विष्णुपूजामनुक्रमात् ॥ ३० ॥ कोट्यो हि ब्रह्महत्यानामगम्यागम्यकोटयः । ताः सर्वा नाशमायान्ति विष्णोर्नैवेद्यभक्षणात् ॥ ३१ ॥ विष्णोः पादोदकं पीत्वा कोटिजन्माघनाशनम् । तस्मादष्टगुणं पापं भूमौ बिन्दुनिपातनात् ॥ ३२ ॥ ॥ इति श्री शालिग्राम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री शालिग्राम स्तोत्रम् की दिव्य महिमा (Introduction)

श्री शालिग्राम स्तोत्रम् (Sri Shaligrama Stotram) भविष्योत्तर पुराण का एक अत्यंत पावन हिस्सा है। यह स्तोत्र भगवान श्री कृष्ण और युधिष्ठिर के बीच संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है। शालिग्राम शिला केवल एक पाषाण नहीं है, बल्कि यह भगवान विष्णु का साक्षात् निर्गुण और सगुण रूप है। गंडकी नदी के तट पर मिलने वाली ये शिलाएं स्वयं सिद्ध मानी जाती हैं और इनकी पूजा के लिए किसी विशेष प्राण-प्रतिष्ठा की आवश्यकता नहीं होती।

इस स्तोत्र में शालिग्राम की पूजा के अभूतपूर्व आध्यात्मिक लाभों का वर्णन है। श्लोक संख्या ५ और ६ में स्पष्ट कहा गया है कि शालिग्राम का पादोदक (चरणामृत) अकाल मृत्यु को हरने वाला और समस्त व्याधियों का नाश करने वाला है। यह साधक को वह मानसिक शांति और अभय प्रदान करता है जो हज़ारों वर्षों की तपस्या से भी दुर्लभ है।

विशिष्ट महत्व: शिला के लक्षणों का विज्ञान (Significance)

शालिग्राम स्तोत्र हमें शिलाओं के विभिन्न स्वरूपों और उनसे प्राप्त होने वाले फलों का ज्ञान देता है। श्लोक १४ से २४ तक भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों जैसे वराह, नृसिंह, और वामन के चिह्नों वाली शिलाओं का वर्णन है। उदाहरण के लिए:

  • चक्र चिह्न: जिस शिला पर स्पष्ट चक्र हो, वह संतान और सौभाग्य प्रदायक है।
  • छत्राकार: छतरी के आकार वाली शिला राज्य और सामाजिक सम्मान दिलाती है।
  • दोष रहित पूजा: श्लोक ११ हमें सिखाता है कि शालिग्राम शिला यदि खंडित या जली हुई भी हो, तो भी वह उतनी ही पूजनीय और शुभ है।

फलश्रुति: पाठ और पादोदक के लाभ (Benefits)

शास्त्रों के अनुसार इस स्तोत्र के नित्य पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • ब्रह्महत्यादि पाप नाश: शालिग्राम के जल मात्र से बड़े से बड़े पापों का शमन हो जाता है।
  • करोड़ों यज्ञों का फल: शालिग्राम पर चढ़ी तुलसी और उसके चरणामृत के सेवन से कोटि यज्ञों का फल मिलता है।
  • वैकुंठ की प्राप्ति: नित्य पाठ करने वाला अंततः विष्णु लोक को प्राप्त होता है।
  • आरोग्य और सुरक्षा: अकाल मृत्यु के भय को मिटाकर यह स्तोत्र दीर्घायु प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. शालिग्राम स्तोत्रम् का पाठ क्यों किया जाता है?

इसका पाठ पापों से मुक्ति, मानसिक शांति, असाध्य रोगों के निवारण और भगवान विष्णु की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए किया जाता है।

2. शालिग्राम शिला का सबसे बड़ा महत्व क्या है?

यह भगवान विष्णु का साक्षात् स्वरूप है जिसे किसी भी प्रकार के मंत्रों द्वारा 'प्राण-प्रतिष्ठा' की आवश्यकता नहीं होती। यह स्वयं सिद्ध है।

3. क्या खंडित शालिग्राम की पूजा हो सकती है?

जी हाँ, श्लोक ११ के अनुसार, खंडित या जली हुई शालिग्राम शिला की पूजा में कोई दोष नहीं लगता; वह सदैव कल्याणकारी है।

4. शालिग्राम के जल (पादोदक) का क्या फल है?

इसका जल कोटि जन्मों के पापों का नाश करता है और अकाल मृत्यु से सुरक्षा प्रदान करता है।

5. क्या स्त्रियाँ यह पाठ कर सकती हैं?

हाँ, श्रद्धापूर्वक स्तोत्र का पाठ और दर्शन कोई भी कर सकता है। शालिग्राम की भक्ति में कोई भेदभाव नहीं है।

6. शालिग्राम शिला कहाँ से प्राप्त होती है?

यह शिला नेपाल में स्थित गंडकी नदी से प्राप्त होती है।

7. पाठ के लिए सबसे उत्तम समय क्या है?

प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में या पूजा के समय इसका पाठ करना सर्वाधिक फलदायी माना गया है।

8. 'द्वारावती शिला' क्या है?

यह द्वारका में मिलने वाली चक्राङ्कित सफेद शिला है। शालिग्राम और द्वारावती का संगम मोक्ष प्रदायक माना गया है।

9. क्या इस पाठ से असाध्य रोग ठीक होते हैं?

हाँ, श्रद्धापूर्वक किया गया पाठ और चरणामृत का सेवन असाध्य रोगों में चमत्कारिक लाभ देता है।

10. पाठ के दौरान किस रंग के वस्त्र पहनना शुभ है?

भगवान विष्णु की पूजा में पीला रंग अत्यंत प्रिय है, अतः पीले वस्त्र पहनकर पाठ करना सात्विकता बढ़ाता है।