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Sri Jwalamukhi Stotram 2 – श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् – २

Sri Jwalamukhi Stotram 2 – श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् – २
॥ श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् ॥ जाज्वल्यमानवपुषा दशदिग्विभागान् सन्दीपयन्त्यभयपद्मगदावराढ्या । सिंहस्थिता शशिकलाभरणा त्रिनेत्रा ज्वालामुखी हरतु मोहतमः सदा नः ॥ १ ॥ आब्रह्मकीटजननीं महिषीं शिवस्य मुग्धस्मितां प्रलयकोटिरविप्रकाशम् । ज्वालामुखीं कनककुण्डलशोभितांसां वन्दे पुनः पुनरपीह सहस्रकृत्वः ॥ २ ॥ देदीप्यमानमुकुटद्युतिभिश्च देवै- र्दासैरिव द्विगुणिताङ्घ्रिनखप्रदीप्तिम् । ज्वालामुखीं सकलमङ्गलमङ्गलां ता- मम्बां नतोऽस्म्यखिलदुःखविपत्तिदग्ध्रीम् ॥ ३ ॥ क्षित्यब्‍हुताशपवनाम्बरसूर्यचन्द्र- यष्ट्राख्यमूर्तिममलानपि पावयन्तीम् । ज्वालामुखीं प्रणतकल्पलतां शिवस्य साम्राज्यशक्तिमतुलां महतीं नमामि ॥ ४ ॥ नौमीश्वरीं त्रिजगतोऽभयदानशौण्डां ज्वालामहार्यभवजालहरां नमामि । मोहान्धकारहरणे विमलेन्दुकान्तिं देवीं सदा भगवतीं मनसा स्मरामि ॥ ५ ॥ दुष्कर्मवायुभिरितस्तत एव दीप्तैः पापज्वलज्ज्वलनजातशिखाकलापैः । दग्धं च जीवयतु मां परितो लुठन्तं देवी दयार्द्रहृदयामृतपूर्णदृष्ट्या ॥ ६ ॥ ज्वालामुखी ज्वलदनल्पलयाग्रिकोटि- रोचिष्मती रविशशिप्रतिभानकर्त्री । भक्तस्य भर्गवपुषा भवभर्जनाय भूयात् सदाभ्युदयदानवदान्यमुख्या ॥ ७ ॥ त्वं चौषधीशमुकुटाऽहमसाध्यरोग- स्त्वं चित्प्रदीप्तिरहमत्र भवान्ध्यमग्नः । त्वं चाम्ब कल्पतरुरेवमहं च भिक्षु- र्ज्वलामुखि प्रकुरु देवि यथोचितं मे ॥ ८ ॥ यद्ध्यानकेसरिसमाक्रमणोत्थभीते- र्मर्मव्यथाजनकदुःखशतानि सद्यः । गोमायवन्ति परितो भृशकान्दिशीका- नस्मांश्च पालयतु सैव भवाब्धिदुःखात् ॥ ९ ॥ ज्वालामुखि क्षणमपीह विलम्बमम्ब नार्तो ह्यनर्थपतितः सहते विपन्नः । हस्तस्थितामृतकमण्डलुवारिणैव मां मूर्छितं झटिति जीवय तापतप्तम् ॥ १० ॥ बाह्यान्ध्यनाशनविधौ रविचन्द्रवाह्नि- ज्योतींषि देवि दयायाऽजनयः पुरा त्वम् । एतत्तु रूपमखिलान्तरमोहरात्रि- ध्वान्तान्तकारि तव यत् स्फुरतादतोऽन्तः ॥ ११ ॥ मन्ये त्रिधामनयने नयनत्रयं ते भक्तार्तिनाशननिमित्तविलोकनाय । मातः परं यदपि देवि तथाप्यधन्य- स्त्वद्दृष्टिपातरहितोस्म्यहहाहतोऽस्मि ॥ १२ ॥ सत्यं ब्रवीमि शृणु चित्त मदान्ध मूर्ख मा गाः कदापि विषयान्विषमान्विषाक्तान् । ईशीमपारकरुणां भवभीतिभेत्रि- मम्बां भजस्व सततं परसौख्यदात्रीम् ॥ १३ ॥ त्वं मे महेशि जननी परमार्तिहर्त्री त्वं मे पिता हिततमस्त्वमहेतुबन्धुः । त्वं मे भवाब्धितरणे दृढनौस्त्वमेव दुःखामयाधिहरणे चतुरश्च वैद्यः ॥ १४ ॥ ज्वालां जगज्जननसंहरणस्थितीनां हेतुं गतिं मुषितलज्जितदुःखितानाम् । उन्मोचनां च भवबन्धनदुर्गतीनां त्वां नौमि नौमि शरणं शरणागतानाम् ॥ १५ ॥ फलश्रुतिः ज्वालामुखीस्तवमिमं शृणुयात्पठेद्वा यः श्रद्धया परमया बहुभक्तियुक्तः । भूयात्स दग्धबहुजन्मशतार्जिताऽघो ऽविज्ञोप्यनेकजननाथितराज्यभूमिः ॥ १६ ॥ ॥ इति श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् माँ दुर्गा के उस पावन स्वरूप की स्तुति है, जो हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में 'ज्वाला जी' (Jwala Ji) के नाम से विश्वविख्यात हैं। यह 51 शक्ति पीठों में से एक परम जाग्रत स्थल है।

पौराणिक कथा: जब भगवान विष्णु ने सती के जलते हुए शरीर के टुकड़े किए थे, तब यहाँ सती की 'जिह्वा' (Tongue) गिरी थी। इसी कारण यहाँ देवी का मुख (Mouth) अग्नि की लपटों (Flames) के रूप में सदा प्रज्वलित रहता है। यहाँ देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकलती हुई नौ प्राकृतिक ज्वालाएं ही देवी का साक्षात स्वरूप मानी जाती हैं।

अकबर का अहंकार और चमत्कार: मुगल बादशाह अकबर ने ज्वालाजी की शक्ति को परखने और बुझाने के लिए कई प्रयास किए। उसने ज्वालाओं पर लोहे के भारी तवे रखवाए और पानी की नहर खुदवाई, लेकिन ज्वालाएं लोहे को फाड़कर और पानी को चीरकर ऊपर आ गईं। यह देखकर अकबर नत्मस्तक हुआ और नंगे पैर चलकर उसने देवी को 'सवा मन (50 Kg) सोने का छत्र' चढ़ाया। परंतु देवी ने उस अहंकार भरे दान को अस्वीकार कर दिया और वह सोना एक ऐसी 'विचित्र धातु' में बदल गया, जिसकी पहचान आज तक वैज्ञानिक भी नहीं कर पाए हैं।

यह स्तोत्र उसी 'ज्वालामुखी' देवी का आवाहन करता है। श्लोक 7 में कहा गया है—"ज्वलदनल्पलयाग्रिकोटि" (करोड़ों प्रल्पाग्नि के समान ज्वाला वाली)। यह देवी केवल प्रकाश नहीं, अपितु 'ज्ञान की अग्नि' भी हैं जो अज्ञान के अंधकार (मोहतमः) को जला देती हैं (श्लोक 1)।

भक्तों का विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से यहाँ आता है, उसकी खाली झोली भर जाती है। गोरखनाथ जी ने भी यहाँ घोर तपस्या की थी, जिसका प्रमाण मंदिर में स्थित 'गोरख डिब्बी' है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

  • नौ देवियों का वास: यहाँ जलने वाली मुख्य ज्वाला महाकाली हैं। अन्य आठ ज्वालाएं—अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विन्ध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजना के रूप में पूजी जाती हैं। एक ही स्थान पर नवदुर्गा का यह अद्भुत संगम दुर्लभ है।

  • रोग नाशक: श्लोक 14 में देवी को "दुःखामयाधिहरणे चतुरश्च वैद्यः" (दुःख और रोगों को हरने वाला चतुर वैद्य/चिकित्सक) कहा गया है। यह स्तोत्र शारीरिक पीड़ा को हरने में 'रामबाण' औषधि के समान कार्य करता है।

  • शत्रु दमन: अग्नि तत्व प्रधान होने के कारण, ज्वालामुखी देवी शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों को तत्काल भस्म कर देती हैं। श्लोक 3 में उन्हें "विपत्तिदग्ध्रीम्" (विपत्तियों को जलाने वाली) कहा गया है।

पाठ के लाभ (Benefits)

श्री ज्वालामुखी स्तोत्र का नियमित पाठ करने से जीवन में प्रत्यक्ष चमत्कार अनुभव होते हैं:

  • असाध्य रोगों से मुक्ति: विशेषकर यदि कोई त्वचा रोग, नेत्र विकार या पेट की बीमारियों से ग्रसित हो, तो इस स्तोत्र का पाठ और देवी की भभूति का प्रयोग चमत्कारी लाभ देता है।

  • विपत्ति निवारण: जब व्यक्ति चारों ओर से मुसीबतों से घिर जाए और कोई रास्ता न दिखे (श्लोक 10 - "नार्तो ह्यनर्थपतितः"), तब करुणा से भरी देवी की दृष्टि उसे उबार लेती है।

  • राज्य और ऐश्वर्य: फलश्रुति (श्लोक 16) के अनुसार, इसका पाठ करने वाला "अनेकजननाथितराज्यभूमिः" (अनेक जन्मों तक राज्य सुख भोगने वाला) बनता है। दरिद्रता का नाश होकर घर में लक्ष्मी स्थिर होती हैं।

  • पाप नाश: अग्नि का स्वभाव है जलाना। यह स्तोत्र संचित पापों (Accumulated Karmas) को वैसे ही जला देता है, जैसे आग सूखी लकड़ी को (श्लोक 3)।

पाठ विधि (Ritual Method)

ज्वालामुखी साधना के लिए अग्नि तत्व की प्रधानता होती है:

  • दीप प्रज्वलन: तांबे या मिट्टी के दीपक में तिल का तेल भरकर मोटी बाती जलाएं, जो देर तक प्रज्वलित रहे। यह देवी की ज्योति का प्रतीक है।

  • भोग: देवी को नारियल, मिसरी, और दूध से बनी मिठाइयाँ (विशेषकर राबड़ी/खीर) का भोग लगाएं।

  • मंत्र: पाठ के पूर्व और अंत में इस मंत्र का 11 बार जाप करें:
    "ॐ ह्रीं श्रीं ज्वालामुखी मम सर्व शत्रून् भक्षय भक्षय हुं फट् स्वाहा"

  • दिशा: उत्तर दिशा की ओर मुख करके पाठ करें, क्योंकि कांगड़ा (मंदिर) भारत के उत्तर में स्थित है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. ज्वालामुखी देवी का मंदिर कहाँ है?

श्री ज्वालामुखी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित है। यह 51 शक्ति पीठों में से एक है, जहाँ सती की 'जीभ' (Tongue) गिरी थी। यहाँ देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि भूगर्भ से निकलती हुई नौ प्राकृतिक ज्वालाएं ही देवी का स्वरूप हैं।

2. नौ ज्वालाओं (Nine Flames) के क्या नाम हैं?

ये नौ ज्वालाएं महाकाली (मुख्य ज्योति), अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विन्ध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजना देवी के प्रतीक हैं। भक्त इन सभी स्वरूपों का दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

3. बादशाह अकबर से जुड़ी क्या कथा है?

अकबर ने ज्वाला को बुझाने के लिए नहर खुदवाई और लोहे के तवे रखवाए, पर ज्वाला नहीं बुझी। हारकर उसने सवा मन (50 किलो) सोने का छत्र चढ़ाया, जिसे देवी ने अस्वीकार कर दिया और वह सोना किसी अज्ञात धातु (Unknown Metal) में बदल गया, जो आज भी मंदिर में है।

4. इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?

यह स्तोत्र 'दुःखविपत्तिदग्ध्रीम्' (दुःख और विपत्ति को जलाने वाला) है। इसके पाठ से असाध्य रोग (विशेषकर त्वचा और नेत्र रोग), शत्रु बाधा, और मुकदमों में विजय प्राप्त होती है।

5. क्या घर पर इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। घर पर ज्योत जलाकर पूर्ण श्रद्धा से इसका पाठ करें। यह घर की नकारात्मक ऊर्जा को भस्म कर देता है और परिवार की रक्षा करता है।

6. देवी को क्या भोग लगाया जाता है?

ज्वालाजी को नारियल, मिश्री, मखाने और विशेष रूप से 'राबड़ी' (गाढ़ा दूध) का भोग लगाया जाता है। भक्त लाल चुनरी और सुहाग की सामग्री भी अर्पित करते हैं।

7. गोरखनाथ जी का मंदिर से क्या संबंध है?

बाबा गोरखनाथ ने यहाँ तपस्या की थी। मंदिर परिसर में 'गोरख डिब्बी' है, जहाँ जल का स्रोत्र खौलता हुआ (Boiling) प्रतीत होता है, पर हाथ डालने पर वह शीतल (Cold) लगता है। यह एक आश्चर्यजनक दैवीय चमत्कार है।

8. पाठ के लिए कौन सा समय उत्तम है?

नवरात्रि के नौ दिन, और सामान्य दिनों में सुबह और शाम की आरती का समय (जब ज्वालाएं विशेष रूप से प्रदीप्त होती हैं) पाठ के लिए सर्वोत्तम है।

9. 'जाज्वल्यमानवपुषा' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'जिनका शरीर (वपु) अत्यंत देदीप्यमान (जाज्वल्यमान) है'। देवी का स्वरूप साक्षात अग्नि शिखाओं (Flames) से बना है जो दशों दिशाओं को प्रकाशित करता है।

10. क्या यह स्तोत्र तांत्रिक है?

नहीं, यह एक भक्ति प्रधान स्तोत्र है। यद्यपि इसमें "फट्" जैसे बीज मंत्रों का प्रभाव है, परंतु इसे गृहस्थ भी सरलता से पढ़ सकते हैं। यह उग्र होते हुए भी कल्याणकारी है।