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Sri Pratyangira Suktam (Rigveda) – श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (ऋग्वेदीय खिले) | Meaning & Protection

Sri Pratyangira Suktam (Rigveda) – श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (ऋग्वेदीय खिले) | Meaning & Protection
॥ श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (ऋग्वेदीय खिल) ॥ (ऋ.वे.खि.४.५) यां कल्पयन्ति नोऽरयः क्रूरां कृत्यां वधूमिव । तां ब्रह्मणाप निर्णुद्मः प्रत्यक्कर्तारमृच्छतु ॥ १ ॥ शीर्षण्वतीं कर्णवतीं विषुरूपां भयंकरीम् । यः प्राहिणोदिहाद्य त्वां वि तं त्वं योजयासुभिः ॥ २ ॥ येन दिष्टेह वहसि प्रतिकूलमघायिनि । तमेवेतो निवर्तस्व मास्मान् मृच्छो अनागसः ॥ ३ ॥ अभिवर्तस्व कर्तारं निरस्तास्माभिरोजसा । आयुरस्य निकृन्तस्व प्रजां च पुरुषादिनि ॥ ४ ॥ यस्त्वा कृत्ये चकारेह तं त्वं गच्छ पुनर्नवे । अरातीः कृत्ये नाशय सर्वाश्च यातुधान्यः ॥ ५ ॥ क्षिप्रं कृत्ये निवर्तस्व कर्तुरेव गृहान् प्रति । पशूंश्चैवास्य नाशय वीरांश्चास्य नि बर्हय ॥ ६ ॥ यस्त्वा कृत्ये प्रजिघाय विद्वान् अविदुषो गृहान् । तस्त्यैवेतः परेत्याशु तनुं कृधि परुष्परुः ॥ ७ ॥ प्रतीचीं त्वापसेधतु ब्रह्म रोचिष्ण्वमित्रहा । अग्निश्च कृत्ये रक्षोहा रिप्रहा चाज एकपात् ॥ ८ ॥ यथा त्वाङ्गिरसः पूर्वे भृगवश्चाप सेधिरे । अत्रयश्च वसिष्ठाश्च तथैव त्वाप सेधिम ॥ ९ ॥ यस्ते परूंषि संदधौ रथस्येव विभुर्धिया । तं गच्छ तत्र तेऽयनमज्ञातस्ते अयं जनः ॥ १० ॥ यो नः कश्चिद्रणस्थो वा कश्चिद्वान्योऽभि हिंसति । तस्य त्वं द्रोरिवेद्धोऽग्निस्तनूमृच्छस्व हेळिता ॥ ११ ॥ भवा शर्वा देवहेळिमस्यत पापकृत्वने । हरस्वती त्वं च कृत्ये मोच्छिषस्तस्य किंचन ॥ १२ ॥ यो नः कश्चिद्रुहारातिर्मनसा प्रतिभूषति । दूरस्थो वान्तिकस्थो वा तस्य हृद्यमसृक् पिब ॥ १३ ॥ येनासि कृत्ये प्रहिता दूढ्येनास्मज्जिघांसया । तस्य व्यानच्चाव्यानच्च हिनस्तु हरसाशनिः ॥ १४ ॥ ये नः शिवासः पन्थानः परायन्ति परावतम् । तैर्देवि रात्र्याः कृत्या नो गमयस्वानुकृत्तये ॥ १५ ॥ यदि वैषि द्विपद्यस्मान् यदि वैषि चतुष्पदी । निरस्तेतो व्रजास्माभिः कर्तुरष्टापदी गृहान् ॥ १६ ॥ यो नः शपादशपतो यश्च नः शपतः शपात् । वृक्षमिव विद्युदाशु तमामूलादनुशोषय ॥ १७ ॥ यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्ट्यघायुर्यश्च नः शपात् । शुने पिष्टमिव क्षामं तं प्रत्यस्य स्वमृत्यवे ॥ १८ ॥ यश्च सापत्नः शपथो यश्च यामी शपाति नः । ब्रह्मा च यत्क्रुद्धः शपात्सर्वं तत्कृध्यधस्पदम् ॥ १९ ॥ सबन्धुश्चाप्यबन्धुश्च यो अस्मान् अभिदासति । तस्य त्वं भिन्द्यधिष्ठाय पदा विस्फूर्य तच्छिरः ॥ २० ॥ अभि प्रेहि सहस्राक्षं युक्त्वा तु शपथं रथे । शत्रूनन्विच्छती कृत्ये वृकीवाविमतो गृहान् ॥ २१ ॥ परि णो वृङ्धि शपथान् दहन्नग्निरिव ह्रदम् । शत्रूनेवाभितो जहि दिव्या वृक्षमिवाशनिः ॥ २२ ॥ शत्रून् मे प्रोथ शपथात् कृत्याश्च सुहृदोऽसुहृत् । जिह्माः श्लक्ष्णाश्च दुर्हृदः समिद्धं जातवेदसम् ॥ २३ ॥ असपत्नं पुरस्तान्नः शिवं दक्षिणतः कृधि । अभयं सततं पश्चाद्भद्रमुत्तरतो गृहे ॥ २४ ॥ परेहि कृत्ये मा तिष्ठ विद्धस्येव पदं नय । मृगस्य हि मृगारिपो न त्वा निकर्तुमर्हति ॥ २५ ॥ अघ्न्यास्येव घोररूपे विषुरूपेऽविनाशिनि । जृम्भिता प्रतिगृभ्णीष्व स्वयमादाय चाद्भुतम् ॥ २६ ॥ त्वमिन्द्रो यमो वरुणस्त्वमापोऽग्निरथानिलः । त्वं ब्रह्मा चैव रुद्रश्च त्वष्टा चैव प्रजापतिः ॥ २७ ॥ आवर्तध्वं निवर्तध्वमृतवः परिवत्सराः । अहोरात्राश्चाब्दाश्च त्वं दिशः प्रदिशश्च मे ॥ २८ ॥ त्वं यमं वरुणं सोमं त्वमापोऽग्निमथानिलम् । अत्राहृत्य पशूंश्चैवमुत्पादयसि चाद्भुतम् ॥ २९ ॥ ये मे दमे दारुगर्भे शयानं धिया सहितं पुरुषं निजह्रुः । कुम्भीपाकं नरकं ग्रीवबद्धं हता एवं पुरुषासो यमस्य ॥ ३० ॥ अभ्यक्ताक्ता स्वलंकृता सर्वं नो दुरितं दह । जानीथाश्चैव कृत्यानां कर्तॄन् नॄन् पापचेतसः ॥ ३१ ॥ यथा हन्ति पुरासीनं तथैवेष्वा सुकृन्नरः । तथा त्वया युजा वयं निकृण्म स्थास्नु जङ्गमम् ॥ ३२ ॥ उत्तिष्ठैव परेहितोऽज्ञाते किमिहेच्छसि । ग्रीवास्ते कृत्ये पादौ चाभि कर्त्स्यामि विद्रव ॥ ३३ ॥ स्वायसाः सन्ति नोऽसयो विद्म चैव परूंषि ते । तैस्ते निकृण्मस्तान्युग्रे यदि नो जीवयस्वरीन् ॥ ३४ ॥ मास्योच्छिषो द्विपदं मोत किंचिच्चतुष्पदम् । मा ज्ञातीननुजान्पूर्वान्मा वेशि प्रतिवेशिनौ ॥ ३५ ॥ शत्रूयता प्रहितासि दूढ्येनाभि यथायतः । ततस्तथा त्वा नुदतु योऽयमन्तर्मयि श्रितः ॥ ३६ ॥ एवं त्वं निकृतास्माभिर्ब्रह्मणा देवि सर्वशः । यथेतमाश्रिता गत्वा पापदीनिव नो जहि ॥ ३७ ॥ यथा विद्युद्धतो वृक्ष आमूलदानु शुष्यति । एवं स प्रतिशुष्यतु यो मे पापं चिकीर्षति ॥ ३८ ॥ यथा प्रतिशुको भूत्वा तमेव प्रतिधावति । पापं तमेवं धावतु यो मे पापं चिकीर्षति ॥ ३९ ॥ यो नः स्वो अरणो यश्च निष्ट्यो जिघांसति । देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम् ॥ ४० ॥ उत्त्वा मन्दन्तु स्तोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः । अव ब्रह्मद्विषो जहि ॥ ४१ ॥ कुबेर ते मुखं रौद्रं नन्दिन्नानन्दमावह । ज्वरमृत्युभयं घोरं विश नाशय मे ज्वरम् ॥ ४२ ॥ यो मे करोति प्रद्वारे यो गृहे यो निवेशने । यो मे केशनखे कुर्यादञ्जने दन्तधावने ॥ ४३ ॥ प्रतिसर प्रतिधाव कुमारीव पितुर्गृहान् । मूर्धानमेषां स्फोटय पदमेषां कुले कृधि ॥ ४४ ॥ ये नो रयिं दुश्चरितासो अग्ने जह्रुर्मर्तासो अनृतं वदन्तः । तेषां वपूंष्यर्चिषा जातवेदः शुष्कं न वृक्षमभि सं दहस्व ॥ ४५ ॥ कृष्णवर्णे महद्रूपे बृहत्कर्णे महद्भये । देवि देवि महादेवि मम शत्रून् विनाशय ॥ ४६ ॥ खट् फट् जहि महाकृत्ये विधूमाग्निसमप्रभे । जहि शत्रूंस्त्रिशूलेन क्रुध्यस्व पिब शोणितम् ॥ ४७ ॥ ये द्रुह्युरृजवे मह्यमग्ने कदाधियो दुर्मदा अश्मनासः । आबध्यैतान् शोचिषा विध्य तन्तून् वैवस्वतस्य सदनं नयस्व ॥ ४८ ॥ ॥ इति ऋग्वेद खिलान्तर्गत श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् सम्पूर्णम् ॥

श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् - परिचय एवं रहस्य

श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (Sri Pratyangira Suktam) ऋग्वेद के खिल सूक्तों में से एक है। यह 'शत्रु-विमर्दिनी' (Destroyer of Enemies) माँ प्रत्यङ्गिरा को समर्पित है। 'प्रत्यङ्गिरा' का अर्थ है - वह शक्ति जो शत्रु द्वारा किए गए किसी भी तंत्र, मंत्र या अभिचार (Black Magic) को उल्टा करके उसी के ऊपर लौटा दे।

ऐतिहासिक संदर्भ: पुराणों के अनुसार, जब भगवान नृसिंह का क्रोध हिरण्यकशिपु वध के बाद भी शांत नहीं हुआ, तब शरभेश्वर (शिव) प्रकट हुए। प्रत्यङ्गिरा देवी शरभेश्वर के पंखों से प्रकट हुईं और उन्होंने नृसिंह के क्रोध को शांत किया। इसलिए वे न केवल उग्र हैं, बल्कि 'शांति' प्रदायिनी भी हैं।

यह सूक्त विशेष रूप से उन लोगों के लिए एक अमोघ अस्त्र है जो अज्ञात शत्रुओं, नजर दोष या भूत-प्रेत बाधा से पीड़ित हैं। यह एक 'अग्नि-मयी' विद्या है, जो पापियों को भस्म करती है लेकिन भक्तों के लिए कवच (Shield) का काम करती है।

सूक्त की मुख्य विशेषताएं

कृत्या निवारण (Removing Created Entities)

इस सूक्त का मुख्य विषय 'कृत्या' को वापस भेजना है। श्लोक १ में कहा गया है - "यां कल्पयन्ति नोऽरयः... तां ब्रह्मणाप निर्णुद्मः" - "शत्रुओं ने हमारे लिए जिस कृत्या की कल्पना की है, उसे हम अपनी ब्रह्म-विद्या से वापस लौटाते हैं।"

अंग-अंग रक्षिका

यह सूक्त केवल बाहरी शत्रुओं से ही नहीं बचाता, बल्कि शरीर में प्रवेश कर चुकी नकारात्मकता को भी नष्ट करता है। श्लोक ४३ में उल्लेख है - "जो मेरे घर में, द्वार पर, बालों में, नाखूनों में या दन्त-धावन में भी दोष उत्पन्न करता है, वह नष्ट हो।"

उलट वार (Reversal)

श्लोक ३९ में सिद्धांत दिया गया है - "पापं तमेवं धावतु यो मे पापं चिकीर्षति" - "जैसे गेंद दीवार से टकराकर वापस आती है, वैसे ही मेरे प्रति किया गया पाप, पापी की ओर ही दौड़े।"

पाठ के लाभ (Phala Shruti)

इस सूक्त के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • शत्रु और षड्यंत्र नाश: ज्ञात और अज्ञात शत्रु स्वतः परास्त होकर दूर हो जाते हैं।
  • नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति: घर से बुरी नजर, टोना-टोटका और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव समाप्त होता है।
  • कोर्ट-कचहरी में विजय: मुकदमे और विवादों में विजय प्राप्त होती है।
  • आत्म-विश्वास: साधक के भीतर निर्भयता और तेज का संचार होता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री प्रत्यङ्गिरा सूक्तम् (Sri Pratyangira Suktam) क्या है?

यह ऋग्वेद के खिल भाग (Supplement) से लिया गया एक अत्यंत उग्र और शक्तिशाली सूक्त है। इसमें प्रयोग (Experiment) की गई 'कृत्या' (Black Magic/Negative Entities) को वापस भेजने और शत्रुओं के विनाश की प्रार्थना की गई है।

2. 'प्रत्यङ्गिरा' का अर्थ क्या है?

'प्रति' (विपरीत/उल्टा) और 'अंगिरा' (रस/शक्ति)। जो देवी शत्रु द्वारा भेजी गई नकारात्मक शक्ति को उलट कर उसी के पास वापस भेज देती हैं, वे 'प्रत्यङ्गिरा' कहलाती हैं। इन्हें 'अथर्वण भद्रकाली' भी कहा जाता है।

3. क्या इस सूक्त का पाठ घर में किया जा सकता है?

हाँ, यदि उदेश्य रक्षा (Protection) है तो घर में कर सकते हैं। किन्तु यदि उद्देश्य 'मारण' या किसी का अहित करना है, तो यह वर्जित है और इसका उल्टा प्रभाव हो सकता है। सात्विक भाव से ही पाठ करें।

4. 'कृत्या' (Kritya) का क्या अर्थ है?

मंत्र-तंत्र द्वारा सिद्ध करके किसी के विनाश के लिए छोड़ी गई अदृश्य 'मारी' शक्ति को 'कृत्या' कहते हैं। यह सूक्त विशेष रूप से 'कृत्या निवारण' के लिए ही है।

5. श्लोक १ में 'वधूमिव' का क्या तात्पर्य है?

हाँ एक उपमा दी गई है - जैसे वर पक्ष वाले वधू को आदर सहित ले जाते हैं, वैसे ही हम इस कृत्या (अभिचार) को आदर सहित उसके कर्ता (भेजने वाले) के पास वापस लौटाते हैं।

6. क्या इसके पाठ से शत्रुओं का नाश होता है?

यह सूक्त मुख्य रूप से 'आत्म-रक्षा' के लिए है। यदि कोई अकारण शत्रुता करता है, तो देवी उस शत्रु की बुद्धि को भ्रमित कर देती हैं या उसे दंड देती हैं। यह साधक की ढाल (Shield) है।

7. पाठ करने का उपयुक्त समय कौन सा है?

अमावस्या, मंगलवार, रविवार और ग्रहण काल इसके पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ माने गए हैं। रात्रि काल (विशेषकर आधी रात) में इसका प्रभाव अधिक होता है।

8. श्लोक ४६ में देवी का स्वरूप कैसा वर्णित है?

देवी को 'कृष्णवर्णे' (काले रंग वाली), 'महद्रूपे' (विशाल रूप वाली), 'बृहत्कर्णे' (बड़े कानों वाली) और 'महद्भये' (भय उत्पन्न करने वाली) कहा गया है। यह उनका संहारक रूप है।

9. क्या स्त्रियां इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, माँ प्रत्यङ्गिरा सभी की रक्षा करती हैं। स्त्रियां भी अपनी और परिवार की सुरक्षा के लिए पूर्ण पवित्रता के साथ इसका पाठ कर सकती हैं।

10. क्या इसके लिए किसी विशेष हवन (यज्ञ) की आवश्यकता है?

विशेष कार्यों (जैसे गंभीर संकट या बीमारी) के लिए इस सूक्त से हवन किया जाता है, जिसमें लाल मिर्च, राई और नमक का प्रयोग होता है। किन्तु नित्य पाठ के लिए केवल दीपक जलाना पर्याप्त है।