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Sri Pratyangira Kavacham 1 (Sarvartha Sadhanam) – श्री प्रत्यङ्गिरा कवचम् (सर्वार्थसाधनम्)

Sri Pratyangira Kavacham 1: Sarvartha Sadhanam (Rudra Yamala)

Sri Pratyangira Kavacham 1 (Sarvartha Sadhanam) – श्री प्रत्यङ्गिरा कवचम् (सर्वार्थसाधनम्)
॥ श्री प्रत्यङ्गिरा कवचम् (सर्वार्थसाधनम्) ॥ (रुद्रयामल तन्त्रम्) श्रीदेव्युवाच भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रार्थपारग । देव्याः प्रत्यङ्गिरायाश्च कवचं यत्प्रकाशितम् ॥ १ ॥ सर्वार्थसाधनं नाम कथयस्व मयि प्रभो । भैरव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कवचं परमाद्भुतम् ॥ २ ॥ सर्वार्थसाधनं नाम त्रैलोक्ये चाऽतिदुर्लभम् । सर्वसिद्धिमयं देवि सर्वैश्वर्यप्रदायकम् ॥ ३ ॥ पठनाच्छ्रवणान्मर्त्यस्त्रैलोक्यैश्वर्यभाग्भवेत् । सर्वार्थसाधकस्याऽस्य कवचस्य ऋषिः शिवः ॥ ४ ॥ छन्दो विराट् पराशक्तिर्जगद्धात्री च देवता । धर्माऽर्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः ॥ ५ ॥ ॥ न्यासः ॥ श्रीसर्वार्थसाधककवचस्य शिव ऋषये नमः शिरसि । विराट् छन्दसे नमः मुखे । श्रीमत्प्रत्यङ्गिरा देवतायै नमः हृदये । ऐं बीजाय नमः गुह्ये । ह्रीं शक्तये नमः पादौ । श्रीं कीलकाय नमः नाभौ । धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ॥ ॥ कवचम् ॥ प्रणवं मे शिरः पातु वाग्भवं च ललाटकम् । ह्रीं पातु दक्षनेत्रं मे लक्ष्मीर्वाम सुरेश्वरी ॥ ६ ॥ प्रत्यङ्गिरा दक्षकर्णं वामे कामेश्वरी तथा । लक्ष्मीः प्राणं सदा पातु वदनं पातु केशवः ॥ ७ ॥ गौरी तु रसनां पातु कण्ठं पातु महेश्वरः । स्कन्धदेशं रतिः पातु भुजौ तु मकरध्वजः ॥ ८ ॥ शङ्खनिधिः करौ पातु वक्षः पद्मनिधिस्तथा । ब्राह्मी मध्यं सदा पातु नाभिं पातु महेश्वरी ॥ ९ ॥ कौमारी पृष्ठदेशं तु गुह्यं रक्षतु वैष्णवी । वाराही च कटिं पातु चैन्द्री पातु पदद्वयम् ॥ १० ॥ भार्यां रक्षतु चामुण्डा लक्ष्मी रक्षतु पुत्रकान् । इन्द्रः पूर्वे सदा पातु आग्नेय्यामग्निदेवता ॥ ११ ॥ याम्ये यमः सदा पातु नैरृत्यां निरृतिस्तथा । पश्चिमे वरुणः पातु वायव्यां वायुदेवता ॥ १२ ॥ सौम्यां सोमः सदा पातु चैशान्यामीश्वरो विभुः । ऊर्ध्वं प्रजापतिः पातु ह्यधश्चाऽनन्तदेवता ॥ १३ ॥ राजद्वारे श्मशाने तु अरण्ये प्रान्तरे तथा । जले स्थले चाऽन्तरिक्षे शत्रूणां निवहे तथा ॥ १४ ॥ एताभिः सहिता देवी चतुर्बीजा महेश्वरी । प्रत्यङ्गिरा महाशक्तिः सर्वत्र मां सदाऽवतु ॥ १५ ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इति ते कथितं देवि सारात्सारं परात्परम् । सर्वार्थसाधनं नाम कवचं परमाद्भुतम् ॥ १६ ॥ अस्याऽपि पठनात्सद्यः कुबेरोऽपि धनेश्वरः । इन्द्राद्याः सकला देवाः धारणात्पठनाद्यतः ॥ १७ ॥ सर्वसिद्धीश्वराः सन्तः सर्वैश्वर्यमवाप्नुयुः । पुष्पाञ्जल्यष्टकं दत्त्वा मूलेनैव सकृत्पठेत् ॥ १८ ॥ संवत्सरकृतायास्तु पूजायाः फलमाप्नुयात् । प्रीतिमन्येऽन्यतः कृत्वा कमला निश्चला गृहे ॥ १९ ॥ वाणी च निवसेद्वक्त्रे सत्यं सत्यं न संशयः । यो धारयति पुण्यात्मा सर्वार्थसाधनाभिधम् ॥ २० ॥ कवचं परमं पुण्यं सोऽपि पुण्यवतां वरः । सर्वैश्वर्ययुतो भूत्वा त्रैलोक्यविजयी भवेत् ॥ २१ ॥ पुरुषो दक्षिणे बाहौ नारी वामभुजे तथा । बहुपुत्रवती भूयाद्वन्ध्याऽपि लभते सुतम् ॥ २२ ॥ ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि नैव कृन्तन्ति तत्तनुम् । एतत्कवचमज्ञात्वा यो जपेत्परमेश्वरीम् । दारिद्र्यं परमं प्राप्य सोऽचिरान्मृत्युमाप्नुयात् ॥ २३ ॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामलतन्त्रे पञ्चाङ्गखण्डे सर्वार्थसाधनं नाम श्री प्रत्यङ्गिरा कवचम् सम्पूर्णम् ॥

श्री प्रत्यङ्गिरा कवचम् (सर्वार्थसाधनम्) - परिचय (Introduction)

भारतीय तन्त्र साधना के इतिहास में माँ प्रत्यङ्गिरा का स्थान अद्वितीय और सर्वोच्च है। जिन्हें अथर्ववेद में 'अथर्वण भद्रकाली' और तंत्र शास्त्रों में 'महाकृत्या नाशिनी' कहा गया है, वे माँ प्रत्यंगिरा केवल शत्रुओं का नाश करने वाली देवी ही नहीं, अपितु अपने भक्तों की परम रक्षक माता भी हैं। रुद्रयामल तन्त्र, जो शिव और शक्ति के संवाद का महासागर है, उस पावन ग्रंथ के पञ्चाङ्ग खण्ड में इस अद्भुत 'सर्वार्थसाधनम् कवच' का वर्णन मिलता है।

'सर्वार्थसाधनम्' (Sarvartha Sadhanam) दो शब्दों से मिलकर बना है - 'सर्व' (सभी) और 'अर्थ' (प्रयोजन/उद्देश्य)। संसार में जितने भी कवच हैं, वे प्रायः किसी एक विशेष उद्देश्य की पूर्ति करते हैं - जैसे कोई रोग नाशक है, तो कोई शत्रु नाशक। परन्तु यह कवच अपने नाम के अनुरूप सम्पूर्णता का प्रतीक है। भगवान भैरव स्वयं देवी को बताते हैं कि यह कवच तीनों लोकों (त्रैलोक्ये) में अत्यंत दुर्लभ है और यह साधक को धर्म (Righteousness), अर्थ (Wealth), काम (Desires) और मोक्ष (Liberation) - चारों पुरुषार्थों की सिद्धि एक साथ प्रदान करने की क्षमता रखता है।

इस कवच की विशेषता यह है कि यह केवल बाह्य सुरक्षा ही नहीं करता, बल्कि आंतरिक चेतना को भी जागृत करता है। इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियों के साथ-साथ अष्टमातृकाओं (ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी आदि) का आह्वान किया गया है। जब साधक इसका पाठ करता है, तो ये दिव्य शक्तियाँ उसके शरीर के रोम-रोम में एक अभेद्य सुरक्षा चक्र (Protective Grid) का निर्माण करती हैं। यह चक्र इतना शक्तिशाली होता है कि बड़े से बड़े तांत्रिक अभिचार, ग्रह दोष और प्रारब्ध के कष्ट भी इसे भेद नहीं पाते।

आज के कलयुग में, जहाँ पग-पग पर इर्ष्या, द्वेष और अज्ञात भय व्याप्त है, यह कवच एक दिव्य ढाल के समान है। यह न केवल भय को दूर कर आत्मविश्वास भरता है, बल्कि साधक को कुबेर के समान ऐश्वर्य और वाग्देवी सरस्वती की कृपा भी प्रदान करता है।

कवच का भावार्थ और विशिष्टता (Deep Meaning)

इस कवच के श्लोकों में छिपा गूढ़ अर्थ साधक को देवत्व की ओर ले जाता है:
  • शिर और बुद्धि की रक्षा: कवच का आरम्भ ही 'प्रणव' (ओं) और 'वाग्भव' (ऐं - सरस्वती बीज) से होता है। यह स्पष्ट करता है कि माँ सबसे पहले साधक की बुद्धि और निर्णय क्षमता को शुद्ध करती हैं, क्योंकि सही ज्ञान ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
  • नेत्र और दृष्टि: 'लक्ष्मी' (श्री बीज) नेत्रों की रक्षा करती हैं। इसका अर्थ केवल आँखों की सुरक्षा नहीं, बल्कि 'दिव्य दृष्टि' और 'समृद्धि को देखने वाली दृष्टि' की प्राप्ति है।
  • कुबेर की निधियां: श्लोक 9 में 'शंखनिधि' और 'पद्मनिधि' का उल्लेख है जो हाथों और वक्षस्थल की रक्षा करती हैं। यह इस बात का संकेत है कि साधक के हाथों से होने वाले कर्म शुभ और धन-दायक होंगे, और उसका हृदय उदारता से भरा होगा।
  • दसों दिशाओं से रक्षण (Digbandhan): श्लोक 11 से 14 में इंद्र, अग्नि, यम, वरुण आदि दिकपालों का आह्वाहन है। यह 'दिग्बंधन' है, जो साधक को यह आश्वस्त करता है कि वह चाहे घर में हो, यात्रा में, श्मशान में या राजदरबार में - दसों दिशाओं से माँ उसकी रक्षा कर रही हैं।

फलश्रुति: इस कवच से क्या प्राप्त होता है? (Benefits)

रुद्रयामल तंत्र में भगवान भैरव ने इस कवच की महिमा का विस्तार से वर्णन किया है:
  • अखंड लक्ष्मी की प्राप्ति: "कुबेरोऽपि धनेश्वरः" - इस कवच का साधक धन के देवता कुबेर के समान ऐश्वर्यशाली हो जाता है। उसके घर में लक्ष्मी 'चंचला' नहीं, बल्कि 'निश्चला' बनकर स्थायी रूप से निवास करती हैं।

  • वाक सिद्धि (Power of Speech): श्लोक 20 के अनुसार, कवच का पाठ करने वाले के मुख में साक्षात सरस्वती का वास होता है। उसकी वाणी में सत्यता और प्रभाव आ जाता है; वह जो कहता है, वह सिद्ध होने लगता है।

  • वंशावली का विस्तार (Progeny): यह कवच वंश वृद्धि के लिए भी चमत्कारिक है। "वन्ध्याऽपि लभते सुतम्" - अर्थात जिन माताओं की गोद सूनी है, वे भी इस कवच के प्रभाव से तेजस्वी संतान प्राप्त करती हैं।

  • अजेय सुरक्षा (Invincibility): "त्रैलोक्यविजयी भवेत्" - साधक तीनों लोकों में विजयी होता है। ब्रह्मास्त्र जैसे विनाशकारी शस्त्र और मारण-मोहन जैसे तांत्रिक प्रयोग भी इस कवच से रक्षित व्यक्ति को स्पर्श नहीं कर पाते।

  • साधना की सफलता: यह सबसे महत्वपूर्ण चेतावनी भी है - "एतत्कवचमज्ञात्वा..." अर्थात जो साधक बिना इस कवच को धारण किए माँ प्रत्यंगिरा की साधना या मंत्र जप करता है, उसे सफलता तो दूर, मृत्यु तुल्य कष्ट और दरिद्रता भोगनी पड़ती है। इसलिए कवच साधना का आधार है।

पाठ और अनुष्ठान की विधि (Ritual Method)

नित्य पाठ विधि:

  1. पवित्रता: स्नानादि कर लाल वस्त्र धारण करें और लाल आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  2. संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करते हुए संकल्प लें।
  3. विनियोग और न्यास: श्लोक 5 में दिए गए विनियोग को पढ़कर जल छोड़ें। फिर श्लोक 6 से वर्णित न्यास (अंगों को स्पर्श करना) करें। यह अत्यंत आवश्यक है।
  4. पुष्पांजलि प्रयोग: श्लोक 18 में एक विशेष गुप्त विधि बताई गई है - "पुष्पाञ्जल्यष्टकं दत्त्वा"। पाठ शुरू करने से पहले माँ के चित्र या यंत्र पर 8 बार लाल फूल (या अक्षत) समर्पित करें। हर बार "ओं प्रत्यंगिरायै नमः" बोलें।
  5. पाठ: इसके बाद कवच का 1, 3 या 11 बार पाठ करें। पाठ उच्च स्वर में लेकिन स्पष्ट उच्चारण के साथ करें।
  6. धारण प्रयोग: यदि आप इसे ताबीज रूप में पहनना चाहते हैं, तो किसी शुभ मुहूर्त (जैसे रवि-पुष्य योग या नवरात्रि) में इसे भोजपत्र पर लाल चंदन या अष्टगंध से लिखें और धूप-दीप दिखाकर धारण करें।

FAQ - आपके प्रश्नों के उत्तर

1. 'सर्वार्थ साधन' और 'त्रैलोक्य विजय' कवच में क्या अंतर है?

'त्रैलोक्य विजय' कवच का मुख्य कार्य शत्रु नाश और युद्ध में विजय दिलाना है, जबकि 'सर्वार्थ साधन' कवच अधिक व्यापक है। यह सुरक्षा के साथ-साथ धन, विद्या, संतान और पारिवारिक सुख भी प्रदान करता है। गृहस्थों के लिए यह कवच अधिक संतुलित और लाभकारी माना जाता है।

2. क्या इस कवच के लिए किसी गुरु दीक्षा की आवश्यकता है?

यद्यपि तंत्र साधना में गुरु का मार्गदर्शन सर्वोपरि है, परन्तु यह कवच 'स्तोत्र' रूप में है और इसमें भगवान भैरव का आशीर्वाद निहित है। एक सामान्य भक्त भी पूर्ण श्रद्धा और पवित्रता के साथ माँ को ही गुरु मानकर इसका पाठ आरम्भ कर सकता है।

3. क्या मासिक धर्म के दौरान स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

नहीं, मासिक धर्म के दौरान 5 दिनों तक तांत्रिक और सात्विक साधनाएं वर्जित होती हैं। इस दौरान मानसिक जप किया जा सकता है, लेकिन विधि-विधान से कवच का पाठ और स्पर्श वर्जित है।

4. मेरे जीवन में बहुत कर्ज है, क्या यह कवच मदद करेगा?

अवश्य। श्लोक 9 में 'शंखनिधि' और 'पद्मनिधि' का उल्लेख और श्लोक 17 में 'कुबेर' का संदर्भ इसी ओर संकेत करता है। यह कवच दरिद्रता नाशक है। नियमित पाठ से आय के नए स्रोत खुलते हैं और कर्ज मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता है।

5. क्या इसे रोज पढ़ना जरूरी है या केवल विशेष दिनों में?

उत्तम परिणाम के लिए नित्य पाठ (Daily Recitation) सर्वश्रेष्ठ है। यदि नित्य संभव न हो, तो कम से कम प्रत्येक मंगलवार, शुक्रवार और अष्टमी/अमावस्या तिथि को अवश्य पाठ करें।

6. क्या यह कवच बच्चों को पहनाया जा सकता है?

हाँ, बच्चे प्रायः कोमल होते हैं और उन पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव जल्दी होता है। इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर और अभिमंत्रित करके बच्चों के गले में पहनाने से उनकी नजर दोष, भय और रोगों से रक्षा होती है।

7. पाठ करते समय दीपक कैसा जलाना चाहिए?

सौम्य कामनाओं (धन, शांति) के लिए गाय के घी का दीपक जलाएं। यदि शत्रु बाधा या तंत्र दोष निवारण के लिए पाठ कर रहे हैं, तो सरसों के तेल या तिल के तेल का दीपक जलाना श्रेयस्कर है।

8. क्या इस पाठ के बाद आरती करना जरूरी है?

हाँ, पाठ के समापन पर माँ की आरती या क्षमा प्रार्थना अवश्य करनी चाहिए। इससे पाठ में हुई किसी भी अनजाने भूल-चूक (त्रुटि) का परिमार्जन हो जाता है।

9. 'ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि...' का व्यावहारिक अर्थ क्या है?

इसका अर्थ है कि जीवन में आने वाली 'ब्रह्मास्त्र' जैसी बड़ी से बड़ी विपत्ति - चाहे वह कोई जानलेवा बीमारी हो, भयानक दुर्घटना हो या कोई कानूनी संकट - इस कवच के प्रभाव से निष्क्रिय हो जाती है और साधक सुरक्षित निकल आता है।

10. क्या मैं इसे मोबाइल या कंप्यूटर पर पढ़कर लाभ ले सकता हूँ?

श्रवण (सुनने) से भी लाभ होता है (श्लोक 4: "पठनाच्छ्रवणान्मर्त्य..."), लेकिन पूर्ण फल प्राप्ति के लिए स्वयं उच्चारण करके पढ़ना (पठन) ही श्रेष्ठ है। आप मोबाइल से देख सकते हैं, लेकिन उच्चारण स्वयं करें।