Devi Bhagavatam Skanda 12 Chapter 9 | The Power of Gayatri & Gautama's Curse

परिचय - श्रीमद्देवीभागवते द्वादशस्कन्धे नवमोऽध्यायः
श्रीमद्देवीभागवत महापुराण शाक्त सम्प्रदाय का सर्वोच्च ग्रंथ है। इसके बारहवें स्कन्ध का नौवां अध्याय एक अत्यंत ऐतिहासिक और शिक्षापद कथा का वर्णन करता है। यह कथा महर्षि गौतम और उनके द्वारा रक्षित कृतघ्न ब्राह्मणों के शाप से जुड़ी है।
कथा सार: एक बार 12 वर्षों तक घोर अकाल पड़ा। त्राही-त्राही मची हुई थी। तब महर्षि गौतम ने माता गायत्री की कठोर तपस्या की। देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें एक 'पूर्णपात्र' (अक्षय पात्र) प्रदान किया। उस पात्र से ऋषि ने हजारों ऋषियों और ब्राह्मणों का 12 वर्षों तक पुत्रवत पालन किया।
परन्तु, जब सुकाल आया, तो ईर्ष्यावश उन ब्राह्मणों ने गौतम पर झूठा आरोप लगाया। इस घोर कृतघ्नता को देख गौतम ने उन्हें शाप दिया कि वे वेद और गायत्री से विमुख हो जाएंगे। यह अध्याय हमें कृतज्ञता (Gratitude) और निरन्तर शक्ति उपासना का महत्व सिखाता है।
अध्याय का महत्त्व
गायत्री की सर्वोच्चता
यह अध्याय स्पष्ट करता है कि गायत्री मंत्र और शक्ति उपासना के बिना अन्य सभी साधनाएं अधूरी हैं। ऋषि व्यास यहाँ तक कहते हैं - "न विष्णूपासना नित्या न शिवोपासना तथा। नित्या चोपासना शक्तेः" - अर्थात शक्ति उपासना नित्य और अनिवार्य है।
पाखंड का कारण
आज समाज में वेद-विरुद्ध जो अनेक पाखंडी मत प्रचलित हैं, उनका मूल कारण वही प्राचीन शाप है। जो लोग वेदों की निंदा करते हैं, वे वस्तुतः उसी शाप के प्रभाव से ग्रस्त हैं।
पाठ के लाभ (Benefits)
- धर्म में आस्था: इसके पठन से वेद और गायत्री के प्रति निष्ठा दृढ़ होती है।
- पाप नाश: कृतघ्नता जैसे महापापों के दुष्परिणाम जानकर मनुष्य सन्मार्ग पर चलता है।
- संकट निवृति: अकाल और दरिद्रता के समय गायत्री उपासना की प्रेरणा मिलती है, जो सभी अभावों को दूर करती है।
- विवेक जाग्रति: सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म का भेद समझने की बुद्धि प्राप्त होती है।