Sri Bhramarambika Ashtakam (Sri Kantarpita) – श्री भ्रमराम्बिकाष्टकम् (श्रीकण्ठार्पित)

श्री भ्रमराम्बिकाष्टकम् - परिचय (Introduction)
श्री भ्रमराम्बिकाष्टकम् (Sri Bhramarambika Ashtakam) की रचना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र माँ भ्रमराम्बा को समर्पित है, जो श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश) में विराजमान हैं।
श्रीशैलम एक अत्यंत दुर्लभ क्षेत्र है जहाँ मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग और भ्रमराम्बा शक्तिपीठ एक साथ स्थित हैं। यहाँ माता सती की ग्रीवा (Neck) गिरी थी, इसलिए यह 18 महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है।
अरुणासुर वध की कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, 'अरुणासुर' नामक दैत्य ने वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई भी दो या चार पैरों वाला जीव नहीं मार सकता। तब देवी ने हजारों भ्रमरों (Six-legged Bees) का रूप धारण किया और उसका वध किया। इसी कारण उनका नाम 'भ्रमराम्बा' या 'भ्रमरी' पड़ा।
महत्त्व और लाभ (Significance & Benefits)
- सर्व सिद्धि प्रदाता: अंतिम श्लोक में इसे "अष्टकं सर्वसिद्धिदम्" कहा गया है। यह साधना की सभी सिद्धियां प्रदान करने में सक्षम है।
- शत्रु नाश (Destruction of Enemies): "शत्रूणां तु नराणां च ध्वंसनं" - यह शत्रुओं (बाहरी शत्रुओं और आंतरिक विकार जैसे काम, क्रोध) का नाश करता है।
- दारिद्र्य विध्वंसिनी: श्लोक 6 में देवी को "दारिद्र्य-विध्वंसिनी" कहा गया है। उनकी कृपा से घोर गरीबी भी समाप्त हो जाती है।
- संसार सागर से मुक्ति: देवी "संसार-अर्णव-तारकां" हैं, जो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करती हैं।
विशेष साधना: कुंकुम अर्चन (Kumkum Archana)
श्रीशैलम में माँ भ्रमराम्बा की उपासना की सबसे प्रामाणिक विधि 'कुंकुम अर्चन' है। आप इसे अपने घर पर भी कर सकते हैं:
तैयारी: श्रीयंत्र या माँ भ्रमराम्बा की तस्वीर के सामने लाल आसन पर बैठें।
संकल्प: अपने मन में अपनी मनोकामना (सुहाग रक्षा, धन, या शत्रु नाश) का संकल्प लें।
अर्चन: इस अष्टकम के प्रत्येक श्लोक का पाठ करते हुए, या "ॐ ऐं ह्रीं श्रीं भ्रमराम्बिकायै नमः" मंत्र बोलते हुए, देवी के चरणों में या श्रीयंत्र के मध्य बिंदु पर कुंकुम (Vermilion) अर्पित करें।
निवेदन: पूजा के अंत में देवी को गुड़, नारियल या पायसम (खीर) का भोग लगाएं।