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Sri Amba Bhujanga Pancharatna Stotram – श्री अम्बाभुजङ्गपञ्चरत्न स्तोत्रम् (Kamacharya Kritam)

Sri Amba Bhujanga Pancharatna Stotram: The Five Gems of Goddess Amba

Sri Amba Bhujanga Pancharatna Stotram – श्री अम्बाभुजङ्गपञ्चरत्न स्तोत्रम् (Kamacharya Kritam)
वधूरोजगोत्रोधराग्रे चरन्तं लुठन्तं प्लवन्तं नटं तपतन्तम् पदं ते भजन्तं मनोमर्कटन्तं कटाक्षालिपाशैस्सुबद्धं कुरु त्वम् ॥ १ ॥ गजास्यष्षडास्यो यथा ते तथाहं कुतो मां न पश्यस्यहो किं ब्रवीमि सदा नेत्रयुग्मस्य ते कार्यमस्ति तृतीयेन नेत्रेण वा पश्य मां त्वम् ॥ २ ॥ त्वयीत्थं कृतं चेत्तव स्वान्तमम्ब प्रशीतं प्रशीतं प्रशीतं किमासीत् इतोऽन्यत्किमास्ते यशस्ते कुतस्स्यात् ममेदं मतं चापि सत्यं ब्रवीमि ॥ ३ ॥ इयद्दीनमुक्त्वापि तेऽन्नर्त शीतं ततश्शीतलाद्रेः मृषा जन्मते भूत् कियन्तं समालम्बकालं वृथास्मि प्रपश्यामि तेऽच्छस्वरूपं कदाहम् ॥ ४ ॥ जगत्सर्वसर्गस्थितिध्वंसहेतु स्त्वमेवासि सत्यं त्वमेवासि नित्यं त्वदन्येषु देवेष्वनित्यत्वमुक्तं त्वदङ्घ्रिद्वयासक्तचित्तोहमम्ब ॥ ५ ॥ इति श्रीमत्कामाचार्यरचितमम्बाभुजङ्गस्तोत्र पञ्चरत्नम् ॥

श्री अम्बाभुजङ्गपञ्चरत्न स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री अम्बाभुजङ्गपञ्चरत्न स्तोत्रम् (Sri Amba Bhujanga Pancharatna Stotram) देवी अंबा (जगदम्बा) को समर्पित एक दुर्लभ और चमत्कारी स्तोत्र है। इसके रचयिता श्रीमत् कामाचार्य हैं। प्रायः 'भुजंग प्रयात' छंद में रचे गए स्तोत्र आदि शंकराचार्य के माने जाते हैं, किन्तु यह विशिष्ट स्तोत्र कामाचार्य की भक्ति का अनुपम उदाहरण है। 'पञ्चरत्न' का अर्थ है पाँच रत्न; ये पाँच श्लोक वास्तव में भक्ति और भाव के अनमोल रत्न हैं।

इस स्तोत्र में भक्त एक बालक की भांति माँ से हठ करता है, उलाहना देता है और अंत में पूर्ण समर्पण कर देता है। छंद की गति सर्प (भुजंग) के समान वक्र और तीव्र है, जो मन की चंचलता को साधने के लिए सर्वोत्तम है। पहले ही श्लोक में भक्त अपने मन को 'बंदर' (मर्कट) कहता है जो इधर-उधर कूदता रहता है, और देवी से प्रार्थना करता है कि वे इसे अपने कृपा-कटाक्ष रूपी रस्सी से बांध लें।

यह स्तोत्र विशेष रूप से उन साधकों के लिए है जो लंबी-चौड़ी पूजा विधियों में नहीं उलझना चाहते, बल्कि कम समय में, तीव्र भाव से माँ को प्रसन्न करना चाहते हैं।

श्लोकों का भावार्थ और रहस्य (Significance)

इन पाँच श्लोकों में छिपा रहस्य साधक को भक्ति की गहराइयों में ले जाता है:

  • मन का नियंत्रण (Verse 1): "मनोमर्कटन्तं..." — हमारा मन एक बंदर की तरह है जो कभी विषयों (Sensual objects) पर कूदता है, कभी चिंताओं पर। कामाचार्य कहते हैं कि केवल देवी की कृपा दृष्टि (कटाक्ष) ही इस चंचल मन को स्थिर कर सकती है।

  • पुत्रवत प्रेम (Verse 2): "गजास्य षडास्यो यथा ते तथाहं..." — यह सबसे मार्मिक श्लोक है। भक्त पूछता है—"माँ! जैसे गजानन (गणेश) और षडानन (कार्तिकेय) आपके पुत्र हैं, वैसे ही मैं भी तो हूँ। आप उन्हें तो प्रेम से देखती हैं, पर मेरी ओर क्यों नहीं? यदि आपकी दो आँखें उन दोनों को देखने में व्यस्त हैं, तो अपने तीसरे नेत्र (ज्ञान चक्षु) से ही मुझे देख लो।" यह अधिकार पूर्ण प्रेम (Sakhya/Vatsalya Bhava) का प्रतीक है।

  • हिमालय की शीतलता (Verse 3 & 4): भक्त कहता है—"आप हिमालय की पुत्री (पार्वती) हैं, फिर भी आपका हृदय नहीं पिघल रहा? यदि आप मुझ पर दया नहीं करेंगी, तो आपका वह 'शीतल' स्वभाव व्यर्थ है।" यह स्तुति निंदा के माध्यम से की गई प्रशंसा (व्याजस्तुति) है।

  • एकमात्र सत्य (Verse 5): "त्वमेवासि सत्यं त्वमेवासि नityaं..." — अंत में, भक्त स्वीकार करता है कि ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देवता भी काल के अधीन हैं, लेकिन एकमात्र आद्या शक्ति ही नित्य और सत्य है। यह अद्वैत ज्ञान का उद्घोष है।

फलश्रुति लाभ (Benefits)

यद्यपि यह स्तोत्र छोटा है, परन्तु इसके लाभ अत्यंत व्यापक हैं:

  • सर्वार्थ सिद्धि: यह स्तोत्र धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ देने में सक्षम है। विशेषकर जो साधक भौतिक सुखों के साथ-साथ आत्म-शांति चाहते हैं, उनके लिए यह सर्वोत्तम है।

  • विवाह और संतान: चूंकि इसमें गणेश और कार्तिकेय का उल्लेख है, इसलिए संतान प्राप्ति और शीघ्र विवाह के लिए भी कुंवारी कन्याएं या दंपत्ति इसका पाठ करते हैं।

  • मानसिक शांति: 'भुजंग प्रयात' छंद के लयबद्ध उच्चारण से मस्तिष्क की नसें शांत होती हैं। चिंता (Anxiety) और तनाव (Stress) को दूर करने के लिए यह एक 'साउंड थेरेपी' की तरह कार्य करता है।

  • देवी का साक्षात्कार: निरंतर पाठ से साधक को अनुभव होने लगता है कि देवी हर पल उसके साथ हैं। 'कटाक्ष' प्राप्ति का अर्थ है—देवी की निरंतर निगरानी में रहना।

पाठ विधि (Ritual Method)

इस स्तोत्र का पूर्ण फल प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित विधि अपनाएं:

दैनिक पाठ विधि:

  1. समय: प्रातः काल या संध्या समय (गोधूलि बेला) उत्तम है।
  2. स्थान: अपने पूजा घर में पूर्व मुख होकर बैठें।
  3. पूजन: माँ अंबा (दुर्गा/पार्वती/ललिता) के चित्र पर कुमकुम, अक्षत और लाल पुष्प चढ़ाएं। अगरबत्ती या दीप जलाएं।
  4. लय: इस स्तोत्र को गाकर पढ़ना चाहिए। इसकी छंद गति बहुत मधुर है। आप इंटरनेट पर 'Amba Bhujanga Stotram' सुनकर इसकी लय सीख सकते हैं।
  5. संख्या: प्रतिदिन 5, 11 या 21 बार पाठ करें। चूंकि यह छोटा है, 11 बार पाठ करने में केवल 10-15 मिनट लगते हैं।

विशेष काम्य प्रयोग:

यदि किसी विशेष मनोकामना (जैसे परीक्षा, इंटरव्यू, संकट निवारण) के लिए पाठ कर रहे हैं, तो 41 दिनों तक लगातार 21 पाठ करें और अंतिम दिन खीर का भोग लगाकर कन्याओं को खिलाएं।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं?

इस स्तोत्र के अंत में स्पष्ट रूप से लिखा है—'इति श्रीमत्कामाचार्यरचितमम्बाभुजङ्गस्तोत्र पञ्चरत्नम्'। अतः इसके रचयिता 'कामाचार्य' हैं। यद्यपि आदि शंकराचार्य ने भी कई भुजंग स्तोत्र रचे हैं, परन्तु यह विशेष 'पञ्चरत्न' कामाचार्य की कृति है।

2. 'भुजंग प्रयात' छंद का क्या महत्व है?

'भुजंग' का अर्थ है सर्प। जैसे सर्प बलखाते हुए चलता है, वैसे ही इस छंद की लय होती है। यह छंद मन को एकाग्र करने और कुंडलिनी शक्ति (जो सर्पाकार है) को जाग्रत करने में अत्यंत सहायक माना जाता है। श्वास-प्रश्वास के साथ इसका पाठ बहुत प्रभावशाली होता है।

3. श्लोक 2 में 'गजास्य' और 'षडास्य' का क्या अर्थ है?

'गजास्य' का अर्थ है गज (हाथी) के मुख वाले अर्थात् 'गणेश'। 'षडास्य' का अर्थ है छह मुख वाले अर्थात् 'कार्तिकेय' (स्कंद)। भक्त देवी से कहता है—'जैसे आप गणेश और कार्तिकेय पर वात्सल्य लुटाती हैं, मेरी ओर क्यों नहीं देखतीं?' यह एक बहुत ही भावपूर्ण उलाहना है।

4. इस स्तोत्र के पाठ से क्या लाभ होते हैं?

इसके पाठ से मुख्य रूप से 'विद्या' (ज्ञान), 'विवाह' (सुयोग्य जीवनसाथी), और 'धन' की प्राप्ति होती है। श्लोक 5 में कहा गया है कि जो अनन्य भाव से देवी के चरणों में आसक्त है, उसे संसार के सारे सुख और अंत में मोक्ष मिलता है।

5. क्या विवाह में विलंब होने पर इसका पाठ किया जा सकता है?

जी हाँ। चूंकि इसमें माँ अंबा (जगज्जननी) की आराधना है, और भक्त स्वयं को उनके पुत्र के रूप में प्रस्तुत करता है, तो माँ की कृपा से विवाह में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और सुयोग्य वर/वधू की प्राप्ति होती है।

6. 'पञ्चरत्न' का क्या अर्थ है?

'पञ्चरत्न' का शाब्दिक अर्थ है 'पाँच रत्न'। यह स्तोत्र मात्र 5 श्लोकों का है, किन्तु प्रत्येक श्लोक एक बहुमूल्य रत्न के समान है। कम समय में देवी की पूर्ण कृपा प्राप्त करने के लिए इसे 'लघु स्तोत्र' के रूप में रचा गया है।

7. श्लोक 5 में 'जगत सर्व सर्ग स्थिति ध्वंस हेतु' का क्या भाव है?

यह श्लोक अद्वैत वेदांत का सार है। इसमें देवी को ही सृष्टि की उत्पत्ति (सर्ग), पालन (स्थिति) और संहार (ध्वंस) का एकमात्र कारण माना गया है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी उन्हीं की शक्ति से कार्य करते हैं। देवी ही एकमात्र 'नित्य' सत्य हैं।

8. पाठ करने की विधि क्या होनी चाहिए?

स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। देवी की प्रतिमा के सामने घी का दीपक जलाएं। लाल फूल अर्पित करें। फिर लयात्मक ढंग से (गाते हुए) इन 5 श्लोकों का पाठ करें। शुक्रवार और मंगलवार को इसका विशेष महत्व है।

9. क्या इसे बच्चे भी पढ़ सकते हैं?

हाँ, विशेषकर विद्यार्थियों के लिए यह बहुत लाभकारी है। इसकी लय और संस्कृत के शब्द उच्चारण को शुद्ध करते हैं और स्मरण शक्ति बढ़ाते हैं। 'बुद्धि' और 'विद्या' की प्राप्ति के लिए बच्चे इसे नित्य पढ़ सकते हैं।

10. 'तृतीय नेत्र' (Third Eye) का उल्लेख क्यों है?

श्लोक 2 में भक्त कहता है—'यदि आपके दो नेत्रों को अन्य कार्य हैं, तो अपने तीसरे नेत्र (ज्ञान चक्षु) से ही मुझे देख लो।' यह दर्शाता है कि देवी त्रिनेत्रा हैं (शिव स्वरूपा) और उनकी एक कृपा कटाक्ष ही अज्ञान का नाश करने के लिए पर्याप्त है।