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Sri Pratyangira Suktam (Atharva Vedoktam) – श्री प्रत्यंगिरा सूक्तम् (अथर्ववेदोक्तम्) | Kritya Pariharan

Sri Pratyangira Suktam (Atharva Vedoktam) – श्री प्रत्यंगिरा सूक्तम् (अथर्ववेदोक्तम्) | Kritya Pariharan
॥ श्री प्रत्यंगिरा सूक्तम् (अथर्ववेदोक्तम्) ॥ (अ.वे.का-१०.सू-१) यां कल्पयन्ति वहतौ वधूमिव विश्वरूपां हस्तकृतां चिकित्सवः । सारादेत्वप नुदाम एनाम् ॥ १ ॥ शीर्षण्वती नस्वती कर्णिणी कृत्याकृता संभृता विश्वरूपा । सारादेत्वप नुदाम एनाम् ॥ २ ॥ शूद्रकृता राजकृता स्त्रीकृता ब्रह्मभिः कृता । जाया पत्या नुत्तेव कर्तारं बन्ध्वृच्छतु ॥ ३ ॥ अनयाहमोषध्या सर्वाः कृत्या अदूदुषम् । यां क्षेत्रे चक्रुर्यां गोषु यां वा ते पुरुषेषु ॥ ४ ॥ अघमस्त्वघकृते शपथः शपथीयते । प्रत्यक्प्रतिप्रहिण्मो यथा कृत्याकृतं हनत् ॥ ५ ॥ प्रतीचीन आङ्गिरसोऽध्यक्षो नः पुरोहितः । प्रतीचीः कृत्या आकृत्यामून्कृत्याकृतो जहि ॥ ६ ॥ यस्त्वोवाच परेहीति प्रतिकूलमुदाय्यऽम् । तं कृत्येऽभिनिवर्तस्व मास्मानिच्छो अनागसः ॥ ७ ॥ यस्ते परूंषि संदधौ रथस्येवर्भुर्धिया । तं गच्छ तत्र तेऽयनमज्ञातस्तेऽयं जनः ॥ ८ ॥ ये त्वा कृत्वालेभिरे विद्वला अभिचारिणः । शंभ्वीदं कृत्यादूषणं प्रतिवर्त्म पुनःसरं तेन त्वा स्नपयामसि ॥ ९ ॥ यद्दुर्भगां प्रस्नपितां मृतवत्सामुपेयिम । अपैतु सर्वं मत्पापं द्रविणं मोप तिष्ठतु ॥ १० ॥ यत्ते पितृभ्यो ददतो यज्ञे वा नाम जगृहुः । सन्देश्यात्सर्वस्मात्पापादिमा मुञ्चन्तु त्वौषधीः ॥ ११ ॥ देवैनसात्पित्र्यान्नामग्राहात्संदेश्याऽदभिनिष्कृतात् । मुञ्चन्तु त्वा वीरुधो वीर्येऽण ब्रह्मणा ऋग्भिः पयस ऋषीणाम् ॥ १२ ॥ यथा वातश्च्यावयति भूम्या रेणुमन्तरिक्षाच्चाभ्रम् । एवा मत्सर्वं दुर्भूतं ब्रह्मनुत्तमपायति ॥ १३ ॥ अप क्राम नानदती विनद्धा गर्दभीव । कर्तॄन्नक्षस्वेतो नुत्ता ब्रह्मणा वीर्याऽवता ॥ १४ ॥ अयं पन्थाः कृत्येति त्वा नयामोऽभिप्रहितां प्रति त्वा प्र हिण्मः । तेनाभि याहि भञ्जत्यनस्वतीव वाहिनी विश्वरूपा कुरूटिनी ॥ १५ ॥ पराक्ते ज्योतिरपथं ते अर्वागन्यत्रास्मदयना कृणुष्व । परेणेहि नवतिं नाव्या अति दुर्गाः स्रोत्या मा क्षणिष्ठाः परेहि ॥ १६ ॥ वात इव वृक्षान्नि मृणीहि पादय मा गामश्वं पुरुषमुच्छिष एषाम् । कर्तॄन् निवृत्येतः कृत्येऽप्रजास्त्वाय बोधय ॥ १७ ॥ यां ते बर्हिषि यां श्मशाने क्षेत्रे कृत्यां वलगं वा निचख्नुः । अग्नौ वा त्वा गार्हपत्येऽभिचेरुः पाकं सन्तं धीरतरा अनागसम् ॥ १९ ॥ उपाहृतमनुबुद्धं निखातं वैरं त्सार्यन्वविदाम कर्त्रम् । तदेतु यत आभृतं तत्राश्व इव वि वर्ततां हंतु कृत्याकृतः प्रजाम् ॥ १९ ॥ स्वायसा असयः संति नो गृहे विद्मा ते कृत्ये यतिधा परूंषि । उत्तिष्ठैव परेहीतोऽज्ञाते किमिहेच्छसि ॥ २० ॥ ग्रीवास्ते कृत्ये पादौ चापि कर्त्स्यामि निर्द्रव । इन्द्राग्नी अस्मान्रक्षतां यौ प्रजानां प्रजावती ॥ २१ ॥ सोमो राजाधिपा मृडिता च भूतस्य नः पतयो मृडयन्तु ॥ २२ ॥ भवाशर्वावस्यतां पापकृते कृत्याकृते । दुष्कृते विद्युतं देवहेतिम् ॥ २३ ॥ यद्येयथ द्विपदी चतुष्पदी कृत्याकृता संभृता विश्वरूपा । सेतोष्टापदी भूत्वा पुनः परेहि दुच्छुने ॥ २४ ॥ अभ्यक्ताक्ता स्वऽरंकृता सर्वं भरन्ती दुरितं परेहि । जानीहि कृत्ये कर्तारं दुहितेव पितरं स्वम् ॥ २५ ॥ परेहि कृत्ये मा तिष्ठो विद्धस्येव पदं नय । मृगः स मृगयुस्त्वं न त्वा निकर्तुमर्हति ॥ २६ ॥ उत हन्ति पूर्वासिनं प्रत्यादायापर इष्वा । उत पूर्वस्य निघ्नतो नि हन्त्यपरः प्रति ॥ २७ ॥ एतद्धि शृणु मे वचोऽथेहि यत एयथ । यस्त्वा चकार तं प्रति ॥ २८ ॥ अनागोहत्या वै भीमा कृत्ये मा नो गामश्वं पुरुषं वधीः । यत्रयत्रासि निहिता ततस्त्वोत्थापयामसि पर्णाल्लघीयसी भव ॥ २९ ॥ यदि स्थ तमसावृता जालेनाभिहिता इव । सर्वाः संलुप्येतः कृत्याः पुनः कर्त्रे प्र हिण्मसि ॥ ३० ॥ कृत्याकृतो वलगिनोऽभिनिष्कारिणः प्रजाम् । मृणीहि कृत्ये मोच्छिषोऽमून्कृत्याकृतो जहि ॥ ३१ ॥ यथा सूर्यो मुच्यते तमसस्परि रात्रिं जहात्युषसश्च केतून् । एवाहं सर्वं दुर्भूतं कर्त्रं कृत्याकृता कृतं हस्तीव रजो दुरितं जहामि ॥ ३२ ॥ ॥ इति अथर्ववेदोक्तं श्री प्रत्यंगिरा सूक्तम् (कृत्यापरिहरण सूक्तम्) सम्पूर्णम् ॥

अथर्ववेदीय प्रत्यंगिरा सूक्त: परिचय एवं रहस्य

श्री प्रत्यंगिरा सूक्तम् (Atharva Vedoktam) अथर्ववेद के १०वें काण्ड का प्रथम सूक्त है। इसे 'कृत्या परिहरण सूक्त' (Kritya Pariharan Sukta) भी कहा जाता है। वैदिक परंपरा में, जब भी किसी व्यक्ति, परिवार या राष्ट्र पर अदृश्य शत्रुओं का आक्रमण होता था, तो ऋषि अंगिरा द्वारा दृष्ट इस सूक्त का प्रयोग किया जाता था।

क्या है 'कृत्या'? 'कृत्या' वह नकारात्मक ऊर्जा या शक्ति है जिसे तांत्रिक विधियों से सिद्ध करके किसी के विनाश के लिए भेजा जाता है। यह एक 'गाइडेड मिसाइल' (Guided Missile) की तरह कार्य करती है। यह सूक्त एक 'एंटी-बैलिस्टिक मिसाइल' (Anti-Ballistic Missile) है जो उस कृत्या को बीच में ही रोककर, उसे वापस भेजने वाले के पास लौटा देती है।

इस सूक्त में देवी प्रत्यंगिरा से प्रार्थना है कि वे हमारे शत्रुओं द्वारा किए गए षड्यंत्रों, विष-प्रयोग और मारण-प्रयोगों को विफल करें और हमें पूर्ण सुरक्षा प्रदान करें।

सूक्त की मुख्य विशेषताएं

शत्रु का पराभव (Defeat of Enemy)

यह सूक्त स्पष्ट रूप से कहता है - "प्रतीचीः कृत्या आकृत्यामून्कृत्याकृतो जहि" - "हे देवी! तू वापस लौट जा और जिसने तुझे भेजा है, उसी का नाश कर।" यह शत्रु को उसी के जाल में फंसाने की विद्या है।

सर्व-दोष निवारण

चाहे वह श्मशान में किया गया प्रयोग हो, घर में गाड़ा गया 'वलग' हो, या अग्नि में दी गई आहुति हो - यह सूक्त हर तरह के अभिचार कर्म को जड़ से नष्ट कर देता है (श्लोक १८-१९)।

पूर्ण सुरक्षा (Ultimate Protection)

अंत में, ऋषि प्रार्थना करते हैं कि जैसे सूर्य अंधकार को मिटा देता है और हाथी धूल को झाड़ देता है, वैसे ही मैं अपने सभी पापों और दुर्भाग्य को झाड़कर फेंक देता हूँ (श्लोक ३२)।

पाठ के लाभ (Phala Shruti)

  • काला जादू (Black Magic) से मुक्ति: यह सूक्त काले जादू के प्रभाव को तत्काल समाप्त करने के लिए रामबाण है।
  • अकाल मृत्यु से रक्षा: यह साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनाता है।
  • मानसिक शांति: भय, चिंता और बुरे स्वप्नों का नाश होता है।
  • ग्रह बाधा निवारण: राहु-केतु और शनि जैसे क्रूर ग्रहों की पीड़ा शांत होती है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. अथर्ववेदीय प्रत्यंगिरा सूक्त का क्या महत्व है?

अथर्ववेद का यह सूक्त (काण्ड १०, सूक्त १) तंत्र और अभिचार कर्मों (Black Magic) के निवारण के लिए सर्वोच्च माना जाता है। इसमें 'कृत्या' (शत्रु द्वारा भेजी गई नकारात्मक शक्ति) को उसी के पास वापस लौटाने का विधान है।

2. 'कृत्या' (Kritya) किसे कहते हैं?

जो शक्ति विशेष तांत्रिक क्रियाओं से सिद्ध करके किसी के विनाश के लिए छोड़ी जाती है, उसे 'कृत्या' कहते हैं। यह अदृश्य होती है और पीड़ित के जीवन में दुर्भाग्य, रोग और मृत्यु तक ला सकती है।

3. क्या यह सूक्त केवल शत्रुओं के नाश के लिए है?

नहीं, यह मुख्य रूप से 'आत्म-रक्षा' (Self-Protection) के लिए है। यह एक 'वज्र-कवच' की तरह काम करता है। यदि कोई आप पर प्रहार करता है, तो यह सूक्त उस प्रहार को रोककर उसे वापस भेज देता है।

4. इस सूक्त में 'वलग' (Valaga) शब्द का क्या अर्थ है?

'वलग' का अर्थ है वह तांत्रिक वस्तु (जैसे हड्डी, बाल, पुतला आदि) जो शत्रु द्वारा पीड़ित के घर या जमीन में गाड़ दी जाती है। इस सूक्त के पाठ से ऐसे वलग निष्क्रिय हो जाते हैं।

5. क्या सामान्य व्यक्ति इसका पाठ कर सकता है?

हाँ, अपनी रक्षा के लिए कोई भी इसका पाठ कर सकता है। इसे क्रोध या बदले की भावना से नहीं, बल्कि माँ प्रत्यंगिरा के प्रति समर्पण और रक्षा की भावना से करना चाहिए।

6. श्लोक १ में 'वधूमिव' का उपमा क्यों दी गई है?

'वधूमिव' का अर्थ है 'बहू की तरह'। जैसे विदाई में बहू को आदर सहित ससुराल भेजा जाता है, वैसे ही हम इस कृत्या (दोदा) को आदर सहित उसके कर्ता (शत्रु) के घर वापस भेजते हैं।

7. क्या इसके पाठ से पितृ दोष भी दूर होता है?

हाँ, श्लोक १२ में 'पित्र्यात्' दोष निवारण की बात कही गई है। यह सूक्त पितृ-शाप और कुल-दोषों को भी शांत करने में सक्षम है।

8. पाठ के लिए कौन सा समय उपयुक्त है?

अमावस्या की रात्रि, ग्रहण काल, या मंगलवार/शनिवार की रात्रि में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है। इसे दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पढ़ना चाहिए।

9. क्या गर्भवती महिलाएं इसका पाठ कर सकती हैं?

गर्भवती महिलाओं को उग्र देवताओं की साधना से बचना चाहिए। वे सामान्य देवी स्तोत्रों का पाठ करें। प्रत्यंगिरा सूक्त का पाठ उनके लिए किसी योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही उचित है।

10. श्लोक २७ की क्या विशेषता है?

इस श्लोक में 'प्रति-संहार' का सिद्धांत है। यह कहता है कि जो पहले मारता है उसे मारना पाप नहीं, बल्कि न्याय है। यह सूक्त 'जैसा को तैसा' (Tit for Tat) के दिव्य न्याय को स्थापित करता है।