Sri Renuka Ashtottara Shatanama Stotram – श्री रेणुका अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

॥ श्री रेणुका ध्यानम् ॥
ध्यायेन्नित्यमपूर्ववेषललितां कन्दर्पलावण्यदां
देवीं देवगणैरुपास्यचरणां कारुण्यरत्नाकराम् ।
लीलाविग्रहिणीं विराजितभुजां सच्चन्द्रहासादिभि-
-र्भक्तानन्दविधायिनीं प्रमुदितां नित्योत्सवां रेणुकाम् ॥
॥ श्री रेणुका अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥
जगदम्बा जगद्वन्द्या महाशक्तिर्महेश्वरी ।
महादेवी महाकाली महालक्ष्मीः सरस्वती ॥
महावीरा महारात्रिः कालरात्रिश्च कालिका ।
सिद्धविद्या राममाता शिवा शान्ता ऋषिप्रिया ॥
नारायणी जगन्माता जगद्बीजा जगत्प्रभा ।
चन्द्रिका चन्द्रचूडा च चन्द्रायुधधरा शुभा ॥
भ्रमराम्बा तथानन्दा रेणुका मृत्युनाशिनी ।
दुर्गमा दुर्लभा गौरी दुर्गा भर्गकुटुम्बिनी ॥
कात्यायनी महामाता रुद्राणी चाम्बिका सती ।
कल्पवृक्षा कामधेनुः चिन्तामणिरूपधारिणी ॥
सिद्धाचलवासिनी च सिद्धबृन्दसुशोभिनी ।
ज्वालामुखी ज्वलत्कान्ता ज्वाला प्रज्वलरूपिणी ॥
अजा पिनाकिनी भद्रा विजया विजयोत्सवा ।
कुष्ठरोगहरा दीप्ता दुष्टासुरगर्वमर्दिनी ॥
सिद्धिदा बुद्धिदा शुद्धा नित्यानित्या तपःप्रिया ।
निराधारा निराकारा निर्माया च शुभप्रदा ॥
अपर्णा चाऽन्नपूर्णा च पूर्णचन्द्रनिभानना ।
कृपाकरा खड्गहस्ता छिन्नहस्ता चिदम्बरा ॥
चामुण्डी चण्डिकाऽनन्ता रत्नाभरणभूषिता ।
विशालाक्षी च कामाक्षी मीनाक्षी मोक्षदायिनी ॥
सावित्री चैव सौमित्री सुधा सद्भक्तरक्षिणी ।
शान्तिश्च शान्त्यतीता च शान्तातीततरा तथा ॥
जमदग्नितमोहन्त्री धर्मार्थकाममोक्षदा ।
कामदा कामजननी मातृका सूर्यकान्तिनी ॥
मन्त्रसिद्धिर्महातेजा मातृमण्डलवल्लभा ।
लोकप्रिया रेणुतनया भवानी रौद्ररूपिणी ॥
तुष्टिदा पुष्टिदा चैव शाम्भवी सर्वमङ्गला ।
॥ फलश्रुतिः ॥
एतदष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् पठेत्सदा ॥
सर्वसम्पत्करं दिव्यं सर्वाभीष्टफलप्रदम् ।
अष्टसिद्धियुतं चैव सर्वपापनिवारणम् ॥
॥ इति श्रीशाण्डिल्यमहर्षिविरचिता श्रीरेणुकादेव्यष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णा ॥
श्री रेणुका अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् - परिचय
श्री रेणुका अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् माँ आदिशक्ति रेणुका (यल्लम्मा) के 108 अत्यंत सिद्ध और पवित्र नामों का संग्रह है। महर्षि शाण्डिल्य द्वारा रचित यह स्तोत्र देवी के अनन्य भक्तों के लिए एक कल्पवृक्ष के समान है। दक्षिण भारत में, विशेषकर कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना में, देवी रेणुका को 'यल्लम्मा' (जगदम्बा) के रूप में पूजा जाता है।
इस स्तोत्र में देवी को 'जगदम्बा' (जगत की माता), 'महाशक्ति', 'महाकाली', 'महालक्ष्मी' और 'सरस्वती' के रूप में नमन किया गया है। इसमें उनके उग्र रूप (जैसे 'ज्वालामुखी', 'दुष्टासुरगर्वमर्दिनी') और सौम्य रूप (जैसे 'करुण्यरत्नाकरा', 'शान्ता') दोनों का अद्भुत संगम है। यह स्तोत्र न केवल आध्यात्मिक उन्नति देता है, बल्कि व्यावहारिक जीवन की कठिनाइयों जैसे रोग, दरिद्रता और शत्रु बाधा को भी दूर करता है।
भक्तों का विश्वास है कि जो व्यक्ति इन 108 नामों का नित्य पाठ करता है, उस पर माँ यल्लम्मा की विशेष कृपा बरसती है और उसके जीवन से दुख और दरिद्रता का सदा के लिए नाश हो जाता है।
पाठ के लाभ (Benefits)
इस स्तोत्र की फलश्रुति और 108 नामों के प्रभाव से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
- धन और ऐश्वर्य: अंतिम श्लोक में कहा गया है - 'सर्वसम्पत्करं दिव्यं' - अर्थात यह पाठ करने से सभी प्रकार की संपत्ति और वैभव की प्राप्ति होती है।
- आरोग्य और रोग निवारण: देवी का नाम 'कुष्ठरोगहरा' (श्लोक 38) है। यह स्तोत्र त्वचा संबंधी रोगों (Skin Diseases), चेचक और अन्य गंभीर बीमारियों से मुक्ति दिलाता है।
- मनोकामना पूर्ति: 'सर्वाभीष्टफलप्रदम्' - यह भक्तों की सभी सात्विक इच्छाओं को पूर्ण करने वाला कामधेनु रूपी स्तोत्र है।
- पाप नाश: 'सर्वपापनिवारणम्' - इसके पाठ से जाने-अनजाने में किए गए पापों का क्षय होता है और चित्त शुद्ध होता है।
- अष्ट सिद्धि: 'अष्टसिद्धियुतं चैव' - साधक को अणिमा, महिमा आदि आठों सिद्धियों की प्राप्ति में सहायता मिलती है।
- शत्रु विजय: 'विजया' और 'दुष्टासुरगर्वमर्दिनी' नामों के जप से शत्रुओं का दमन होता है और निडरता आती है।
पाठ विधि (Recitation Method)
इस अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र की पूर्ण सिद्धि के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:
- विशिष्ट दिन: मंगलवार और शुक्रवार रेणुका देवी की पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं। आषाढ़ और कार्तिक माह विशेष फलदायी हैं।
- स्नान और वस्त्र: स्नान करके शुद्ध वस्त्र (लाल रंग शुभ है) धारण करें।
- पूजन सामग्री: देवी को हल्दी, कुमकुम, और नीम के पत्ते अवश्य अर्पित करें। दक्षिण भारत में देवी को 'कढ़म' (कलश) के रूप में भी पूजा जाता है।
- नैवेद्य: देवी को गुड़ और चावल की खीर या पान-सुपारी का भोग लगाएं।
- संकल्प: हाथ में जल और अक्षत लेकर अपनी मनोकामना बोलें और फिर 108 नामों का पाठ आरम्भ करें।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. श्री रेणुका अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् क्या है?
यह माँ रेणुका (यल्लम्मा) के 108 दिव्य नामों का संग्रह है। महर्षि शाण्डिल्य द्वारा रचित इस स्तोत्र में देवी के विभिन्न गुणों और शक्तियों का वर्णन है।
2. रेणुका देवी को 'यल्लम्मा' क्यों कहा जाता है?
दक्षिण भारत में 'यल्लम्मा' का अर्थ है 'सभी की माता' (जगदम्बा)। रेणुका देवी को ही वहां यल्लम्मा के रूप में पूजा जाता है, जो ग्राम देवता और कुलदेवी के रूप में मान्य हैं।
3. इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होता है?
फलश्रुति के अनुसार, इसके पाठ से 'सर्वसम्पत्करं' (समस्त संपत्तियों की प्राप्ति), 'सर्वाभीष्टफलप्रदम्' (सभी इच्छाओं की पूर्ति) और 'सर्वपापनिवारणम्' (पापों का नाश) होता है।
4. क्या यह त्वचा रोगों (Skin Diseases) के लिए लाभकारी है?
हाँ, देवी के 108 नामों में एक नाम 'कुष्ठरोगहरा' (श्लोक 38) है, जिसका अर्थ है कुष्ठ और अन्य त्वचा रोगों को हरने वाली। यल्लम्मा माता को आरोग्य की देवी माना जाता है।
5. पाठ करने का सबसे शुभ समय कौन सा है?
मंगलवार और शुक्रवार (विशेषकर आषाढ़ और कार्तिक माह में) देवी की पूजा के लिए सर्वोत्तम माने गए हैं। नवरात्रि और पूर्णिमा भी विशेष फलदायी तिथियां हैं।
6. क्या पुरुष और स्त्रियाँ दोनों इसका पाठ कर सकते हैं?
जी हाँ, कोई भी भक्त (स्त्री या पुरुष) पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ माँ रेणुका के इन 108 नामों का पाठ कर सकता है।
7. देवी को 'कामधेनु' और 'कल्पवृक्ष' क्यों कहा गया है?
श्लोक 32 में देवी को 'कल्पवृक्षा' और 'कामधेनुः' कहा गया है क्योंकि वे अपने भक्तों की हर सात्विक मनोकामना को वैसे ही पूर्ण करती हैं जैसे स्वर्ग का कल्पवृक्ष और कामधेनु।
8. क्या इससे शत्रु बाधा और कोर्ट केस में मदद मिलती है?
हाँ, देवी का एक नाम 'दुष्टासुरगर्वमर्दिनी' (श्लोक 38) है, अर्थात दुष्टों और असुरों के गर्व को चूर करने वाली। यह शत्रुओं और विरोधियों पर विजय दिलाता है।
9. पूजा में कौन सी सामग्री अर्पित करनी चाहिए?
रेणुका/यल्लम्मा देवी को हल्दी, कुमकुम, नीम के पत्ते (आरोग्य के लिए), नींबू और नैवेद्य (खीर या गुड़-चावल) अर्पित करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
10. 'जमदग्नितमोहन्त्री' नाम का क्या अर्थ है?
इसका अर्थ है 'जमदग्नि के अज्ञान/अंधकार (तम) का नाश करने वाली' या 'अपने पति ऋषि जमदग्नि को प्रिय'। यह देवी के पातिव्रत्य और शक्ति दोनों को दर्शाता है।