Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Varaha Ashtottara Shatanama Stotram – श्री वराहाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Varaha Ashtottara Shatanama Stotram – श्री वराहाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री वराहाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ श्वेतं सुदर्शनदराङ्कितबाहुयुग्मं दंष्ट्राकरालवदनं धरया समेतम् । ब्रह्मादिभिः सुरगणैः परिसेव्यमानं ध्यायेद्वराहवपुषं निगमैकवेद्यम् ॥ ॥ स्तोत्रम् ॥ श्रीवराहो महीनाथः पूर्णानन्दो जगत्पतिः । निर्गुणो निष्कलोऽनन्तो दण्डकान्तकृदव्ययः ॥ १ ॥ हिरण्याक्षान्तकृद्देवः पूर्णषाड्गुण्यविग्रहः । लयोदधिविहारी च सर्वप्राणिहितेरतः ॥ २ ॥ अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः । वेदान्तवेद्यो वेदी च वेदगर्भः सनातनः ॥ ३ ॥ सहस्राक्षः पुण्यगन्धः कल्पकृत् क्षितिभृद्धरिः । पद्मनाभः सुराध्यक्षो हेमाङ्गो दक्षिणामुखः ॥ ४ ॥ महाकोलो महाबाहुः सर्वदेवनमस्कृतः । हृषीकेशः प्रसन्नात्मा सर्वभक्तभयापहः ॥ ५ ॥ यज्ञभृद्यज्ञकृत्साक्षी यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः । हव्यभुक् हव्यदेवश्च सदाऽव्यक्तः कृपाकरः ॥ ६ ॥ देवभूमिगुरुः कान्तो धर्मगुह्यो वृषाकपिः । स्रवत्तुण्डो वक्रदंष्ट्रो नीलकेशो महाबलः ॥ ७ ॥ पूतात्मा वेदनेता च वेदहर्तृशिरोहरः । वेदान्तविद्वेदगुह्यः सर्ववेदप्रवर्तकः ॥ ८ ॥ गभीराक्षस्त्रिधामा च गभीरात्माऽमरेश्वरः । आनन्दवनगो दिव्यो ब्रह्मनासासमुद्भवः ॥ ९ ॥ सिन्धुतीरनिवासी च क्षेमकृत्सात्त्वतां पतिः । इन्द्रत्राता जगत्त्राता चेन्द्रदोर्दण्डगर्वहा ॥ १० ॥ भक्तवश्यो सदोद्युक्तो निजानन्दो रमापतिः । श्रुतिप्रियः शुभाङ्गश्च पुण्यश्रवणकीर्तनः ॥ ११ ॥ सत्यकृत्सत्यसङ्कल्पः सत्यवाक्सत्यविक्रमः । सत्येनिगूढः सत्यात्मा कालातीतो गुणाधिकः ॥ १२ ॥ परं‍ज्योतिः परं‍धाम परमः पुरुषः परः । कल्याणकृत्कविः कर्ता कर्मसाक्षी जितेन्द्रियः ॥ १३ ॥ कर्मकृत्कर्मकाण्डस्यसम्प्रदायप्रवर्तकः । सर्वान्तकः सर्वगश्च सर्वदः सर्वभक्षकः ॥ १४ ॥ सर्वलोकपतिः श्रीमान् श्रीमुष्णेशः शुभेक्षणः । सर्वदेवप्रियः साक्षीत्येतन्नामाष्टकं शतम् ॥ १५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ सर्ववेदाधिकं पुण्यं वराहस्य महात्मनः । सततं प्रातरुत्थाय सम्यगाचम्य वारिणा ॥ १६ ॥ जितासनो जितक्रोधः पश्चान्मन्त्रमुदीरयेत् । ब्राह्मणो ब्रह्मविद्यायां च क्षत्रियो राज्यमाप्नुयात् ॥ १७ ॥ वैश्यो धनसमृद्धः स्यात् शूद्रः सुखमवाप्नुयात् । सकामो लभते कामान्निष्कामो मोक्षमाप्नुयात् ॥ १८ ॥ ॥ इति श्रीवराहपुराणे धरणीवराहसंवादे श्रीभूवराहाष्टोत्तरस्तवः सम्पूर्णम् ॥

श्री वराहाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्: परिचय एवं महात्म्य (Introduction)

श्री वराहाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Varaha Ashtottara Shatanama Stotram) सनातन धर्म के अठारह महापुराणों में से एक 'वराह पुराण' से उद्धृत है। यह दिव्य स्तोत्र भगवान विष्णु के तृतीय अवतार, भगवान वराह को समर्पित है, जिन्होंने पृथ्वी (माता धरणी) को रसातल से बाहर निकालकर हिरण्याक्ष नामक दैत्य का संहार किया था। यह स्तोत्र भगवान वराह और भूमि देवी (धरणी) के पावन संवाद का हिस्सा है, जिसमें पृथ्वी माता की रक्षा के बाद प्रभु के १०८ दिव्य नामों की महिमा गाई गई है।

वैदिक साहित्य में वराह अवतार को 'यज्ञ-वराह' के रूप में भी जाना जाता है। इस स्तोत्र में उन्हें 'यज्ञभृत्', 'यज्ञकृत्' और 'यज्ञाङ्ग' कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि प्रभु का यह स्वरूप साक्षात् यज्ञ की वेदी और उसकी शक्ति का प्रतीक है। भगवान वराह न केवल भूमि के उद्धारक हैं, बल्कि वे ज्ञान, बल और अमोघ शक्ति के प्रदाता भी हैं। जब जीव संसार के दुखों के रसातल में डूबने लगता है, तब वराह रूपी परमात्मा ही उसे अपनी ज्ञान रूपी दंष्ट्रा (दांतों) पर उठाकर सुरक्षित बाहर निकालते हैं।

इस स्तोत्र की रचना का मुख्य उद्देश्य साधक के जीवन से अज्ञान, दरिद्रता और भूमि संबंधी कष्टों को दूर करना है। इसके प्रत्येक नाम में एक विशिष्ट ऊर्जा छिपी है जो साधक के ओरा (Aura) को शुद्ध कर उसे दैवीय सुरक्षा प्रदान करती है। 'वैनतेय' (गरुड़) के समान तेज और 'वायुवेगो' जैसी गति वाले भगवान वराह अपने भक्तों की पुकार पर तत्काल संकटमोचन करते हैं।

विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं वराह अवतार का रहस्य (Significance)

वराहाष्टोत्तरशतनाम का आध्यात्मिक महत्व इसके 'निगमैकवेद्यम्' स्वरूप में निहित है। ध्यान श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि प्रभु का यह रूप केवल वेदों (निगम) के माध्यम से ही जानने योग्य है। यह स्तोत्र हमें यह बोध कराता है कि भगवान वराह साक्षात् 'वेदमूर्ति' हैं। उनके खुर ऋग्वेद हैं, दांत यजुर्वेद हैं और मुख सामवेद है।

  • महीनाथ एवं जगत्पति: वे पृथ्वी के वास्तविक स्वामी हैं। भूमि दोष, वास्तु दोष या संपत्ति विवादों के निवारण हेतु इनका स्मरण अमोघ माना गया है।
  • हिरण्याक्षान्तकृत्: हिरण्याक्ष 'स्वर्ण नेत्र' यानी अत्यधिक लोभ और भौतिकता का प्रतीक है। भगवान वराह उस लोभ रूपी असुर का अंत कर साधक को संतोष और सुख प्रदान करते हैं।
  • दक्षिणमुख: तिरुमाला तिरुपति के आदि वराह मंदिर में प्रभु का मुख दक्षिण की ओर है, जिसे 'कामी' और 'मोक्षार्थी' दोनों के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। यह स्तोत्र उनके उसी 'दक्षिणामुख' रूप की महिमा गाता है।

दार्शनिक दृष्टिकोण से, यह स्तोत्र जीव को 'निर्गुण' और 'निष्कल' ब्रह्म के साथ जोड़ता है। यद्यपि भगवान ने वराह का शरीर धारण किया है, परंतु वे तत्वतः अनंत और अविनाशी (अव्यय) हैं। पाठ के माध्यम से साधक यह जान पाता है कि ईश्वर प्रत्येक जड़ और चेतन वस्तु के आधार हैं।

फलश्रुति: वराह स्तोत्र पाठ के अमोघ लाभ (Benefits)

वराह पुराण के अनुसार, जो भक्त श्रद्धापूर्वक इन १०८ नामों का पाठ करते हैं, उन्हें निम्नलिखित दिव्य फल प्राप्त होते हैं:

  • चतुर्वर्ण फल प्राप्ति: श्लोक १७-१८ के अनुसार, यह पाठ ब्राह्मण को ज्ञान (ब्रह्मविद्या), क्षत्रिय को अधिकार (राज्य), वैश्य को समृद्धि (धन) और शूद्र को अखंड सुख प्रदान करता है।
  • भूमि एवं वास्तु दोष निवारण: भगवान वराह साक्षात् पृथ्वी के रक्षक हैं। अतः भूमि पूजन, गृह प्रवेश या भूमि विवादों के समाधान हेतु इसका पाठ अत्यंत प्रभावशाली है।
  • अमोघ सुरक्षा कवच: 'सर्वभक्तभयापहः' — यह पाठ साधक को शत्रुओं, चोरों और अकाल मृत्यु के भय से मुक्त कर अभय दान प्रदान करता है।
  • मनोकामना पूर्ति (सकाम एवं निष्काम): जो साधक किसी कामना (Sakaam) से पाठ करते हैं, उनकी इच्छाएं पूर्ण होती हैं, और जो निष्काम भाव से पाठ करते हैं, उन्हें अंततः मोक्ष (Liberation) प्राप्त होता है।
  • सात जन्मों के पापों का नाश: भगवान के दिव्य नामों का संकीर्तन चित्त की अशुद्धियों और पूर्व जन्मों के पापों को धो देता है।

पाठ विधि एवं साधना के नियम (Ritual Method)

भगवान महावराह की साधना पूर्ण शुद्धि और श्रद्धा की मांग करती है। सर्वोत्तम फल हेतु निम्न विधि का पालन करें:

१. श्रेष्ठ समय एवं शुद्धि:

स्तोत्र के अनुसार 'प्रातरुत्थाय' अर्थात् प्रातः काल ब्रह्म मुहूर्त में पाठ करना सर्वोत्तम है। स्नान के उपरांत सम्यक आचमन कर, पवित्र होकर आसन पर बैठें।

२. वस्त्र एवं आसन:

भगवान विष्णु को पीला रंग अत्यंत प्रिय है, अतः पीले वस्त्र धारण करें। उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा के आसन या पीले ऊनी आसन पर बैठें।

३. पूजन एवं अर्पण:

सामने भगवान वराह की प्रतिमा या शालिग्राम स्थापित करें। शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें। भगवान को तुलसी और पीले पुष्प अर्पित करें। यदि संभव हो, तो उन्हें गंध (चन्दन) और अक्षत समर्पित करें।

४. मानसिक स्थिति:

पाठ करते समय 'जितक्रोधः' (क्रोध रहित) रहना अनिवार्य है। भगवान के उस स्वरूप का ध्यान करें जिसमें वे अपनी दंष्ट्रा पर पृथ्वी माता को धारण किए हुए हैं। यह ध्यान साधक के भीतर अगाध विश्वास पैदा करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री वराहाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र किस ग्रंथ से लिया गया है?

यह स्तोत्र 'वराह पुराण' के अन्तर्गत आता है, जो भगवान वराह और पृथ्वी माता (धरणी) के दिव्य संवाद का हिस्सा है।

2. भगवान वराह की पूजा भूमि दोष निवारण में कैसे सहायक है?

भगवान वराह भूमि के रक्षक और उद्धारक हैं। उनके १०८ नामों का पाठ करने से भूमि से संबंधित वास्तु दोष, नकारात्मक ऊर्जा और कानूनी विवाद शांत होते हैं।

3. क्या इस स्तोत्र का पाठ महिलाएं कर सकती हैं?

हाँ, निश्चित रूप से। भगवान की भक्ति में कोई भेद नहीं है। महिलाएं अपने परिवार की सुरक्षा और भूमि-सौभाग्य के लिए इस स्तोत्र का पाठ पूरी श्रद्धा के साथ कर सकती हैं।

4. 'यज्ञ-वराह' का अर्थ क्या है?

वेदों के अनुसार, भगवान वराह का संपूर्ण शरीर यज्ञ के अंगों से बना है। उनके खुर, बाल, मुख और अंग विभिन्न वैदिक सूक्तों और यज्ञ क्रियाओं के प्रतीक हैं, इसलिए उन्हें यज्ञ-वराह कहा जाता है।

5. पाठ के लिए सबसे उत्तम दिन कौन सा माना जाता है?

यद्यपि नित्य पाठ श्रेष्ठ है, परंतु गुरुवार (विष्णु का दिन) और एकादशी तिथि पर इसका पाठ करना विशेष फलदायी होता है।

6. क्या तिरुपति के आदि वराह का भी इसमें उल्लेख है?

जी हाँ, स्तोत्र में 'दक्षिणामुख' और 'सिन्धुतीरनिवासी' जैसे शब्द भगवान वराह के उन सिद्ध पीठों की ओर संकेत करते हैं जहाँ वे भक्तों के उद्धार हेतु विराजमान हैं।

7. क्या यह स्तोत्र शत्रुओं पर विजय दिलाता है?

हाँ, भगवान वराह 'शत्रुजित्' और 'शत्रुतापन' हैं। उनके १०८ नामों का कंपन किसी भी प्रकार के गुप्त या प्रत्यक्ष शत्रुओं को परास्त करने की शक्ति प्रदान करता है।

8. पाठ के लिए कौन सी माला सर्वोत्तम है?

भगवान विष्णु के अवतार होने के कारण, तुलसी की माला जप के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है। स्तोत्र पाठ मात्र के लिए माला अनिवार्य नहीं है, परंतु एकाग्रता हेतु इसका प्रयोग करें।

9. क्या बिना संस्कृत जाने लाभ मिल सकता है?

हाँ, मंत्रों की ध्वनि तरंगे भाव प्रधान होती हैं। यदि आप संस्कृत नहीं पढ़ सकते, तो इसका हिंदी अर्थ समझकर श्रद्धा के साथ इन नामों को पुकार सकते हैं। भक्ति और समर्पण ही मुख्य कुंजी है।

10. पाठ का फल कितने दिनों में प्राप्त होता है?

यह साधक की निष्ठा और एकाग्रता पर निर्भर है। २१ या ४१ दिनों तक निरंतर पाठ करने से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन, सुरक्षा और आत्म-बल का अनुभव होने लगता है।