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Sri Pratyangira Suktam (Rigveda – Variation 1) – श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (ऋग्वेदीय पाठान्तरम् – १) | Meaning & Benefits

Sri Pratyangira Suktam (Rigveda – Variation 1) – श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (ऋग्वेदीय पाठान्तरम् – १) | Meaning & Benefits
॥ श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (ऋग्वेदीय पाठान्तरम् - १) ॥ (ऋ.वे.खि.४.५) यां कल्पयन्ति नोऽरयः क्रूरां कृत्यां वधूमिव । तां ब्रह्मणा परि निङ्मः प्रत्यक्कर्तारमृच्छतु ॥ १ ॥ शीर्षण्वतीं कर्णवतीं विश्वरूपां भयंकरीम् । यः प्राहिणोमि हाद्य त्वा वि तत्त्वं योजयाशुभि ॥ २ ॥ येन चित्तेन वदसि प्रतिकूलमघायूनि । तमेवं ते नि कृत्ये मास्मान् ऋष्यो अनागसः ॥ ३ ॥ अभि वर्तस्व कर्तारं निरस्तास्माभिरोजसा । आयुरस्य नि वर्तस्व प्रजां च पुरुषादिनि ॥ ४ ॥ यस्त्वा कृत्ये चकारेह तं त्वं गच्छ पुनर्नवे । अरातीः कृत्यां नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः ॥ ५ ॥ क्षिप्रं कृत्ये नि वर्तस्व कर्तुरेव गृहान् प्रति । पशूंश्चावास्य नाशय वीरांश्चास्य नि बर्हय ॥ ६ ॥ यस्त्वा कृत्ये प्र जिगाति विद्वान् अविदुषो गृहान् । तस्त्यैवेतः परेत्याशु तनुं कृधि परुष्यसः ॥ ७ ॥ प्रतीचीं त्वापसेधतु ब्रह्म रोचिष्ण्वमित्रहा । अग्निश्च कृत्ये रक्षोहा रिप्रहा चाज एकपात् ॥ ८ ॥ यथा त्वाङ्गिरसः पूर्वे भृगवश्चाप सेधिरे । अत्रयश्च वसिष्ठाश्च तथैव त्वापसेधिम ॥ ९ ॥ यस्ते परूंषि संदधौ रथस्येव ऋभुर्धिया । तं गच्छ तत्र ते जनमज्ञातस्तेऽयं जनः ॥ १० ॥ यो नः कश्चिद्रणस्थो वा कश्चिद्वान्योऽभि हिंसति । तस्य त्वं द्रोरिवेद्धोऽग्निस्तनुः पृच्छस्व हेळितः ॥ ११ ॥ भवा शर्वा देवहेळिमस्य ते पापकृत्वने । हरस्वतीस्त्वं च कृत्ये नोच्छिषस्तस्य किञ्चन ॥ १२ ॥ ये नो शिवासः पन्थानः परायान्ति परावतम् । तैर्देव्यरातीः कृत्या नो गमयस्वा नि वर्तय ॥ १३ ॥ यो नः कश्चिद्द्रुहोऽरातिर्मनसाप्यभि दासति । दूरस्थो वान्तिकस्थो वा तस्य हृद्यमसृक् पिब ॥ १४ ॥ येनासि कृत्ये प्रहिता दूढ्येनास्मज्जिघांसया । तस्य व्यनच्चाव्यनच्च हिनस्तु शरदाशनिः ॥ १५ ॥ यद्यु वैषि द्विपद्यस्मान् यदि वैषि चतुष्पदी । निरस्तातोऽव्रतास्माभिः कर्तुरष्टापदी गृहम् ॥ १६ ॥ यो नः शपादशपतो यश्च नः शपतः शपात् । वृक्ष इव विद्युता हत आमूलादनुशुष्यतु ॥ १७ ॥ यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्ट्यघायुर्यश्च नः शपात् । शुने पेष्ट्रमिवावक्षामं तं प्रत्यस्यामि मृत्यवे ॥ १८ ॥ यश्च सापत्नः शपथो यश्च जाम्याः शपथः । ब्रह्मा च यत् क्रुद्धः शपात् सर्वं तत् कृध्यधस्पदम् ॥ १९ ॥ सबन्धुश्चासबन्धुश्च यो अस्मान् अभि दासति । तस्य त्वं भिन्ध्यधिष्ठाय पदा विष्पूर्यते शिरः ॥ २० ॥ अभि प्रेहि सहस्राक्षं युक्त्वाशुं शपथ रथम् । शत्रूँरन्विच्छती कृत्ये वृकीवाविवृतो गृहान् ॥ २१ ॥ परि णो वृङ्धि शपथान् दहन्नग्निरिव व्रजम् । शत्रूँरेवा वि नो जहि दिव्या वृक्षमिवाशनिः ॥ २२ ॥ शत्रून्मे प्रोष्ट शपथान् कृत्याश्च सुहृदो हृद्याः । जिह्माः श्लक्ष्णाश्च दुर्हृदः समिद्धं जातवेदसम् ॥ २३ ॥ असपत्नं पुरस्तान्नः शिवं दक्षिणतस्कृधि । अभयं सततं पश्चाद्भद्रमुत्तरतो गृहे ॥ २४ ॥ परेहि कृत्ये मा तिष्ठ वृद्धस्येव पदं नय । मृगस्य हि मृगारिस्त्वं तं त्वं निकर्तुमर्हसि ॥ २५ ॥ अघ्न्यास्ये घोररूपे वररूपे विनाशिनि । जम्भिताः प्रत्या गृभ्णीष्व स्वयमादायाद्भुतम् ॥ २६ ॥ त्वमिन्द्रो यमो वरुणस्त्वमापो अग्निरथानिलः । ब्रह्मा चैव रुद्रश्च त्वष्टा चैव प्रजापतिः ॥ २७ ॥ आवर्तध्वं निवर्तध्वमृतवः परिवत्सराः । अहोरात्राश्चाब्दाश्च त्वं दिशः प्रदिशश्च मे ॥ २८ ॥ त्वमिन्द्रो यमो वरुणस्त्वमापो अग्निरथानिलः । अत्याहृत्य पशून् देवानुत्पातयस्वाद्भुतम् ॥ २९ ॥ अभ्यक्तास्ताः स्वलंकृताः सर्वं नो दुरितं जहि । जानीथाश्चैव कृत्यानां कर्तॄन् नॄन् पापचेतसः ॥ ३० ॥ यथा हन्ति पूर्वासिनं तयैवेष्वाशुकृज्जनः । तथा त्वया युजा वयं तस्य निकृण्म स्थास्नु जङ्गमम् ॥ ३१ ॥ उत्तिष्ठैव परेहितो३घ्न्यास्ये किमिहेच्छसि । ग्रीवास्ते कृत्ये पदा चापि कर्त्स्यामि निर्द्रव ॥ ३२ ॥ स्वायसा सन्ति नोसयो विद्मश्चैव परूंषि ते । तैः स्थ निकृण्म स्थान्युग्रे यदि नो जीवयस्व ईम् ॥ ३३ ॥ मास्योच्छिषो द्विपदं मो च किंचिच्चतुष्पदम् । मा ज्ञातीरनुजास्वन्वा मा वेशं प्रतिवेशिना ॥ ३४ ॥ शत्रूयता प्रहितामिमां येनाभि यथायथा । ततस्तथा त्वानुदतु योऽयमन्तर्मयि श्रितः ॥ ३५ ॥ एवं त्वं निकृतास्माभिर्ब्रह्मणा देवि सर्वशः । यथा तमाश्रितं कर्त्वा पापधीरेव नो जहि ॥ ३६ ॥ यो नः स्वो अरणो यश्च निष्ट्यो जिघांसति । देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम् ॥ ३७ ॥ यथा विद्युद्धतो वृक्ष आ मूलदनु शुष्यति । एवं स प्रति शुष्यतु यो मे पापं चिकीर्षति ॥ ३८ ॥ यथा प्रतिहिता भूत्वा तामेव प्रति धावति । पापं तमेव धावतु यो मे पापं चिकीर्षति ॥ ३९ ॥ कुवीरं ते सुखं रुद्रं नन्दीमानं विमथ ह । ब्रह्म वर्म ममान्तरं शर्म वर्म ममान्तरं धर्म वर्म ममान्तरम् ॥ ४० ॥ ॥ इति ऋग्वेदीय श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (पाठान्तरम् - १) सम्पूर्णम् ॥

श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (ऋग्वेदीय पाठान्तर - १): परिचय

श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (Sri Pratyangira Suktam) ऋग्वेद के खिल अंश का एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली सूक्त है। यह 'पाठान्तर १' (Variation 1) है, जो अन्य पाठों से किंचित् भिन्न होते हुए भी समान फलदायी है। यह सूक्त मुख्य रूप से 'अभिचार-नाशक' (Destroyer of Black Magic) है।

तंत्र और वेद का संगम: जहाँ वेद में सात्विक उपासना की प्रधानता है, वहीं इस सूक्त में तांत्रिक 'कृत्या' (Kritya) विद्या का भी उल्लेख है। यह सिद्ध करता है कि वेदों में न केवल देवता स्तुति है, बल्कि आत्म-रक्षा और शत्रु-निवारण के गूढ़ रहस्य भी छिपे हैं। ऋषि अंगिरा द्वारा दृष्ट होने के कारण इसे 'आङ्गिरस' विद्या भी कहते हैं।

यह सूक्त साधक को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर सुरक्षा प्रदान करता है। यह भय को दूर कर साहस और तेज का संचार करता है।

सूक्त की मुख्य विशेषताएं

शत्रु पराजय (Overcoming Enemies)

इस सूक्त में प्रार्थना की गई है कि जो शत्रु हमारे प्रति द्वेष रखते हैं या अहित चाहते हैं, वे स्वयं अपने कुकर्मों के जाल में फंस जाएं। श्लोक ३९ कहता है - "पापं तमेव धावतु यो मे पापं चिकीर्षति" - "पाप उसी के पीछे दौड़े जो मेरा पाप (अहित) करना चाहता है।"

ब्रह्म-कवच (Divine Armor)

अंतिम श्लोक (४०) में साधक घोषणा करता है - "ब्रह्म वर्म ममान्तरम्"। अर्थात, साक्षात् ब्रह्म (परमात्मा) मेरे भीतर कवच के रूप में स्थित हैं। जब ईश्वर ही रक्षक हैं, तो बाहरी कोई भी शक्ति मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

गृह और कुल की रक्षा

श्लोक ६ और ३४ में घर, पशु, पुत्र, पौत्र और कुल की रक्षा की कामना की गई है। यह सूक्त केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पारिवारिक सुरक्षा का भी अमोघ मंत्र है।

पाठ के लाभ (Phala Shruti)

  • तनाव और भय से मुक्ति: अनजाना भय, घबराहट और मानसिक तनाव दूर होता है।
  • विवादों में विजय: कोर्ट-कचहरी, जमीन-जायदाद या व्यापारिक शत्रुता में विजय प्राप्त होती है।
  • रोग निवारण: पुरानी और असाध्य बीमारियों में भी इसके अनुष्ठान से लाभ मिलता है।
  • कुल देवी की कृपा: जिन परिवारों में कुल देवी का दोष हो, वहां इस पाठ से शांति आती है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (पाठान्तर १) का क्या विशेष महत्व है?

ऋग्वेद की खिल शाखा में प्रत्यङ्गिरा सूक्त के कई पाठान्तर मिलते हैं। यह प्रथम पाठान्तर (Variation 1) विशेष रूप से 'कृत्या' (Black Magic) को वापस भेजने और शत्रु द्वारा किए गए अहित को निष्क्रिय करने के लिए अत्यंत प्रभावकारी माना जाता है।

2. इस सूक्त में 'ब्रह्मणा परि निङ्मः' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है - 'हम ब्रह्म-विद्या (दिव्य ज्ञान/शक्ति) के द्वारा उस कृत्या को घेर लेते हैं और उसे निष्क्रिय कर देते हैं।' यह सूक्त केवल भौतिक बल नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति का प्रयोग करता है।

3. क्या यह सूक्त नजर दोष के लिए भी प्रभावी है?

जी हाँ, यह सूक्त नजर दोष (Evil Eye), ऊपरी हवा और नकारात्मक ऊर्जाओं के निवारण के लिए अचूक है। इसके पाठ से घर का वातावरण शुद्ध और सकारात्मक हो जाता है।

4. श्लोक ८ में 'अज एकपात्' का उल्लेख क्यों है?

'अज एकपात्' रुद्र (शिव) का एक उग्र स्वरूप है। यहाँ अग्नि और रुद्र दोनों का आवाहन किया गया है ताकि वे राक्षसों और कृत्याओं का संहार कर सकें।

5. क्या राहु-केतु की दशा में इसका पाठ लाभकारी है?

देवी प्रत्यङ्गिरा को राहु-केतु जैसे छाया ग्रहों की अधिष्ठात्री माना जाता है। इस सूक्त का पाठ इन ग्रहों के दुष्प्रभावों को शांत करने और जीवन में स्थिरता लाने में सहायक है।

6. इस सूक्त के पाठ की विधि क्या है?

शुद्ध होकर लाल वस्त्र धारण करें। दक्षिण मुख होकर बैठें। सामने तेल का दीपक जलाएं और देवी का ध्यान करते हुए पूर्ण श्रद्धा से सूक्त का पाठ करें। अमावस्या या ग्रहण काल में पाठ विशेष फलदायी होता है।

7. श्लोक ३८ में 'विद्युद्धतो वृक्ष' का क्या उदाहरण है?

यहाँ कहा गया है कि जैसे बिजली गिरने से हरा-भरा वृक्ष भी जड़ से सूख जाता है, वैसे ही मेरे प्रति पाप करने वाले शत्रु की दुष्ट बुद्धि और शक्ति भी समूल नष्ट हो जाए।

8. क्या स्त्रियां मासिक धर्म के दौरान इसका पाठ कर सकती हैं?

नहीं, मासिक धर्म के दौरान उग्र साधनाओं और वेदमंत्रों का पाठ वर्जित माना गया है। शुद्धि के पश्चात ही पुनः पाठ आरम्भ करना चाहिए।

9. क्या यह सूक्त धन प्राप्ति में सहायक है?

यद्यपि इसका मुख्य उद्देश्य रक्षा है, किन्तु बाधाओं के हटने से धन और समृद्धि का मार्ग स्वतः प्रशस्त हो जाता है। देवी की कृपा से 'लक्ष्मी' (श्री) की प्राप्ति भी होती है।

10. श्लोक ४० में 'ब्रह्म वर्म ममान्तरम्' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है - 'ब्रह्म (ईश्वरीय ज्ञान) मेरा अभेद्य कवच है।' साधक यह उद्घोष करता है कि परमात्मा का ज्ञान और शक्ति उसे हर तरफ से सुरक्षित रखे हुए है, इसलिए उसे कोई भय नहीं।