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Sri Shakambhari Panchakam – श्री शाकम्भरी पञ्चकम् | Meaning & Significance

Sri Shakambhari Panchakam – श्री शाकम्भरी पञ्चकम् | Meaning & Significance
॥ श्री शाकम्भरी पञ्चकम् ॥ श्रीवल्लभसोदरी श्रितजनश्चिद्दायिनी श्रीमती श्रीकण्ठार्धशरीरगा श्रुतिलसन्माणिक्यताटङ्कका । श्रीचक्रान्तरवासिनी श्रुतिशिरः सिद्धान्तमार्गप्रिया श्रीवाणी गिरिजात्मिका भगवती शाकम्भरी पातु माम् ॥ १ ॥ शान्ता शारदचन्द्रसुन्दरमुखी शाल्यन्नभोज्यप्रिया शाकैः पालितविष्टपा शतदृशा शाकोल्लसद्विग्रहा । श्यामाङ्गी शरणागतार्तिशमनी शक्रादिभिः संस्तुता शङ्कर्यष्टफलप्रदा भगवती शाकम्भरी पातु माम् ॥ २ ॥ कञ्जाक्षी कलशी भवादिविनुता कात्यायनी कामदा कल्याणी कमलालया करकृताम्भोजासिखेटाभया । कादंवासवमोदिनी कुचलसत्काश्मीरजालेपना कस्तूरीतिलकाञ्चिता भगवती शाकम्भरी पातु माम् ॥ ३ ॥ भक्तानन्दविधायिनी भवभयप्रध्वंसिनी भैरवी भस्मालङ्कृतिभासुरा भुवनभीकृद्दुर्गदर्पापहा । भूभृन्नायकनन्दिनी भुवनसूर्भास्वत्परः कोटिभा भौमानन्दविहारिणी भगवती शाकम्भरी पातु माम् ॥ ४ ॥ रीताम्नायशिखासु रक्तदशना राजीवपत्रेक्षणा राकाराजकरावदातहसिता राकेन्दुबिम्बस्थिता । रुद्राणी रजनीकरार्भकलसन्मौली रजोरुपिणी रक्षः शिक्षणदीक्षिता भगवती शाकम्भरी पातु माम् ॥ ५ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ श्लोकानामिह पञ्चकं पठति यः स्तोत्रात्मकं शर्मदं सर्वापत्तिविनाशकं प्रतिदिनं भक्त्या त्रिसन्ध्यं नरः । आयुःपूर्णमपारमर्थममलां कीर्तिं प्रजामक्षयां शाकम्भर्यनुकम्पया स लभते विद्यां च विश्वार्थकाम् ॥ ६ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं शाकम्भरी पञ्चकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री शाकम्भरी पञ्चकम् - परिचय एवं महत्व

श्री शाकम्भरी पञ्चकम् (Sri Shakambhari Panchakam) आदि गुरु शंकराचार्य या किसी सिद्ध तांत्रिक द्वारा रचित एक दुर्लभ स्तोत्र है जो माँ शाकम्भरी देवी को समर्पित है। 'शाकम्भरी' का शाब्दिक अर्थ है - 'शाक' (वनस्पति/सब्जियां) की 'अम्भरी' (भरण-पोषण करने वाली)।

पौराणिक संदर्भ: दुर्गा सप्तशती के अंत में वर्णित 'मूर्ति रहस्य' में देवी कहती हैं: "ततोऽहमखिलं लोकमात्मदेहसमुद्भवैः। भरिष्यामि सुराः शाकैरावृष्टेः प्राणधारकैः॥" अर्थात जब सौ वर्षों तक वर्षा न होने के कारण भीषण सूखा पड़ेगा, तब मैं अपने शरीर से उत्पन्न शाक-सब्जियों से समस्त लोकों का भरण-पोषण करूँगी। इसीलिए मेरा नाम 'शाकम्भरी' प्रसिद्ध होगा।

इस स्तोत्र में देवी के सौम्य (Vegetative/Nourishing) और उग्र (Demon-slaying) दोनों रूपों का वर्णन है। वे एक हाथ में कमल, खड्ग और ढाल धारण करती हैं (श्लोक ३), तो दूसरे रूप में वे दुर्गम दैत्य का नाश करने वाली 'दुर्गदर्पापहा' (श्लोक ४) भी हैं।

प्रमुख विशेषताएं (Key Features)

शताक्षी स्वरूप (The Hundred-Eyed One)

श्लोक २ में देवी को "शतदृशा" (सौ नेत्रों वाली) और "शाकोल्लसद्विग्रहा" (शाक से उल्लसित शरीर वाली) कहा गया है। यह करुणा का चरम रूप है, जहाँ माँ अपनी संतानों की भूख मिटाने के लिए स्वयं अन्न बन जाती हैं।

श्रीचक्र निवासिनी

श्लोक १ में उन्हें "श्रीचक्रान्तरवासिनी" कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि शाकम्भरी देवी कोई साधारण ग्राम देवी नहीं, बल्कि स्वयं ललिता त्रिपुरसुन्दरी (श्रीविद्या) का ही एक पोषणकारी रूप हैं।

वनस्पति और औषधि शक्ति

यह स्तोत्र केवल अन्न प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि औषधियों (Herbs) की शक्ति जागृत करने के लिए भी पढ़ा जाता है। आयुर्वेद के ज्ञाता वैद्य भी अपनी औषधियों को सिद्ध करने के लिए शाकम्भरी देवी का ध्यान करते हैं।

पाठ के लाभ (Phala Shruti)

अंतिम श्लोक (फलश्रुति) के अनुसार, जो व्यक्ति प्रतिदिन तीनों संध्याओं (प्रातः, मध्याह्न, सायं) में इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे:

  • अक्षय अन्न भंडार: उसके घर में कभी अन्न और धन की कमी नहीं होती।
  • पूर्ण आयु और आरोग्य: वह पूर्ण आयु और निरोगी काया प्राप्त करता है ("आयुःपूर्णमपारमर्थममलां")।
  • संतान सुख: उसे उत्तम संतान (प्रजा) और निर्मल कीर्ति प्राप्त होती है।
  • विद्या और ज्ञान: देवी की अनुकंपा से उसे विश्व का कल्याण करने वाली विद्या प्राप्त होती है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री शाकम्भरी पञ्चकम् (Sri Shakambhari Panchakam) क्या है?

यह माँ दुर्गा के 'शाकम्भरी' अवतार को समर्पित 5 श्लोकों का एक अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है। इसमें देवी के उस करुण रूप की स्तुति है जो अकाल (famine) के समय अपने शरीर से शाक (vegetables) उत्पन्न करके जगत का पोषण करती हैं।

2. शाकम्भरी देवी का प्राकट्य क्यों हुआ?

दुर्गा सप्तशती के मूर्ति रहस्य के अनुसार, जब पृथ्वी पर सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई और भयानक सूखा पड़ गया, तब ऋषियों की प्रार्थना पर देवी ने प्रकट होकर अपने शरीर से उत्पन्न शाक-सब्जियों (Vegetables/Greens) से सम्पूर्ण जगत की भूख शांत की।

3. क्या यह स्तोत्र अन्नपूर्णा स्तोत्र से भिन्न है?

हाँ, यद्यपि दोनों देवी अन्नपूर्णा और शाकम्भरी पोषण करने वाली हैं, किन्तु अन्नपूर्णा काशी में शिव को भिक्षा देती हैं, जबकि शाकम्भरी अनावृष्टि (drought) के समय स्वयं वनस्पति रूप बनकर प्राणियों की प्राण रक्षा करती हैं।

4. इसके पाठ का मुख्य लाभ क्या है?

इसके नियमित पाठ से घर में कभी भी अन्न-धन की कमी नहीं होती। यह दरिद्रता नाशक है और कृषि (agriculture) तथा वनस्पति से जुड़े कार्यों में विशेष सफलता प्रदान करता है।

5. श्लोक २ में 'शताक्षी' (Shatakshi) नाम का क्या महत्व है?

'शत' का अर्थ है १०० और 'अक्षी' का अर्थ है आँखें। देवी ने जगत के कष्टों को देखकर अपने शरीर पर १०० नेत्र प्रकट किए और निरंतर आँसू बहाए, जिससे नदियाँ बह निकलीं और सूखा समाप्त हुआ। इसलिए उन्हें 'शताक्षी' कहा जाता है।

6. किस दिन इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है?

शुक्रवार का दिन देवी शाकम्भरी की उपासना के लिए अत्यंत शुभ है। इसके अतिरिक्त, नवरात्रि की अष्टमी या नवमी तिथि (विशेषकर शाकम्भरी नवरात्रि पौष मास में) को इसका पाठ अनंत गुना फल देता है।

7. क्या बीमार व्यक्ति के लिए यह लाभकारी है?

जी हाँ, चूँकि शाकम्भरी देवी वनस्पति और औषधियों की भी अधिष्ठात्री हैं, इसलिए स्वास्थ्य लाभ और रोग मुक्ति के लिए इनका स्तोत्र पाठ अत्यंत गुणकारी माना गया है।

8. श्लोक ४ में 'दुर्गदर्पापहा' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'दुर्गम नामक असुर के गर्व का नाश करने वाली'। देवी ने ही दुर्गम असुर का वध किया था, इसीलिए उनका एक नाम 'दुर्गा' पड़ा।

9. क्या इसके लिए किसी विशेष भोग की आवश्यकता है?

शाकम्भरी देवी को हरी सब्जियां (Green Vegetables) और फलों का भोग लगाना सबसे उत्तम माना जाता है। सात्विक भोजन का भोग ही उन्हें प्रिय है।

10. क्या इसे बच्चे भी पढ़ सकते हैं?

अवश्य। यह स्तोत्र बहुत सरल और लयात्मक है। बच्चों द्वारा इसका पाठ करने से उनकी बुद्धि कुशाग्र होती है और उन्हें सुपोषण (Good Nutrition) का आशीर्वाद मिलता है।