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Sri Bhramarambika Ashtakam (Sri Kantarpita) – श्री भ्रमराम्बिकाष्टकम् (श्रीकण्ठार्पित)

Sri Bhramarambika Ashtakam (Sri Kantarpita) – श्री भ्रमराम्बिकाष्टकम् (श्रीकण्ठार्पित)
॥ अथ श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीभ्रमराम्बिकाष्टकम् ॥ श्रीकण्ठार्पितपत्रगण्डयुगलां सिंहासनाध्यासिनीं लोकानुग्रहकारिणीं गुणवतीं लोलेक्षणां शाङ्करीम् । पाकारिप्रमुखामरार्चितपदां मत्तेभकुम्भस्तनीं श्रीशैलभ्रमराम्बिकां भज मनः श्रीशारदासेविताम् ॥ १ ॥ विन्ध्याद्रीन्द्रगृहान्तरे निवसितां वेदान्तवेद्यानिधिं मन्दारद्रुमपुष्पवासितकुचां मायां महामायिनीम् । बन्धूकप्रसवोज्ज्वलारुणनिभां पञ्चाक्षरीरूपिणीं श्रीशैलभ्रमराम्बिकां भज मनः श्रीशारदासेविताम् ॥ २ ॥ माद्यच्छुम्भनिशुम्भमेघपटलप्रध्वंसझञ्झानिलां कौमारीं महिषाख्यशुष्कविटपीधूमोरुदावानलाम् । चक्राद्यायुधसङ्ग्रहोज्ज्वलकरां चामुण्डिकाधीश्वरीं श्रीशैलभ्रमराम्बिकां भज मनः श्रीशारदासेविताम् ॥ ३ ॥ दृक्कञ्जातविलासकल्पितसरोजातोरुशोभान्वितां नक्षत्रेश्वरशेखरप्रियतमां देवीं जगन्मोहिनीम् । रञ्जन्मङ्गलदायिनीं शुभकरीं राजत्स्वरूपोज्ज्वलां श्रीशैलभ्रमराम्बिकां भज मनः श्रीशारदासेविताम् ॥ ४ ॥ केलीमन्दिरराजताचलतलां सम्पूर्णचन्द्राननां योगीन्द्रैर्नुतपादपङ्कजयुगां रत्नाम्बरालङ्कृताम् । स्वर्गावाससरोजपत्रनयनाभीष्टप्रदां निर्मलां श्रीशैलभ्रमराम्बिकां भज मनः श्रीशारदासेविताम् ॥ ५ ॥ संसारार्णवतारकां भगवतीं दारिद्र्यविध्वंसिनीं सन्ध्याताण्डवकेलिकां प्रियसतीं सद्भक्तकामप्रदाम् । शिञ्जन्नूपुरपादपङ्कजयुगां बिम्बाधरां श्यामलां श्रीशैलभ्रमराम्बिकां भज मनः श्रीशारदासेविताम् ॥ ६ ॥ चञ्चत्काञ्चनरत्नचारुकटकां सर्वं सहावल्लभां काञ्चीकाञ्चनघण्टिकाघणघणां कञ्जातपत्रेक्षणाम् । सारोदारगुणाञ्चितां पुरहरप्राणेश्वरीं शाम्भवीं श्रीशैलभ्रमराम्बिकां भज मनः श्रीशारदासेविताम् ॥ ७ ॥ ब्रह्मर्षीश्वरवन्द्यपादकमलां पङ्केरुहाक्षस्तुतां प्रालेयाचलवंशपावनकरीं शृङ्गारभूषानिधिम् । तत्त्वातीतमहाप्रभां विजयिनीं दाक्षायिणीं भैरवीं श्रीशैलभ्रमराम्बिकां भज मनः श्रीशारदासेविताम् ॥ ८ ॥ ॥ फलश्रुति (Benefits) ॥ भ्रमराम्बा महादेव्याः अष्टकं सर्वसिद्धिदम् । शत्रूणां तु नराणां च ध्वंसनं तद्वदाम्यहम् ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीभ्रमराम्बिकाष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री भ्रमराम्बिकाष्टकम् - परिचय (Introduction)

श्री भ्रमराम्बिकाष्टकम् (Sri Bhramarambika Ashtakam) की रचना आदि गुरु शंकराचार्य ने की थी। यह स्तोत्र माँ भ्रमराम्बा को समर्पित है, जो श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश) में विराजमान हैं।

श्रीशैलम एक अत्यंत दुर्लभ क्षेत्र है जहाँ मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग और भ्रमराम्बा शक्तिपीठ एक साथ स्थित हैं। यहाँ माता सती की ग्रीवा (Neck) गिरी थी, इसलिए यह 18 महाशक्तिपीठों में से एक माना जाता है।

अरुणासुर वध की कथा:
पौराणिक कथाओं के अनुसार, 'अरुणासुर' नामक दैत्य ने वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई भी दो या चार पैरों वाला जीव नहीं मार सकता। तब देवी ने हजारों भ्रमरों (Six-legged Bees) का रूप धारण किया और उसका वध किया। इसी कारण उनका नाम 'भ्रमराम्बा' या 'भ्रमरी' पड़ा।

महत्त्व और लाभ (Significance & Benefits)

  • सर्व सिद्धि प्रदाता: अंतिम श्लोक में इसे "अष्टकं सर्वसिद्धिदम्" कहा गया है। यह साधना की सभी सिद्धियां प्रदान करने में सक्षम है।
  • शत्रु नाश (Destruction of Enemies): "शत्रूणां तु नराणां च ध्वंसनं" - यह शत्रुओं (बाहरी शत्रुओं और आंतरिक विकार जैसे काम, क्रोध) का नाश करता है।
  • दारिद्र्य विध्वंसिनी: श्लोक 6 में देवी को "दारिद्र्य-विध्वंसिनी" कहा गया है। उनकी कृपा से घोर गरीबी भी समाप्त हो जाती है।
  • संसार सागर से मुक्ति: देवी "संसार-अर्णव-तारकां" हैं, जो जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कर मोक्ष प्रदान करती हैं।

विशेष साधना: कुंकुम अर्चन (Kumkum Archana)

श्रीशैलम में माँ भ्रमराम्बा की उपासना की सबसे प्रामाणिक विधि 'कुंकुम अर्चन' है। आप इसे अपने घर पर भी कर सकते हैं:

  1. तैयारी: श्रीयंत्र या माँ भ्रमराम्बा की तस्वीर के सामने लाल आसन पर बैठें।

  2. संकल्प: अपने मन में अपनी मनोकामना (सुहाग रक्षा, धन, या शत्रु नाश) का संकल्प लें।

  3. अर्चन: इस अष्टकम के प्रत्येक श्लोक का पाठ करते हुए, या "ॐ ऐं ह्रीं श्रीं भ्रमराम्बिकायै नमः" मंत्र बोलते हुए, देवी के चरणों में या श्रीयंत्र के मध्य बिंदु पर कुंकुम (Vermilion) अर्पित करें।

  4. निवेदन: पूजा के अंत में देवी को गुड़, नारियल या पायसम (खीर) का भोग लगाएं।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री भ्रमराम्बिका कौन हैं?

श्री भ्रमराम्बिका (भ्रमराम्बा), श्रीशैलम शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, उन्होंने 'अरुणासुर' नामक राक्षस का वध करने के लिए 'भ्रमरी' (मधुमक्खी) का रूप धारण किया था, इसलिए उनका नाम भ्रमराम्बिका पड़ा।

2. इस अष्टकम की रचना किसने की है?

इस अष्टकम की रचना आदि गुरु शंकराचार्य (Adi Shankaracharya) ने की थी, जब उन्होंने श्रीशैलम की यात्रा की थी।

3. श्रीशैलम में देवी का कौन सा अंग गिरा था?

श्रीशैलम 18 महाशक्तिपीठों में से एक है। यहाँ माता सती की 'ग्रीवा' (Neck) गिरी थी, इसलिए इसे 'गले' से संबंधित रोगों के निवारण के लिए भी पूजा जाता है।

4. 'कुंकुम अर्चन' (Kumkum Archana) का क्या महत्त्व है?

श्रीशैलम मंदिर में 'कुंकुम अर्चन' सबसे प्रमुख सेवा है। इसमें भक्त 'ललिता सहस्रनाम' या 'भ्रमराम्बिका अष्टकम' का पाठ करते हुए देवी के श्रीचक्र या विग्रह पर कुंकुम अर्पित करते हैं। यह सौभाग्य और सुहाग की रक्षा के लिए अत्यंत फलदायी है।

5. श्लोक 3 में देवी को 'झंझा-निलाम' क्यों कहा गया है?

'झंझा-निलाम' का अर्थ है 'तूफानी हवा'। देवी ने शुम्भ-निशुम्भ जैसे राक्षसों की सेना (मेघ-पटल) को तिनके की तरह उड़ा दिया था, इसलिए उन्हें यह विशेषण दिया गया है।

6. इस पाठ का मुख्य लाभ क्या है?

अंतिम श्लोक (फलश्रुति) के अनुसार, यह पाठ 'सर्वसिद्धिदम्' है, अर्थात सभी सिद्धियां देने वाला। यह शत्रुओं का नाश करता है और दारिद्र्य (गरीबी) को जड़ से मिटा देता है।

7. देवी को 'श्रीकण्ठार्पित' क्यों कहा गया है?

'श्रीकण्ठ' भगवान शिव का एक नाम है। 'अर्पित' का अर्थ है समर्पित। देवी अपने आप को पूर्ण रूप से शिव को समर्पित कर चुकी हैं, और वे अर्धनारीश्वर स्वरूप में उनके साथ सदैव विराजमान रहती हैं।

8. क्या इसे घर पर पढ़ा जा सकता है?

जी हाँ, इसे घर पर सुबह या शाम की पूजा के समय पढ़ा जा सकता है। विशेष रूप से मंगलवार और शुक्रवार को इसका पाठ करना शुभ माना जाता है।

9. 'महिषाख्य' का क्या संदर्भ है?

श्लोक 3 में 'महिषाख्य-शुष्क-विटपी' कहा गया है। अर्थात, महिषासुर रूपी सूखे वृक्ष को जलाने के लिए देवी 'दावानल' (वन की आग) के समान हैं।

10. क्या यह पाठ मोक्ष प्रदान करता है?

हाँ, माँ भ्रमराम्बा 'संसार-अर्णव-तारकां' हैं (श्लोक 6), अर्थात वे इस संसार रूपी सागर से तारने वाली हैं और अंत में मोक्ष प्रदान करती हैं।