Sri Jwalamukhi Stotram 2 – श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् – २

श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् माँ दुर्गा के उस पावन स्वरूप की स्तुति है, जो हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा घाटी में 'ज्वाला जी' (Jwala Ji) के नाम से विश्वविख्यात हैं। यह 51 शक्ति पीठों में से एक परम जाग्रत स्थल है।
पौराणिक कथा: जब भगवान विष्णु ने सती के जलते हुए शरीर के टुकड़े किए थे, तब यहाँ सती की 'जिह्वा' (Tongue) गिरी थी। इसी कारण यहाँ देवी का मुख (Mouth) अग्नि की लपटों (Flames) के रूप में सदा प्रज्वलित रहता है। यहाँ देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकलती हुई नौ प्राकृतिक ज्वालाएं ही देवी का साक्षात स्वरूप मानी जाती हैं।
अकबर का अहंकार और चमत्कार: मुगल बादशाह अकबर ने ज्वालाजी की शक्ति को परखने और बुझाने के लिए कई प्रयास किए। उसने ज्वालाओं पर लोहे के भारी तवे रखवाए और पानी की नहर खुदवाई, लेकिन ज्वालाएं लोहे को फाड़कर और पानी को चीरकर ऊपर आ गईं। यह देखकर अकबर नत्मस्तक हुआ और नंगे पैर चलकर उसने देवी को 'सवा मन (50 Kg) सोने का छत्र' चढ़ाया। परंतु देवी ने उस अहंकार भरे दान को अस्वीकार कर दिया और वह सोना एक ऐसी 'विचित्र धातु' में बदल गया, जिसकी पहचान आज तक वैज्ञानिक भी नहीं कर पाए हैं।
यह स्तोत्र उसी 'ज्वालामुखी' देवी का आवाहन करता है। श्लोक 7 में कहा गया है—"ज्वलदनल्पलयाग्रिकोटि" (करोड़ों प्रल्पाग्नि के समान ज्वाला वाली)। यह देवी केवल प्रकाश नहीं, अपितु 'ज्ञान की अग्नि' भी हैं जो अज्ञान के अंधकार (मोहतमः) को जला देती हैं (श्लोक 1)।
भक्तों का विश्वास है कि जो भी सच्चे मन से यहाँ आता है, उसकी खाली झोली भर जाती है। गोरखनाथ जी ने भी यहाँ घोर तपस्या की थी, जिसका प्रमाण मंदिर में स्थित 'गोरख डिब्बी' है।
विशिष्ट महत्व (Significance)
नौ देवियों का वास: यहाँ जलने वाली मुख्य ज्वाला महाकाली हैं। अन्य आठ ज्वालाएं—अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विन्ध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका और अंजना के रूप में पूजी जाती हैं। एक ही स्थान पर नवदुर्गा का यह अद्भुत संगम दुर्लभ है।
रोग नाशक: श्लोक 14 में देवी को "दुःखामयाधिहरणे चतुरश्च वैद्यः" (दुःख और रोगों को हरने वाला चतुर वैद्य/चिकित्सक) कहा गया है। यह स्तोत्र शारीरिक पीड़ा को हरने में 'रामबाण' औषधि के समान कार्य करता है।
शत्रु दमन: अग्नि तत्व प्रधान होने के कारण, ज्वालामुखी देवी शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों को तत्काल भस्म कर देती हैं। श्लोक 3 में उन्हें "विपत्तिदग्ध्रीम्" (विपत्तियों को जलाने वाली) कहा गया है।
पाठ के लाभ (Benefits)
श्री ज्वालामुखी स्तोत्र का नियमित पाठ करने से जीवन में प्रत्यक्ष चमत्कार अनुभव होते हैं:
असाध्य रोगों से मुक्ति: विशेषकर यदि कोई त्वचा रोग, नेत्र विकार या पेट की बीमारियों से ग्रसित हो, तो इस स्तोत्र का पाठ और देवी की भभूति का प्रयोग चमत्कारी लाभ देता है।
विपत्ति निवारण: जब व्यक्ति चारों ओर से मुसीबतों से घिर जाए और कोई रास्ता न दिखे (श्लोक 10 - "नार्तो ह्यनर्थपतितः"), तब करुणा से भरी देवी की दृष्टि उसे उबार लेती है।
राज्य और ऐश्वर्य: फलश्रुति (श्लोक 16) के अनुसार, इसका पाठ करने वाला "अनेकजननाथितराज्यभूमिः" (अनेक जन्मों तक राज्य सुख भोगने वाला) बनता है। दरिद्रता का नाश होकर घर में लक्ष्मी स्थिर होती हैं।
पाप नाश: अग्नि का स्वभाव है जलाना। यह स्तोत्र संचित पापों (Accumulated Karmas) को वैसे ही जला देता है, जैसे आग सूखी लकड़ी को (श्लोक 3)।
पाठ विधि (Ritual Method)
ज्वालामुखी साधना के लिए अग्नि तत्व की प्रधानता होती है:
दीप प्रज्वलन: तांबे या मिट्टी के दीपक में तिल का तेल भरकर मोटी बाती जलाएं, जो देर तक प्रज्वलित रहे। यह देवी की ज्योति का प्रतीक है।
भोग: देवी को नारियल, मिसरी, और दूध से बनी मिठाइयाँ (विशेषकर राबड़ी/खीर) का भोग लगाएं।
मंत्र: पाठ के पूर्व और अंत में इस मंत्र का 11 बार जाप करें:
"ॐ ह्रीं श्रीं ज्वालामुखी मम सर्व शत्रून् भक्षय भक्षय हुं फट् स्वाहा"दिशा: उत्तर दिशा की ओर मुख करके पाठ करें, क्योंकि कांगड़ा (मंदिर) भारत के उत्तर में स्थित है।