Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Vedanta Desika's Daya Satakam – श्री दया शतकम् (108 Verses on Divine Mercy)

Sri Vedanta Desika's Daya Satakam – श्री दया शतकम् (108 Verses on Divine Mercy)
॥ श्री दया शतकम् ॥ ॥ मंगलाचरणम् ॥ प्रपद्ये तं गिरिं प्रायः श्रीनिवासानुकम्पया । इक्षुसारस्रवन्त्येव यन्मूर्त्या शर्करायितम् ॥ १ ॥ विगाहे तीर्थबहुलां शीतलां गुरुसन्ततिम् । श्रीनिवासदयाम्भोधिपरीवाहपरम्पराम् ॥ २ ॥ कृतिनः कमलावासकारुण्यैकान्तिनो भजे । धत्ते यत्सूक्तिरूपेण त्रिवेदी सर्वयोग्यताम् ॥ ३ ॥ पराशरमुखान्वन्दे भगीरथनये स्थितान् । कमलाकान्तकारुण्यगङ्गाप्लावितमद्विधान् ॥ ४ ॥ अशेषविघ्नशमनमनीकेश्वरमाश्रये । श्रीमतः करुणाम्भोधौ शिक्षास्रोत इवोत्थितम् ॥ ५ ॥ समस्तजननीं वन्दे चैतन्यस्तन्यदायिनीम् । श्रेयसीं श्रीनिवासस्य करुणामिव रूपिणीम् ॥ ६ ॥ वन्दे वृषगिरीशस्य महिषीं विश्वधारिणीम् । तत्कृपाप्रतिघातानां क्षमया वारणं यया ॥ ७ ॥ निशामयतु मां नीला यद्भोगपटलैर्ध्रुवम् । भावितं श्रीनिवासस्य भक्तदोषेष्वदर्शनम् ॥ ८ ॥ कमप्यनवधिं वन्दे करुणावरुणालयम् । वृषशैलतटस्थानां स्वयं व्यक्तिमुपागतम् ॥ ९ ॥ अकिञ्चननिधिं सूतिमपवर्गत्रिवर्गयोः । अञ्जनाद्रीश्वरदयामभिष्टौमि निरञ्जनाम् ॥ १० ॥ अनुचरशक्त्यादिगुणामग्रेसरबोधविरचितालोकाम् । स्वाधीनवृषगिरीशां स्वयं प्रभूतां प्रमाणयामि दयाम् ॥ ११ ॥ अपि निखिललोकसुचरितमुष्टिन्धयदुरितमूर्छनाजुष्टम् । सञ्जीवयतु दये मामञ्जनगिरिनाथरञ्जनी भवती ॥ १२ ॥ भगवति दये भवत्यां वृषगिरिनाथे समाप्लुते तुङ्गे । अप्रतिघमज्जनानां हस्तालम्बो मदागसां मृग्यः ॥ १३ ॥ कृपणजनकल्पलतिकां कृतापराधस्य निष्क्रियामाद्याम् । वृषगिरिनाथदये त्वां विदन्ति संसारतारिणीं विबुधाः ॥ १४ ॥ वृषगिरिगृहमेधिगुणा बोधबलैश्वर्यवीर्यशक्तिमुखाः । दोषा भवेयुरेते यदि नाम दये त्वया विनाभूताः ॥ १५ ॥ आसृष्टि सन्ततानामपराधानां निरोधिनीं जगतः । पद्मासहायकरुणे प्रतिसञ्चरकेलिमाचरसि ॥ १६ ॥ अचिदविशिष्टान्प्रलये जन्तूनवलोक्य जातनिर्वेदा । करणकलेबरयोगं वितरसि वृषशैलनाथकरुणे त्वम् ॥ १७ ॥ अनुगुणदशार्पितेन श्रीधरकरुणे समाहितस्नेहा । शमयसि तमः प्रजानां शास्त्रमयेन स्थिरप्रदीपेन ॥ १८ ॥ रुढा वृषाचलपतेः पादे मुखकान्तिपत्रलच्छाया । करुणे सुखयसि विनताङ्कटाक्षविटपैः करापचेयफलैः ॥ १९ ॥ नयने वृषाचलेन्दोस्तारामैत्रीं दधानया करुणे । दृष्टस्त्वयैव जनिमानपवर्गमकृष्टपच्यमनुभवति ॥ २० ॥ समयोपनतैस्तव प्रवाहैरनुकम्पे कृतसम्प्लवा धरित्री । शरणागतसस्यमालिनीयं वृषशैलेशकृषीवलं धिनोति ॥ २१ ॥ कलशोदधिसम्पदो भवत्याः करुणे सन्मतिमन्थसंस्कृतायाः । अमृतांशमवैमि दिव्यदेहं मृतसञ्जीवनमञ्जनाचलेन्दोः ॥ २२ ॥ जलधेरिव शीतता दये त्वं वृषशैलाधिपतेस्स्वभावभूता । प्रलयारभटींनटीं तदीक्षां प्रसभं ग्राहयसि प्रसक्तिलास्यम् ॥ २३ ॥ प्रणतप्रतिकूलमूलघाती प्रतिघः कोऽपि वृषाचलेश्वरस्य । कलमे यवसापचायनीत्या करुणे किङ्करतां तवोपयाति ॥ २४ ॥ अबहिष्कृतनिग्रहान्विदन्तः कमलाकान्तगुणान्स्वतन्त्रतादीन् । अविकल्पमनुग्रहं दुहानां भवतीमेव दये भजन्ति सन्तः ॥ २५ ॥ करुणे दुरितेषु मामकेषु प्रतिकारान्तरदुर्जयेषु खिन्नः । कवचायितया त्वयैव शार्ङ्गी विजयस्थानमुपाश्रितो वृषाद्रिम् ॥ २८ ॥ मयि तिष्ठति दुष्कृतां प्रधाने मितदोषानितरान्विचिन्वती त्वम् । अपराधगणैरपूर्णकुक्षिः कमलाकान्तदये कथं भवित्री ॥ २९ ॥ अहमस्म्यपराधचक्रवर्ती करुणे त्वं च गुणेषु सार्वभौमी । विदुषी स्थितिमीदृशीं स्वयं मां वृषशैलेश्वरपादसात्कुरु त्वम् ॥ ३० ॥ अशिथिलकरणेऽस्मिन्नक्षतश्वासवृत्तौ वपुषि गमनयोग्ये वासमासादयेयम् । वृषगिरिकटकेषु व्यञ्जयत्सु प्रतीतै- र्मधुमथनदये त्वां वारिधाराविशेषैः ॥ ३१ ॥ अविदितनिजयोगक्षेममात्मानभिज्ञं गुणलवरहितं मां गोप्तुकामा दये त्वम् । परवति चतुरैस्ते विभ्रमैः श्रीनिवासे बहुमतिमनपायां विन्दसि श्रीधरण्योः ॥ ३२ ॥ फलवितरणदक्षं पक्षपातानभिज्ञं प्रगुणमनुविधेयं प्राप्य पद्मासहायम् । महति गुणसमाजे मानपूर्वं दये त्वं प्रतिवदसि यथार्हं पाप्मनां मामकानाम् ॥ ३३ ॥ अनुभवितुमघौघं नालमागामिकालः प्रशमयितुमशेषं निष्क्रियाभिर्न शक्यम् । स्वयमिति हि दये त्वं स्वीकृतश्रीनिवासा शिथिलितभवभीतिश्श्रेयसे जायसे नः ॥ ३४ ॥ अवतरणविशेषैरात्मलीलापदेशै- रवमतिमनुकम्पे मन्दचित्तेषु विन्दन् । वृषभशिखरिनाथस्त्वन्निदेशेन नूनं भजति चरणभाजां भाविनो जन्मभेदान् ॥ ३५ ॥ परहितमनुकम्पे भावयन्त्यां भवत्यां स्थिरमनुपधि हार्दं श्रीनिवासो दधानः । ललितरुचिषु लक्ष्मीभूमिनीलासु नूनं प्रथयति बहुमानं त्वत्प्रतिच्छन्दबुद्ध्या ॥ ३६ ॥ वृषगिरिसविधेषु व्याजतो वासभाजां दुरितकलुषितानां दूयमाना दये त्वम् । करणविलयकाले कान्दिशीकस्मृतीनां स्मरयसि बहुलीलं माधवं सावधाना ॥ ३७ ॥ दिशि दिशि गतिविद्भिर्देशिकैर्नीयमाना स्थिरतरमनुकम्पे स्त्यानलग्ना गुणैस्त्वम् । परिगतवृषशैलं पारमारोपयन्ती भवजलधिगतानां पोतपात्री भवित्री ॥ ३८ ॥ परिमितफलसङ्गात्प्राणिनः किम्पचाना निगमविपणिमध्ये नित्यमुक्तानुषक्तम् । प्रसदनमनुकम्पे प्राप्तवत्यां भवत्यां वृषगिरिहरिनीलं व्यञ्जितं निर्विशन्ति ॥ ३९ ॥ त्वयि बहुमतिहीनः श्रीनिवासानुकम्पे जगति गतिमिहान्यां देवि सम्मन्यते यः । स खलु विबुधसिन्धौ सन्निकर्षे वहन्त्यां शमयति मृगतृष्णावीचिकाभिः पिपासाम् ॥ ४० ॥ नाभीपद्मस्फुरणसुभगा नव्यनीलोत्पलाभा क्रीडाशैलं कमपि करुणे वृण्वती वेङ्कटाख्यम् । शीता नित्यं प्रसदनवती श्रद्धधानावगाह्या दिव्या काचिज्जयति महती दीर्घिका तावकीना ॥ ४३ ॥ यस्मिन्दृष्टे तदितरसुखैर्गम्यते गोष्पदत्वं सत्यं ज्ञानं त्रिभिरवधिभिर्मुक्तमानन्दसिन्धुम् । त्वत्स्वीकारात्तमिह कृतिनस्सूरिबृन्दानुभाव्यं नित्यापूर्वं निधिमिव दये निर्विशन्त्यञ्जनाद्रौ ॥ ४४ ॥ सारं लब्ध्वा कमपि महतः श्रीनिवासाम्बुराशेः काले काले घनरसवती कालिकेवानुकम्पे । व्यक्तोन्मेषा मृगपतिगिरौ विश्वमाप्याययन्ती शीलोपज्ञं क्षरति भवती शीतलं सद्गुणौघम् ॥ ४५ ॥ भीमे नित्यं भवजलनिधौ मज्जतां मानवाना- मालम्बार्थं वृषगिरिपतिस्त्वन्निदेशात्प्रयुङ्क्ते । प्रज्ञासारं प्रकृतिमहता मूलभागेन जुष्टं शाखाभेदैस्सुभगमनघं शाश्वतं शास्त्रपाणिम् ॥ ४६ ॥ दैवात्प्राप्ते वृषगिरितटं देहिनि त्वन्निदाना- त्स्वामिन्पाहीत्यवशवचने विन्दति स्वापमन्त्यम् । देवः श्रीमान् दिशति करुणे दृष्टिमिच्छंस्त्वदीया- मुद्घातेन श्रुतिपरिषदामुत्तरेणाभिमुख्यम् ॥ ४८ ॥ श्रेयस्सूतिं सकृदपि दये सम्मतां यस्सखीं ते शीतोदारामलभत जनः श्रीनिवासस्य दृष्टिम् । देवादीनामयमनृणतां देहवत्त्वेऽपि विन्द- न्बन्धान्मुक्तो बलिभिरनघैः पूर्यते तत्प्रयुक्तैः ॥ ५९ ॥ मृदुहृदये दये मृदितकामहिते महिते धृतविबुधे बुधेषु विततात्मधुरे मधुरे । वृषगिरिसार्वभौमदयिते मयि ते महतीं भवुकनिधे निधेहि भवमूलहरां लहरीम् ॥ ६० ॥ वेदान्तदेशिकपदे विनिवेश्य बालं देवो दयाशतकमेतदवादयन्माम् । वैहारिकेण विधिना समये गृहीतं वीणाविशेषमिव वेङ्कटशैलनाथः ॥ १०४ ॥ अनवधिमधिकृत्य श्रीनिवासानुकम्पा- मवितथविषयत्वाद्विश्वमव्रीलयन्ती । विविधकुशलनीवी वेङ्कटेशप्रसूता स्तुतिरियमनवद्या शोभते सत्वभाजाम् ॥ १०५ ॥ शतकमिदमुदारं सम्यगभ्यस्यमानान् वृषगिरिमधिरुह्य व्यक्तमालोकयन्ती । अनितरशरणानामाधिराज्येऽभिषिञ्चे- च्छमितविमतपक्षा शार्ङ्गधन्वानुकम्पा ॥ १०६ ॥ विश्वानुग्रहमातरं व्यतिषजत्स्वर्गापवर्गां सुधा- सध्रीचीमिव वेङ्कटेश्वरकविर्भक्त्या दयामस्तुत । पद्मानामिह यद्विधेयभगवत्सङ्कल्पकल्पद्रुमा- ज्जञ्झामारुतधूतचूतनयतस्साम्पातिकोऽयं क्रमः ॥ १०७ ॥ कामं सन्तु मिथः करम्बितगुणावद्यानि पद्यानि नः कस्यास्मिन् शतके सदम्बुकतके दोषश्रुतिं क्षाम्यति । निष्प्रत्यूहवृषाद्रिनिर्झरझरत्कारच्छलेनोच्चल- द्दीनालम्बनदिव्यदम्पतिदयाकल्लोलकोलाहलः ॥ १०८ ॥ ॥ इति श्री वेदान्तदेशिक विरचितं दयाशतकं सम्पूर्णम् ॥

दया शतकम्: स्वामी वेदान्त देशिक की करुणामयी अभिव्यक्ति (Introduction)

दया शतकम् (Daya Satakam) वैष्णव संप्रदाय के महान संत स्वामी वेदान्त देशिक की सबसे कालजयी रचनाओं में से एक है। १०८ श्लोकों का यह महाकाव्य तिरुमाला के अधिपति भगवान श्री वेंकटेश्वर (श्रीनिवास) की 'दया' (Mercy) को समर्पित है। वेदान्त देशिक जी ने इस ग्रंथ में एक अत्यंत क्रांतिकारी दार्शनिक विचार प्रस्तुत किया है— उन्होंने भगवान के अन्य सभी गुणों (जैसे उनका ज्ञान, शक्ति और ऐश्वर्य) के ऊपर उनकी 'दया' को सर्वोच्च स्थान दिया है। उनका तर्क है कि यदि भगवान में केवल शक्ति और न्याय होता, तो हम जैसे पापी जीवात्माओं का कभी उद्धार नहीं हो पाता।

रचना का स्वरूप: दया शतकम् १० 'दशकों' में विभाजित है। प्रत्येक दशक भगवान की दया के एक विशिष्ट पहलू का वर्णन करता है। स्तोत्र का प्रारंभ ही भगवान को "श्रीनिवास" कहकर होता है, जहाँ 'श्री' (लक्ष्मी) और 'निवास' (आधार) के मिलन से करुणा का जन्म होता है। श्लोक ६ में वे दया को 'समस्त जननी' कहते हैं, जो अपने भक्तों को ज्ञान रूपी पोषण प्रदान करती है। तिरुमाला पर्वत, जिसे हम शेषाद्रि कहते हैं, आचार्य के अनुसार साक्षात् भगवान की दया का घनीभूत रूप है।

दार्शनिक गहराई: यह स्तोत्र "विशिष्टाद्वैत" दर्शन के 'प्रपत्ति' (पूर्ण शरणागति) मार्ग का जीवंत उदाहरण है। आचार्य देशिक स्वयं को "अपराधचक्रवर्ती" (पापों का सम्राट) कहते हैं और भगवान की दया को "गुणों की सार्वभौमी" मानते हैं। यह विनम्रता ही इस स्तोत्र की आत्मा है। आध्यात्मिक विशेषज्ञों के अनुसार, दया शतकम् का पाठ मनुष्य के हृदय से अहंकार और भय को मिटाकर उसे कोमलता और विश्वास से भर देता है। यह ग्रंथ यह सुनिश्चित करता है कि चाहे हम कितने भी दोषपूर्ण क्यों न हों, यदि हम भगवान श्रीनिवास की 'दया' की शरण में हैं, तो हमारा कल्याण निश्चित है।

विशिष्ट महत्व: दया और न्याय का संतुलन (Significance)

दया शतकम् का विशिष्ट महत्व इस बात में है कि यह "ईश्वर के भय" को "ईश्वर के प्रेम" में बदल देता है। आचार्य देशिक के अनुसार, यदि 'दया' न हो, तो भगवान के अन्य गुण जैसे 'ऐश्वर्य' और 'वीर्य' हमारे लिए भयावह हो सकते हैं। भगवान वेंकटेश्वर की दया ही वह तत्व है जो उनके 'स्वातंत्र्य' (स्वतंत्र इच्छा) को भक्तों के प्रति वात्सल्य में बदल देती है।

इस स्तोत्र का एक और महत्वपूर्ण पक्ष "गुरु-परम्परा" का सम्मान है। श्लोक २ में आचार्य गुरुओं की श्रृंखला को दया की उस शीतल धारा के रूप में देखते हैं जो श्रीनिवास रूपी महासागर से निकलकर हम तक पहुँचती है। यह पाठ उन लोगों के लिए विशेष फलदायी है जो जीवन में बार-बार असफलताओं या ग्लानि (Guilt) का अनुभव कर रहे हैं। 'दया शतकम्' हमें सिखाता है कि परमात्मा हमसे हमारी योग्यता नहीं, बल्कि हमारी शरणागति माँगते हैं।

फलश्रुति: दया शतकम् पाठ के दिव्य लाभ (Benefits)

स्वामी वेदान्त देशिक के अनुसार, इस स्तोत्र के नित्य पाठ और मनन से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • मानसिक बोझ से मुक्ति: स्वयं को "अपराधचक्रवर्ती" मानकर दया की शरण में जाने से साधक का मन हल्का होता है और पुराने पापों का मानसिक संताप समाप्त हो जाता है।
  • अमोघ सुरक्षा कवच: दया को "कवचायितया" माना गया है, जो साधक को प्रतिकूल प्रारब्ध और अज्ञात बाधाओं से सुरक्षा प्रदान करती है।
  • आध्यात्मिक ज्ञान: यह स्तोत्र अज्ञान के अंधकार को मिटाकर जीवन में स्पष्टता और शान्ति लाता है।
  • आर्थिक एवं भौतिक मंगल: भगवान श्रीनिवास की दया का गान करने से दरिद्रता का नाश होता है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है।
  • मोक्ष प्राप्ति: जो इस शतक का अभ्यास करते हैं, वे भगवान के परम धाम (वैकुण्ठ) में स्थान प्राप्त करते हैं।

पाठ विधि एवं साधना विधान (Ritual Method)

  • समय: शनिवार भगवान वेंकटेश्वर का सबसे प्रिय दिन है। शनिवार, एकादशी और ब्रह्मोत्सव के दौरान इसका पाठ महाफलदायी है।
  • शुद्धि: स्नान के पश्चात स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें।
  • पूजन सामग्री: शुद्ध घी का दीपक जलाएं और भगवान को तुलसी दल अर्पित करें।
  • आसन: उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठकर पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. दया शतकम् के रचयिता कौन हैं?
इस स्तोत्र की रचना १३वीं शताब्दी के महान आचार्य स्वामी वेदान्त देशिक ने की थी।
2. इस स्तोत्र में १०८ श्लोक ही क्यों हैं?
१०८ एक पवित्र संख्या है जो पूर्णता को दर्शाती है। इसके पाठ से १०८ दिव्य नामों के जप का फल मिलता है।
3. क्या यह पाठ दरिद्रता दूर कर सकता है?
हाँ, भगवान श्रीनिवास साक्षात् लक्ष्मी के पति हैं। उनकी दया का गान करने से आर्थिक कष्ट मिट जाते हैं।
4. प्रपत्ति का क्या अर्थ है?
प्रपत्ति का अर्थ है पूर्ण शरणागति—भगवान को ही एकमात्र रक्षक मानकर स्वयं को उनके चरणों में अर्पण कर देना।
5. "अपराधचक्रवर्ती" शब्द का यहाँ क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है "पापों का सम्राट"। आचार्य देशिक ने यह शब्द अपनी विनम्रता दिखाने के लिए स्वयं के लिए प्रयुक्त किया है।