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Sri Jwalamukhi Stotram 1 – श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् (देवी रहस्य)

Sri Jwalamukhi Stotram: Hymn to the Flame-Mouthed Goddess from Devi Rahasya

Sri Jwalamukhi Stotram 1 – श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् (देवी रहस्य)
श्रीभैरव उवाच । तारं यो भजते मातर्बीजं तव सुधाकरम् । पारावारसुता नित्यं निश्चला तद्गृहे वसेत् ॥ १ ॥ शून्यं यो दहनाधिरूढममलं वामाक्षिसंसेवितं सेन्दुं बिन्दुयुतं भवानि वरदे स्वान्ते स्मरेत् साधकः । मूकस्यापि सुरेन्द्रसिन्धुजलवद्वाग्देवता भारती गद्यः पद्यमयीं निरर्गलतरा मातर्मुखे तिष्ठति ॥ २ ॥ शुभं वह्न्यारूढं मतियुतमनल्पेष्टफलदं सबिन्द्वीन्दुं मन्दो यदि जपति बीजं तव प्रियम् । तदा मातः स्वःस्त्रीजनविहरणक्लेशसहितः सुखमिन्द्रोद्याने स्वपिति स भवत्पूजनरतः ॥ ३ ॥ ज्वालामुखीति जपते तव नामवर्णान् यः साधको गिरिशपत्नि सुभक्तिपूर्वम् । तस्याङ्घ्रिपद्मयुगलं सुरनाथवेश्याः सीमन्तरत्नकिरणैरनुरञ्जयन्ति ॥ ४ ॥ पाशाम्बुजाभयधरे मम सर्वशत्रून् शब्दं त्विति स्मरति यस्तव मन्त्रमध्ये । तस्याद्रिपुत्रि चरणौ बहुपांसुयुक्तौ प्रक्षालयन्त्यरिवधूनयनाश्रुपाताः ॥ ५ ॥ भक्षयद्वयमिदं यदि भक्त्या साधको जपति चेतसि मातः । स स्मरारिरिव त्वत्प्रसादत- स्त्वत्पदं च लभते दिवानिशम् ॥ ६ ॥ कूर्चबीजमनघं यदि ध्यायेत् साधकस्तव महेश्वरि योऽन्तः । अष्टहस्तकमलेषु सुवश्या- स्तस्य त्र्यम्बकसमस्तसिद्धयः ॥ ७ ॥ ठद्वयं तव मनूत्तरस्थितं यो जपेत्तु परमप्रभावदम् । तस्य देवि हरिशङ्करादयः पूजयन्ति चरणौ दिवौकसः ॥ ८ ॥ ओं ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरे देवि सुरासुरनिषूदिनि । त्रैलोक्याभयदे मातर्ज्वालामुखि नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥ उदितार्कद्युते लक्ष्मि लक्ष्मीनाथसमर्चिते । वराम्बुजाभयधरे ज्वालामुखि नमोऽस्तु ते ॥ १० ॥ सर्वसारमयि शर्वे सर्वामरनमस्कृते । सत्ये सति सदाचारे ज्वालामुखि नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥ यस्या मूर्ध्नि शशी त्रिलोचनगता यस्या रवीन्द्वग्नयः पाशाम्भोजवराभयाः करतलाम्भोजेषु सद्धेतयः । गात्रे कुङ्कुमसन्निभा द्युतिरहिर्यस्यागले सन्ततं देवीं कोटिसहस्ररश्मिसदृशीं ज्वालामुखीं नौम्यहम् ॥ १२ ॥ निद्रां नो भजते विधिर्भगवति शङ्का शिवं नो त्यजे- द्विष्णुर्व्याकुलतामलं कमलिनीकान्तोऽपि धत्ते भयम् । दृष्ट्वा देवि त्वदीयकोपदहनज्वालां ज्वलन्ति तदा देवः कुङ्कुमपीतगण्डयुगलः सङ्क्रन्दनः क्रन्दति ॥ १३ ॥ यामाराध्य दिवानिशं सुरसरित्तीरे स्तवैरात्मभू- रुद्यद्भास्वरघर्मभानुसदृशीं प्राप्तोऽमरज्येष्ठताम् । दारिद्र्योरगदष्टलोकत्रितयीसञ्जिवनीं मातरं देवीं तां हृदये शशाङ्कशकलाचूडावतंसां भजे ॥ १४ ॥ आपीनस्तनश्रोणिभारनमितां कन्दर्पदर्पोज्ज्वलां लावण्याङ्कितरम्यगण्डयुगलां यस्त्वां स्मरेत् साधकः । वश्यास्तस्य धराभृदीश्वरसुते गीर्वाणवामभ्रुवः पादाम्भोजतलं भजन्ति त्रिदशा गन्धर्वसिद्धादयः ॥ १५ ॥ हृत्वा देवि शिरो विधेर्यदकरोत् पात्रं कराम्भोरुहे शूलप्रोतममुं हरिं व्यगमयत् सद्भूषणं स्कन्धयोः । कालान्ते त्रितयं मुखेन्दुकुहरे शम्भोः शिरः पार्वति तन्मातर्भुवने विचित्रमखिलं जाने भवत्याः शिवे ॥ १६ ॥ गायत्री प्रकृतिर्गलेऽपि विधृता सा त्वं शिवे वेधसा श्रीरूपा हरिणापि वक्षसि धृताप्यर्धाङ्गभागे तथा । शर्वेणापि भवानि देवि सकलाः ख्यातुं न शक्ता वयं त्वद्रूपं हृदि मादृशां जडधियां ध्यातुं कथैवास्ति का ॥ १७ ॥ ज्वालामुखीस्तवमिमं पठते यदन्तः श्रीमन्त्रराजसहितं विभवैकहेतुम् । इष्टप्रदानसमये भुवि कल्पवृक्षं स्वर्गं व्रजेत् सुरवधूजनसेवितः सः ॥ १८ ॥ ॥ इति देवीरहस्ये श्री ज्वालामुखि स्तवम् ॥

श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री ज्वालामुखी स्तोत्रम् देवी रहस्य नामक गोपनीय तंत्र ग्रंथ से लिया गया है। इसमें भगवान भैरव स्वयं देवी को संबोधित करते हुए विभिन्न बीज मंत्रों की साधना विधि और उनके अद्भुत फल बताते हैं। यह 18 श्लोकों का अत्यंत प्रभावशाली स्तोत्र है।

ज्वालामुखी देवी हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में 51 शक्तिपीठों में से एक प्रमुख पीठ में विराजमान हैं। पौराणिक कथा के अनुसार यहाँ देवी सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी जब भगवान विष्णु ने शिव के तांडव को रोकने के लिए सुदर्शन चक्र से उनके शरीर को विच्छेदित किया। यहाँ के भैरव उन्मत्त भैरव हैं।

इस मंदिर की विशेषता है कि यहाँ 9 अखंड ज्वालाएं भूमि से निकलती हैं जो देवी दुर्गा के नौ रूपों—महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजना देवी का प्रतीक हैं। यहाँ कोई मूर्ति नहीं, केवल अग्नि स्वरूप में देवी पूजित हैं।

बीज मंत्र और श्लोकार्थ (Secret Bija Mantras)

यह स्तोत्र तांत्रिक साधना प्रधान है। प्रत्येक श्लोक में गोपनीय बीज मंत्रों का संकेत है:

  • श्लोक 1 (तार बीज): 'तारं बीजं सुधाकरम्' — 'तार' बीज (ॐ) और 'सुधाकर' (चंद्र बीज) का जप करने से लक्ष्मी (पारावारसुता) स्थिर रूप से घर में निवास करती हैं।

  • श्लोक 2 (वाग्देवी प्राप्ति): 'शून्यं दहनाधिरूढम्' — विशेष बीज मंत्र के ध्यान से मूक व्यक्ति भी वाग्देवता भारती का आश्रय पाता है, उसके मुख में गद्य-पद्य की धारा बहती है।

  • श्लोक 4 (नाम जप): 'ज्वालामुखीति जपते नामवर्णान्' — जो 'ज्वालामुखी' नाम के वर्णों का जप करता है, उसके चरणकमलों को देवांगनाएं अपने मस्तक के रत्नों की किरणों से रंजित करती हैं।

  • श्लोक 7 (कूर्च बीज): 'कूर्चबीजमनघं' — कूर्च बीज (हूं) का ध्यान करने से अष्ट सिद्धियाँ और त्र्यम्बक (शिव) जैसी समस्त सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं।

  • श्लोक 8 (ठ-द्वय): 'ठद्वयं तव मनूत्तरस्थितं' — मंत्र के अंत में स्थित ठ-द्वय (ठः ठः) का जप करने से हरि, शंकर आदि देवता भक्त के चरण पूजते हैं।

  • श्लोक 9 (त्र्यक्षर मंत्र): 'ॐ ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरे देवि' — तीन अक्षरों (ॐ ह्रीं श्रीं) वाली देवी को नमस्कार।

पाठ के लाभ (Benefits)

फलश्रुति (श्लोक 18) और अन्य श्लोकों में वर्णित लाभ:

  • वाक् सिद्धि: 'मूकस्यापि वाग्देवता मुखे तिष्ठति' — मूक भी वाणी प्राप्त करता है, कवित्व शक्ति मिलती है।

  • लक्ष्मी प्राप्ति: 'पारावारसुता निश्चला गृहे वसेत्' — लक्ष्मी स्थिर रूप से घर में निवास करती हैं।

  • स्वर्ग सुख: 'इन्द्रोद्याने स्वपिति स्वःस्त्रीजनविहरण' — इंद्र के उद्यान में अप्सराओं के साथ विहार।

  • शत्रु नाश: 'सर्वशत्रून् भक्षय' — सभी शत्रुओं का भक्षण। शत्रुओं की पत्नियाँ आँसू बहाती हैं।

  • अष्ट सिद्धि: 'अष्टहस्तकमलेषु सुवश्या त्र्यम्बकसमस्तसिद्धयः' — शिव जैसी समस्त सिद्धियाँ।

  • दारिद्र्य नाश: 'दारिद्र्योरगदष्टलोकत्रितयीसञ्जिवनीं' — दरिद्रता रूपी सर्प से दंशित त्रिलोक को जीवन देने वाली।

  • कल्पवृक्ष सम: 'इष्टप्रदानसमये भुवि कल्पवृक्षं' — इच्छा पूर्ति में कल्पवृक्ष के समान।

पाठ विधि (Ritual Method)

यह तांत्रिक स्तोत्र है, अतः विशेष सावधानी आवश्यक:

सामान्य पाठ विधि:

  1. समय: रात्रि 10 बजे के बाद या ब्रह्म मुहूर्त। मंगलवार और शुक्रवार विशेष।
  2. स्थान: एकांत स्थान, लाल आसन पर पूर्व या उत्तर मुख।
  3. दीप: सरसों तेल या घी का दीपक अवश्य जलाएं—देवी अग्नि स्वरूप हैं।
  4. पाठ: 1, 9 या 21 बार। नवरात्रि में 9 दिन नित्य पाठ अति प्रभावी।

विशेष साधना (गुरु दीक्षा उपरांत):

स्तोत्र में वर्णित बीज मंत्रों की साधना के लिए योग्य गुरु से दीक्षा आवश्यक है। बिना दीक्षा केवल स्तोत्र पाठ करें, बीज मंत्र जप न करें।

ज्वालामुखी मंदिर यात्रा:

मंदिर में देवी को मिश्री, नारियल और लाल चुनरी अर्पित करें। ज्योति की आरती लें। मंदिर के पीछे गोरख डिब्बी में भी ज्योति है—वहाँ भी दर्शन करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. ज्वालामुखी देवी कौन हैं?

ज्वालामुखी देवी आदिशक्ति का वह स्वरूप हैं जो 'ज्वाला के मुख' अर्थात अग्नि स्वरूप में प्रकट हुईं। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मंदिर में 9 अखंड ज्वालाएं भूमि से निकलती हैं जो देवी की साक्षात उपस्थिति मानी जाती हैं।

2. यह स्तोत्र किस ग्रंथ से है?

यह स्तोत्र 'देवी रहस्य' नामक तंत्र ग्रंथ से है। इसमें भगवान भैरव देवी को संबोधित करते हुए विभिन्न बीज मंत्रों की साधना और उनके फल बताते हैं। अंत में 'इति देवीरहस्ये श्री ज्वालामुखि स्तवम्' लिखा है।

3. 51 शक्तिपीठों में ज्वालामुखी का क्या स्थान है?

ज्वालामुखी 51 शक्तिपीठों में अत्यंत महत्वपूर्ण पीठ है। यहाँ देवी सती की जिह्वा (जीभ) गिरी थी। भैरव का नाम यहाँ उन्मत्त भैरव है।

4. 9 ज्वालाओं का क्या अर्थ है?

मंदिर में 9 अखंड ज्वालाएं हैं जो देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक मानी जाती हैं: महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका और अंजना देवी।

5. श्लोक 1-2 में कौन से बीज मंत्र हैं?

श्लोक 1 में 'तारं बीजं' (तार = ॐ) और 'सुधाकरम्' (चंद्र बीज) है। श्लोक 2 में विशेष बीज मंत्र का वर्णन है जिससे वाग्देवता प्राप्त होती हैं।

6. श्लोक 9 का मंत्र 'ॐ ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरे' क्या है?

यह ज्वालामुखी देवी का त्र्यक्षर (तीन अक्षर) मंत्र है: ॐ ह्रीं श्रीं। 'सुरासुरनिषूदिनि' (देवासुरों का संहार करने वाली), 'त्रैलोक्याभयदे' (तीनों लोकों को अभय देने वाली) देवी को नमस्कार है।

7. श्लोक 12 में देवी का ध्यान कैसे बताया है?

मस्तक पर चंद्रमा, तीन नेत्र (सूर्य-चंद्र-अग्नि), हाथों में पाश, कमल, वर, अभय मुद्रा, केसर जैसी कांति, गले में सर्प, करोड़ों किरणों जैसी दीप्ति।

8. श्लोक 16 में ब्रह्मा-विष्णु-शिव का क्या उल्लेख है?

देवी की सर्वशक्तिमत्ता का वर्णन—उन्होंने ब्रह्मा का सिर काटकर कपाल बनाया, विष्णु को शूल पर प्रोत किया, काल के अंत में शिव का भी सिर। यह देवी की परम शक्ति का प्रतीक है।

9. फलश्रुति (श्लोक 18) में क्या कहा है?

श्रीमंत्रराज सहित इस स्तोत्र को पढ़ने वाला इच्छा पूर्ति में कल्पवृक्ष सम है और स्वर्ग में अप्सराओं द्वारा सेवित होता है।

10. इस स्तोत्र को कब और कैसे पढ़ें?

नवरात्रि, मंगलवार और शुक्रवार विशेष शुभ। रात्रि में दीपक के सामने पाठ अधिक प्रभावी। यह तांत्रिक स्तोत्र है—गुरु से दीक्षा लेकर करें तो सर्वोत्तम। सामान्य भक्त भी श्रद्धापूर्वक पाठ कर सकते हैं।