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Sri Jagaddhatri Stotram – श्री जगद्धात्री स्तोत्रम्

Sri Jagaddhatri Stotram: Hymn to the Upholder of the Universe

Sri Jagaddhatri Stotram – श्री जगद्धात्री स्तोत्रम्
आधारभूते चाधेये धृतिरूपे धुरन्धरे । ध्रुवे ध्रुवपदे धीरे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥ शवाकारे शक्तिरूपे शक्तिस्थे शक्तिविग्रहे । शाक्ताचारप्रिये देवि जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ २ ॥ जयदे जगदानन्दे जगदेकप्रपूजिते । जय सर्वगते दुर्गे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥ सूक्ष्मातिसूक्ष्मरूपे च प्राणापानादिरूपिणि । भावाभावस्वरूपे च जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥ कालादिरूपे कालेशे कालाकालविभेदिनि । सर्वस्वरूपे सर्वज्ञे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥ महाविघ्ने महोत्साहे महामाये वरप्रदे । प्रपञ्चसारे साध्वीशे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥ अगम्ये जगतामाद्ये माहेश्वरि वराङ्गने । अशेषरूपे रूपस्थे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ७ ॥ द्विसप्तकोटिमन्त्राणां शक्तिरूपे सनातनि । सर्वशक्तिस्वरूपे च जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥ तीर्थयज्ञतपोदानयोगसारे जगन्मयि । त्वमेव सर्वं सर्वस्थे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥ दयारूपे दयादृष्टे दयार्द्रे दुःखमोचनि । सर्वापत्तारिके दुर्गे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥ अगम्यधामधामस्थे महायोगीशहृत्पुरे । अमेयभावकूटस्थे जगद्धात्रि नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥ ॥ इति श्री जगद्धात्री स्तोत्रम् ॥

श्री जगद्धात्री स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री जगद्धात्री स्तोत्रम् 11 श्लोकों का दिव्य स्तोत्र है जो माँ जगद्धात्री को समर्पित है। 'जगद्धात्री' शब्द का अर्थ है "जगत को धारण करने वाली" (जगत् + धात्री)। वे माँ दुर्गा का ही एक स्वरूप हैं।

पश्चिम बंगाल में जगद्धात्री पूजा का विशेष महत्व है। यह कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी (कार्तिक नवमी) को मनाई जाती है, जो दुर्गा पूजा के लगभग एक महीने बाद आती है। कृष्णनगर, चंदननगर और हुगली में भव्य पंडाल सजाए जाते हैं।

देवी का स्वरूप अत्यंत मनोहर है—चतुर्भुज (चार हाथ) जिनमें शंख, चक्र, धनुष और बाण हैं। सिंह वाहन है और सिंह के पैर हाथी पर हैं। यह प्रतीक है कि ज्ञान (सिंह) अहंकार (हाथी) को वश में करता है।

श्लोकों का भावार्थ (Verse Meanings)

  • श्लोक 1 (धारण शक्ति): 'आधारभूते'—आधार स्वरूप। 'धृतिरूपे'—धैर्य स्वरूप। 'धुरन्धरे'—भार उठाने वाली। 'ध्रुवे ध्रुवपदे'—स्थिर और स्थिर पद वाली। 'धीरे'—धैर्यवान। जगद्धात्री को नमस्कार।

  • श्लोक 2 (शाक्त परंपरा): 'शवाकारे'—शव (पुरुष तत्त्व) पर आसीन। 'शक्तिरूपे शक्तिस्थे'—शक्ति स्वरूप और शक्ति में स्थित। 'शाक्ताचारप्रिये'—शाक्त आचार को प्रिय मानने वाली।

  • श्लोक 3 (जय-जयकार): 'जयदे'—जय देने वाली। 'जगदानन्दे'—जगत को आनंद देने वाली। 'जगदेकप्रपूजिते'—संपूर्ण जगत द्वारा पूजित। 'सर्वगते दुर्गे'—सर्वव्यापी दुर्गा।

  • श्लोक 4 (सूक्ष्म स्वरूप): 'सूक्ष्मातिसूक्ष्मरूपे'—अत्यंत सूक्ष्म। 'प्राणापानादिरूपिणी'—प्राण, अपान आदि पंच वायुओं का स्वरूप। 'भावाभावस्वरूपे'—भाव और अभाव दोनों का स्वरूप।

  • श्लोक 5 (कालस्वरूप): 'कालादिरूपे कालेशे'—काल का आदि और कालों की ईश्वरी। 'कालाकालविभेदिनी'—काल-अकाल का भेद करने वाली। 'सर्वस्वरूपे सर्वज्ञे'—सर्व स्वरूप, सर्वज्ञ।

  • श्लोक 6 (महामाया): 'महाविघ्ने'—महान विघ्नों को हरने वाली। 'महोत्साहे'—महान उत्साह वाली। 'महामाये'—महामाया। 'प्रपञ्चसारे'—प्रपंच (संसार) का सार।

  • श्लोक 7 (अगम्य): 'अगम्ये'—जो पहुँच से परे। 'जगतामाद्ये'—जगत की आदि। 'माहेश्वरि'—महेश्वर की शक्ति। 'अशेषरूपे'—अनंत रूप वाली।

  • श्लोक 8 (14 करोड़ मंत्र): 'द्विसप्तकोटिमन्त्राणां शक्तिरूपे'—14 करोड़ मंत्रों की शक्ति स्वरूप। 'सनातनी'—शाश्वत। 'सर्वशक्तिस्वरूपे'—सभी शक्तियों का स्वरूप।

  • श्लोक 9 (सर्व तत्त्व): 'तीर्थयज्ञतपोदानयोगसारे'—तीर्थ, यज्ञ, तप, दान, योग का सार। 'जगन्मयी'—जगत्मय। 'त्वमेव सर्वं'—तुम ही सब कुछ हो।

  • श्लोक 10 (दुःखमोचनी): 'दयारूपे दयादृष्टे दयार्द्रे'—दया स्वरूप, दया दृष्टि, दया से आर्द्र। 'दुःखमोचनी'—दुखों से मुक्त करने वाली। 'सर्वापत्तारिके'—सभी आपत्तियों से तारने वाली।

  • श्लोक 11 (परम धाम): 'अगम्यधामधामस्थे'—अगम्य धाम में स्थित। 'महायोगीशहृत्पुरे'—महायोगियों के हृदय में निवास। 'अमेयभावकूटस्थे'—अमेय (अपरिमेय) भाव में कूटस्थ।

पाठ के लाभ (Benefits)

  • धैर्य और स्थिरता: 'धृतिरूपे', 'ध्रुवे', 'धीरे'—इन नामों के स्मरण से जीवन में धैर्य और स्थिरता आती है।

  • दुख निवारण: 'दुःखमोचनी'—सभी प्रकार के दुखों से मुक्ति। श्लोक 10 का विशेष पाठ करें।

  • विपत्तियों से रक्षा: 'सर्वापत्तारिके दुर्गे'—सभी आपत्तियों से तारने वाली।

  • अहंकार नाश: जगद्धात्री पूजा का मूल उद्देश्य अहंकार का नाश है (सिंह द्वारा हाथी को वश में करना)।

  • ज्ञानेंद्रिय नियंत्रण: पंचेंद्रियों पर नियंत्रण और आत्मज्ञान की प्राप्ति।

  • शक्ति साधना: 'शाक्ताचारप्रिये'—शाक्त साधकों के लिए विशेष अनुग्रह।

पाठ विधि (Ritual Method)

कार्तिक नवमी (जगद्धात्री पूजा):

  1. तिथि: कार्तिक शुक्ल नवमी सर्वश्रेष्ठ।
  2. पूजा: देवी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। लाल पुष्प, मिठाई अर्पित करें।
  3. पाठ: 11 बार स्तोत्र पाठ करें।
  4. आरती: घी के दीपक से आरती करें।

नित्य पाठ:

  • समय: प्रातःकाल या संध्या समय।
  • दिन: मंगलवार और शुक्रवार विशेष शुभ।
  • पाठ संख्या: 1, 11 या 21 बार।
  • भाव: पूर्ण श्रद्धा और मातृभाव से पाठ करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. जगद्धात्री देवी कौन हैं?

'जगद्धात्री' का अर्थ है 'जगत को धारण करने वाली'। वे माँ दुर्गा का ही एक स्वरूप हैं जो समस्त ब्रह्मांड को धारण करती हैं। पश्चिम बंगाल में कार्तिक शुक्ल नवमी को उनकी विशेष पूजा होती है।

2. जगद्धात्री पूजा कब मनाई जाती है?

जगद्धात्री पूजा कार्तिक महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी (कार्तिक नवमी) को मनाई जाती है। यह दुर्गा पूजा के लगभग एक महीने बाद आती है। कृष्णनगर और हुगली में भव्य पंडाल सजाए जाते हैं।

3. देवी का स्वरूप कैसा है?

माँ जगद्धात्री चतुर्भुज हैं—शंख, चक्र, धनुष, बाण धारण करती हैं। सिंह वाहन है जो हाथी पर पैर रखे है। हाथी अहंकार का प्रतीक है जिसे सिंह (ज्ञान) वश में करता है।

4. श्लोक 1 में 'आधारभूते' का क्या अर्थ है?

'आधारभूते'—जो आधार स्वरूप हैं। 'धृतिरूपे'—धैर्य स्वरूप। 'धुरन्धरे'—भार उठाने वाली। 'ध्रुवे ध्रुवपदे'—स्थिर और स्थिर पद वाली।

5. श्लोक 2 में 'शाक्ताचारप्रिये' का क्या अर्थ है?

'शवाकारे'—शव (पुरुष तत्त्व) पर आसीन। 'शाक्ताचारप्रिये'—शाक्त संप्रदाय की पूजा विधि को प्रिय मानने वाली। यह तांत्रिक परंपरा का संकेत है।

6. श्लोक 4-5 में प्राण और काल का क्या वर्णन है?

'प्राणापानादिरूपिणी'—प्राण, अपान आदि पंच वायुओं का स्वरूप। 'कालादिरूपे कालेशे'—काल का आदि और कालों की ईश्वरी।

7. श्लोक 8 में 'द्विसप्तकोटिमन्त्राणां' का क्या अर्थ है?

'द्विसप्तकोटि' = 14 करोड़। देवी 14 करोड़ मंत्रों की शक्ति स्वरूप हैं। वे सभी मंत्रों की मूल शक्ति हैं।

8. श्लोक 10 में 'दुःखमोचनी' का क्या महत्व है?

'दयारूपे दयादृष्टे'—दया स्वरूप। 'दुःखमोचनी'—दुखों से छुड़ाने वाली। 'सर्वापत्तारिके'—सभी आपत्तियों से तारने वाली। यह भक्तों के लिए सबसे आश्वासकारी श्लोक है।

9. जगद्धात्री और दुर्गा में क्या अंतर है?

जगद्धात्री दुर्गा का ही एक स्वरूप हैं। दुर्गा पूजा में महिषासुर वध का उत्सव होता है, जबकि जगद्धात्री अहंकार के नाश का प्रतीक हैं।

10. इस स्तोत्र को कब और कैसे पढ़ें?

कार्तिक नवमी (जगद्धात्री पूजा) सर्वश्रेष्ठ। नवरात्रि, शुक्रवार और मंगलवार भी शुभ। प्रातःकाल या संध्या समय 11 बार पाठ करें।